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परिवर्तिनी एकादशी

पढ़ें परिवर्तिनी एकादशी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सनातन धर्म में 'परिवर्तिनी एकादशी' (Parivartini Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। इसे 'पद्मा एकादशी', 'जयंती एकादशी', 'डोल ग्यारस' और 'वामन एकादशी' जैसे अत्यंत पवित्र नामों से भी पुकारा जाता है। पौराणिक और शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) को क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन होने के बाद, भगवान श्रीहरि विष्णु इस पावन तिथि को अपनी करवट बदलते हैं। भगवान के करवट बदलने (परिवर्तन) के कारण ही इस तिथि को 'परिवर्तिनी एकादशी' कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु के पांचवें अवतार 'भगवान वामन' की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्रत साधक के जीवन में आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाता है, संचित पापों का शमन करता है और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इस व्यापक शोधपूर्ण लेख में हम इस व्रत के शास्त्रीय स्वरूप, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, पौराणिक कथा और इसके दार्शनिक महत्व का सविस्तार विवेचन करेंगे।

त्योहार की तिथि एवं शुभ मुहूर्त | Festival Date & Shubh Muhurat

सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत पूर्ण श्रद्धा और नियम-संयम के साथ रखा जाता है। वर्ष 2026 में परिवर्तिनी एकादशी की महत्वपूर्ण तिथियां और शुभ मुहूर्त निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत हैं:

विवरण (Festival Event) दिनांक एवं समय (Date & Time)
एकादशी तिथि प्रारंभ 21 सितंबर 2026, दोपहर 02:15 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त 22 सितंबर 2026, दोपहर 12:30 बजे तक
उदयातिथि एवं व्रत तिथि 22 सितंबर 2026 (मंगलवार)
पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06:10 बजे से सुबह 09:15 बजे तक (अमृत चौघड़िया)
अभिजीत मुहूर्त (विशेष साधना हेतु) दोपहर 11:50 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
व्रत पारण का समय (Parana Time) 23 सितंबर 2026, सुबह 06:12 बजे से सुबह 08:35 बजे के बीच

त्योहार का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Religious & Spiritual Significance

परिवर्तिनी एकादशी का महत्व पद्म पुराण और महाभारत में युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण के संवाद के रूप में अत्यंत विस्तार से वर्णित है। इस एकादशी को बहुआयामी महत्व प्राप्त है:

  • योगनिद्रा में करवट बदलना: आषाढ़ मास से प्रारंभ होने वाले चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु शयन मुद्रा में होते हैं। भाद्रपद शुक्ल एकादशी को उनके शयन का आधा समय पूर्ण हो जाता है, और वे दाईं से बाईं करवट लेते हैं। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह में एक बड़े परिवर्तन का प्रतीक है।
  • वामन अवतार की पूजा: इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है। शास्त्रों का कथन है कि जो मनुष्य इस दिन वामन देव की श्रद्धापूर्वक अर्चना करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
  • पापों से मुक्ति: जाने-अनजाने में किए गए कायिक, वाचिक और मानसिक पापों के प्रायश्चित के लिए यह व्रत अमोघ माना गया है। इस दिन व्रत रखने से साधक के जीवन के अंधकारमय पक्ष का अंत होता है और उसमें दैवीय गुणों का संचार होता है।
  • लक्ष्मी-नारायण की संयुक्त कृपा: इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता महालक्ष्मी की आराधना करने से घर में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का वास होता है। साधक को जीवन में कभी भी आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ता।

त्योहार का पौराणिक एवं धार्मिक इतिहास | Mythological Background

परिवर्तिनी एकादशी का ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ त्रेतायुग में भगवान विष्णु द्वारा लिए गए अत्यंत दिव्य 'वामन अवतार' से जुड़ा हुआ है। जब असुरराज बलि ने अपनी शक्ति, तप और यज्ञों के बल पर तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया, तब देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में गए। देवताओं की रक्षा और ब्रह्मांडीय संतुलन को पुनः स्थापित करने के लिए भगवान विष्णु ने महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में 'वामन' (बौने ब्राह्मण) के रूप में अवतार लिया।

भगवान वामन ने राजा बलि की दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए उनके यज्ञ स्थल पर प्रस्थान किया। राजा बलि अत्यंत दानी थे और उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि उनके द्वार से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं जाएगा। भगवान वामन ने राजा बलि से केवल तीन पग भूमि दान में मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य ने वामन देव के वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया और बलि को दान देने से रोका, परंतु धर्मनिष्ठ राजा बलि अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे और उन्होंने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया। इसके बाद जो घटित हुआ, वह संपूर्ण सृष्टि के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

त्योहार से जुड़ी पौराणिक कथा | Associated Mythological Katha

धर्मराज युधिष्ठिर के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण ने इस पावन एकादशी व्रत कथा का श्रवण कराया था, जो इस प्रकार है:

त्रेतायुग में बलि नाम का एक दानवीर असुर राजा था। वह अत्यंत ऐश्वर्यशाली, सत्यवादी और ब्राह्मणों का सेवक था। उसने अपने तपोबल से इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। दुखी होकर देवराज इंद्र और अन्य देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और स्तुति करते हुए बोले—"हे प्रभो! हमारी रक्षा कीजिए। राजा बलि ने हमारा स्वर्ग छीन लिया है।"

देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया। वे हाथ में छत्र और कमंडल लेकर राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। राजा बलि ने उनका आदर-सत्कार किया और उनसे इच्छा अनुसार दान मांगने को कहा। वामन देव ने मुस्कुराते हुए कहा—"हे राजन! मुझे अपने पैरों से नापकर केवल तीन पग भूमि चाहिए।" राजा बलि ने इसे अत्यंत तुच्छ मांग समझा और हंसते हुए कहा—"हे बटुक! आप केवल तीन पग भूमि मांग रहे हैं? आप मुझसे बड़ा राज्य मांग सकते थे, परंतु यदि आपकी यही इच्छा है, तो मैं संकल्प करता हूँ।"

जैसे ही संकल्प का जल राजा बलि के हाथ से गिरा, भगवान वामन ने अपना विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने अपने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी और भूलोक को नाप लिया। दूसरे पग में उन्होंने स्वर्गलोक, अंतरिक्ष और सभी दिशाओं को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा था। भगवान वामन ने राजा बलि से पूछा—"हे राजन! अब मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ?"

सत्यवादी और पूर्ण समर्पित राजा बलि ने नम्रतापूर्वक अपना सिर झुका दिया और कहा—"हे भगवन! आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।" भगवान वामन राजा बलि की इस अनन्य शरणागति और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना पैर बलि के मस्तक पर रखा, जिससे वे पाताल लोक (सुतल लोक) चले गए। भगवान ने बलि को पाताल लोक का स्वामी बना दिया और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि वे स्वयं उनके महल के द्वारपाल बनकर सदैव उनकी रक्षा करेंगे।

भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु का एक अंश राजा बलि के पास पाताल लोक में निवास करने गया था और दूसरा अंश क्षीर सागर में शेषशय्या पर विराजमान रहा, जहाँ उन्होंने करवट बदली। इसी कारण इस दिन का महत्व अनंत गुना बढ़ जाता है।

पूजा की तैयारी एवं सामग्री सूची | Puja Preparation & Complete Samagri List

परिवर्तिनी एकादशी की पूजा को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पवित्र सामग्रियों को पहले से ही एकत्रित कर लेना चाहिए:

सामग्री का नाम (Puja Item) धार्मिक महत्व एवं उपयोग (Significance & Use)
भगवान वामन/विष्णु की प्रतिमा पूजन के मुख्य केंद्र बिंदु के रूप में स्थापना हेतु
पीला वस्त्र एवं चौकी भगवान को आसन देने और स्वयं धारण करने के लिए
तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) भगवान विष्णु के भोग के लिए अनिवार्य (एकादशी को न तोड़ें, पहले से रखें)
गंगाजल एवं पंचामृत अभिषेक और शुद्धि के लिए
पीले पुष्प, फल एवं नैवेद्य भगवान विष्णु के प्रिय रंग के अनुसार अर्पण हेतु
धूप, दीप, कपूर एवं कलावा आरती और रक्षा सूत्र बांधने के लिए
रोली, अक्षत (बिना टूटे चावल) तिलक लगाने के लिए (ध्यान रहे, एकादशी को अक्षत चढ़ाना वर्जित माना जाता है, केवल तिल का प्रयोग करें)

पूजा विधि एवं चरण | Step-by-step Puja Vidhi

परिवर्तिनी एकादशी के दिन की जाने वाली पूजा को निम्नलिखित चरणों में व्यवस्थित रूप से संपन्न करना चाहिए:

  1. प्रातःकाल जागरण एवं स्नान: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की सफाई करें। इसके बाद गंगाजल युक्त जल से स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें।
  2. व्रत का संकल्प: पूजा घर में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल, अक्षत (तिल) और पुष्प लेकर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें—"हे लक्ष्मीपति भगवान विष्णु, मैं आज परिवर्तिनी एकादशी का निराहार/फलाहार व्रत रखने का संकल्प लेता/लेती हूँ। मेरी यह साधना निर्विघ्न पूर्ण हो।"
  3. वेदी निर्माण एवं घट स्थापना: एक लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही भगवान वामन देव का स्मरण करें।
  4. अभिषेक एवं श्रृंगार: भगवान को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। उन्हें पीले वस्त्र, पीले फूल, चंदन, और यज्ञोपवीत अर्पित करें। माता लक्ष्मी को लाल चुनरी और सुहाग सामग्री अर्पित करें।
  5. धूप-दीप एवं नैवेद्य अर्पण: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। धूप जलाएं। भगवान को ऋतुफल, मावे के पेड़े या मखाने की खीर का भोग लगाएं। याद रखें कि भोग में तुलसी दल अवश्य सम्मिलित होना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते।
  6. मंत्र जप एवं कथा श्रवण: शांत चित्त से बैठकर भगवान वामन की कथा का श्रवण या पठन करें। इसके बाद लक्ष्मी गायत्री मंत्र और भगवान विष्णु के अष्टाक्षर मंत्र का जप करें।
  7. आरती एवं क्षमा प्रार्थना: पूजा के अंत में भगवान विष्णु की आरती और माता लक्ष्मी की आरती गाएं। आरती के बाद अनजाने में हुई भूलचूक के लिए भगवान से क्षमा प्रार्थना करें।

व्रत के नियम एवं सावधानियां | Vrat Rules & Do's and Don'ts

एकादशी व्रत की पूर्णता और उसका आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में कुछ कड़े नियम और सावधानियां बताई गई हैं, जिनका पालन प्रत्येक साधक को अवश्य करना चाहिए:

क्या करें (Do's):

  • दशमी तिथि की रात्रि से ही सात्विक जीवन शैली अपनाएं और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • पूरे दिन मन में सकारात्मक विचार रखें और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का मानसिक जप करते रहें।
  • यदि पूर्ण उपवास संभव न हो, तो केवल एक बार फलाहार (दूध, फल, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा) ग्रहण करें।
  • गरीबों, ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।

क्या न करें (Don'ts):

  • एकादशी के दिन भूलकर भी चावल (अन्न) का सेवन न करें। माना जाता है कि इस दिन चावल खाने से रेंगने वाले जीव की योनि मिलती है।
  • घर में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा या किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का प्रवेश और सेवन पूरी तरह वर्जित रखें।
  • क्रोध, वाद-विवाद, परनिंदा (दूसरों की बुराई) और झूठ बोलने से बचें। अपनी वाणी पर पूर्ण नियंत्रण रखें।
  • इस दिन बाल काटना, नाखून काटना या दाढ़ी बनाना वर्जित माना गया है।

पावन मंत्र, श्लोक, आरती एवं चालीसा | Sacred Mantras, Shloks, Aarti & Chalisa

परिवर्तिनी एकादशी के दिन निम्नलिखित मंत्रों और स्तोत्रों का पाठ करने से साधक को अमोघ फल की प्राप्ति होती है:

भगवान विष्णु का ध्यान मंत्र:

शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

भगवान वामन का प्रार्थना मंत्र:

देवेश्वराय देवाय देवसंभूति कारिणे।
प्रभावे सर्वदेवानां वामनाय नमो नमः॥

इस पावन दिन पर श्री विष्णु चालीसा और श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और नकारात्मक ऊर्जा का समूल नाश होता है।

पारंपरिक भोग एवं प्रसाद | Traditional Bhog / Prasad

परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान वामन और माता लक्ष्मी को सात्विक और प्रिय भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से निम्नलिखित नैवेद्य तैयार किए जाते हैं:

  • मखाने की खीर: गाय के शुद्ध दूध, मखाने और मेवों से बनी खीर भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसमें तुलसी पत्र डालकर अर्पित करें।
  • पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल को मिलाकर बनाया गया पंचामृत इस दिन के अभिषेक और प्रसाद का मुख्य हिस्सा होता है।
  • सिंघाड़े का हलवा: व्रत रखने वाले साधकों के लिए सिंघाड़े के आटे और शुद्ध घी से बना हलवा उत्तम प्रसाद माना जाता है।
  • ऋतुफल: केले, सेब, और नारियल जैसे ताजे फलों का भोग भी भगवान को लगाया जाता है।

क्षेत्रीय परंपराएं एवं प्रमुख मंदिर | Regional Traditions & Celebrations

भारत के विभिन्न राज्यों में परिवर्तिनी एकादशी को अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाया जाता है:

  • मध्य प्रदेश और राजस्थान (डोल ग्यारस): इन राज्यों में इस पर्व को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण और विष्णु जी के बाल स्वरूप की मूर्तियों को सुंदर डोल (पालकियों) में बिठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। मंदिरों में भजन-कीर्तन और लोक नृत्यों का आयोजन होता है।
  • दक्षिण भारत (वामन जयंती): दक्षिण भारत के केरल और तमिलनाडु राज्यों में इस दिन को वामन जयंती के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से केरल के तृक्काकरा वामनमूर्ति मंदिर में इस दिन अद्भुत उत्सव और विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।
  • ओडिशा (पद्मा एकादशी): जगन्नाथ पुरी मंदिर में इस दिन भगवान जगन्नाथ का विशेष श्रृंगार किया जाता है और उन्हें पद्म (कमल) के पुष्पों से सजाया जाता है।

त्योहार से मिलने वाली आध्यात्मिक सीख | Spiritual Message & Life Lessons

परिवर्तिनी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के गहरे दार्शनिक सत्यों से परिचित कराती है:

  • परिवर्तन ही संसार का नियम है: भगवान विष्णु का करवट बदलना हमें सिखाता है कि जीवन में परिस्थितियां कभी एक जैसी नहीं रहतीं। सुख और दुख, उत्थान और पतन जीवन के चक्र हैं। हमें हर परिस्थिति में समभाव रहना चाहिए।
  • अहंकार का विसर्जन: राजा बलि के पास सब कुछ था, लेकिन जब उन्होंने अपना सर्वस्व (यहाँ तक कि अपना मस्तक भी) भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया, तब वे अमर हो गए। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची शरणागति और निरहंकारिता ही ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है।
  • दान की महिमा: राजा बलि की दानशीलता हमें प्रेरित करती है कि हमारे पास जो कुछ भी है, उसका एक अंश समाज कल्याण और धर्म के कार्यों में अवश्य लगाना चाहिए।

एक नजर में महत्वपूर्ण जानकारी | Quick Festival Information

मुख्य बिंदु (Key Point) संक्षिप्त विवरण (Quick Details)
त्योहार का नाम परिवर्तिनी एकादशी (पद्मा / जयंती / वामन एकादशी)
मुख्य आराध्य देव भगवान विष्णु (वामन अवतार) एवं माता महालक्ष्मी
पंचांग तिथि भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि
मुख्य अनुष्ठान व्रत, वामन कथा श्रवण, दान, रात्रि जागरण, दीपदान
मुख्य प्रसाद मखाने की खीर, पंचामृत, ऋतुफल (तुलसी दल सहित)
आध्यात्मिक लाभ पापों का नाश, मानसिक शांति, आर्थिक समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति

त्योहार की शुभकामनाएं एवं संदेश | Festival Wishes & Greetings

इस पावन पर्व पर अपने प्रियजनों को शुभकामनाएं भेजने के लिए कुछ चुनिंदा संदेश यहाँ दिए गए हैं:

"करवट बदलें आज देव मुरारी, हर लें विपदा आपकी सारी।
परिवर्तिनी एकादशी के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं!"

"भगवान वामन की कृपा आप पर सदैव बनी रहे, आपके जीवन से अंधकार दूर हो और सुख-समृद्धि का वास हो। शुभ परिवर्तिनी एकादशी!"

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। भाद्रपद शुक्ल एकादशी को उनकी निद्रा के दो महीने पूरे होते हैं और वे इस दिन करवट बदलते हैं। इसी करवट बदलने (परिवर्तन) के कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु के पांचवें अवतार 'भगवान वामन' की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन वामन देव की पूजा करने से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।

नहीं, सनातन धर्म में किसी भी एकादशी के दिन चावल खाना पूरी तरह वर्जित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन चावल खाने से मनुष्य का मन चंचल होता है और वह पाप कर्मों की ओर प्रवृत्त हो सकता है।

व्रत का पारण हमेशा एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को सूर्योदय के पश्चात शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। पारण के समय सबसे पहले भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें, फिर जल या सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत खोलें।

दोनों एक ही तिथि के नाम हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में परिवर्तिनी एकादशी को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है, जहाँ भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप को पालकी (डोल) में बिठाकर उत्सव मनाया जाता है।

गर्भवती महिलाओं, बीमार व्यक्तियों और वृद्धों के लिए उपवास के कड़े नियमों में छूट दी गई है। वे निराहार रहने के बजाय फलाहार या दूध का सेवन करके मानसिक रूप से व्रत का पालन कर सकती हैं।

चूंकि यह दिन भगवान वामन (जो स्वयं याचक बनकर राजा बलि के पास दान मांगने आए थे) को समर्पित है, इसलिए इस दिन अन्न, वस्त्र, छाता, दही या तांबे के बर्तनों का दान करना अत्यंत शुभ और अक्षय पुण्य प्रदाता माना गया है।

नहीं, एकादशी तिथि को तुलसी के पत्ते तोड़ना महापाप माना गया है। पूजा के लिए तुलसी के पत्ते हमेशा एक दिन पूर्व (दशमी तिथि को) ही तोड़कर रख लेने चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे पद्म पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण और पारंपरिक हिंदू पंचांग के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दी गई तिथियां और शुभ मुहूर्त ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने स्थानीय पंचांग और पुरोहितों से भी परामर्श अवश्य लें। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक मार्गदर्शन और ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पद्म पुराण: उत्तर खंड (एकादशी महात्म्य प्रसंग)
  • श्रीमद्भागवत महापुराण: अष्टम स्कंध (वामन अवतार एवं राजा बलि प्रसंग)
  • निर्णय सिंधु: व्रत एवं त्योहार निर्णय खंड
  • पारंपरिक ज्योतिषाचार्य एवं राष्ट्रीय पंचांग गणना (संवत 2083)

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 09 Oct 2026

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