सभी अध्याय अध्याय 7 | 30 श्लोक

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)

सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (साक्षात्कार) का वर्णन करते हैं। वह अपनी योगमाया, अपने दो प्रकार के स्वरूप (परा और अपरा प्रकृति) तथा भक्ति द्वारा उन्हें जानने के मार्ग की व्याख्या करते हैं।

परिचय / Introduction

अध्याय ६ के अंत में कृष्ण ने भक्त को सभी योगियों में श्रेष्ठ बताया। अब अध्याय ७ में वह उस भक्ति के लिए आवश्यक तत्व "ज्ञान और विज्ञान" का विस्तार से वर्णन करते हैं। यह अध्याय ईश्वर के स्वरूप और उसकी शक्तियों को समझने का आधार प्रस्तुत करता है।

मुख्य विषय / Key Themes

  • दो प्रकृतियाँ (Two Natures): कृष्ण अपनी दो प्रकार की प्रकृतियाँ बताते हैं – अपरा (जड़, भौतिक) और परा (चेतन, जीवात्मा)। यह सम्पूर्ण जगत इन्हीं दोनों का संयोग है।
  • जगत का आधार (The Support of the Universe): वे सभी तत्वों के मूल कारण हैं। सब कुछ उनमें धागे में मणियों की तरह पिरोया हुआ है।
  • ईश्वर को जानना कठिन क्यों? (Why is it difficult to know God?): उनकी योगमाया से मोहित मनुष्य उन्हें नहीं जान पाता। केवल वे ही जान पाते हैं जो उनकी शरण में आते हैं।
  • चार प्रकार के भक्त (Four Kinds of Devotees): आर्त (दुःखी), जिज्ञासु (जानने की इच्छा वाला), अर्थार्थी (सांसारिक लाभ चाहने वाला) और ज्ञानी। इनमें भी ज्ञानी भक्त सबसे प्रिय है।
  • देवताओं की उपासना बनाम कृष्ण की उपासना (Worship of Deities vs. Worship of Krishna): अल्पबुद्धि लोग देवताओं की पूजा करते हैं और सीमित फल पाते हैं, लेकिन कृष्ण की भक्ति करने वाला उनके परम धाम को प्राप्त होता है।

यह अध्याय हमें सिखाता है कि संसार का वास्तविक स्वामी और आधार एक ही परम सत्ता है। उसे केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि श्रद्धा और भक्ति से जाना जा सकता है। जो उस परम तत्व को जान लेता है, उसके लिए फिर कुछ भी अज्ञात नहीं रहता। This chapter reveals the divine nature of Krishna and emphasizes that true wisdom lies in recognizing Him as the supreme cause of all causes.

अध्याय के सभी श्लोक

श्लोक 21

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यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१॥

“जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धापूर्वक पूजना चाहता है, उस-उसकी श्रद्धा को मैं उसी देवता में अचल कर देता हूँ।”

English: Whatever form any devotee desires to worship with faith – that (same) faith of his I make unshakable.

श्लोक 22

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स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२॥

“वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस (देवता) की आराधना करता है और उससे अपने अभीष्ट पदार्थों को प्राप्त करता है – वे सब मेरे द्वारा ही नियत किए गए होते हैं।”

English: Endowed with that faith, he engages in the worship of that (form) and from it obtains his desires, these being decreed by Me alone.

श्लोक 23

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अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३॥

“उन अल्पबुद्धि वालों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, परन्तु मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।”

English: But the fruit (accruing) to these men of little understanding is limited. The worshippers of the gods go to the gods, but My devotees come to Me.

श्लोक 24

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अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४॥

“अबुद्धि लोग मुझ अव्यक्त को व्यक्त रूप में प्राप्त मानते हैं, वे मेरे परम, अविनाशी और अनुत्तम भाव को नहीं जानते।”

English: The unintelligent think of Me, the Unmanifest, as having become manifest, not knowing My supreme, imperishable and transcendental state.

श्लोक 25

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नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढो ऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५॥

“मैं योगमाया से आवृत होने के कारण सबके लिए प्रकट नहीं होता। यह मूढ़ संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।”

English: I am not manifest to all, being veiled by Yoga-Maya. This deluded world does not know Me, the unborn and imperishable.

श्लोक 26

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वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६॥

“हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों को, जो बीत चुके हैं, वर्तमान में हैं और भविष्य में होंगे, जानता हूँ। परन्तु मुझे कोई नहीं जानता।”

English: I know, O Arjuna, all beings that are past, present, and future; but no one knows Me.

श्लोक 27

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इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७॥

“हे भरतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह के कारण समस्त प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।”

English: O Bharata (Arjuna), all beings are born into delusion, O conqueror of foes, overcome by the delusion of duality arising from desire and aversion.

श्लोक 28

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येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८॥

“परन्तु जिन पुण्यकर्मी मनुष्यों के पाप समाप्त हो गए हैं, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत से मेरा भजन करते हैं।”

English: But those men of virtuous deeds, whose sins have come to an end, are freed from the delusion of dualities and worship Me with firm resolve.

श्लोक 29

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जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९॥

“जो पुरुष जरा और मरण से मुक्ति के लिए मेरी शरण ग्रहण करके प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और समस्त कर्म को जान लेते हैं।”

English: Those who strive for freedom from old age and death, taking refuge in Me, know Brahman, the whole of Adhyatma, and all Karma.

श्लोक 30

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साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३०॥

“जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रूप में जानते हैं, वे युक्तचित्त होकर मृत्युकाल में भी मुझे जानते हैं (अर्थात् मुझे प्राप्त होते हैं)।”

English: Those who know Me as the Adhibhuta (the basis of material existence), Adhidaiva (the basis of all gods), and Adhiyajna (the basis of all sacrifices), they, with their minds steadfast, know Me even at the time of death.