Shyam Bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई" भजन सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत भावपूर्ण, मर्मस्पर्शी और विरह-रस से सराबोर संकीर्तन है। यह भजन जीवात्मा की उस परम व्याकुलता और आर्त पुकार को व्यक्त करता है, जहाँ वह संसार के समस्त मिथ्या संबंधों, दुखों और माया-जाल से थककर अंततः अपने आराध्य श्री बांके बिहारी के चरणों में पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति) स्वीकार करती है। कलयुग के इस कठिन काल में जब मनुष्य चारों ओर से मानसिक संताप, अकेलेपन और सांसारिक विषमताओं से घिरा होता है, तब यह भजन प्रभु के प्रति अटूट विश्वास और 'अनन्य भक्ति' का मार्ग प्रशस्त करता है। इस भजन का गायन विशेष रूप से एकांत साधना, सत्संगों और संध्या कालीन आरती के समय किया जाता है। यह केवल एक गीत नहीं है, बल्कि भक्त के हृदय से निकली वह करुण पुकार है जो सीधे गोलोक धाम में बैठे कन्हैया के हृदय को झंकृत कर देती है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन भजन के लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, दार्शनिक संदेश और शास्त्रीय संदर्भों का सांगोपांग विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई


(स्थायी / मुखड़ा)
श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई,
हूँ अकेला यहाँ नहीं कोई मेरा,
मेरी बनके चलो परछाई,
श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई...

(प्रथम अंतरा)
इस दुनिया में एक तू ही मेरा,
दूजा ना कोई सहारा है,
मन में विश्वास जगा कर के,
मैंने तुझको आज पुकारा है,
मेरी सुनके पुकार तू आजा एक बार,
अब तो कर लो सुनवाई,
श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई...

(द्वितीय अंतरा)
भवसागर की इन लहरों में,
मेरी नैया डगमगा रही है,
कोई खेवनहार नहीं है यहाँ,
जिंदगी की शाम आ रही है,
अब थाम लो पतवार हे कृष्ण मुरार,
मैंने तुमसे ही आस लगाई,
श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई...

(तृतीय अंतरा)
लाखों को तुमने तारा है प्रभु,
मेरी बारी क्यों देर करी,
क्या मुझमें ही कोई कमी रही,
या मेरी भक्ति अधूरी रही,
हे दीनबंधु हे करुणासिंधु,
अब तो कर दो मेरी विदाई,
श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई...

(चतुर्थ अंतरा)
तेरे द्वार पे आकर बैठ गया,
अब जो भी होगा देखा जाएगा,
या तो बिगड़ी मेरी बन जाएगी,
या जग में तमाशा हो जाएगा,
मेरी लाज बचाओ हे गिरधर गोपाल,
मैंने लाज तुम्हारे हाथ गंवाई,
श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन 'दैन्य भाव' और 'आत्मनिवेदन' की पराकाष्ठा है। वैष्णव भक्ति शास्त्र में भक्ति के नौ प्रकार (नवधा भक्ति) बताए गए हैं, जिनमें 'सख्य' और 'आत्मनिवेदन' को सर्वोच्च माना गया है। इस भजन में भक्त अपने आराध्य श्री कृष्ण से कहता है कि हे श्यामसुंदर! इस नश्वर संसार में मेरा कोई वास्तविक रक्षक या संबंधी नहीं है। सब स्वार्थ के साथी हैं। इसलिए अब आप ही मेरी कलाई पकड़ लीजिए, अर्थात मेरा हाथ थामकर मुझे सन्मार्ग पर ले चलिए।

भक्त अपनी असमर्थता को स्वीकार करते हुए कहता है कि इस संसार रूपी महासागर (भवसागर) की लहरें अत्यंत तीव्र हैं और मेरी जीवन रूपी नौका डगमगा रही है। इस नौका को पार लगाने वाला कोई कुशल नाविक (खेवनहार) नहीं है। आयु रूपी दिन ढल रहा है और जीवन की संध्या निकट आ रही है। ऐसे संकट काल में केवल आप ही मेरी पतवार संभाल सकते हैं। भक्त का यह भाव श्रीमद्भगवद्गीता के शरणागति योग से प्रेरित है, जहाँ भगवान स्वयं कहते हैं कि जो अनन्य भाव से मेरी शरण में आता है, उसका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन सनातन समाज में अत्यधिक लोकप्रिय है क्योंकि यह सीधे मानव हृदय की पीड़ा और ईश्वर के प्रति उसके अगाध प्रेम को जोड़ता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • दैन्य भाव की अभिव्यक्ति: इसमें भक्त अपने अहंकार को पूरी तरह शून्य कर देता है। जब तक मनुष्य के भीतर 'मैं' और 'मेरा' का भाव रहता है, तब तक ईश्वर की पूर्ण कृपा का अनुभव नहीं होता। यह भजन अहंकार विसर्जन का सर्वोत्तम उदाहरण है।
  • शरण्य-शरण भाव: भगवान को 'शरण्य' (शरण देने वाले) और स्वयं को 'शरणार्थी' मानकर की गई यह पुकार अत्यंत तीव्र है।
  • संगीतमय सरलता: इसकी धुन और शब्द इतने सरल एवं सुगम हैं कि कोई भी सामान्य भक्त इसे गाकर प्रभु के ध्यान में लीन हो सकता है।
  • सांत्वना प्रदायक: जब कोई व्यक्ति जीवन में अत्यंत निराश या अकेला महसूस करता है, तब इस भजन का श्रवण उसे आंतरिक शक्ति और मानसिक शांति प्रदान करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए किसी विशेष समय की बाध्यता नहीं होती, क्योंकि नाम-स्मरण सर्वदा कल्याणकारी है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और समय अत्यंत फलदायी माने गए हैं:

  • संध्या काल (Evening Prayer): दिनभर की सांसारिक व्यस्तताओं के बाद जब मन अशांत हो, तब संध्या के समय मंदिर या घर के पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाकर इस भजन का गायन करने से मानसिक क्लेश दूर होते हैं।
  • एकांत साधना (Silent Meditation): रात्रि के समय जब चारों ओर शांति हो, तब एकांत में बैठकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से इस भजन को गुनगुनाने से प्रभु के सामीप्य का अनुभव होता है।
  • सत्संग एवं कीर्तन (Satsang): सामूहिक रूप से भक्तों के समूह में ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के साथ इस भजन को गाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से श्री कृष्ण (बांके बिहारी / श्याम सरकार) को समर्पित है। ब्रज मंडल की भक्ति परंपरा में भगवान कृष्ण को केवल एक ऐश्वर्यशाली ईश्वर नहीं, बल्कि एक अत्यंत आत्मीय सखा, रक्षक और प्रेमी के रूप में पूजा जाता है। इस भजन में प्रयुक्त 'बांके' शब्द वृंदावन के ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज की ओर संकेत करता है, जो अपने भक्तों की करुण पुकार सुनकर तुरंत दौड़े चले आते हैं।

संतों की दृष्टि में, यह भजन सूरदास, मीराबाई और रसखान जैसे महान संतों की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ भक्त भगवान से मान भी करता है, शिकायत भी करता है और अंततः उन्हीं के चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है। जैसे मीराबाई ने कहा था, "हरि तुम हरो जन की भीर", ठीक उसी प्रकार इस भजन में भी भक्त अपनी कलाई पकड़ने की मनुहार कर रहा है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति और आधुनिक संकीर्तन शैली का एक अद्भुत मिश्रण है। इसकी रचना किसी एक विशिष्ट कालखंड की न होकर, ब्रज के रसिक संतों की मौखिक परंपरा से विकसित हुई मानी जाती है। बाद के वर्षों में विभिन्न सुप्रसिद्ध भजनांचलों और गायकों ने इसे अपने-अपने स्वर देकर जन-जन तक पहुँचाया। इस भजन की पृष्ठभूमि में 'गजेंद्र मोक्ष' और 'द्रौपदी चीरहरण' जैसी पौराणिक घटनाएं छिपी हैं, जहाँ जब भक्त ने अपनी पूरी शक्ति हारकर केवल प्रभु को पुकारा, तब प्रभु अविलंब प्रकट हुए।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के मिठास भरे शब्दों (जैसे 'बांके', 'कलाई', 'नैया', 'खेवनहार') का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया गया है।

  • काव्य रूप: यह एक 'पद' या 'गीत' शैली में रचित है, जिसमें एक मुखड़ा और चार अंतरे हैं।
  • रूपक अलंकार: इसमें 'भवसागर' (संसार रूपी सागर) और 'नैया' (जीवन रूपी नाव) के रूप में रूपक अलंकार का उत्कृष्ट प्रयोग किया गया है।
  • रस: इस भजन में मुख्य रूप से 'करुण रस' और 'शांत रस' का प्रवाह है, जो अंततः 'भक्ति रस' में परिणत हो जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल गाने-सुनने के लिए नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक और आध्यात्मिक पाठ सिखाता है:

  1. संसार की असारता: यह भजन हमें याद दिलाता है कि संसार के सभी भौतिक संबंध और वस्तुएं अनित्य (temporary) हैं। अंत समय में केवल ईश्वर ही जीव का सच्चा साथी होता है।
  2. पूर्ण समर्पण (Surrender): जब हम अपनी बुद्धि और बल का अहंकार छोड़कर ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं, तभी से हमारे जीवन का वास्तविक कल्याण शुरू होता है।
  3. धैर्य और विश्वास: विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान पर विश्वास न खोना ही सच्ची भक्ति है। भक्त कहता है कि 'मैंने तुझको आज पुकारा है', जो उसके अटूट विश्वास को दर्शाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
कलाई पकड़ना हाथ थामना / संरक्षण देना भगवान द्वारा जीव को माया के बंधनों से मुक्त कर अपने मार्ग पर ले जाना।
भवसागर संसार रूपी महासागर जन्म और मृत्यु का चक्र जिसमें जीव फंसा रहता है।
खेवनहार नाव चलाने वाला (नाविक) सद्गुरु या स्वयं भगवान जो जीव को इस संसार से पार उतारते हैं।
दीनबंधु गरीबों और असहायों के भाई/मित्र भगवान का वह स्वरूप जो दीन-दुखियों पर विशेष कृपा करता है।
लाज गंवाई अहंकार और लोक-लाज का त्याग संसार की परवाह किए बिना केवल प्रभु के प्रति समर्पित हो जाना।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई, हूँ अकेला यहाँ नहीं कोई मेरा..."
हे कृष्ण! इस संसार की भीड़ में मैं स्वयं को अत्यंत अकेला पाता हूँ। यहाँ कोई भी मेरा निस्वार्थ हितैषी नहीं है। इसलिए आप मेरी कलाई पकड़ लीजिए ताकि मैं भटक न जाऊँ।

"इस दुनिया में एक तू ही मेरा, दूजा ना कोई सहारा है..."
मैंने जीवन के हर मोड़ पर अपनों को आजमाया है, परंतु संकट के समय सबने साथ छोड़ दिया। अब मुझे समझ आ गया है कि आपके अतिरिक्त मेरा कोई वास्तविक रक्षक नहीं है।

"भवसागर की इन लहरों में, मेरी नैया डगमगा रही है..."
यह संसार दुखों और कठिनाइयों का सागर है। इसमें मेरी जीवन रूपी नैया डगमगा रही है। यदि आपने अपनी कृपा की पतवार न संभाली, तो यह नैया डूब जाएगी।

"लाखों को तुमने तारा है प्रभु, मेरी बारी क्यों देर करी..."
हे करुणासिंधु! आपने अजामिल, गणिका, गजेंद्र और द्रौपदी जैसे अनगिनत पापियों और आर्त भक्तों का उद्धार किया है। फिर मेरे उद्धार में इतनी देरी क्यों हो रही है? क्या मेरी पुकार में कोई कमी है?

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के शरणागति के भाव को पुष्ट करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह सुप्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

-(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 18, श्लोक 66)

अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों और आश्रयों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

इसके अतिरिक्त, भगवान कृष्ण के इस पावन मंत्र का जाप इस भजन के साथ करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई (Shyam Meri Ab To Pakado Kalai)
मुख्य आराध्य श्री कृष्ण / श्री बांके बिहारी जी
भक्ति का भाव दैन्य भाव, समर्पण, विरह, करुणा
भाषा सरल हिंदी (ब्रज शब्दावली युक्त)
उपयुक्त अवसर सत्संग, एकांत प्रार्थना, जन्माष्टमी, एकादशी व्रत
मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति ही मोक्ष का मार्ग है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: "श्याम मेरी अब तो पकड़ो कलाई" भजन का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस भजन का मुख्य संदेश पूर्ण शरणागति (Surrender) है। यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहंकार और सांसारिक आश्रयों को छोड़कर पूरी तरह भगवान कृष्ण पर निर्भर हो जाता है, तब भगवान स्वयं उसका हाथ थाम लेते हैं और उसे भवसागर से पार लगाते हैं।

प्रश्न 2: यह भजन किस देवता को समर्पित है?
उत्तर: यह भजन भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है, जिन्हें प्यार से श्याम, बांके बिहारी, गिरधर गोपाल और दीनबंधु कहा जाता है।

प्रश्न 3: इस भजन को गाने के लिए सबसे उत्तम समय कौन सा है?
उत्तर: इस भजन को गाने के लिए संध्या काल (Evening Prayer) या रात्रि का एकांत समय सबसे उत्तम माना जाता है, जब मन शांत होता है और भक्त पूरी तन्मयता से प्रभु को पुकार सकता है।

प्रश्न 4: भजन में 'कलाई पकड़ने' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'कलाई पकड़ने' का आध्यात्मिक अर्थ है भगवान द्वारा भक्त का हाथ थामना, उसे जीवन के कठिन समय में सहारा देना और उसे मायावी संसार के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाना।

प्रश्न 5: क्या यह भजन एकादशी या जन्माष्टमी पर गाया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, एकादशी, जन्माष्टमी, होली और अन्य वैष्णव उत्सवों पर इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी और आनंददायक होता है।

प्रश्न 6: इस भजन में 'भवसागर' और 'नैया' का क्या प्रतीक है?
उत्तर: 'भवसागर' इस जन्म-मृत्यु और दुखों से भरे संसार का प्रतीक है, और 'नैया' मनुष्य के इस नश्वर जीवन का प्रतीक है जो बिना ईश्वर की कृपा के पार नहीं हो सकता।

प्रश्न 7: इस भजन को गाते समय किस भाव की आवश्यकता होती है?
उत्तर: इस भजन को गाते समय 'दैन्य भाव' (Humility) और 'आर्त पुकार' (Sincere Cry) की आवश्यकता होती है। भक्त को स्वयं को असहाय मानकर केवल प्रभु को अपना एकमात्र रक्षक स्वीकार करना चाहिए।

प्रश्न 8: क्या यह भजन मानसिक तनाव को कम करने में सहायक है?
उत्तर: हाँ, इस भजन के शब्द और इसकी मधुर धुन मन को असीम शांति प्रदान करते हैं। जब व्यक्ति अकेलापन या तनाव महसूस करता है, तब इस भजन का श्रवण उसे सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक संबल देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन भक्ति परंपरा के प्रामाणिक ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता के शरणागति सिद्धांतों और ब्रज के रसिक संतों की वाणी के आधार पर तैयार किया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में छिपे गहरे दार्शनिक अर्थ को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है ताकि पाठक न केवल इसके लिरिक्स पढ़ सकें, बल्कि इसके पीछे की आध्यात्मिक चेतना को भी आत्मसात कर सकें। यह सामग्री पूर्णतः शोधपरक और "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 18 - मोक्षसंन्यासयोग)
  • श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध 10 - कृष्ण लीला)
  • ब्रज भक्ति काव्य परंपरा और रसिक संतों के पद संग्रह
  • सनातन धर्म के पारंपरिक संकीर्तन और भजन संग्रह

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आपको यह भजन और इसका भावार्थ पसंद आया है, तो आप हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध निम्नलिखित पावन भजनों और लेखों को भी पढ़ सकते हैं:

श्रेणियां: Shyam Bhajan

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 04 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!