भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

शान्तं कार्म भुजगशयनम् श्लोक अर्थ सहित (Shantam Bhujagashayanam Shloka Lyrics in Hindi)

भगवान विष्णु के प्रसिद्ध श्लोक 'शान्तकारं भुजगशयनम्' का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, शब्दार्थ, गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ एवं पाठ विधि हिंदी में पढ़ें।

श्रोत्रियों और वेदान्त प्रेमियों के लिए भूमिका

सनातन संस्कृति और वैदिक सनातन धर्म में भगवान विष्णु को अखिल ब्रह्मांड का पालनहार, सृष्टि के संरक्षक और समस्त चराचर जगत का आधार माना गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण तथा विभिन्न वैदिक स्तोत्रों में भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों का अत्यंत मनमोहक, दिव्य और दार्शनिक वर्णन प्राप्त होता है। जब भी कोई साधक अपनी संध्यावंदना, देव-पूजन अथवा नित्य ध्यान की प्रक्रिया को पूर्ण करता है, तो उसके मुख से अनायास ही भगवान विष्णु के इस अत्यंत प्रसिद्ध और शांत रूप का स्मरण कराने वाला श्लोक निकल पड़ता है—'शान्तकारं भुजगशयनम्'। यह श्लोक न केवल भगवान विष्णु के बाह्य रूप का सांगोपंग वर्णन करता है, बल्कि इसके भीतर अद्वैत वेदांत, सांख्य दर्शन और योग दर्शन के अत्यंत गहरे गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं।

Shloka / Suktam Origin & Vedic Context (उद्गम एवं संदर्भ)

इस महान श्लोक का मूल संदर्भ पुराण साहित्य और वैष्णव आगमों से जुड़ा हुआ है। यद्यपि इसे विभिन्न स्तोत्रों और प्रार्थनाओं के अंग के रूप में पढ़ा जाता है, तथापि इसका उद्गम सनातन पौराणिक परंपरा के उस स्वर्णकाल से है जहाँ ऋषि-मुनि भगवान के शाश्वत और निराकार-साकार दोनों रूपों का एक साथ दर्शन करते थे। पुराणों के अनुसार, जब प्रलय काल होता है और संपूर्ण सृष्टि अपने मूल कारण में लीन हो जाती है, तब भी केवल परमात्मा शेष रहते हैं। क्षीरसागर के अनंत अनंत नाग (शेषनाग) की शय्या पर विश्राम करते हुए भगवान विष्णु का यह रूप इस बात का प्रतीक है कि प्रलय और क्षोभ के समय भी ईश्वर का आंतरिक स्वरूप पूर्णतः शांत, स्थिर और आनंदमय रहता है।

Complete Sanskrit Shlokas / Suktam Text (मूल शुद्ध संस्कृत पाठ)

यहाँ भगवान विष्णु के इस पावन ध्यान श्लोक का शुद्ध देवनागरी पाठ प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसका उच्चारण साधक को एकाग्रता के साथ करना चाहिए:
शान्तकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
संधि-विच्छेद:
शान्त-कारम् भुजग-शयनम् पद्म-नाभम् सुर-ईशम्
विश्व-आधारम् गगन-सदृशम् मेघ-वर्णम् शुभ-अङ्गम्

लक्ष्मी-कान्तम् कमल-नयनम् योगिभिः-ध्यान-गम्यम्
वन्दे विष्णुम् भव-भय-हरम् सर्व-लोक-एक-नाथम्

Word-by-Word Breakdown & Translation (पद-दर-पद अन्वय एवं सरल हिंदी अर्थ)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का व्याकरणिक और आध्यात्मिक अर्थ नीचे सारणीबद्ध किया गया है:

संस्कृत पदसंधि / विश्लेषणशाब्दिक अर्थ
शान्तकारम्शान्त + कारम्शांत है आकार या स्वरूप जिनका
भुजगशयनम्भुजग + शयनम्भुजग (सर्प/शेषनाग) है शयन (शय्या) जिनकी
पद्मनाभम्पद्म + नाभम्कमल है नाभि में जिनके (ब्रह्मा जी के उद्गम स्थल)
सुरेशम्सुर + ईशम्देवताओं के भी स्वामी या ईश्वर
विश्वाधारम्विश्व + आधारम्समस्त ब्रह्मांड का आधार या आश्रय
गगनसदृशम्गगन + सदृशम्आकाश के समान अनंत और सर्वव्यापी
मेघवर्णम्मेघ + वर्णम्जल से भरे नवीन मेघ (बादल) के समान श्याम वर्ण वाले
शुभाङ्गम्शुभ + अङ्गम्अत्यंत मंगलमय, सुंदर और पवित्र अंगों वाले
लक्ष्मीकान्तम्लक्ष्मी + कान्तम्माता लक्ष्मी के पति या प्रिय
कमलनयनम्कमल + नयनम्कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले
योगिभिः ध्यानगम्यम्योगिभिः + ध्यान-गम्यम्योगियों द्वारा ध्यान के माध्यम से प्राप्त किए जाने योग्य
वन्देवन्द धातु (उत्तम पुरुष एकवचन)मैं वंदना करता हूँ
विष्णुम्विष्णु (द्वितीया विभक्ति)भगवान विष्णु की
भवभयहरम्भव + भय + हरम्संसार के जन्म-मरण रूपी भय को हरने वाले
सर्वलोकैकनाथम्सर्व + लोक + एक + नाथम्समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी

सरल हिंदी अर्थ: जिनका स्वरूप अत्यंत शांत है, जो क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ है जो देवताओं के भी स्वामी हैं, जो संपूर्ण विश्व के आधार हैं, आकाश के समान अनंत और सर्वव्यापी हैं, जिनका वर्ण नवीन मेघ के समान श्यामल है, जिनके सभी अंग अत्यंत शुभ और सुंदर हैं, जो लक्ष्मीजी के स्वामी हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, जिन्हें योगीजन केवल ध्यान के द्वारा ही प्राप्त करते हैं, तथा जो इस संसार के जन्म-मरण रूपी भय को पूरी तरह नष्ट करने वाले हैं, ऐसे समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं बारंबार प्रणाम (वंदना) करता हूँ।

Deep Philosophical & Spiritual Meaning (गूढ़ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ)

इस स्तोत्र की पंक्तियाँ केवल एक देवता की स्तुति नहीं हैं, बल्कि यह वेदान्त के सर्वोच्च सत्यों का प्रतिपादन करती हैं। आइए इसके दार्शनिक पक्षों को समझें:

  • शान्तकारम् और भुजगशयनम्: शेषनाग निरंतर चलने वाली काल गति और चंचलता का प्रतीक है। उस भयंकर और विशाल सर्प पर भी भगवान का शांत मुद्रा में लेटे रहना यह दर्शाता है कि ईश्वर 'काल' के भी नियंत्रक (महाकाल) हैं। बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जितनी भी अशांत और प्रलयकारी क्यों न हों, भीतर का चेतन स्वरूप हमेशा शांत और निर्विकार रहता है।
  • पद्मनाभम् और विश्वाधारम्: नाभि से कमल का निकलना इस बात का द्योतक है कि यह संपूर्ण दृश्यमान जगत (ब्रह्मा जी द्वारा रचित सृष्टि) भगवान के ही गर्भ से, उनकी शक्ति से उत्पन्न हुआ है। वे इस चराचर जगत के मूल आधार हैं।
  • गगनसदृशम्: आकाश की तरह सर्वव्यापी होने के कारण भगवान को किसी एक देश या काल में बांधा नहीं जा सकता। वे घट-घट वासी और सर्वत्र परिपूर्ण हैं।
  • योगिभिर्ध्यानगम्यम्: सांसारिक प्रपंचों और भौतिक पदार्थों से इसे नहीं पाया जा सकता। इसे पाने का एकमात्र मार्ग अंतर्मुखी होना, चित्त की वृत्तियों को रोकना (योग) और ध्यान की प्रगाढ़ अवस्था को प्राप्त करना है।

Proper Recitation Protocol & Chanting Benefits (शुद्ध उच्चारण विधि व फलश्रुति)

इस श्लोक का दैनिक जीवन में अत्यंत महत्व है। इसे प्रातःकाल उठकर शय्या पर ही अथवा पूजा के आरंभ में पढ़ा जाता है।

  1. उच्चारण की शुद्धता: संस्कृत के वर्णों का उच्चारण करते समय दीर्घ (आ, ई, ऊ) और ह्रस्व (अ, इ, उ) स्वरों का विशेष ध्यान रखें। 'शान्तकारम्' बोलते समय अनुस्वार का उच्चारण सही ढंग से हो।
  2. मानस शांति: रात को सोने से पहले या सुबह स्नान के बाद इस श्लोक का तीन बार पाठ करने से मन की उद्विग्नता, तनाव और चिंता समाप्त होती है।
  3. भय मुक्ति: 'भवभयहरम्' पद के स्मरण मात्र से जीवन के अज्ञात भय, मृत्यु का भय और असफलताओं का संताप दूर होता है।

Psychological & Scientific Relevance (आधुनिक जीवन व मानसिक शांति में महत्व)

आधुनिक दौर में जहां मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद (Depression) और भागदौड़ भरी जिंदगी से त्रस्त है, वहाँ 'शान्तकारं भुजगशयनम्' का स्मरण एक मनोवैज्ञानिक औषधि का कार्य करता है। श्लोक के पहले ही शब्द 'शान्तकारम्' का उच्चारण मस्तिष्क की तंत्रिकाओं (Neurons) को शांत करने का संदेश देता है। जब हम किसी सर्वशक्तिमान, शांत और अनंत स्वरूप का ध्यान करते हैं, तो हमारे अवचेतन मन (Subconscious Mind) में एक सुरक्षा और स्थिरता की भावना उत्पन्न होती है, जो आधुनिक विज्ञान के अनुसार ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने और मानसिक एकाग्रता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 21 Oct 2026

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