Papmochani Ekadashi Vrat Katha मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

ऐगिरी नंदिनी भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें ऐगिरी नंदिनी भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

माँ दुर्गा का दिव्य स्तोत्र एवं महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र

ऐगिरी नंदिनी नन्दित मेदिनि विश्व विनासिनी नंडिनुते... माता दुर्गा के परम पावन, ओजस्वी और ऊर्जावान स्वरूप को समर्पित 'ऐगिरी नंदिनी नन्दित मेदिनि' (महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र) सनातन संस्कृति का एक ऐसा दिव्य काव्य है, जिसके श्रवण मात्र से ही अंतर्मन में अद्भुत शक्ति, वीरता और भक्ति का संचार हो जाता है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र माँ आदिशक्ति जगदम्बा के उस पराक्रमी रूप का बखान करता है, जिसमें उन्होंने समस्त ब्रह्मांड की रक्षा के लिए महाबली असुर महिषासुर का संहार किया था। नवरात्रि के पावन पर्व, दुर्गा पूजा, और दैनिक साधना के दौरान इस स्तोत्र का गायन और स्मरण साधक को मानसिक शक्ति, निर्भयता और आंतरिक ऊर्जा प्रदान करता है। यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह लय, ताल और नाद का एक ऐसा अद्भुत संयोजन है जो सीधे देवी के चरणों से जोड़ता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दि नुते,
गिरिवर विन्ध्य शिरोधि निवासिनि विष्णु विलासिनी जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठ कुटुम्बिणि भूरि कुटुंबिणि ਭूरि कृते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि सुतसेते ॥

सुरवर वर्षिणि दुर्नध धर्णिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरते,
त्रिभुवन पोषिणि शंकर तोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते।
दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि सुतसेते ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रिय वासिनी हासरते,
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग मयूर वाहन मत्त मयूराचरते।
अजित महाटक भङ्ग सुरङ्ग विभूषित शङ्ग विराजकुचे,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि सुतसेते ॥

अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित गंड सुशोण्ड पते,
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते।
निज भुज दण्ड निपातित खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि सुतसेते ॥

अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित दुर्धर निर्जर शक्तिभृते,
चतुर विचार धुरीण महाशिव दूतगण प्रमथारिपते।
दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानव दूत कृतान्तमते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि सुतसेते ॥

अयि शरणागत वैरि वधूवर वीर वराभय दायकते,
त्रिभुवन मस्तक वेद विरोजन धर्धि शिरोधिय पालयते।
अचल सुता सुत राजित मध्य गणेष्ट जनस्य च सौख्यदते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि सुतसेते ॥

धनु रण दण्ड मुखीकृत दण्ड दुराधर खण्ड दुराशयते,
अयि चरण गत देव मुनि वर संभृत भुत सकलकते।
कमल दलायित कोमल कान्ति कला कलिता मल भाललते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि सुतसेते ॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के रूप में प्रसिद्ध यह पावन रचना आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। इसका प्रत्येक पद माता दुर्गा के असीम पराक्रम और उनके करुणापूर्ण स्वभाव का सुंदर संतुलन प्रस्तुत करता है। पहले पद में आचार्य जी कहते हैं कि हे विंध्याचल की पहाड़ियों पर निवास करने वाली, समस्त संसार को आनंदित करने वाली और भगवान विष्णु की शक्ति स्वरूपा भगवती! आप नीलकंठ (शिवजी) की कुटुंबिनी हैं और समस्त ब्रह्मांड आपका परिवार है। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली माता, आपकी जय हो।

भजन के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि जब-जब संसार में अधर्म, अहंकार और असत्य का बोलबाला होता है, तब-तब आदिशक्ति दुर्गा दुष्टों का संहार करने के लिए प्रकट होती हैं। माता का यह रूप साधक को सिखाता है कि जीवन के संघर्षों और आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) का दमन करने के लिए भीतर अपार शक्ति और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। यह भजन केवल युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के अंधकार पर ज्ञान और प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इसे गाने और सुनने से मन का भय दूर होता है और साधक में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मबल और निर्भयता का संचार होता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह स्तोत्र सनातन धर्म में अत्यंत उच्च स्थान रखता है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • दिव्य रचनाकार: इस महाकाव्य स्तोत्र के रचयिता अद्वैत वेदान्त के प्रणेता आदि गुरु शंकराचार्य हैं।
  • लय और ताल का अद्भुत मेल: इस स्तोत्र की रचना द्रुत गति (Fast rhythm) और अनुप्रासयुक्त शब्दों में की गई है, जो श्रवण मात्र से ही व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर देती है।
  • शक्ति और भक्ति का संगम: यह भजन साधक के भीतर पराक्रम (वीर रस) और भक्ति (भक्ति रस) दोनों का एक साथ संचार करता है।
  • नकारात्मकता का नाश: इसके नियमित पाठ से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और मानसिक शांति मिलती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस ओजस्वी भजन का गायन विशेष अवसरों पर अत्यंत फलदायी माना जाता है:

  • नवरात्रि के नौ दिन: शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान सुबह और संध्या आरती के समय इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
  • दैनिक पूजा: प्रातःकाल स्नान के बाद माता दुर्गा के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर इसे पढ़ा जा सकता है।
  • धार्मिक अनुष्ठान: हवन, जागरण, और कन्या पूजन के समय इस स्तोत्र का गान वातावरण को पवित्र कर देता है।

गायन के समय शुद्धता, स्पष्ट उच्चारण और माता के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव होना अनिवार्य है। आप चाहें तो श्री हनुमान चालीसा की भांति इसे अपनी दैनिक साधना का हिस्सा बना सकते हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस स्तोत्र की आराध्य देवी माँ दुर्गा हैं, जिन्हें पराशक्ति, महामाया और जगदम्बा भी कहा जाता है। वे त्रिशूल, चक्र और विभिन्न अस्त्रों से सुसज्जित होकर भक्तों की रक्षा करती हैं। इस दिव्य स्तोत्र के रचयिता जगतगुरु आदि शंकराचार्य हैं, जिन्होंने भारत के चारों कोनों में मठों की स्थापना की और सनातन धर्म को पुनर्जीवित किया। आदि शंकराचार्य ने माँ भगवती के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति में अनेक स्तोत्र रचे, जिनमें 'महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र' का स्थान सर्वोपरि माना जाता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब महिषासुर नामक राक्षस ने अपने बल और अहंकार से तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मचा दी थी और देवता भी स्वर्ग छोड़कर भागने को विवश हो गए थे, तब समस्त देवताओं के सम्मिलित तेज से माँ दुर्गा का प्रादुर्भाव हुआ। माता ने महासंग्राम के पश्चात महिषासुर का वध किया और ब्रह्मांड को भयमुक्त किया। सदियों पश्चात आदि शंकराचार्य ने जब भारत भ्रमण किया, तब उन्होंने माँ दुर्गा के इस पराक्रम और लीला का स्मरण करते हुए संस्कृत के अत्यंत ओजस्वी और प्रवाहमयी शब्दों में इस स्तोत्र की रचना की, ताकि आने वाली पीढ़ियां वीरता और धर्म के मार्ग पर अडिग रह सकें।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है, किंतु इसकी शब्दावली इतनी संगीतमय और लयबद्ध है कि इसे बिना संस्कृत के गहरे ज्ञान के भी आसानी से गाया जा सकता है। इसमें अनुप्रास अलंकार और महाप्राण ध्वनियों का अद्भुत प्रयोग हुआ है, जो इसके उच्चारण को एक विशेष प्रकार की कंपन और ऊर्जा से भर देता है। शब्दों की यह गूंज मन और मस्तिष्क को एकाग्र करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें यह सिखाता है कि जीवन में कठिनाइयों, विकारों और अन्याय के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए। महिषासुर हमारे भीतर छिपे हुए अहंकार, अज्ञान और नकारात्मक वृत्तियों का प्रतीक है। जब साधक माँ दुर्गा की शरण में जाता है, तो भगवती उसकी भीतर की बुराइयों का नाश कर देती हैं। यह भजन हमें धीरज, साहस, सेवा, और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना ही इस भजन का मूल संदेश है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ
ऐगिरी नंदिनि पर्वतराज (हिमालय या विंध्य) की पुत्री माता पार्वती / दुर्गा
नन्दित मेदिनि पृथ्वी को आनंदित करने वाली माँ की कृपा से संसार में सुख
महिषासुरमर्दिनि महिषासुर राक्षस का वध करने वाली अधर्म का नाश करने वाली
शितिकण्ठ कुटुम्बिणि भगवान शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती का स्वरूप
सिन्धुसुते समुद्र की पुत्री (लक्ष्मी जी का संकेत) या नदी स्वरूपा पवित्रता और समृद्धि

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि..." - हे पर्वतों की पुत्री, पूरी पृथ्वी को प्रसन्न करने वाली, समस्त विश्व को आनंदित करने वाली और नन्दिकेश्वर द्वारा पूजित माता!

"गिरिवर विन्ध्य शिरोधि निवासिनि..." - विंध्याचल पर्वत की चोटी पर निवास करने वाली, भगवान विष्णु द्वारा शोभित और इंद्र (जिष्णु) द्वारा वंदित माँ!

"भगवति हे शितिकण्ठ कुटुम्बिणि..." - हे भगवती, नीलकंठ भगवान शिव की संगिनी, विशाल परिवार वाली और प्रचुर कृपा बरसाने वाली माँ! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली माता, आपकी जय हो।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ-साथ साधक को माँ दुर्गा के बीज मंत्र का भी जाप करना चाहिए:

« ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे »

यह नवार्ण मंत्र माँ दुर्गा के तीनों स्वरूपों (महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती) की संयुक्त आराधना का पावन मंत्र है।

साथ ही आप शिव तांडव स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं, जो भगवान शिव के तांडव और ऊर्जा का प्रतीक है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन / स्तोत्र का नाम ऐगिरी नंदिनी भजन (महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र)
आराध्य देवी माँ दुर्गा / भगवती आदिशक्ति
رचनाकार / रचयिता आदि गुरु शंकराचार्य
भाषा संस्कृत / हिंदी भाव
मुख्य थीम / भाव वीर रस, भक्ति, शक्ति, और दुष्टों का संहार
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, दुर्गा पूजा, हवन, और दैनिक साधना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध स्तोत्र (ऐगिरी नंदिनी भजन) के रचयिता महान अद्वैत दार्शनिक और संत आदि गुरु शंकराचार्य हैं।

इसके नियमित पाठ से मन का भय दूर होता है, आत्मबल बढ़ता है, नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और माँ दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

नहं, हालांकि नवरात्रि के दौरान इसका विशेष महत्व है, किंतु इसे प्रतिदिन प्रातःकाल या संध्या वंदन के समय भी पूरी श्रद्धा के साथ गाया जा सकता है।

यह मूल रूप से अत्यंत संस्कृत और ओजस्वी पदावली में रचित है, जिसे हिंदी और अन्य भाषाओं में भावार्थ सहित गाया व समझा जाता है।

हाँ, इसकी लय और ताल इतनी आकर्षक है कि बच्चे इसे बहुत जल्दी और उत्साह के साथ सीख जाते हैं, जिससे उनकी उच्चारण क्षमता भी मजबूत होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख Bhaktilok.in के उच्च कोटि के धार्मिक और साहित्यिक मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। इसमें पाठकों की सुविधा के लिए मूल संस्कृत पद, हिंदी लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ और प्रासंगिक जानकारियों को सहेजा गया है। यह सामग्री "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत पूरी तरह प्रामाणिक और उपयोगी है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत पुराण एवं मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती संदर्भ)
  • आदि शंकराचार्य विरचित स्तोत्र संग्रह
  • सनातन सांस्कृतिक परंपरा और लोक संकीर्तन ग्रंथ

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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