पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री हनुमान जी आरती
113 पाठ

श्री हनुमान लला की आरती - आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की सम्पूर्ण बोल व भावार्थ

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग बिलावल / राग यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री हनुमान लला की आरती - आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की सम्पूर्ण बोल व भावार्थ ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि, ऐतिहासिक उत्पत्ति व रचयिता

सनातन सनातन संस्कृति में श्री हनुमान जी महाराज को अष्टचिरंजीवियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वे साक्षात रुद्र अवतार हैं और उनकी कृपा के बिना भगवान श्री राम की प्राप्ति असंभव मानी गई है। 'आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की' यह अत्यंत लोकप्रिय, पावन और ऊर्जा से परिपूर्ण आरती संपूर्ण भारतवर्ष में हनुमान भक्तों द्वारा श्रद्धापूर्वक गाई जाती है। इस आरती की रचना के विषय में विभिन्न लोककथाएं और संत परंपराएं जुड़ी हुई हैं। माना जाता है कि इस आरती की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी के समकालीनों अथवा उनके आराध्य के प्रति अगाध प्रेम से ओत-प्रोत किसी महान संत-कवि द्वारा की गई थी। कुछ विद्वान इसे रामानंद संप्रदाय की भजन परंपरा का अभिन्न अंग मानते हैं, जो सदियों से मौखिक रूप से तथा हस्तलिखित गुटकों के माध्यम से भक्तों की जुबान पर जीवित है।

इस आरती का प्रत्येक शब्द वीर रस और भक्ति रस का अद्भुत संगम है। जब भक्त इस आरती का गान करता है, तो उसके भीतर एक नई आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। हनुमान जी महाराज जो कि संकटमोचन हैं, उनकी महिमा का गुणगान करने मात्र से भूत-प्रेत, बाधाएं, भय, और नकारात्मक ऊर्जाएं स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं। पौरानिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग से लेकर कलयुग तक हनुमान जी अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। लंका दहन, संजीवनी बूटी लाना, अहिरावण का वध और सीता माता की खोज जैसे महापराक्रमों के साक्ष्री हनुमान जी की स्तुति यह आरती अत्यंत सरल किंतु गहन अर्थों में प्रस्तुत करती है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरवर कांपै।
रोग दोष निकट नहीं झांपै॥
अंजनि पुत्र महाबलदायी।
संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए।
लंका जारि सिया सुधि लाए॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे।
सियाराम जी के काज संवारे॥
लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे।
आनि संजीवन प्राण उबारे॥
पैठि पाताल तोरि जमकारे।
अहिरावण की भुजा उखाड़े॥
बाएं हाथ असुर दल मारै।
दाहिने हाथ संत जन तारै॥
सुर नर मुनि जन आरती उतारैं।
जै हनुमान लला जय उच्चारैं॥
कंचन थार कपूर लौ छाई।
आरती करत अंजना माई॥
लंक विध्वंस किये रघुराई।
तुलसीदास प्रभु की कीरति गाई॥

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
भावार्थ: हे हनुमान लला! हम आपकी आरती करते हैं। आप भगवान श्री राम की ही कला (स्वरूप) हैं और दुष्टों तथा राक्षसों का दलन (विनाश) करने वाले हैं। आपकी कृपा से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं।

जाके बल से गिरवर कांपै। रोग दोष निकट नहीं झांपै॥
भावार्थ: आपके अतुलनीय बल और पराक्रम से बड़े-बड़े पर्वत भी कांप उठते हैं। आपके स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के रोग, दोष और कष्ट भक्त के निकट भी नहीं फटकते हैं।

अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतन के प्रभु सदा सहाई॥
भावार्थ: माता अंजनि की कोख से प्रकट होने वाले हे महाबलशाली हनुमान जी! आप सज्जनों, संतों और भक्तों के लिए हमेशा सहायक और रक्षक हैं।

दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥
भावार्थ: जब भगवान श्री राम ने आपको बीड़ा (जिम्मेदारी) देकर लंका भेजा, तो आपने अपनी वीरता दिखाते हुए पूरी लंका को जला दिया और माता सीता की खोज खबर लाकर श्री राम को दी।

लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥
भावार्थ: सोने की लंका का वह विशाल किला और समुद्र जैसी गहरी खाई को पार करने में पवनसुत हनुमान जी को जरा भी समय या देर नहीं लगी।

लंका जारि असुर संहारे। सियाराम जी के काज संवारे॥
भावार्थ: आपने लंका को जलाकर अनेक असुरों का संहार किया और इस प्रकार भगवान सियाराम के सभी महत्वपूर्ण कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया।

लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे॥
भावार्थ: युद्ध के दौरान जब प्रातःकाल लक्ष्मण जी शक्ति लगने से मूर्छित होकर गिर पड़े, तब आप तुरंत जाकर संजीवनी बूटी ले आए और उनके प्राणों की रक्षा की।

पैठि पाताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े॥
भावार्थ: आपने पाताल लोक में प्रवेश करके यमराज के समान भयंकर अहिरावण का वध किया और उसकी भुजाओं को उखाड़ फेंका।

बाएं हाथ असुर दल मारै। दाहिने हाथ संत जन तारै॥
भावार्थ: आपके एक हाथ में असुरों का संहार करने की शक्ति है, तो दूसरे हाथ से आप सज्जन और साधु संतों का उद्धार करते हैं और उन्हें अभयदान देते हैं।

सुर नर मुनि जन आरती उतारैं। जै हनुमान लला जय उच्चारैं॥
भावार्थ: देवता, मनुष्य और मुनिगण सभी श्रद्धा के साथ आपकी आरती उतारते हैं और 'जय हनुमान लला की' कहकर आपकी जय-जयकार करते हैं।

कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥
भावार्थ: सोने की थाली में कपूर की ज्योति प्रज्वलित करके माता अंजनि और सभी भक्तजन आपकी दिव्य आरती उतार रहे हैं।

लंक विध्वंस किये रघुराई। तुलसीदास प्रभु की कीरति गाई॥
भावार्थ: भगवान श्री राम ने लंका का विध्वंस किया (अधर्म का नाश किया) और गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मैंने ऐसे प्रभु और उनके परम भक्त हनुमान जी की कीर्ति का गान किया है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

श्री हनुमान लला की यह आरती मुख्य रूप से जोश, उत्साह और भक्ति भाव से ओत-प्रोत होती है। इसे शास्त्रीय संगीत के अंतर्गत राग बिलावल अथवा राग यमन की बंदिशों के आधार पर गाया जाता है। राग बिलावल प्रातःकालीन और सायंकालीन दोनों समय की स्वच्छता और ऊर्जा को प्रकट करता है, जो हनुमान जी की सात्विक और ओजस्वी ऊर्जा से पूरी तरह मेल खाता है।

  • ताल: कहवा (८ मात्रा) या दादरा (६ मात्रा) ताल में इसे बहुत ही लेहबद्ध तरीके से गाया जाता है ताकि भक्तगण आसानी से ताली बजाकर इसका गान कर सकें।
  • लय: मध्य लय से द्रुत लय की ओर बढ़ती हुई यह धुन श्रोताओं के मन में उत्साह और वीरता का संचार करती है।
  • वाद्य यंत्र: ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम और झाल इस आरती के पारंपरिक वाद्य यंत्र हैं, जो इसके संकीर्तन को और अधिक जीवंत बनाते हैं।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

हनुमान जी की आरती करने की एक विशिष्ट शास्त्रीय और पारंपरिक विधि होती है, जिसका पालन करने से पूजन का पूर्ण फल प्राप्त होता है:

  1. पवित्रता: स्नान करके स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। हनुमान जी को लाल रंग अति प्रिय है।
  2. दीपक प्रज्वलन: शुद्ध घी या चमेली के तेल का दीपक मिट्टी या पीतल के दीपक में प्रज्वलन करें। चमेली के तेल का दीपक हनुमान जी को विशेष रूप से प्रिय है।
  3. धूप-दीप: कपूर और गुग्गुल की धूप जलाकर हनुमान जी के विग्रह या चित्र के समक्ष रखें।
  4. आरती की थाली का क्रम: थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाया जाता है।
    - चरणों की ओर: ४ बार
    - नाभि की ओर: २ बार
    - मुखमंडल की ओर: १ बार
    - संपूर्ण शरीर की ओर: ७ बार
  5. घंटी और शंख: आरती के दौरान लगातार घंटी बजाएं और अंत में शंखनाद अवश्य करें, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती में कर्पूर जलाने का अत्यधिक आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व है। कर्पूर जब जलता है, तो वह बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह से कपूर हवा में विलीन हो जाता है। इसी प्रकार, एक सच्चे भक्त का अहंकार भी भगवान की भक्ति की अग्नि में जलकर समाप्त हो जाना चाहिए। कर्पूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध करती है और मन को एकाग्र करती है।

फलश्रुति (आरती का फल)

जो भी भक्त नित्य प्रति या मंगलवार और शनिवार के दिन श्रद्धा और नियम के साथ श्री हनुमान लला की इस आरती का गान करता है, उसके जीवन के सभी संकट टल जाते हैं। हनुमान चालीसा के पश्चात इस आरती का गान करने से बजरंगबली की कृपा द्विगुणी हो जाती है। भूत, पिशाच, निकट नहीं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै—इस सत्य का अनुभव भक्त को इस आरती के माध्यम से तुरंत होता है। घर में सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

१. श्री हनुमान लला की आरती - आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की सम्पूर्ण बोल व भावार्थ का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री हनुमान जी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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