एकादशी व्रत • वर्ष २०२६

पापांकुशा एकादशी 2026: आश्विन शुक्ल एकादशी व्रत, श्रीहरि पूजन व पारण मुहूर्त

पापांकुशा एकादशी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। पद्म पुराण के अनुसार यह एकादशी सभी प्रकार के पापों का नाश करने, गजेंद्र मोक्ष प्रदान करने और भगवान विष्णु की कृपा से बैकुंठ धाम की प्राप्ति कराने वाली मानी जाती है।

२२ अक्टूबर २०२६, गुरुवार तिथि व दिनांक
एकादशी व्रत धार्मिक श्रेणी
११७ कुल पाठक संख्या
६ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: पापांकुशा एकादशी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। पद्म पुराण के अनुसार यह एकादशी सभी प्रकार के पापों का नाश करने, गजेंद्र मोक्ष प्रदान करने और भगवान विष्णु की कृपा से बैकुंठ धाम की प्राप्ति कराने वाली मानी जाती है।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
प्रारंभ / मुख्य तिथि: २२ अक्टूबर २०२६, गुरुवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत

पापांकुशा एकादशी 2026: सनातन धर्म में इसका अद्वितीय महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को 'पापांकुशा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य के समस्त पाप अंकुश में आ जाते हैं (नियंत्रित हो जाते हैं) और वह दैवीय गुणों को प्राप्त करता है। पद्म पुराण में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस एकादशी के महात्म्य के बारे में बताया है। यह व्रत मनुष्य को यमराज की यातनाओं से मुक्त कराकर अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति करवाता है।

पापांकुशा एकादशी 2026: तिथि, समय और पंचांग विवरण

वर्ष 2026 में पापांकुशा एकादशी का व्रत बहुत ही शुभ योगों में मनाया जाएगा। नीचे दी गई सारणी के माध्यम से आप सटीक तिथियों और मुहूर्तों को समझ सकते हैं:

विवरण तिथि / समय
एकादशी तिथि प्रारंभ शीघ्र पंचांग गणना के अनुसार आश्विन शुक्ल एकादशी
एकादशी तिथि समाप्त अगले दिन सूर्योदय से पूर्व
व्रत पारण का समय (Paran Timing) द्वादशी तिथि के दिन सूर्योदय के पश्चात शुभ मुहूर्त में
प्रमुख देवता भगवान विष्णु (पद्मनाभ रूप)

पौराणिक कथा एवं कथासार

पापांकुशा एकादशी की कथा विंध्य पर्वत पर रहने वाले एक क्रूर बहेलिया (शिकारी) क्रोधन की कथा से जुड़ी है। अपने संपूर्ण जीवन में पाप कर्म करते-करते जब उसका अंतिम समय आया, तो महर्षि अंगिरा के आश्रम में उसने एकादशी का यह पवित्र व्रत किया। अनजाने में ही सही, किंतु एकादशी के प्रभाव और भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से उसे मृत्यु के पश्चात उत्तम गति और भगवान विष्णु के परम धाम की प्राप्ति हुई। यह कथा दर्शाती है कि सच्चे मन से श्रीहरि की शरण में आने वाले पापी व्यक्ति का भी उद्धार हो जाता है।

पापांकुशा एकादशी की विस्तृत पूजा विधि

व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

  1. कलश स्थापना: ईशान कोण में एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। तांबे के कलश में जल, आम के पत्ते और सुपारी रखकर कलश स्थापना करें।
  2. षोडशोपचार पूजन: श्रीहरि को रोक्ष, चंदन, अक्षत, पीले फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  3. मंत्र जाप: भगवान विष्णु के मूल मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का कम से कम एक माला जाप अवश्य करें।
  4. विष्णु सहस्त्रनाम पाठ: इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम या गजेंद्र स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  5. आरती और भोग: भगवान को केले, पंचामृत और तुलसी दल सहित सात्विक व्यंजनों का भोग लगाएं। अंत में आरती कर क्षमा प्रार्थना करें।

आवश्यक पूजन सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर
  • पीला वस्त्र, कलावा, जनेऊ
  • रोधी, अक्षत, हल्दी, चंदन
  • ताजे पीले फूल और तुलसी दल (अति अनिवार्य)
  • धूप, दीप, शुद्ध घी का दीपक, कपूर
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • ऋतुफल, नारियल, पान, सुपारी और दक्षिणा

क्षेत्रीय परंपराएं और सांस्कृतिक महत्व

भारत के विभिन्न राज्यों में पापांकुशा एकादशी को अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में जहां मंदिरों में विशेष श्रीहरि की झांकियां सजाई जाती हैं, वहीं दक्षिण भारत में इसे 'पद्मनाभ एकादशी' के रूप में मनाते हुए भगवान पद्मनाभ स्वामी की विशेष आराधना की जाती है। इस दिन मंदिरों में विशेष भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण का भी आयोजन होता है।

व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें (Dos and Don'ts)

विशेष ध्यान दें: एकादशी के दिन चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित माना जाता है। इस दिन किसी की निंदा न करें, क्रोध पर नियंत्रण रखें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। अन्न का त्याग करते हुए फलाहार या केवल जल पर रहकर व्रत संपन्न करना उत्तम माना गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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