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श्री भगवान शिव आरती
47 पाठ

श्री महामृत्युंजय भगवान की आरती - ॐ जय महामृत्युंजय देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री महामृत्युंजय भगवान की आरती - ॐ जय महामृत्युंजय देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान शिव का महामृत्युंजय स्वरूप न केवल अकाल मृत्यु को टालने वाला और आरोग्यता प्रदान करने वाला है, बल्कि यह भौतिक संतापों और आध्यात्मिक अज्ञानता का भी नाश करता है। 'ॐ जय महामृत्युंजय देवा' आरती का गान साधक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है। भक्तिलोक के इस पावन अंक में हम भगवान महामृत्युंजय की इस अद्भुत आरती के संपूर्ण बोल, उसके गहन भावार्थ, पूजा विधि और इसके अलौकिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय महामृत्युंजय देवा, स्वामी जय महामृत्युंजय देवा।
अक्षय सुख के दाता, संकटनाशन देवा॥ ॐ जय...॥

त्रिभुवन के तुम स्वामी, महिमा अति भारी।
शेष महेश गनेश ध्यावें नर-नारी॥ ॐ जय...॥

वाहन नंदी विराजे, त्रिशूल हाथ सोहे।
डमरू की धुन सुनि के सुर नर मुनि मोहे॥ ॐ जय...॥

भस्मांग राग सोहे, चंदा ललाट धारे।
गंगा की निर्मल धारा पापिन को तारे॥ ॐ जय...॥

काल कृतांत डरे सब, नाम तुम्हारो लीन्हें।
आयु आरोग्य दीजै, शरणागत कीन्हें॥ ॐ जय...॥

विष को पिया कटोरे, नीलकंठ नाम धरे।
देवन के हितकारी, भव-दुख सब हरे॥ ॐ जय...॥

जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे।
सो नर भवजल तर कर, परम गति पावे॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान महामृत्युंजय की इस दिव्य आरती का एक-एक शब्द साधक की चेतना को झकझोरने वाला और उसे शिवमय बनाने वाला है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझते हैं:

प्रथम पद: 'ॐ जय महामृत्युंजय देवा, स्वामी जय महामृत्युंजय देवा। अक्षय सुख के दाता, संकटनाशन देवा॥' — इस पहली पंक्ति में भक्त भगवान शिव के उस रूप की वंदना करता है जो मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले हैं। हे स्वामी, आप ही शाश्वत और कभी न समाप्त होने वाले सुखों के प्रदाता हैं तथा भक्तों के सभी संकटों का नाश करने वाले हैं। आपकी जय हो।

द्वितीय पद: 'त्रिभुवन के तुम स्वामी, महिमा अति भारी। शेष महेश गनेश ध्यावें नर-नारी॥' — इस पद में भगवान शिव की सर्वव्यापकता का वर्णन है। आप तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्तल और पाताल) के स्वामी हैं। आपकी महिमा अपरंपार और असीम है। शेषनाग, भगवान विष्णु (महेश के स्थान पर विष्णु/ब्रह्मा), और भगवान गणेश भी निरंतर आपका ध्यान करते हैं। संसार के सभी स्त्री और पुरुष आपकी शरण में आते हैं।

तृतीय पद: 'वाहन नंदी विराजे, त्रिशूल हाथ सोहे। डमरू की धुन सुनि के सुर नर मुनि मोहे॥' — यहाँ भगवान के स्वरूप का सुंदर चित्रण है। आपके वाहन परम भक्त नंदी महाराज हैं, आपके एक हाथ में दुष्टों का संहार करने वाला त्रिशूल सुशोभित है। आपके डमरू की दिव्य नाद को सुनकर देवता, मनुष्य और मुनिश्रेष्ठ सभी मोहित हो जाते हैं।

चतुर्थ पद: 'भस्मांग राग सोहे, चंदा ललाट धारे। गंगा की निर्मल धारा पापिन को तारे॥' — भगवान शिव वैराग्य के प्रतीक हैं। आपके शरीर पर भस्म लगी हुई है, मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है और आपकी जटाओं से बहने वाली मां गंगा की पवित्र धारा समस्त पापी जीवों का उद्धार करती है।

पंचम पद: 'काल कृतांत डरे सब, नाम तुम्हारो लीन्हें। आयु आरोग्य दीजै, शरणागत कीन्हें॥' — यह पंक्ति महामृत्युंजय रूप के मुख्य मर्म को प्रकट करती है। यमराज और काल भी आपका नाम लेने मात्र से भयभीत हो जाते हैं। हे प्रभु! हमें दीर्घ आयु, उत्तम स्वास्थ्य और आरोग्य प्रदान कीजिए क्योंकि हम आपकी शरण में आए हैं।

षष्ठ पद: 'विष को पिया कटोरे, नीलकंठ नाम धरे। देवन के हितकारी, भव-दुख सब हरे॥' — समुद्र मंथन के समय आपने संसार की रक्षा के लिए हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया, जिससे आपका नाम 'नीलकंठ' पड़ा। आप सदैव देवताओं और भक्तों के हितकारी हैं तथा इस संसार के सभी दुखों का हरण करते हैं।

सप्तम पद: 'जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे। सो नर भवजल तर कर, परम गति पावे॥' — अंत में आरती का फल बताया गया है। जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा और एकाग्र मन से इस आरती का गान करता है, वह इस भवसागर (जन्म-मृत्यु के चक्र) से पार हो जाता है और अंत में मोक्ष रूपी परम गति को प्राप्त करता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

भगवान महामृत्युंजय की आरती केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह मृत्यु के भय से मुक्ति पाने का महामंत्र है। शिव पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, महामृत्युंजय रूप भगवान शिव का वह स्वरूप है जो काल को भी परास्त कर सकता है। जिस प्रकार महर्षि मार्कण्डेय ने अपनी भक्ति और महामृत्युंजय मंत्र के प्रभाव से यमराज को भी हरा दिया था, ठीक उसी प्रकार इस आरती और मंत्र के नियमित अनुष्ठान से अकाल मृत्यु का योग टल जाता है। यह आरती रोग, शोक, संताप, मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है। रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय अनुष्ठान के अंत में इस आरती का विशेष महत्व होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. ब्रह्म मुहूर्त या प्रदोष काल: महामृत्युंजय भगवान की पूजा और आरती के लिए प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त या प्रदोष काल (संध्या समय) सबसे उत्तम माना गया है।
  2. शुद्धता एवं आसन: स्नान करके स्वच्छ श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें। कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. शिवलिंग की स्थापना: यदि घर में पूजा कर रहे हैं, तो पार्थिव शिवलिंग, नर्मदेश्वर शिवलिंग या धातु के छोटे शिवलिंग को जल, गंगाजल, दूध और पंचामृत से स्नान कराएं।
  4. श्रृंगार एवं अर्पण: शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, चंदन, और भस्म अर्पित करें।
  5. दीप प्रज्वलन: घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं और धूपबत्ती अर्पित करें।
  6. आरती गान: हाथ में जल से भरा आचमन पात्र लेकर, कपूर और घंटी के साथ सस्वर 'ॐ जय महामृत्युंजय देवा' आरती गाएं।
  7. परिक्रमा एवं क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात भगवान की तीन बार परिक्रमा करें (या अपने ही स्थान पर तीन बार घूमकर परिक्रमा करें), कपूर से आरती लें और अपनी भूलचुक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

सफलतापूर्वक आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

  • तांबे, पीतल या चांदी की साफ थाली (आरती का थाल)
  • शुद्ध गाय के घी का दीपक (या चमेली/तिल के तेल का दीपक)
  • कपूर की टिकिया (आरती को प्रज्वलित करने के लिए)
  • शुद्ध चंदन, रोली, और अक्षत (चावल के साबुत दाने)
  • ताजे फूल, बेलपत्र, और आक के श्वेत पुष्प
  • पूजा की घंटी (नकारात्मक ऊर्जा दूर करने के लिए)
  • शंख (आरती के आरंभ और अंत में नाद करने के लिए)
  • तांबे के लोटे में जल और आचमनी

राग, ताल एवं गायन समय

भगवान महामृत्युंजय की आरती को गंभीर, शांत और भक्तिरस से परिपूर्ण रागों में गाया जाना चाहिए। इसके लिए राग कल्याण, राग यमन या राग भैरवी अत्यंत उपयुक्त माने जाते हैं। आरती की ताल कहरवा (८ मात्रा) या तीनताल (१६ मात्रा) में बैठती है। इसे गाने का सबसे उत्तम समय सोमवार की संध्या, महाशिवरात्रि, सावन मास या प्रदोष व्रत की रात्रि है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

  • मृत्यु भय से मुक्ति: इस आरती के नियमित गान से मनुष्य के भीतर से अकाल मृत्यु और दुर्घटना का भय समाप्त होता है।
  • उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु: शारीरिक बीमारियाँ दूर होती हैं और महामृत्युंजय भगवान की कृपा से लंबी आयु का वरदान मिलता है।
  • मानसिक शांति: तनाव, अवसाद, और मानसिक अशांति दूर होकर चित्त में एकाग्रता और शांति आती है।
  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर की नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर और बाधाएं समाप्त होती हैं।
  • मोक्ष प्राप्ति: अंत समय में भगवान शिव के चरणों में स्थान प्राप्त होता है और साधक भवसागर से तर जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री महामृत्युंजय भगवान की आरती - ॐ जय महामृत्युंजय देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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