॥ श्री भुवनेश्वर महादेव जी की पावन आरती - ॐ जय भुवनेश्वर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन संस्कृति और देवाधिदेव महादेव की आराधना में 'श्री भुवनेश्वर महादेव जी की पावन आरती' (ॐ जय भुवनेश्वर देवा) का अनंत और अद्वितीय महत्व है। भगवान शिव सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, और जब वे 'भुवनेश्वर' अर्थात् समस्त भुवनों (लोकों) के ईश्वर के रूप में पूजे जाते हैं, तब उनकी कृपा का विस्तार सम्पूर्ण सृष्टि पर एक साथ होता है। यह पावन आरती केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भौतिकताप्रेरित दुखों से मुक्त होकर आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने का एक महामंत्र है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम भुवनेश्वर महादेव की आरती के बोल, उसके गूढ़ अर्थ, पूजा की शास्त्रसम्मत विधि और इसके चमत्कारी फलों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा।
भक्तजनों के संकट, पल में दूर देवा॥ ॐ जय...॥
त्रिभुवन के तुम स्वामी, अंतरगत ज्ञानी।
तुम्हरी महिमा गावें, वेद और पुरानी॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
कण्ठ विष पिया तुमने, जगत बचाए के।
बैठे कैलाश पर्वत, ध्यान लगाए के॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
डमरू त्रिशूल विराजे, हाथ में सोहे माला।
गले में भुजंग बिराजे, शीश चंद्रहाला॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
नंदी पर तुम विराजे, भक्तों के रखवारे।
दर्शन मात्र से होते, पातक सब न्यारे॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
ब्रह्मा विष्णु सिरावें, सुर मुनि जन ध्यावें।
जो मन से तुमको ध्यावे, सो फल पावे॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
जो यह आरती गावे, प्रेम सहित गावे।
शिवपद को पावे नर, भव से तर जावे॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान शिव की प्रत्येक आरती उनके महान स्वरूप, उनके परोपकारी स्वभाव और उनकी शरणागतवत्सलता का बखान करती है। 'ॐ जय भुवनेश्वर देवा' आरती के माध्यम से भक्त अपने आराध्य के चरणों में संपूर्ण समर्पण व्यक्त करता है।
प्रथम चरण का अर्थ: 'ॐ जय भुवनेश्वर देवा' का आशय है कि हे संपूर्ण भुवनों के स्वामी! आपकी जय हो। आप अपने भक्तों के सभी प्रकार के संकटों को पल भर में हर लेते हैं। आप त्रिभुवन (स्वर्ग, म्र्त्यु और पाताल) के एकमात्र स्वामी हैं और सभी के अंतःकरण की बात जानने वाले अंतर्यामी हैं। आपकी महिमा का गान वेद और पुराण भी करते हैं।
द्वितीय चरण का अर्थ: भगवान शिव ने समुद्र मंथन के समय कालकूट विष को अपने कंठ में धारण किया था, जिससे संपूर्ण संसार की रक्षा हुई थी। ऐसे परम दयालु भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ध्यानमुद्रा में आसीन रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू, दूसरे में त्रिशूल, गले में सर्पराज और मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, जो उनके शांत और प्रलयकारी दोनों स्वरूपों का प्रतीक है।
तृतीय चरण का अर्थ: नंदी बैल पर सवारी करने वाले महादेव अपने भक्तों के सच्चे रक्षक हैं। उनके केवल एक दर्शन मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और तमाम देवी-देवता तथा ऋषि-मुनि उनका निरंतर ध्यान करते हैं। जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, वह मनवांछित फल प्राप्त करता है और अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
भुवनेश्वर महादेव का स्वरूप आदिकाल से ही साधकों, ऋषियों और सामान्य जनमानस के लिए आस्था का केंद्र रहा है। भुवनेश्वर का अर्थ है 'भुवनों के ईश्वर'। शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति नियमित रूप से भुवनेश्वर महादेव की पूजा और आरती करता है, उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य स्वतः प्राप्त हो जाता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि कलियुग में भगवान शिव की आराधना और उनकी आरती का गान करने मात्र से मनुष्य की अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है तथा घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह आरती नकारात्मक शक्तियों, मानसिक संतापों और बाधाओं को नष्ट करने में अचूक औषधि का कार्य करती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
शिव आरती का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे विधि-विधान के साथ करना अत्यंत आवश्यक है:
- प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या प्रदोष काल में स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- शिवलिंग या भुवनेश्वर महादेव के विग्रह के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- भगवान को जल, गंगाजल, दूध, दही, शहद, और घृत से स्नान कराएं।
- चंदन, अक्षत (अखंड चावल), बेलपत्र, धतूरा, आ आक के फूल और श्वेत पुष्प अर्पित करें।
- धूप दिखाने के पश्चात पूरी श्रद्धा और लयबद्ध तरीके से भुवनेश्वर महादेव की आरती गाएं।
- आरती के उपरांत दोनों हाथों से दीप को लेकर भगवान को आचमन कराएं और स्वयं तथा उपस्थित सभी भक्तों को आरती का प्रकाश लें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
शिव आरती के समय निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य माना गया है:
- पूजा थाल: तांबे, पीतल या चांदी का स्वच्छ थाल।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (पंचमुखी या एकमुखी)।
- कपूर: आरती को प्रदीप्त करने के लिए शुद्ध कपूर।
- घंटी: वातावरण को शुद्ध करने और नकारात्मकता दूर करने के लिए पीतल की घंटी।
- शंख: आरती के आरंभ और समापन पर नाद करने के लिए पवित्र शंख।
- पुष्प और अक्षत: भगवान पर अर्पित करने के लिए ताजे पुष्प और चावल।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत और भक्ति का गहरा नाता है। 'श्री भुवनेश्वर महादेव जी की पावन आरती' को मुख्य रूप से 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाया जाता है, जो मन को शांत और एकाग्र करता है। इस आरती को गाने के लिए दीप मालिका ताल या কাহারवा ताल का प्रयोग किया जाता है। आरती का सर्वोत्तम गायन समय 'प्रदोष काल' (संध्याकाल) या सोमवार के दिन विशेष पूजा के समय माना गया है। इसके अलावा महाशिवरात्रि और सावन मास में इस आरती का गान विशेष फलदायी होता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से भुवनेश्वर महादेव की आरती करने से साधक को अनेक अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
- जीवन की समस्त बाधाएं और ग्रह दोष शांत होते हैं।
- पारिवारिक कलह समाप्त होती है और सुख-शांति का वास होता है।
- अध्यात्म और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।