पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान शिव आरती
39 पाठ

भगवान शिव जी की आरती - ॐ जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओंकारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग बिलावल / राग यमन शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ भगवान शिव जी की आरती - ॐ जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओंकारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पौराणिक पृष्ठभूमि, दार्शनिक स्वरूप एवं रचयिता

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान शिव केवल एक पौराणिक देवता नहीं, अपितु वे अनादि, अनंत, सच्चिदानंद स्वरूप परब्रह्म हैं। 'ॐ जय शिव ओंकारा' आरती सम्पूर्ण भारतवर्ष में सर्वाधिक गाई जाने वाली परम पावन शिव स्तुति है। यह आरती केवल पदों का समूह नहीं है, बल्कि इसमें अद्वैत वेदांत, सांख्य दर्शन और तंत्र शास्त्र के परम गूढ़ तत्वों का समावेश है।

इस आरती की मूल रचना का श्रेय पारंपरिक रूप से महान संत स्वामी शिवानंद जी को दिया जाता है। उन्होंने इस स्तुति में त्रिगुणमयी सृष्टि (सत्व, रज, तम), त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और एकात्म परात्पर शिव तत्व के अभेद संबंध को अत्यंत सरल परंतु गंभीर काव्यात्मक शैली में पिरोया है। जब साधक इस आरती का सस्वर गायन करता है, तो उसके भीतर का अज्ञान, अहंकार और मानसिक विकार नष्ट होकर विशुद्ध चेतना का जागरण होता है।

ओंकारम Bindu Samyuktam Nityam Dhyayanti Yoginah | Kamadam Mokshadam Chaiva Omkaraya Namo Namah ||

शिव पुराण के अनुसार, महाप्रलय के उपरांत जब संपूर्ण सृष्टि अंधकार और शून्य में लीन थी, तब परात्पर ब्रह्म शिव ने 'अक्षर ब्रह्म' अर्थात ओंकार (ॐ) के रूप में स्वयं को प्रकट किया। आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय शिव ओंकारा' इसी गूढ़ पौराणिक घटना एवं दार्शनिक सत्य को अभिव्यक्त करती है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक मूल बोल

नीचे भगवान शिव जी की प्रामाणिक एवं सम्पूर्ण आरती के बोल दिए गए हैं। इसका भक्तिभाव एवं शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करना चाहिए:

ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधर्ता।
जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एक॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहते शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

इस आरती के प्रत्येक पद में वेदांत और पुराणों का गहन अर्थ छिपा हुआ है। आइए, प्रत्येक पद के रहस्य को विस्तार से समझें:

प्रथम पद: ॐ जय शिव ओंकारा...

भावार्थ: हे ओंकार स्वरूप परमेश्वर शिव! आपकी जय हो। आप ही सर्वदुःखों को हरने वाले 'हर' हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव के रूप में प्रकट होते हैं तथा भगवती शक्ति (पार्वती) को अपने आधे अंग में धारण करके अर्द्धनारीश्वर रूप में सुशोभित हैं।

आध्यात्मिक रहस्य: यह पद शिव और शक्ति के अभेद संबंध को दर्शाता है। पुरुष और प्रकृति का संतुलन ही संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल आधार है। ओंकार ही शिव है और शिव ही ओंकार हैं।

द्वितीय पद: एकानन चतुरानन पंचानन राजे...

भावार्थ: एक मुख वाले (सदाशिव/सदा शांत रूप), चार मुख वाले (ब्रह्मा जी) और पांच मुख वाले (पंचानन शिव - तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव, ईशान) अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं। इन तीनों रूपों के वाहन क्रमशः हंस (ब्रह्मा), गरुड़ (विष्णु) और वृषभ/नंदी (शिव) हैं।

आध्यात्मिक रहस्य: यहाँ सृष्टि के तीन मुख्य आयामों का वर्णन है। शिव का पंचानन रूप पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतीक है।

तृतीय पद: दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे...

भावार्थ: दो भुजाओं वाले (साधारण रूप), चार भुजाओं वाले (विष्णु स्वरूप) और दस भुजाओं वाले (महाकालेश्वर/महाभैरव स्वरूप) आपके रूप अत्यंत मोहक हैं। आपके इस त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) स्वरूप को देखकर तीनों लोकों के प्राणी मुग्ध हो जाते हैं।

चतुर्थ पद: अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी...

भावार्थ: आप रुद्राक्ष की माला (अक्षमाला), वैजयंती/वनमाला और मुण्डों की माला धारण करने वाले हैं। आपके मस्तक पर चंदन और कस्तूरी (मृगमद) का तिलक सुशोभित है तथा सिर पर बालचंद्र विराजमान हैं।

आध्यात्मिक रहस्य: मुण्डमाला काल पर शिव के आधिपत्य और अहंकार के विनाश का प्रतीक है। मस्तक पर चंद्रमा मन के नियंत्रण और परम शांति को दर्शाता है।

पंचम पद: श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे...

भावार्थ: आप श्वेत वस्त्र (ब्रह्मा रूप), पीले वस्त्र (विष्णु रूप) और बाघ की छाल (बाघंबर - शिव रूप) धारण करते हैं। आपके साथ सनकादि ऋषि, गरुड़ आदि देवगण और भूत-प्रेत, गण आदि सभी समान रूप से निवास करते हैं।

आध्यात्मिक रहस्य: शिव समदर्शी हैं। वे जितने देवताओं और ऋषियों के प्रिय हैं, उतने ही उपेक्षित भूतों, प्रेतों और समाज से निष्कासित जीवों के भी आश्रयदाता हैं।

षष्ठ पद: कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधर्ता...

भावार्थ: आपके हाथों में कमंडलु (सृष्टि का प्रतीक), चक्र (पालन का प्रतीक) और त्रिशूल (संहार व आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक तापों को नष्ट करने का प्रतीक) सुशोभित है। आप ही इस जगत् के रचयिता, पालनकर्ता और संहारक हैं।

सप्तम पद: ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका...

भावार्थ: अज्ञानी और अविवेकी मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग मानते हैं। परंतु ज्ञानी जानते हैं कि प्रणवाक्षर (ॐ) के भीतर ये तीनों देव एक ही परम तत्त्व के रूप हैं।

अष्टम पद: त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे...

भावार्थ: जो भी मनुष्य त्रिगुणमयी भगवान शिव की इस आरती को पूर्ण श्रद्धा और भाव से गाता है, स्वामी शिवानंद कहते हैं कि वह अपने जीवन के समस्त मनोवांछित फल और परम मोक्ष प्राप्त करता है।

शास्त्रीय गायन: राग, ताल एवं लयात्मक विवरण

भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा में आरती केवल एक पद्य नहीं, अपितु एक नाद-योग साधना है। 'ॐ जय शिव ओंकारा' आरती को मुख्य रूप से राग बिलावल अथवा राग यमन में गाया जाता है।

शास्त्रीय घटकविवरण व संगीतमय मानक
मुख्य रागराग बिलावल (प्रभात/संध्या काल हेतु) / राग यमन (रात्रि प्रथम प्रहर)
प्रयुक्त तालकहरवा ताल (8 मात्राएं - धा गे ना ती ना क धी ना)
गायन की लयमध्यम लय से प्रारंभ होकर अंतिम पदों में द्रुत लय
स्वर विस्तारसप्तक के मध्य एवं तार सप्तक का मधुर संतुलन
वाद्य यंत्रकांस्य घंटी, शंख, मंजीरा, मृदंग/डमरू और हारमोनियम

आरती गायन के समय शंखध्वनि और डमरू का वादन वातावरण में सात्विक कंपन्न (Vibrations) उत्पन्न करता है। ओंकार की ध्वनि मस्तिष्क की अल्फा तरंगों को सक्रिय करती है, जिससे ध्यान केंद्रित करना सहज हो जाता है।

शिव आरती की थाली सजावट, दीप प्रज्वलन व परिक्रमा विधि

शास्त्रों में आरती (नीराजन) की एक विशेष शास्त्रीय प्रक्रिया बताई गई है। आरती करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन अनिवार्य है:

1. आरती थाली की तैयारी

  • थाली का चयन: तांबे, पीतल या चांदी की शुद्ध थाली का उपयोग करें।
  • दीप सामग्री: शुद्ध गाय का घी अथवा शुद्ध देशी कपूर। कपूर की आरती शिव जी को अत्यंत प्रिय है।
  • अंगभूत सामग्री: रोली, अक्षत (अखंडित चावल), ताजे बिल्वपत्र, धतूरा, श्वेत पुष्प (मदार/कनेर) और गंगाजल।

2. दीप प्रज्वलन एवं संकल्प

आरती प्रारंभ करने से पूर्व हाथ में जल लेकर संकल्प करें और शंखनाद करें। इसके पश्चात घंटी बजाते हुए दीपक प्रज्वलित करें।

3. थाली घुमाने का शास्त्रीय क्रम (नीराजन विधि)

भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग के समक्ष आरती की थाली को हमेशा दक्षिणावर्त (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार थाली घुमाने का संख्यात्मक नियम इस प्रकार है:

  1. चरणों में: भगवान शिव के श्रीचरणों में 4 बार थाली घुमाएं।
  2. नाभि क्षेत्र में: नाभि के समक्ष 2 बार घुमाएं।
  3. मुखारविंद पर: शिवजी के सुंदर मुखारविंद के सामने 1 बार घुमाएं।
  4. सर्वांग पर: संपूर्ण श्रीविग्रह के चारों ओर 7 बार ॐ की आकृति बनाते हुए घुमाएं।

इस प्रकार कुल 14 बार आरती घुमाने का शास्त्रीय विधान है, जो 14 भुवनों का प्रतिनिधित्व करता है।

कर्पूर गौरवम् मंत्र, नीराजन विज्ञान एवं फलश्रुति

आरती के पूर्ण होने पर कपूर से नीराजन किया जाता है और प्रसिद्ध श्लोक का सस्वर पाठ किया जाता है:

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

मंत्रार्थ: जो कपूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और सर्पों का हार धारण करते हैं; वे भगवान शिव भगवती भवानी (पार्वती) के साथ मेरे हृदय कमल में सदा निवास करें, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।

कपूर आरती का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व

कपूर जब जलता है, तो वह पूरी तरह वाष्पीकृत हो जाता है—पीछे कोई राख या अवशेष नहीं छोड़ता। यह इस बात का प्रतीक है कि जीव को अपना अहंकार ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह भस्म कर देना चाहिए, ताकि कोई वासना शेष न रहे। कपूर का धुएं से वातावरण के सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है।

आरती की फलश्रुति (Phalasruthi)

शिव पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति नित्य नियम से संध्या काल में शिव जी की आरती गाता है या सुनता है:

  • उसके जन्मांतर के पाप एवं मानसिक संताप भस्म हो जाते हैं।
  • गृह में दरिद्रता का नाश होकर सुख, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।
  • अकाल मृत्यु और भय से मुक्ति मिलती है।
  • अंतकाल में जीव को शिवलोक (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

भगवान शिव आरती संबंधी बहुप्रचलित प्रश्नोत्तरी (FAQs)

१. भगवान शिव जी की आरती - ॐ जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओंकारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

संबंधित पावन आरतियाँ

समस्त आरतियाँ देखें →

भक्त विचार एवं टिप्पणियां (0)

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। सर्वप्रथम अपने भक्ति विचार साझा करें!

भगवान श्री भगवान शिव जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

श्री भगवान शिव की समस्त आरतियाँ
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!