नवरात्रि उत्सव • वर्ष २०२७

शारदीय नवरात्रि 2027: कलश स्थापना घटस्थापना मुहूर्त, नौ देवियों की साधना, अखंड ज्योति नियम व दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

शारदीय नवरात्रि 2027 के पावन अवसर पर जानें घटस्थापना का सबसे शुभ मुहूर्त, माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा विधि, अखंड ज्योति प्रज्वलन के नियम और संपूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्व। इस लेख में पढ़ें संपूर्ण वैदिक एवं पौराणिक विधान।

२ अक्टूबर २०२७, शनिवार तिथि व दिनांक
नवरात्रि उत्सव धार्मिक श्रेणी
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१३ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: शारदीय नवरात्रि 2027 के पावन अवसर पर जानें घटस्थापना का सबसे शुभ मुहूर्त, माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा विधि, अखंड ज्योति प्रज्वलन के नियम और संपूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्व। इस लेख में पढ़ें संपूर्ण वैदिक एवं पौराणिक विधान।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
प्रारंभ / मुख्य तिथि: २ अक्टूबर २०२७, शनिवार
समाप्ति / पारण तिथि: ११ अक्टूबर २०२७, सोमवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत

शारदीय नवरात्रि: आध्यात्मिक चेतना और शक्ति उपासना का महापर्व

सनातन संस्कृति में नवरात्रि का पर्व केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की आदिशक्ति माँ दुर्गा की आराधना, आत्मिक शुद्धि और ऊर्जा के संचय का सर्वोच्च काल है। वर्षभर में चार बार आने वाली नवरात्रि (दो गुप्त और दो प्रकट - चैत्र एवं शारदीय) में से शारदीय नवरात्रि का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होने वाला यह उत्सव विजयदशमी (दशहरा) तक चलता है। इसे 'अश्वयुग नवरात्रि' भी कहा जाता है क्योंकि इस दौरान मौसम का संधिकाल होता है, जो साधना और स्वास्थ्य दोनों के लिए अत्यंत उत्तम माना जाता है।

भक्तिलोक.इन के इस विस्तृत मार्गदर्शन में हम शारदीय नवरात्रि की तिथि, घटस्थापना के अचूक मुहूर्त, नौ दिनों की नौ देवियों की पूजा पद्धति, अखंड ज्योति नियम, और व्रत के नियमों का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

शारदीय नवरात्रि: पंचांग एवं तिथियां

वैदिक पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होगा। प्रतिपदा तिथि पर ही माँ शैलपुत्री के पूजन के साथ घटस्थापना (कलश स्थापना) की जाती है।

दिवस / तिथि माँ का स्वरूप प्रमुख कृत्य / अनुष्ठान
प्रतिपदा (दिन १) माँ शैलपुत्री घटस्थापना, कलश स्थापना, अखंड ज्योति, माँ शैलपुत्री पूजा
द्वितीया (दिन २) माँ ब्रह्मचारिणी तप और संयम की देवी की साधना, जप
तृतीया (दिन ३) माँ चंद्रघंटा सौम्य और कल्याणकारी स्वरूप का पूजन
चतुर्थी (दिन ४) माँ कूष्मांडा ब्रह्मांड की रचना करने वाली देवी की अर्चना
पंचमी (दिन ५) माँ स्कंदमाता मोक्ष के द्वार खोलने वाली करुणामयी माता का पूजन
षष्ठी (दिन ६) माँ कात्यायनी विवाह बाधा निवारण और शक्ति प्राप्ति हेतु पूजा
सप्तमी (दिन ७) माँ कालरात्रि महागौरी/कालरात्रि तांत्रिक एवं विशेष साधना, रात्रि जागरण
अष्टमी (दिन ८) माँ महागौरी महाष्टमी व्रत, संधि पूजा, कन्या पूजन
नवमी (दिन ९) माँ सिद्धिदात्री महानवमी हवन, पूर्णाहुति, कन्या पूजन, नवरात्रि व्रत पारण
दशमी (दिन १०) विजयादशमी माँ दुर्गा प्रतिमा विसर्जन, शमी पूजन, रावण दहन

कलश स्थापना (घटस्थापना) शुभ मुहूर्त एवं विधान

शारदीय नवरात्रि का प्रथम दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन प्रतिपदा तिथि में चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के त्याग के पश्चात घटस्थापना की जाती है। अभिजीत मुहूर्त कलश स्थापना के लिए सबसे उत्तम माना गया है।

  • ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:25 बजे से 05:13 बजे तक
  • प्रातःकालीन मुहूर्त / अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक
  • वर्जित काल: राहुकाल और अशुभ चौघड़िया में घटस्थापना कभी न करें।

घटस्थापना की आवश्यक सामग्री

मिट्टी का पात्र (वेदी), शुद्ध साफ मिट्टी, जौ (सप्तधान्य के लिए), मिट्टी या तांबे का कलश, गंगाजल, आम या अशोक के पांच पत्ते, जटा वाला नारियल, कलावा (मौली), रोली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, और लाल वस्त्र।

चरण-दर-चरण घटस्थापना विधि

  1. ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को अच्छी तरह साफ कर पवित्र करें। वहाँ पाला बिछाकर लाल रंग का वस्त्र बिछाएं।
  2. मिट्टी के पात्र में पवित्र मिट्टी बिछाकर उसमें जौ के बीज बोएं और थोड़ा सा जल छिड़क दें।
  3. तांबे या मिट्टी के कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाएं और उसके गले में मौली बांधें।
  4. कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत और दूर्वा डालें।
  5. कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखकर उस पर नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर स्थापित करें।
  6. 'ॐ भूर्भुवः स्वः घटेश्वराय नमः' मंत्र का उच्चारण करते हुए वरुण देव और माँ दुर्गा का आह्वान करें।

नवरात्र पर्व की पौराणिक कथा एवं महत्व

पुराणों के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने अपने तप के बल पर देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। तीनों लोक त्राहि-त्राहि कर उठे। तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से महाशक्ति भगवती दुर्गा प्रकट हुईं। देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र माता को समर्पित किए। माँ दुर्गा ने नौ दिनों तक भीषण युद्ध करते हुए महिषासुर और उसकी सेना का संहार किया। तभी से आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक के इन नौ दिनों को 'नवरात्रि' के रूप में मनाया जाने लगा। यह पर्व असत्य पर सत्य की, अंधकार पर प्रकाश की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।

नौ देवियों की साधना, मंत्र एवं भोग

हर दिन भगवती के अलग स्वरूप को समर्पित होता है। आइए जानें नौ देवियों के मंत्र और प्रिय भोग:

  • माँ शैलपुत्री: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै शैलपुत्री नमः। भोग - गाय का शुद्ध घी।
  • माँ ब्रह्मचारिणी: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिणी नमः। भोग - शक्कर और पंचामृत।
  • माँ चंद्रघंटा: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चंद्रघंटायै नमः। भोग - खीर या मिष्ठान।
  • माँ कूष्मांडा: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडास्यै नमः। भोग - मालपुए।
  • माँ स्कंदमाता: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमात्रै नमः। भोग - केला।
  • माँ कात्यायनी: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायनी नमः। भोग - शहद।
  • माँ कालरात्रि: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्रायै नमः। भोग - गुड़ से बनी वस्तुएं।
  • माँ महागौरी: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्यै नमः। भोग - नारियल या हलवा-पूरी।
  • माँ सिद्धिदात्री: मंत्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नमः। भोग - तिल, हलवा और चना।

दुर्गा सप्तशती पाठ और अखंड ज्योति के नियम

नवरात्रि में 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ करने से साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। पाठ करते समय उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करके ही सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करना चाहिए। यदि आप अखंड ज्योति जला रहे हैं, तो ध्यान रखें कि दीपक को कभी भी अकेला न छोड़ें, उसमें पर्याप्त घी/तेल हो और उसकी बाती की दिशा पूर्व या उत्तर की ओर हो।

कन्या पूजन (कंजका) और व्रत पारण

अष्टमी या नवमी तिथि को 2 वर्ष से 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन किया जाता है। इन्हें माँ दुर्गा का स्वरूप मानकर उनके चरण धोए जाते हैं, टीका लगाया जाता है, कलावा बांधा जाता है और हलवा, पूरी तथा काले चने का प्रसाद खिलाकर दक्षिणा दी जाती है। इसके पश्चात दशमी तिथि को हवन की पूर्णाहुति के बाद व्रत का पारण किया जाता है।

व्रत के दौरान क्या खाएं और किन नियमों का पालन करें

ध्यान दें: नवरात्रि के दिनों में सात्विक आहार का पालन करें। लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का पूर्ण त्याग करें। सेंधा नमक का प्रयोग करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में सकारात्मक विचार रखें।

क्षेत्रीय उत्सव और परंपराएं

भारत के विभिन्न राज्यों में नवरात्रि का उल्लास अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल में भव्य 'दुर्गा पूजा पंडाल' और धुनुची नृत्य आकर्षण का केंद्र होते हैं। गुजरात में पारंपरिक 'गरबा' और 'डांडिया' की धूम रहती है। उत्तर भारत में रामलीला का मंचन और रावण दहन की तैयारियां होती हैं, जबकि दक्षिण भारत में 'बोम्मालू कोलुवु' (गुड़ियों की प्रदर्शनी) सजाई जाती है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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