॥ श्री कुबेर देव की पावन आरती - ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान कुबेर को धन का अधिपति, यक्षों का राजा और उत्तर दिशा का दिक्पाल माना गया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, कुबेर देव की भक्ति और उनकी आरती करने से साधक के जीवन में आर्थिक तंगी का नाश होता है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यह आरती न केवल धन प्राप्ति का साधन है, बल्कि यह मन में सात्विक भाव और उदारता का संचार भी करती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय यक्ष...
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
स्वामी दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय यक्ष...
अमृत के समान, तुम धन के स्वामी हो।
स्वामी तुम धन के स्वामी हो।
सबके हृदय में बसते, अंतर्यामी हो॥ ॐ जय यक्ष...
पुष्पक विमान विराजे, स्वर्ण मुकुट सोहे।
स्वामी स्वर्ण मुकुट सोहे।
भक्तों की मनोकामना, पल में पूरी होवे॥ ॐ जय यक्ष...
यक्षराज तुम स्वामी, सब जग के दाता।
स्वामी सब जग के दाता।
भक्तों की रक्षा करते, भाग्य के विधाता॥ ॐ जय यक्ष...
कुबेर आरती जो गावे, सुख-संपति पावे।
स्वामी सुख-संपति पावे।
दुख-दारिद्रय मिट जावे, प्रभु दर्शन पावे॥ ॐ जय यक्ष...
ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय यक्ष...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
कुबेर आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय यक्ष कुबेर हरे' में हम भगवान कुबेर को प्रणाम करते हैं। 'यक्ष' का अर्थ है प्रकृति की गुप्त शक्तियों के स्वामी। कुबेर देव भक्तों के सभी संकटों को क्षण भर में दूर करने वाले हैं। आरती की अगली पंक्तियों में कहा गया है कि जो भी भक्त सच्चे मन से उनका ध्यान करता है, उसके मन के सभी दुख और संताप मिट जाते हैं। धन के अधिपति होने के कारण, वे भक्तों के घर में सुख और संपत्ति का वास कराते हैं। वे अंतर्यामी हैं, जो सबके हृदय में निवास करते हैं। पुष्पक विमान पर विराजमान कुबेर देव का स्वर्ण मुकुट उनकी दिव्यता को दर्शाता है। वे भाग्य के विधाता हैं और जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक उनकी आरती गाता है, उसके जीवन से दरिद्रता का नाश होता है और उसे प्रभु के दिव्य दर्शन प्राप्त होते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कुबेर महर्षि विश्रवा के पुत्र हैं। उन्हें भगवान शिव का परम भक्त माना जाता है। कुबेर देव को 'धनपति' कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे ब्रह्मांड के समस्त धन और खजाने के संरक्षक हैं। वे उत्तर दिशा के स्वामी हैं, इसलिए वास्तु शास्त्र में भी कुबेर का स्थान उत्तर दिशा में ही माना गया है। दीपावली और धनतेरस के दिन कुबेर देव की पूजा का विशेष महत्व है। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को न केवल भौतिक सुख मिलता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
कुबेर देव की आरती करने के लिए सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर कुबेर देव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। उन्हें अक्षत, पुष्प, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद घी का दीपक जलाएं और पूरे भक्ति भाव से आरती करें। आरती के दौरान घंटी और शंख का प्रयोग करना शुभ माना जाता है। आरती के अंत में 'कर्पूर गौरं' या 'क्षमा प्रार्थना' मंत्र का जाप अवश्य करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
आरती के लिए एक पीतल या तांबे की थाली का उपयोग करें। थाली में शुद्ध घी का दीपक, कपूर, धूप, ताजे फूल, चंदन, अक्षत (चावल), और भोग के लिए मिठाई या फल रखें। शंख और घंटी का होना भी अनिवार्य है क्योंकि इनकी ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है।
राग, ताल एवं गायन समय
कुबेर आरती को राग कल्याण या राग यमन में गाना अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इसकी लय धीमी और गंभीर होनी चाहिए। इसे प्रातः काल या संध्या काल में करना सर्वोत्तम है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से कुबेर आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्यापार में वृद्धि, कर्ज से मुक्ति और आर्थिक स्थिरता प्रदान करती है। यह आरती साधक को लोभ से मुक्त कर दानशीलता की ओर प्रेरित करती है।