पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान कुबेर आरती
18 पाठ

श्री कुबेर देव की पावन आरती - ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री कुबेर देव की पावन आरती - ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान कुबेर को धन का अधिपति, यक्षों का राजा और उत्तर दिशा का दिक्पाल माना गया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, कुबेर देव की भक्ति और उनकी आरती करने से साधक के जीवन में आर्थिक तंगी का नाश होता है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यह आरती न केवल धन प्राप्ति का साधन है, बल्कि यह मन में सात्विक भाव और उदारता का संचार भी करती है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय यक्ष...

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
स्वामी दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय यक्ष...

अमृत के समान, तुम धन के स्वामी हो।
स्वामी तुम धन के स्वामी हो।
सबके हृदय में बसते, अंतर्यामी हो॥ ॐ जय यक्ष...

पुष्पक विमान विराजे, स्वर्ण मुकुट सोहे।
स्वामी स्वर्ण मुकुट सोहे।
भक्तों की मनोकामना, पल में पूरी होवे॥ ॐ जय यक्ष...

यक्षराज तुम स्वामी, सब जग के दाता।
स्वामी सब जग के दाता।
भक्तों की रक्षा करते, भाग्य के विधाता॥ ॐ जय यक्ष...

कुबेर आरती जो गावे, सुख-संपति पावे।
स्वामी सुख-संपति पावे।
दुख-दारिद्रय मिट जावे, प्रभु दर्शन पावे॥ ॐ जय यक्ष...

ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय यक्ष...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

कुबेर आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय यक्ष कुबेर हरे' में हम भगवान कुबेर को प्रणाम करते हैं। 'यक्ष' का अर्थ है प्रकृति की गुप्त शक्तियों के स्वामी। कुबेर देव भक्तों के सभी संकटों को क्षण भर में दूर करने वाले हैं। आरती की अगली पंक्तियों में कहा गया है कि जो भी भक्त सच्चे मन से उनका ध्यान करता है, उसके मन के सभी दुख और संताप मिट जाते हैं। धन के अधिपति होने के कारण, वे भक्तों के घर में सुख और संपत्ति का वास कराते हैं। वे अंतर्यामी हैं, जो सबके हृदय में निवास करते हैं। पुष्पक विमान पर विराजमान कुबेर देव का स्वर्ण मुकुट उनकी दिव्यता को दर्शाता है। वे भाग्य के विधाता हैं और जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक उनकी आरती गाता है, उसके जीवन से दरिद्रता का नाश होता है और उसे प्रभु के दिव्य दर्शन प्राप्त होते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कुबेर महर्षि विश्रवा के पुत्र हैं। उन्हें भगवान शिव का परम भक्त माना जाता है। कुबेर देव को 'धनपति' कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे ब्रह्मांड के समस्त धन और खजाने के संरक्षक हैं। वे उत्तर दिशा के स्वामी हैं, इसलिए वास्तु शास्त्र में भी कुबेर का स्थान उत्तर दिशा में ही माना गया है। दीपावली और धनतेरस के दिन कुबेर देव की पूजा का विशेष महत्व है। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को न केवल भौतिक सुख मिलता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

कुबेर देव की आरती करने के लिए सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर कुबेर देव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। उन्हें अक्षत, पुष्प, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद घी का दीपक जलाएं और पूरे भक्ति भाव से आरती करें। आरती के दौरान घंटी और शंख का प्रयोग करना शुभ माना जाता है। आरती के अंत में 'कर्पूर गौरं' या 'क्षमा प्रार्थना' मंत्र का जाप अवश्य करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

आरती के लिए एक पीतल या तांबे की थाली का उपयोग करें। थाली में शुद्ध घी का दीपक, कपूर, धूप, ताजे फूल, चंदन, अक्षत (चावल), और भोग के लिए मिठाई या फल रखें। शंख और घंटी का होना भी अनिवार्य है क्योंकि इनकी ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है।

राग, ताल एवं गायन समय

कुबेर आरती को राग कल्याण या राग यमन में गाना अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इसकी लय धीमी और गंभीर होनी चाहिए। इसे प्रातः काल या संध्या काल में करना सर्वोत्तम है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से कुबेर आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्यापार में वृद्धि, कर्ज से मुक्ति और आर्थिक स्थिरता प्रदान करती है। यह आरती साधक को लोभ से मुक्त कर दानशीलता की ओर प्रेरित करती है।

१. श्री कुबेर देव की पावन आरती - ॐ जय यक्ष कुबेर हरे, स्वामी जय यक्ष कुबेर हरे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान कुबेर के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान कुबेर जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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