"अखियां रोवना छम छम भजन" सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा का एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी उदाहरण है। यह भजन मुख्य रूप से देवी दुर्गा (मैया शेरावाली) को समर्पित है, जिसमें एक भक्त की अपनी आराध्य मां के प्रति विरह-वेदना, अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का सजीव चित्रण किया गया है। पंजाबी लोक संगीत और हिंदी काव्य के अद्भुत संगम से निर्मित यह भजन श्रोताओं और साधकों के अंतर्मन में भक्ति रस का संचार करता है। जब कोई भक्त संसार के प्रपंचों से थककर अपनी परम माता के चरणों में शरण लेता है, तो उसके नेत्रों से बहने वाले अश्रु ही उसकी प्रार्थना बन जाते हैं। इस भजन के माध्यम से जीवात्मा अपनी मूल चेतना यानी परमात्मा रूपी मां से मिलने के लिए व्याकुल दिखाई देती है। नवरात्रि, देवी जागरण, माता की चौकी और दैनिक संध्या वंदन के समय इस भजन का गायन साधक को एक अलौकिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
अखियां रोवना छम छम भजन लिरिक्स
स्थायी (मुखड़ा):
अखियां रोवना छम छम, नी माए तैनू याद करके।
याद करके नी माए, याद करके।
अखियां रोवना छम छम, नी माए तैनू याद करके॥
अंतरा 1:
तेरे बिना मेरा कोई ना सहारा,
तू ही मेरी नैया, तू ही है किनारा।
भवसागर विच डोले मेरी नैया,
पार लगा दे शेरावालिए मैया।
अखियां रोवना छम छम, नी माए तैनू याद करके॥
अंतरा 2:
दर तेरे आके जो भी झोली फैलावे,
खाली ना मोड़े तू, सब कुछ पावे।
मैं भी खड़ा हूँ तेरे दर पे सवाली,
भर दे झोली मेरी, ना मोड़ खाली।
अखियां रोवना छम छम, नी माए तैनू याद करके॥
अंतरा 3:
ऊंचे पहाड़ों पे डेरा है तेरा,
भक्तों के दिल में बसेरा है तेरा।
लाल चुनरिया मैया तुमको सुहावे,
'भक्त' तेरे चरणों में शीश झुकावे।
अखियां रोवना छम छम, नी माए तैनू याद करके॥
अंतरा 4:
कलयुग के इस घोर अंधेरे में माता,
तेरे सिवा कोई राह नहीं सूझता।
हाथ पकड़ लो मेरी आदि भवानी,
तेरी महिमा जग ने है जानी।
अखियां रोवना छम छम, नी माए तैनू याद करके॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन का केंद्रीय भाव "आर्त भक्ति" और "विरह वेदना" है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के भक्तों का वर्णन किया है, जिनमें 'आर्त भक्त' वह होता है जो संकट के समय या अत्यंत व्याकुलता की स्थिति में ईश्वर को पुकारता है। इस भजन में भक्त अपनी सांसारिक असमर्थता को स्वीकार करते हुए जगदम्बा से प्रार्थना करता है।
भजन की शुरुआत में भक्त कहता है कि हे माता! आपकी पावन स्मृति में मेरे नेत्रों से निरंतर अश्रु प्रवाहित हो रहे हैं। यह अश्रुपात कोई साधारण विलाप नहीं है, बल्कि यह आत्मा की वह पुकार है जो अपने मूल स्रोत (परमात्मा) से अलग होने के कारण तड़प रही है। संसार के झूठे संबंधों और दुखों से त्रस्त होकर जब मनुष्य को यह आभास होता है कि इस सृष्टि में केवल आदि शक्ति ही उसकी वास्तविक रक्षक हैं, तब उसके हृदय से ऐसी ही करुण पुकार निकलती है।
भजन के अंतराओं में भक्त स्वीकार करता है कि इस विशाल भवसागर में उसकी जीवन-रूपी नैया डगमगा रही है। सांसारिक वासनाएं, क्रोध, मोह और लोभ रूपी लहरें उसे डुबाने का प्रयास कर रही हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में केवल मां दुर्गा की कृपा ही उसे पार लगा सकती है। वह मां के उदार और करुणामयी स्वरूप का गुणगान करता है कि जो भी उनके द्वार पर आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता। भक्त स्वयं को एक याचक (सवाली) के रूप में प्रस्तुत करता है और मां से अपनी झोली भरने की याचना करता है, जो कि आध्यात्मिक ज्ञान और शांति की झोली है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह साधक के अंतर्मन को झंकृत करने वाला एक आध्यात्मिक मंत्र है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- समर्पण भाव (Sharanagati): भजन का प्रत्येक शब्द भक्त के अहंकार को शून्य कर उसे पूर्ण रूप से मां के चरणों में समर्पित करता है।
- अश्रु साधना (Sadhana of Tears): भक्ति मार्ग में आंसुओं को सबसे पवित्र माना गया है। जब हृदय पिघलता है, तभी आंसू बहते हैं, और पिघले हुए हृदय में ही ईश्वर का वास होता है।
- सरलता और सुगमता: जटिल दार्शनिक सिद्धांतों के विपरीत, यह भजन अत्यंत सरल भाषा में ईश्वर और जीव के संबंध को परिभाषित करता है।
- सांस्कृतिक एकता: पंजाबी और हिंदी भाषा के मिश्रण से बना यह भजन उत्तर भारत सहित संपूर्ण देश में श्रद्धा के साथ गाया जाता है, जो हमारी सांस्कृतिक समरसता को दर्शाता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए प्रत्येक क्षण शुभ है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और समय अत्यधिक फलदायी माने गए हैं:
- नवरात्रि पर्व: आश्विन और चैत्र नवरात्रि के पावन दिनों में इस भजन का श्रवण करने से मां दुर्गा की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।
- संध्या काल की आरती के बाद: संध्या पूजन के पश्चात शांत चित्त से इस भजन को गाने से दिनभर का मानसिक तनाव दूर होता है और मन में सात्विक विचारों का उदय होता है।
- गायन की विधि: इस भजन को गाते समय साधक को अपनी आंखें बंद कर मां के सौम्य रूप का ध्यान करना चाहिए। कंठ में करुणा और हृदय में पूर्ण विश्वास होना अनिवार्य है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन सर्वशक्तिमान आदि पराशक्ति, मां दुर्गा को समर्पित है। सनातन दर्शन में मां दुर्गा को केवल संहारक के रूप में ही नहीं, बल्कि ममतामयी माता के रूप में भी पूजा जाता है। वह अपने भक्तों के कष्टों को देखकर द्रवित हो उठती हैं। इस भजन में प्रयुक्त "शेरावालिए" और "आदि भवानी" शब्द उनके उसी ममतामयी और रक्षक स्वरूप को इंगित करते हैं। अनेक संतों ने माना है कि जब हम भगवान को माता के रूप में पुकारते हैं, तो वात्सल्य भाव के कारण हमारी प्रार्थनाएं शीघ्र स्वीकार होती हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की रचना पारंपरिक लोक भजनों की श्रेणी में आती है। पंजाब की पावन धरती पर जन्मी "भेंट" (Devi Bhetan) परंपरा से इसका गहरा संबंध है। सदियों से पहाड़ों पर स्थित माता के दरबारों (जैसे वैष्णो देवी, चिंतपूर्णी, ज्वाला जी, कांगड़ा देवी) की यात्रा करते समय भक्त इन गीतों को गाते आ रहे हैं। समय के साथ यह लोकगीत आधुनिक भजनों के रूप में रिकॉर्ड किए गए और आज ये हर घर में गूंज रहे हैं।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा में पंजाबी की मिठास और हिंदी की स्पष्टता का सुंदर समन्वय है। "अखियां रोवना", "नी माए", "तैनू याद करके" जैसे शब्द पंजाबी लोक संस्कृति से लिए गए हैं, जो गीत को एक विशेष लय और माधुर्य प्रदान करते हैं। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें 'करुण रस' और 'भक्ति रस' की प्रधानता है। रूपक अलंकार का प्रयोग करते हुए जीवन को 'नैया' और संसार को 'भवसागर' बताया गया है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:
- संसार की असारता: यह हमें याद दिलाता है कि सांसारिक रिश्ते और भौतिक साधन अस्थायी हैं। केवल ईश्वर का आश्रय ही शाश्वत है।
- धैर्य और विश्वास: चाहे जीवन की नैया कितनी भी डगमगाए, यदि हमारा विश्वास अटूट है, तो मां हमें पार लगा ही देंगी।
- विनम्रता: स्वयं को 'सवाली' (याचक) मानकर अहंकार का त्याग करना ही वास्तविक प्रगति का मार्ग है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| अखियां रोवना | नेत्रों का रोना / अश्रुपात | ईश्वर के प्रति विरह और प्रेम के आंसू |
| नी माए | हे माता! | जगत जननी आदि शक्ति को आदरपूर्वक पुकारना |
| भवसागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म और मृत्यु का चक्र, सांसारिक कष्ट |
| नैया | नाव | मनुष्य का जीवन अथवा जीवात्मा |
| सवाली | याचक / प्रार्थना करने वाला | अहंकार रहित भक्त जो केवल कृपा चाहता है |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"अखियां रोवना छम छम, नी माए तैनू याद करके..."
भक्त कहता है कि हे मेरी परम माता, जब भी मुझे आपकी याद आती है, मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह निकलती है। यह आंसू मेरी व्याकुलता और आपके प्रति मेरे अनन्य प्रेम का प्रतीक हैं।
"तेरे बिना मेरा कोई ना सहारा, तू ही मेरी नैया, तू ही है किनारा..."
इस भौतिक जगत में मेरा आपके अतिरिक्त कोई वास्तविक रक्षक नहीं है। आप ही मेरी जीवन रूपी नौका को चलाने वाली हैं और आप ही मुझे मोक्ष रूपी किनारे तक पहुंचाने वाली हैं।
"भवसागर विच डोले मेरी नैया, पार लगा दे शेरावालिए मैया..."
यह संसार माया और मोह का एक अथाह सागर है, जिसमें मेरी बुद्धि और मन विचलित हो रहे हैं। हे सिंहवाहिनी माता! कृपा करके मुझे इस संकट से उबारिए और पार लगाइए।
"दर तेरे आके जो भी झोली फैलावे, खाली ना मोड़े तू, सब कुछ पावे..."
आपके द्वार की यह महिमा है कि जो भी श्रद्धापूर्वक आपके चरणों में अपनी प्रार्थना रखता है, आप उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। आपकी दया असीम है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के गायन से पूर्व या पश्चात देवी के इस परम कल्याणकारी मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जो शरणागति के भाव को और सुदृढ़ करता है:
"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥"
अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला और तीन नेत्रों वाली गौरी हैं। आपको मेरा नमस्कार है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | अखियां रोवना छम छम (Akhiyan Rovna Chham Chham) |
| संबद्ध देवी-देवता | मां दुर्गा, मां शेरावाली, आदि पराशक्ति |
| भाषा | हिंदी एवं पंजाबी (मिश्रित लोक भाषा) |
| मुख्य भाव | करुण रस, आर्त भक्ति, पूर्ण शरणागति (Surrender) |
| गायन का सर्वोत्तम समय | नवरात्रि, संध्या आरती, माता का जागरण / चौकी |
| आध्यात्मिक लाभ | मानसिक शांति, भक्ति का उदय, भय से मुक्ति |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
"अखियां रोवना छम छम" भजन किस देवी को समर्पित है?
यह भजन मुख्य रूप से मां दुर्गा (मैया शेरावाली) को समर्पित है। इसमें भक्त मां के ममतामयी स्वरूप की आराधना करता है।
इस भजन को गाने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है?
इस भजन के गायन से मन का अहंकार शांत होता है, हृदय में करुणा और भक्ति का संचार होता है, और साधक को मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
क्या इस भजन को दैनिक पूजा में गाया जा सकता है?
हां, इस भजन को आप अपनी दैनिक संध्या आरती या सुबह की पूजा के समय अत्यंत श्रद्धा के साथ गा सकते हैं।
इस भजन की भाषा कौन सी है?
यह भजन मुख्य रूप से पंजाबी मिश्रित हिंदी (खड़ीबोली) में लिखा गया है, जो इसे अत्यंत मधुर और सुगम बनाता है।
भक्ति में आंसुओं (रोने) का क्या महत्व है?
भक्ति शास्त्र के अनुसार, जब भक्त भगवान के लिए रोता है, तो उसके संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और हृदय शुद्ध हो जाता है। इसे 'अश्रु साधना' कहा जाता है।
क्या यह भजन नवरात्रि के दौरान गाया जाता है?
हां, नवरात्रि के नौ दिनों में देवी मंदिरों और घरों में इस भजन का गायन और श्रवण अत्यंत लोकप्रिय है।
इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
इसका मुख्य संदेश यह है कि संसार के सभी सहारे अस्थायी हैं, केवल मां भगवती का चरण ही हमारा सच्चा और स्थायी सहारा है।
इस भजन को गाते समय किस मुद्रा या भाव में होना चाहिए?
इसे गाते समय साधक को शांत बैठकर, आंखें बंद कर, मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए पूर्ण समर्पण भाव में होना चाहिए।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को सनातन धर्म की प्रामाणिक संकीर्तन परंपरा, देवी भागवत पुराण के सिद्धांतों और पारंपरिक लोक भजनों के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाली आध्यात्मिक सामग्री पहुंचाना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - प्रथम एवं स्कंध ९ (देवी महिमा संदर्भ)
- पारंपरिक पंजाबी भेंटें एवं लोक संकीर्तन संग्रह
- श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ७ (भक्तों के प्रकार और आर्त भक्ति)
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