॥ श्री भुवनेश्वर महादेव जी की पावन संध्या आरती - ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान शिव के अनंत रूपों में 'श्री भुवनेश्वर महादेव' का स्वरूप समस्त लोकों के स्वामियों के भी स्वामी के रूप में पूजित है। भुवनेश्वर शब्द का शाब्दिक अर्थ है - 'भुवन' यानी लोक और 'ईश्वर' यानी स्वामी; अर्थात् तीनों लोकों के अधिपति भगवान शंकर। भुवनत्रय के नियंता, प्रलय और सृजन के आदिकारण भगवान भुवनेश्वर महादेव की संध्या कालीन आरती का सनातनी परंपरा में अत्यंत विशिष्ट स्थान है। यह आरती न केवल साधक के अंतःकरण को पावन करती है, बल्कि जन्म-जन्मांतर के संचित पापकर्मों का नाश कर शिव सामीप्य प्रदान करती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा। त्रिभुवन के प्रतिपालक, भक्तों के देवा॥ ॐ जय...॥
धवल शरीर विराजे, मृगचर्म ओढ़े, स्वामी मृगचर्म ओढ़े। गले रुण्डमाला शोभित, विषधर को जोड़े॥ ॐ जय...॥
डमरू त्रिशूल विराजे, हस्त कमल सोहे, स्वामी हस्त कमल सोहे। दरशन पाके मोहे, चराचर मन मोहे॥ ॐ जय...॥
गंगा धरत जटा में, पावन जल बहता, स्वामी पावन जल बहता। पाप हरे भव सारे, सुख शांति रहता॥ ॐ जय...॥
काशी हो या उत्कल, धाम तुम्हारा है, स्वामी धाम तुम्हारा है। कोटि सूर्य सम ज्योति, जग का सहारा है॥ ॐ जय...॥
माता तुम हो पिता तुम, तुम ही हो भ्राता, स्वामी तुम ही हो भ्राता। संकट मोचन स्वामी, भव से त्राता॥ ॐ जय...॥
जो यह आरती गावे, मनवांछित फल पावे, स्वामी मनवांछित फल पावे। शिवपद को जो ध्यावे, भव पार हो जावे॥ ॐ जय...॥
हर हर भोले नमः शिवाय, हर हर भोले नमः शिवाय। भुवनेश्वर भगवान की, जय मंगल गाएं॥ ॐ जय...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भक्तगण जब 'ॐ जय भुवनेश्वर देवा' का गान करते हैं, तो वे त्रिभुवन के स्वामी को नमन करते हैं। प्रथम पंक्ति में भगवान शिव को पूरे ब्रह्मांड का पालनहार और भक्तों के रक्षक के रूप में संबोधित किया गया है। द्वितीय पंक्ति में उनके वैरागी स्वरूप का वर्णन है, जिसमें उनका धवल शरीर, मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण करना और गले में सर्पों का आभूषण के रूप में सुशोभित होना उनके मृत्युंजय और भयमुक्त स्वरूप को दर्शाता है।
आरती के अगले चरणों में भगवान के हाथों में सुशोभित डमरू और त्रिशूल का उल्लेख है। डमरू का नाद ब्रह्मांड की उत्पत्ति (नाद ब्रह्म) का प्रतीक है और त्रिशूल त्रिगुणात्मक संसार (सत्व, रज, तम) पर उनके आधिपत्य को दर्शाता है। उनकी जटाओं से बहने वाली मां गंगा का पावन जल मनुष्य के आंतरिक और बाहरी विकारों का शमन करता है।
भुवनेश्वर महादेव का धाम चाहे पावन काशी हो या उत्कल (ओडिशा) की पवित्र भूमि, वे हर स्थान पर अपनी ज्योति से संपूर्ण चराचर जगत को आलोकित कर रहे हैं। आरती के अंतिम भागों में भक्त अपनी पूर्ण शरणागति अर्पित करते हुए उन्हें ही माता, पिता और संपूर्ण संबंधी स्वीकार करता है। अंत में यह विश्वास दिलाया गया है कि जो भी भक्त इस आरती को श्रद्धापूर्वक गाता है, वह भवसागर से पार हो जाता है और भगवान शिव के परम पद को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन धर्म में संध्या वंदना और संध्या आरती का विशेष विधान है। प्रदोष काल में भगवान शिव अपने अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ कैलासाधु या अपने ज्योतिर्लिंग स्वरूप में चराचर जगत का भ्रमण करते हैं। भुवनेश्वर महादेव की आरती करने से ग्रहों के दुष्ट प्रभावों, विशेषकर शनि, राहु और केतु की पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है। पुराणों के अनुसार, भुवनेश्वर क्षेत्र में भगवान शिव ने स्वयं कई कल्पों तक तपस्या की है और यह क्षेत्र मोक्षदायिनी नगरियों में अग्रगण्य माना गया है। संध्या समय दीप प्रज्वलित कर जब यह आरती की जाती है, तो घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक, दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
- शुचिता एवं स्नान: संध्या काल में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि स्नान संभव न हो तो हाथ-पैर धोकर आचमन करें।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। आसन पर बैठकर भगवान भुवनेश्वर महादेव का ध्यान करें।
- पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन: महादेव को जल, चन्दन, अक्षत, बिल्वपत्र, धतूरा, श्वेत पुष्प और धूप-दीप अर्पित करें।
- आरती का क्रम: घी या कपूर का दीपक प्रज्वलित कर थाल में रखें। सबसे पहले भगवान के चरणों में चार बार, नाभि क्षेत्र में दो बार और मुख मंडल की ओर तीन बार आरती घुमाएं। तत्पश्चात संपूर्ण शरीर पर सात बार आरती घुमाई जाती है।
- आचमन और परिक्रमा: आरती के पश्चात दीपक पर हाथ फेरकर माथे से लगाएं और शंख तथा घंटी बजाकर अपनी भूल की क्षमा मांगते हुए परिक्रमा करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- तांबे या पीतल की स्वच्छ आरती की थाल
- शुद्ध गाय का घी या कपूर
- रुई की बत्तियां
- अखंड ज्योति अथवा दीपक
- धूपबत्ती या अगरबत्ती
- ताजे पुष्प (विशेषकर सफेद आंकड़े के फूल या कमल)
- ताजा बिल्वपत्र (बेलपत्र)
- पवित्र गंगाजल
- शंख और घंटी
राग, ताल एवं गायन समय
श्री भुवनेश्वर महादेव की संध्या आरती को भगवान शिव के प्रिय राग 'कल्याण' या 'यमन' में गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस राग की शांति और भक्ति रस से परिपूर्ण धुन मन को तल्लीन कर देती है। ताल के रूप में कहरवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) का प्रयोग किया जा सकता है। इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय प्रदोष काल (सूर्यास्त के ठीक पहले और बाद का समय, लगभग शाम 6:00 बजे से 7:30 बजे के मध्य) है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री भुवनेश्वर महादेव की संध्या आरती करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति: मन की चंचलता समाप्त होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
- भय मुक्ति: अकाल मृत्यु, दुर्घटना और अज्ञात भय से मुक्ति मिलती है।
- आरोग्य लाभ: शारीरिक रोग दूर होते हैं और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
- पारिवारिक सुख: घर में सुख-शांति, समृद्धि और वैवाहिक सौहार्द बना रहता है।
- मोक्ष प्राप्ति: अंत समय में शिवलोक की प्राप्ति होती है और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिलता है।