भगवान विष्णु पौराणिक व्रत कथा संदर्भ एवं व्याख्या सहित

निर्जला एकादशी व्रत कथा - महर्षि वेदव्यास एवं भीमसेन संवाद, निर्जल व्रत विधान

निर्जला एकादशी व्रत कथा और महर्षि वेदव्यास एवं भीमसेन संवाद के माध्यम से जानें इस कठिन उपवास का पौराणिक महत्व, नियम और जलविहीन व्रत की संपूर्ण विधि।

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निर्जला एकादशी की पृष्ठभूमि एवं पौराणिक महत्व

सनातन धर्म और पौराणिक परंपरा में एकादशी व्रत का अत्यंत विशिष्ट और महिमामयी स्थान है। वर्ष भर में कुल चौबीस एकादशी तिथियाँ आती हैं, और जब मलमास या अधिकमास लगता है, तब इनकी संख्या बढ़कर छब्बीस हो जाती है। इन समस्त एकादशियों में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को सबसे कठिन, कल्याणकारी और फलदायी माना गया है। इस परम पवित्र तिथि को निर्जला एकादशी, भीमसेनी एकादशी अथवा पांडव एकादशी के नाम से संबोधित किया जाता है।

इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता इसका नाम स्वयं प्रकट करता है—'निर्जला' अर्थात बिना जल ग्रहण किए रखा जाने वाला उपवास। जहाँ अन्य एकादशियों में फलाहार या एक समय जल ग्रहण करने का विधान है, वहीं निर्जला एकादशी के दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के सूर्योदय तक जल की एक बूंद भी ग्रहण करना वर्जित माना गया है।

एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि।
ज्येष्ठे सिते विशेषेण निर्जलां समुपोषयेत्॥

श्रीमद्भागवत एवं पद्म पुराण के अनुसार, जो साधक वर्ष की चौबीस एकादशियों का नियमपूर्वक व्रत करने में असमर्थ होते हैं, वे यदि केवल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का श्रद्धा और निष्ठा के साथ पूर्ण व्रत रख लें, तो उन्हें वर्ष भर की समस्त एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त हो जाता है। यह व्रत मनुष्य को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धि प्रदान करके अंत में बैकुंठ धाम की प्राप्ति कराता है।

सम्पूर्ण पावन कथा: महर्षि वेदव्यास एवं भीमसेन संवाद

द्वापर युग की बात है। महाभारत काल में परम पूज्य ब्रह्मर्षि महर्षि वेदव्यास जी पांडवों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाले सदाचार एवं उपवास के नियमों का ज्ञान दे रहे थे। उस समय धर्मराज युधिष्ठिर, माता कुंती, महारानी द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव—ये सभी अत्यंत निष्ठा के साथ प्रत्येक माह के दोनों पक्षों (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) की एकादशी तिथि का नियमपूर्वक उपवास रखा करते थे।

परंतु पांडुपुत्र महाबली भीमसेन की स्थिति भिन्न थी। भीमसेन अत्यंत बलशाली थे और उनके उदर (पेट) में 'वृक' नामक जठराग्नि सदैव अत्यंत तीव्र गति से प्रज्वलित रहती थी। इस जठराग्नि के कारण भीमसेन को प्रचुर मात्रा में भोजन की आवश्यकता होती थी और वे थोड़े समय के लिए भी भूख-प्यास सहन करने में असमर्थ थे। इसीलिए भीमसेन को 'वृकोदर' भी कहा जाता था।

भीमसेन की धर्मसंकट की स्थिति

परिवार के सभी सदस्यों को एकादशी के दिन उपवास रखते देख भीमसेन के मन में अत्यंत ग्लानि और धर्मसंकट उत्पन्न हुआ। वे भगवान श्रीहरि विष्णु के अनन्य भक्त थे, परंतु अपनी तीव्र क्षुधा (भूख) के कारण व्रत रखने में विवश थे। जब भी एकादशी आती, माता कुंती और भ्राता युधिष्ठिर उनसे भोजन न करने का अनुरोध करते, परंतु भीमसेन लाचार हो जाते थे।

अपनी इस व्यथा के निवारण हेतु महाबली भीमसेन परम ज्ञानी महर्षि वेदव्यास जी के पास पहुँचे और अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर प्रणाम करके बोले—

भीमसेन बोले: "हे परम पूज्य पितामह! हे धर्मज्ञ महर्षि! कृपा करके मेरी एक प्रार्थना ध्यानपूर्वक सुनिए। मेरे ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर, मेरी माता कुंती, मेरे भाई अर्जुन, नकुल, सहदेव और प्रिय द्रौपदी—ये सभी एकादशी के पावन दिन अन्न जल त्यागकर उपवास करते हैं। वे मुझसे भी यही आग्रह करते हैं कि मैं एकादशी को भोजन न करूँ। वे कहते हैं कि एकादशी को अन्न खाना महापाप है और इससे मनुष्य नरकगामी होता है।"

भीमसेन ने आगे अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा— "हे महर्षि! मैं भगवान जनार्दन की भक्ति तो सच्चे हृदय से करता हूँ, दान-पुण्य कर सकता हूँ, धूप-दीप से पूजन कर सकता हूँ, परंतु भोजन का त्याग करके निराहार रहना मेरे लिए अत्यंत असंभव है। मेरे पेट में 'वृक' नाम की अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहती है, जो मुझे एक क्षण के लिए भी शांत नहीं बैठने देती। यदि मैं भोजन न करूँ, तो मेरे प्राण संकट में पड़ जाते हैं। अतः हे कृपासिंधु! आप मुझे कोई ऐसा उपाय अथवा व्रत बताइए, जिसे वर्ष में केवल एक ही बार करके मैं कल्याण को प्राप्त कर सकूँ और मुझे स्वर्ग एवं मोक्ष की प्राप्ति हो जाए।"

महर्षि वेदव्यास जी का मार्गदर्शन

भीमसेन की ऐसी निष्छल और कातर वाणी सुनकर महर्षि वेदव्यास जी मंद-मंद मुस्कुराए और अत्यंत स्नेहपूर्वक बोले—

महर्षि वेदव्यास बोले: "हे कुरुश्रेष्ठ भीमसेन! वेद और शास्त्रों का निर्णय सर्वविदित है। कलयुग में पापों के निवारण और अक्षय पुण्य की प्राप्ति के लिए एकादशी का व्रत ही परम साधन है। दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की एकादशी को अन्न न खाना शास्त्रों की आज्ञा है। यदि मनुष्य स्वर्ग लोक की इच्छा रखता है और नरक की भयानक यातनाओं से बचना चाहता है, तो उसे एकादशी के दिन भोजन का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।"

यह सुनकर भीमसेन अत्यंत भयभीत हो गए और कांपते हुए बोले— "हे महामुनि! जब वर्ष की चौबीस एकादशियों का उपवास रखना मेरे लिए शारीरिक रूप से संभव ही नहीं है, तो फिर मेरा उद्धार कैसे होगा? क्या मैं सदैव पाप का भागी बना रहूँगा? हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझ पर दया कीजिए और कोई ऐसा सुगम मार्ग बताइए जो मेरे सामर्थ्य के भीतर हो।"

निर्जला एकादशी व्रत का प्राकट्य

भीमसेन की भक्ति और उनकी शारीरिक विवशता को देखकर महर्षि वेदव्यास जी के हृदय में अपार करुणा भर आई। उन्होंने भीमसेन को आश्वस्त करते हुए एक विशेष और परम फलदायी व्रत का गुप्त रहस्य बताया।

महर्षि व्यास जी बोले: "हे कौन्तेय! सुनो, शास्त्रों में परम कल्याणकारी मार्ग भी बताए गए हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, वह समस्त एकादशियों में शिरोमणि है। इस एकादशी का नाम 'निर्जला एकादशी' है। यदि तुम वर्ष की चौबीस एकादशियों का उपवास करने में असमर्थ हो, तो केवल इस एक निर्जला एकादशी का संपूर्ण नियमों के साथ व्रत धारण कर लो।"

महर्षि व्यास ने इस व्रत का कठोर नियम समझाते हुए कहा— "हे वृकोदर! ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के सूर्योदय से लेकर द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक तुम्हें जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करनी है। इस दिन भोजन तो दूर, जल पीना भी पूरी तरह वर्जित है। केवल आचमन के समय जितना जल मुख में लिया जाता है (जो एक माशे या एक बूंद के बराबर हो), उतने ही जल की अनुमति है, ताकि शरीर की आंतरिक शुद्धि हो सके। उससे अधिक जल पीने से व्रत खंडित हो जाता है।"

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः।
पानीयमपि नाश्नीयात् केवलं हरिमुद्दिशेत्॥

महर्षि व्यास ने आगे कहा— "यदि तुम इस दिन निर्जल रहकर पूर्ण एकाग्रता से भगवान केशव (श्रीहरि विष्णु) की पूजा-अर्चना करोगे, तो तुम्हें वर्ष की समस्त चौबीस एकादशियों का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा। द्वादशी के दिन प्रातः काल स्नान करके ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, वस्त्र, स्वर्ण और जल से भरे घट (घड़ों) का दान करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं पारण करके भोजन ग्रहण करना चाहिए।"

भीमसेन का कठोर तप और व्रत पालन

महर्षि वेदव्यास जी के इन वचनों को सुनकर महाबली भीमसेन के मन में अपार हर्ष और उत्साह का संचार हुआ। उन्होंने महर्षि व्यास के चरणों में मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जल व्रत रखने का दृढ़ संकल्प लिया।

जब ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आई, तो भीमसेन ने प्रातः काल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर पवित्र गंगा नदी में स्नान किया। तत्पश्चात उन्होंने हाथ में जल और कुश लेकर भगवान वासुदेव के सम्मुख निर्जल उपवास का संकल्प व्यक्त किया। दिन चढ़ने लगा। ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी और सूर्यदेव का प्रचंड ताप चारों ओर फैल गया।

जैसे-जैसे दोपहर का समय निकट आया, भीमसेन के पेट में 'वृक' नाम की अग्नि भड़कने लगी। अत्यधिक प्यास और भूख के कारण उनका कंठ सूखने लगा, शरीर से पसीना बहने लगा और वे अत्यंत व्याकुल हो उठे। भीमसेन को लगा कि उनके प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। परंतु उन्होंने भगवान श्रीहरि विष्णु के चरण कमलों का ध्यान बनाए रखा और अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए।

सायंकाल होते-होते अत्यधिक कष्ट के कारण महाबली भीमसेन अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। यह देखकर धर्मराज युधिष्ठिर, माता कुंती, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी अत्यंत चिंतित हो गए। उन्होंने तुरंत भीमसेन के मुख पर शीतल गंगाजल का छिड़काव किया, उनके मस्तक पर चंदन लगाया और उन्हें चरणामृत का स्पर्श कराया।

भगवान विष्णु की कृपा और अपने दृढ संकल्प के बल से भीमसेन की मूर्च्छा दूर हुई। उन्होंने पूरी रात्रि भगवान श्रीहरि का कीर्तन और नाम-स्मरण करते हुए जागरण किया और जल का एक कण भी पेट में नहीं जाने दिया।

व्रत की पूर्णता और अद्भुत फल

अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय के साथ ही भीमसेन का निर्जल व्रत सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। भीमसेन ने प्रातः स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण किए। उन्होंने ऋषियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आमंत्रित करके उन्हें अन्न, वस्त्र, छत्र, जूता, और शीतल जल से भरे हुए मिट्टी के मटके (घड़े) दान में दिए।

तत्पश्चात महर्षि व्यास की आज्ञा लेकर भीमसेन ने पहले भगवान का चरणामृत ग्रहण किया और फिर ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं पारण किया।

भीमसेन के इस महान और कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने भीमसेन को आशीर्वाद दिया। इस व्रत के प्रभाव से भीमसेन के जन्म-जन्मांतर के समस्त पाप तत्काल भस्म हो गए। उनका आध्यात्मिक बल अत्यंत बढ़ गया और अंत समय में वे परम पद (वैकुंठ लोक) को प्राप्त हुए। क्योंकि इस परम कठिन व्रत को महाबली भीमसेन ने धारण किया था, इसीलिए इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से पूरे संसार में प्रसिद्धि मिली।

पूजा विधि, सामग्री एवं व्रत के नियम

निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र और नियमबद्ध होता है। इसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म नियमों का पालन करना अनिवार्य है ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।

आवश्यक पूजन सामग्री

  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र: श्रीहरि विष्णु एवं माता लक्ष्मी का चित्र।
  • पूजन पत्र व पुष्प: तुलसी दल (एकादशी से एक दिन पूर्व तोड़ा हुआ), पीले पुष्प, कमल का फूल, वैजयंती माला।
  • धूप व दीप: शुद्ध देसी गाय के घी का दीपक, धूपबत्ती, कपूर।
  • नैवेद्य: पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), पीले फल (आम, केला), पंजीरी, मखाने की खीर।
  • जल दान की सामग्री: मिट्टी का नया मटका (घड़ा), तांबे या पीतल का कलश, पंखा (हाथ का पंखा), छाता, वस्त्र, खरबूजा, सुराही।

चरणबद्ध पूजा विधि

  1. दशमी रात्रि के नियम: निर्जला एकादशी से एक दिन पूर्व (दशमी तिथि को) सात्विक भोजन ग्रहण करें। संध्या काल के बाद अन्न का सेवन न करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  2. प्रातः काल स्नान व संकल्प: एकादशी के दिन प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें। संभव हो तो गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ पीतांबर (पीले वस्त्र) धारण करें।
  3. व्रत का संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान विष्णु के समक्ष संकल्प लें— "हे सर्वेश्वर! हे ऋषिकेश! मैं आज ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जल व्रत रखने का संकल्प लेता/लेती हूँ। आप मेरे इस व्रत को निर्विघ्न पूर्ण कराएं।"
  4. श्रीहरि पूजन: पूजा गृह में चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की स्थापना करें। उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं। तत्पश्चात चंदन, रोली, अक्षत, पीले पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
  5. कथा श्रवण व आरती: धूप-दीप प्रज्वलित करके निर्जला एकादशी की पावन व्रत कथा सुनें या पढ़ें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जप करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती उतारें।
  6. दान एवं रात्रि जागरण: इस दिन जल से भरे घट (घड़े), पंखे, अन्न, और वस्त्र का दान करना महापुण्यदायी होता है। रात्रि के समय सोएं नहीं, बल्कि भगवान का भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।

निर्जला एकादशी व्रत नियम तालिका

समय / तिथिनियम एवं कार्यवर्जित कार्य
दशमी तिथि (एक दिन पूर्व)सात्विक आहार, संध्या पश्चात निराहारमांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, तामसिक भोजन
एकादशी तिथि (मुख्य दिन)पूर्ण निर्जल उपवास, विष्णु पूजन, दान, जागरणजल ग्रहण करना, अन्न खाना, क्रोध, निंदा, तुलसी तोटना
द्वादशी तिथि (पारण दिन)स्नान, दान, ब्राह्मण भोजन, पारण समय पर भोजनपारण समय से पूर्व भोजन, तामसिक वस्तुएं

आध्यात्मिक भावार्थ एवं गूढ़ रहस्य

निर्जला एकादशी केवल एक पौराणिक कथा या शारीरिक उपवास मात्र नहीं है, अपितु इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है।

इंद्रिय निग्रह और आत्म-नियंत्रण

मानव शरीर में जल तत्त्व का अनुपात सबसे अधिक होता है। हमारी कामनाएं, वासनाएं और चंचलता जल तत्त्व और मन से सीधे जुड़ी होती हैं। जब साधक ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में जल का त्याग करता है, तो वह अपनी सबसे प्रबल शारीरिक आवश्यकता पर विजय प्राप्त करता है। यह इंद्रिय निग्रह (सेंस कंट्रोल) की चरम पराकाष्ठा है। जो व्यक्ति अपनी जिह्वा और तृष्णा को वश में कर लेता है, उसके लिए संसार का कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता।

जल का महत्व और प्रकृति का सम्मान

ज्येष्ठ मास वर्ष का सबसे उष्ण (गर्म) महीना होता है, जब नदियाँ, कुएं और जलाशय सूखने लगते हैं। ऐसे समय में जल की एक-एक बूंद का मूल्य समझ में आता है। निर्जला एकादशी का व्रत मनुष्य को जल के महत्व का बोध कराता है। इस दिन प्यासे जीवों को जल पिलाना, पक्षियों के लिए परिंडे बांधना, और जल से भरे घड़ों का दान करना यह सिखाता है कि सनातन संस्कृति में 'जल ही जीवन है' और संपूर्ण सृष्टि की सेवा ही नारायण की सच्ची सेवा है।

व्रत उद्यापन विधि एवं फलश्रुति

जो साधक निर्जला एकादशी का नियमित व्रत रखते हैं, उनके लिए इसका उद्यापन करना अथवा पारण के नियमों का सम्यक रूप से पालन करना अत्यंत आवश्यक है।

व्रत पारण की सही विधि

एकादशी व्रत का फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण (व्रत खोलना) द्वादशी तिथि के भीतर और शुभ मुहूर्त में किया जाए। एकादशी के अगले दिन (द्वादशी तिथि) प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करें।

  • सर्वप्रथम भगवान विष्णु की नित्य पूजा करें।
  • किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को जल से भरा घड़ा, अन्न, फल, दक्षिण और वस्त्र दान करें।
  • तत्पश्चात भगवान के चरणामृत या तुलसी पत्र युक्त जल से अपना व्रत खोलें।
  • इसके बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करें।

महत्वपूर्ण फलश्रुति (Phalasruthi)

पद्म पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, निर्जला एकादशी व्रत के महात्म्य का वर्णन स्वयं भगवान ब्रह्मा और महर्षि वेदव्यास जी ने किया है:

अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च।
एकादश्या कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥

अर्थात, हजारों अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञ मिलकर भी एकादशी व्रत के फल के 16वें अंश के बराबर नहीं हो सकते।

  • समस्त पापों का नाश: इस व्रत को करने से ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी, और गुरु द्रोह जैसे महापाप भी भस्म हो जाते हैं।
  • वैकुंठ लोक की प्राप्ति: इस व्रत का पालन करने वाले साधक को अंत समय में यमदूतों का सामना नहीं करना पड़ता। भगवान विष्णु के पार्षद (विष्णुदूत) उसे अत्यंत दिव्य विमान में बिठाकर सीधे बैकुंठ धाम ले जाते हैं।
  • अक्षय पुण्य: जो मनुष्य इस दिन गौ दान, स्वर्ण दान, या जल दान करता है, उसे अनंत कोटि पुण्यों की प्राप्ति होती है और उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

सामान्य प्रश्नोत्तर (Frequently Asked Questions)

निर्जला एकादशी का व्रत कौन-कौन रख सकता है?

निर्जला एकादशी का व्रत पुरुष, स्त्री, वृद्ध और युवा सभी रख सकते हैं। हालाँकि, यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक बीमार हो, गर्भवती स्त्री हो या शारीरिक रूप से निर्जल रहने में असमर्थ हो, तो वे फलाहार या जल ग्रहण करके (जलाहार) भी यह व्रत रख सकते हैं। भगवान भाव के भूखे हैं, शारीरिक कष्ट देकर जबरन व्रत करना अनिवार्य नहीं है।

क्या निर्जला एकादशी में आचमन करने से व्रत टूट जाता है?

नहीं, पूजा के समय शरीर और मन की शुद्धि के लिए किया जाने वाला आचमन शास्त्रसम्मत है। आचमन में केवल एक माशे (लगभग जल की एक-दो बूंद) के बराबर जल मुख में लिया जाता है, जिसे निगला नहीं जाता बल्कि जीभ को स्पर्श कराया जाता है। इससे व्रत भंग नहीं होता। परंतु प्यास बुझाने के उद्देश्य से जल पीना वर्जित है।

निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहा जाता है?

महाभारत काल में पांडुपुत्र भीमसेन (वृकोदर) अपनी अत्यधिक भूख के कारण वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत रखने में असमर्थ थे। महर्षि वेदव्यास जी के परामर्श पर भीमसेन ने केवल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का अत्यंत कठिन निर्जल उपवास रखा था और मोक्ष प्राप्त किया था। भीमसेन द्वारा यह व्रत धारण किए जाने के कारण ही इसे 'भीमसेनी एकादशी' या 'पांडव एकादशी' कहा जाता है।

निर्जला एकादशी पर जल दान का क्या महत्व है?

ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में जल का दान करना सनातन धर्म में परम धर्म माना गया है। इस दिन राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, पंखे बांटना, और ब्राह्मणों या निर्धनों को जल से भरे मिट्टी के मटके दान करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ऐसा करने से साधक के घर में धन, धान्य और सुख-समृद्धि का वास होता है।

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संपादकीय नीति एवं प्रामाणिकता संदर्भ

यह पावन पौराणिक कथा एवं व्रत विधान उपलब्ध धार्मिक शास्त्रों (पद्म पुराण, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, श्रीमद्भागवत एवं अन्य प्रामाणिक संदर्भों) के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा शोध एवं समीक्षा उपरांत सरल हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म की अमूल्य परंपराओं एवं नैतिक शिक्षाओं का जन-जन तक प्रसार करना है।

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Deepak Kumar Bind

भक्तिलोक के वरिष्ठ धार्मिक शोधकर्ता एवं पौराणिक कथा संपादक। सनातन धर्म, व्रत-त्योहारों, वैदिक अनुष्ठानों और भक्ति परंपराओं पर प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करने हेतु समर्पित।

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