॥ श्री हनुमान लला की आरती - आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की सम्पूर्ण बोल व भावार्थ ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता (Aarti Origin, Author & Pauranik Background)
श्री हनुमान जी की सबसे प्रसिद्ध आरती 'आरती कीजै हनुमान लला की' के रचयिता महान संत और रामानंदी संप्रदाय के प्रवर्तक स्वामी रामानंद जी माने जाते हैं। स्वामी रामानंद जी मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के एक स्तंभ थे, जिन्होंने भक्ति के द्वार सभी के लिए खोले। हनुमान जी को 'लला' कहकर संबोधित करना उनके प्रति वात्सल्य और अनन्य प्रेम को दर्शाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी कलयुग के जाग्रत देवता हैं। वे अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता हैं। इस आरती की रचना के पीछे का मुख्य उद्देश्य हनुमान जी के उन पराक्रमों का गान करना है, जो उन्होंने प्रभु श्री राम की सेवा में किए थे। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि हनुमान जी के संपूर्ण चरित्र का सार है। इसमें उनके जन्म, उनकी शक्ति, लंका दहन, लक्ष्मण जी के प्राण बचाने और असुरों के संहार का विस्तृत वर्णन मिलता है।
भक्ति साहित्य में इस आरती का स्थान सर्वोपरि है क्योंकि यह भक्त के भीतर साहस और समर्पण का संचार करती है। जब हम 'दुष्ट दलन रघुनाथ कला की' कहते हैं, तो हम स्वीकार करते हैं कि हनुमान जी स्वयं भगवान श्री राम की वह शक्ति (कला) हैं जो दुष्टों का दमन करती है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल (Complete Authentic Hindi Lyrics of Aarti)
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥
अंजनि पुत्र महा बलदायी। सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाये॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्राण उबारे॥
पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥
बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥
सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥
जो हनुमानजी की आरति गावे। बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥
लंक विध्वंस किये रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई॥
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ (Stanza-by-Stanza Hindi Meaning & Bhavarth)
मुखड़ा: आरती कीजै हनुमान लला की...
भावार्थ: हम सब मिलकर प्रिय हनुमान लला की आरती करते हैं। वे हनुमान जी जो दुष्टों का दलन (विनाश) करने वाले हैं और जिनमें साक्षात भगवान श्री रघुनाथ (राम) की कला (शक्ति) वास करती है। यहाँ 'लला' शब्द हनुमान जी के प्रति भक्त के स्नेह और आत्मीयता को प्रकट करता है।
पद १: जाके बल से गिरिवर कांपे...
भावार्थ: हनुमान जी के असीम बल का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि जिनके पराक्रम और हुंकार से विशाल पर्वत (गिरिवर) भी कांपने लगते हैं। जिनके नाम स्मरण मात्र से कोई भी रोग या दोष भक्त के समीप नहीं फटक सकता। यह पद हनुमान जी की शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति को रेखांकित करता है।
पद २: अंजनि पुत्र महा बलदायी...
भावार्थ: माता अंजनी के पुत्र हनुमान जी अत्यंत बलशाली हैं। वे केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि संतों और भक्तों के सदा सहायक हैं। जहाँ भी धर्म और सत्य की रक्षा की बात आती है, हनुमान जी वहां रक्षक बनकर खड़े रहते हैं।
पद ३: दे बीरा रघुनाथ पठाए...
भावार्थ: जब माता सीता की खोज का कठिन कार्य आया, तब भगवान श्री राम ने हनुमान जी को 'बीड़ा' (कार्य का उत्तरदायित्व) देकर भेजा। हनुमान जी ने न केवल लंका को जलाया, बल्कि माता सीता का पता लगाकर प्रभु राम को उनकी कुशलता का समाचार भी दिया।
पद ४: लंका सो कोट समुद्र सी खाई...
भावार्थ: लंका जैसा अभेद्य किला और समुद्र जैसी विशाल खाई, जिसे पार करना असंभव था, पवनपुत्र हनुमान जी ने उसे पार करने में तनिक भी देर नहीं लगाई। यह उनकी तीव्र गति और संकल्प शक्ति का परिचायक है।
पद ५: लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे...
भावार्थ: जब युद्ध भूमि में लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे, तब हनुमान जी ने रातों-रात द्रोणागिरी पर्वत लाकर और संजीवनी बूटी के माध्यम से उनके प्राणों की रक्षा की। यह उनके संकटमोचन स्वरूप को दर्शाता है।
पद ६: पैठि पाताल तोरि जम-कारे...
भावार्थ: हनुमान जी ने पाताल लोक में प्रवेश कर यमराज के समान भयंकर अहिरावण का वध किया और उसकी भुजाएं उखाड़ दीं। उन्होंने भगवान राम और लक्ष्मण को अहिरावण के चंगुल से मुक्त कराया।
पद ७: बाएं भुजा असुर दल मारे...
भावार्थ: हनुमान जी अपनी बाईं भुजा से असुरों के दल का संहार करते हैं और अपनी दाहिनी भुजा से संतों और भक्तों का उद्धार (तारा) करते हैं। यह संतुलन उनके संहारक और रक्षक दोनों रूपों को प्रकट करता है।
पद ८: सुर नर मुनि आरती उतारें...
भावार्थ: देवता, मनुष्य और मुनिजन सभी मिलकर हनुमान जी की आरती उतारते हैं और चारों दिशाओं में 'जय हनुमान' का जयघोष करते हैं।
पद ९: कंचन थार कपूर लौ छाई...
भावार्थ: सोने की थाली में कपूर की ज्योति जलाकर स्वयं माता अंजनी अपने पुत्र की आरती कर रही हैं। यह दृश्य अत्यंत दिव्य और मनोरम है।
फलश्रुति: जो हनुमानजी की आरति गावे...
भावार्थ: जो भी मनुष्य हनुमान जी की इस आरती को प्रेम और श्रद्धा के साथ गाता है, वह इस संसार के बंधनों से मुक्त होकर वैकुंठ धाम (परम पद) को प्राप्त करता है। अंत में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि रघुनाथ जी ने लंका का विध्वंस किया और हनुमान जी के यश का गान सर्वत्र फैल गया।
गायन का राग, ताल एवं धुन (Classical Raga, Tala & Melodic Notation)
हनुमान जी की आरती को शास्त्रीय और सुगम संगीत दोनों पद्धतियों में गाया जाता है। संगीत शास्त्र के अनुसार, इस आरती के लिए निम्नलिखित विधाएं उपयुक्त मानी गई हैं:
- राग: इस आरती को मुख्य रूप से राग बिलावल में गाया जाता है, जो शुद्ध स्वरों का राग है और स्फूर्ति व भक्ति का संचार करता है। संध्या काल में इसे राग यमन या राग भैरवी में भी गाया जा सकता है।
- ताल: यह आरती सामान्यतः कहरवा ताल (८ मात्रा) या दादरा ताल (६ मात्रा) में गाई जाती है। इसकी लय मध्यम होनी चाहिए, न बहुत तेज और न बहुत धीमी।
- धुन: इसकी धुन में एक विशेष प्रकार का 'वीर रस' और 'भक्ति रस' का मिश्रण होता है। ऊंचे स्वर में 'जय जय जय हनुमान उचारें' का गायन भक्त के भीतर ऊर्जा भर देता है।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि (Aarti Thali Rotation Protocol & Ritual Rules)
आरती केवल एक गायन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। हनुमान जी की आरती करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
| क्रम | विधि का विवरण |
|---|---|
| १. दीप चयन | हनुमान जी की आरती के लिए चमेली के तेल का दीपक या शुद्ध घी का दीपक उत्तम माना जाता है। कपूर का उपयोग अनिवार्य है। |
| २. थाली घुमाना | आरती की थाली को भगवान के चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे शरीर के सामने सात बार गोलाकार घुमाना चाहिए। |
| ३. शारीरिक मुद्रा | आरती करते समय सीधे खड़े रहें, रीढ़ की हड्डी सीधी हो और मन पूरी तरह हनुमान जी के चरणों में एकाग्र हो। | आरती के दौरान शंख, घंटी और मंजीरों का प्रयोग करना चाहिए। शंख की ध्वनि से वातावरण की नकारात्मकता दूर होती है। |
आरती समाप्त होने के बाद, दोनों हाथों से आरती की लौ को ग्रहण करना चाहिए और उसे अपने मस्तक व आंखों से लगाना चाहिए। इससे दीपक की सात्विक ऊर्जा भक्त के शरीर में प्रवेश करती है।
कर्पूर का महत्व व फलश्रुति (Spiritual Significance, Karpura Gauram & Phalasruthi)
आरती में कपूर (Camphor) का विशेष महत्व है। कपूर बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह जल जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि भक्त को भी अपना अहंकार ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह विलीन कर देना चाहिए। कपूर की सुगंध मन को शांत करती है और एकाग्रता बढ़ाती है।
फलश्रुति: हनुमान जी की आरती के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- भय, भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है।
- शनि दोष और अन्य ग्रहों के कुप्रभाव कम होते हैं।
- साहस, आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है।
- पारिवारिक क्लेश समाप्त होते हैं और सुख-शांति का वास होता है।
- असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है (जैसा कि आरती में कहा गया है - 'रोग दोष जाके निकट न झांके')।
Frequently Asked Questions (FAQs)
- प्रश्न १: हनुमान जी की आरती किस समय करनी चाहिए?
उत्तर: हनुमान जी की आरती सूर्योदय और सूर्यास्त (संध्या काल) के समय करना सबसे शुभ माना जाता है। विशेषकर मंगलवार और शनिवार को इसका महत्व बढ़ जाता है। - प्रश्न २: क्या महिलाएं हनुमान जी की आरती कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, महिलाएं हनुमान जी की आरती और पूजा कर सकती हैं। हनुमान जी सभी के रक्षक हैं, बस शुद्धता और भक्ति का ध्यान रखना आवश्यक है। - प्रश्न ३: आरती में चमेली के तेल का ही प्रयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर: चमेली का तेल हनुमान जी को अत्यंत प्रिय है। इसकी सुगंध से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और यह एकाग्रता बढ़ाने में सहायक है। - प्रश्न ४: 'आरती कीजै हनुमान लला की' के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: इस प्रसिद्ध आरती के रचयिता स्वामी रामानंद जी हैं, जो १५वीं शताब्दी के एक महान संत थे। - प्रश्न ५: हनुमान जी को 'लला' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: 'लला' शब्द का अर्थ है 'प्रिय बालक'। भक्त हनुमान जी को अपने परिवार के सदस्य और एक प्रिय बालक के रूप में देखते हैं, इसलिए उन्हें स्नेहवश लला कहा जाता है।