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श्री रामायण आरती: कीरति कलित ललित सिय पी की - अर्थ एवं विधि

पढ़ें श्री रामायण आरती: कीरति कलित ललित सिय पी की - अर्थ एवं विधि का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

सनातन धर्म की समृद्ध परंपरा में 'श्री रामायण जी की आरती' केवल एक स्तुति गान नहीं, बल्कि साक्षात शब्द-ब्रह्म की वंदना है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के उपरांत गाई जाने वाली यह आरती प्रभु श्री राम के दिव्य चरित्र और रामायण महाकाव्य की महिमा का सार है। 'कीरति कलित ललित सिय पी की' की पंक्तियों में भक्त उस परम यश का गान करता है, जो माता सीता के प्रियतम प्रभु राम का है। यह आरती हमें उस आध्यात्मिक धरातल पर ले जाती है जहाँ ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का संगम होता है। रामायण को भगवान का 'वांग्मय स्वरूप' (वाणी रूपी शरीर) माना गया है, और इस आरती के माध्यम से हम उसी दिव्य स्वरूप की मानसिक और आत्मिक सेवा करते हैं। इस लेख में हम इस पावन आरती के गूढ़ अर्थ, इसकी शास्त्रीय विधि और इसके गायन से प्राप्त होने वाले आध्यात्मिक लाभों का विस्तृत विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics

आरती श्री रामायण जी की ।
कीरति कलित ललित सिय पी की ॥


गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद ।
वाल्मीकि बिग्यान बिसारद ॥
शुक सनकादि शेष अरु सारद ।
बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥
आरती श्री रामायण जी की...

गावत वेद पुरान अष्टदस ।
शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥
मुनि जन धन संतन को सर्वस्व ।
सार अंश सम्मत सब ही की ॥
आरती श्री रामायण जी की...

गावत संतत शंभु भवानी ।
अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी ।
कागभुशुंडि गरुड़ के ही की ॥
आरती श्री रामायण जी की...

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी ।
सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ॥
दलन रोग भव मूरि अमी की ।
तात मात सब बिधि तुलसी की ॥
आरती श्री रामायण जी की...

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

श्री रामायण जी की यह आरती आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण है। यहाँ प्रत्येक पद का विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत है:

मुखड़ा: "आरती श्री रामायण जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥"
इसका अर्थ है कि हम श्री रामायण जी की आरती उतार रहे हैं, जो माता सीता के प्रियतम (प्रभु श्री राम) के सुंदर और मनोहर यश का वर्णन करती है। यह यश अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है।

प्रथम पद: "गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद..."
इस पद में बताया गया है कि रामायण की महिमा का गान स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी, देवर्षि नारद और परम ज्ञानी महर्षि वाल्मीकि करते हैं। शुकदेव जी, सनकादि ऋषि, शेषनाग और माता सरस्वती भी निरंतर इसी यश का गान करते हैं। यहाँ तक कि पवनपुत्र हनुमान जी ने भी इस सुंदर कीर्ति का विस्तार से वर्णन किया है। यह दर्शाता है कि रामायण का महत्व देवताओं और ऋषियों के लिए भी सर्वोपरि है।

द्वितीय पद: "गावत वेद पुरान अष्टदस..."
रामायण केवल एक कथा नहीं है, बल्कि यह चारों वेदों, अठारह पुराणों और समस्त शास्त्रों का निचोड़ (रस) है। यह मुनियों की पूँजी है और संतों का सर्वस्व है। संसार के सभी मतों और सिद्धांतों का सार रामायण में समाहित है। यह ग्रंथ मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है।

तृतीय पद: "गावत संतत शंभु भवानी..."
भगवान शिव और माता पार्वती निरंतर रामायण का गान करते हैं। अगस्त्य मुनि (घटसंभव) जैसे महान वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ऋषि भी इसकी महिमा गाते हैं। महर्षि व्यास और अन्य श्रेष्ठ कवियों ने भी इसका बखान किया है। यह कागभुशुंडि और गरुड़ जी के हृदय की अत्यंत प्रिय वस्तु है।

चतुर्थ पद: "कलिमल हरनि बिषय रस फीकी..."
यह आरती और रामायण का पाठ कलियुग के पापों (कलिमल) को नष्ट करने वाला है। यह सांसारिक विषयों के प्रति वैराग्य उत्पन्न करता है और मुक्ति रूपी युवती के लिए सुंदर श्रृंगार के समान है। यह संसार रूपी रोगों को नष्ट करने के लिए संजीवनी बूटी (अमी की मूरि) है। अंत में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि यह रामायण मेरे लिए माता, पिता और सब कुछ है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Words

शब्द सरल अर्थ संदर्भ
कीरति यश / महिमा प्रभु राम का दिव्य यश
कलित सुंदर / मनोहर आरती की सुंदरता के लिए
सिय पी सीता के प्रिय (राम) प्रभु श्री राम का संबोधन
बिग्यान बिसारद विज्ञान के ज्ञाता महर्षि वाल्मीकि के लिए
सारद माता सरस्वती ज्ञान की देवी
अष्टदस अठारह 18 पुराणों के संदर्भ में
घटसंभव अगस्त्य मुनि घड़े से उत्पन्न होने वाले ऋषि
कलिमल कलियुग के पाप मानसिक और आध्यात्मिक दोष
अमी की मूरि अमृत की जड़/दवा भवसागर से मुक्ति की औषधि

आरती में वर्णित रामायण की महिमा | Glory of the Scripture

रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का प्राण है। इस आरती में रामायण को 'शास्त्र सब ग्रंथन को रस' कहा गया है। इसका अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति वेदों या उपनिषदों का अध्ययन नहीं कर सकता, तो केवल रामायण के शरण में जाने से उसे समस्त शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। रामायण हमें 'मर्यादा' सिखाती है। यह बताती है कि एक पुत्र, एक भाई, एक पति और एक राजा के रूप में आदर्श आचरण क्या होना चाहिए। श्री राम स्तुति और रामायण की यह आरती भक्त के हृदय में भक्ति का संचार करती है और उसे अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म के मार्ग पर प्रशस्त करती है।

आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Religious Significance

सनातन परंपरा में किसी भी पूजा या पाठ की पूर्णता आरती से होती है। रामायण पाठ के अंत में इस आरती को गाने के विशेष लाभ बताए गए हैं:

  • पापों का शमन: 'कलिमल हरनि' होने के कारण यह अनजाने में हुए पापों का नाश करती है।
  • मानसिक शांति: इसके शब्दों का लयबद्ध उच्चारण मन को शांत और एकाग्र करता है।
  • मुक्ति का मार्ग: इसे 'मुक्ति जुबती की सुभग सिंगार' कहा गया है, जो मोक्ष प्राप्ति में सहायक है।
  • भक्ति की वृद्धि: यह आरती प्रभु राम और माता सीता के प्रति अनन्य प्रेम जागृत करती है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi

आरती करते समय श्रद्धा और शुद्धता का होना अनिवार्य है। निम्नलिखित विधि का पालन करें:

  1. शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. थाली सज्जा: पीतल या तांबे की थाली में कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। उसमें दीपक (घी या कपूर का), अक्षत, पुष्प और जल का कलश रखें।
  3. दीपक की संख्या: रामायण जी की आरती के लिए पंचमुखी दीपक या एक शुद्ध घी का दीपक श्रेष्ठ माना जाता है।
  4. मुद्रा: आरती करते समय सीधे खड़े रहें और थाली को धीरे-धीरे 'ॐ' की आकृति में घुमाएं।
  5. अर्पण: आरती पूर्ण होने के बाद जल से आचमन करें और सभी उपस्थित लोगों को आरती दें।

आरती का सही समय एवं दिशा | Best Time & Direction

रामायण जी की आरती मुख्य रूप से रामचरितमानस पाठ की समाप्ति पर की जाती है। हालांकि, इसे दैनिक पूजा में भी शामिल किया जा सकता है।

  • समय: संध्या काल (गोधूलि बेला) आरती के लिए सर्वोत्तम है। यदि अखंड पाठ चल रहा हो, तो पाठ की समाप्ति पर इसे अवश्य करें।
  • दिशा: आरती करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। रामायण जी की प्रति को ऊंचे और साफ आसन पर रखें।

आरती के दौरान घंटी और शंख का महत्व | Symbolism

आरती के समय घंटी और शंख बजाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं। घंटी की ध्वनि से मन के विचार शांत होते हैं और एकाग्रता बढ़ती है। शंख की ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और वातावरण को शुद्ध करती है। यह माना जाता है कि जहाँ रामायण की आरती होती है, वहाँ हनुमान जी अदृश्य रूप में उपस्थित रहते हैं, क्योंकि वे राम-कथा के परम प्रेमी हैं।

आरती का आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message

यह आरती हमें सिखाती है कि संसार में सबसे बड़ा धन 'संतन को सर्वस्व' यानी ईश्वर की भक्ति है। 'विषय रस फीकी' का संदेश हमें भौतिक सुखों की क्षणभंगुरता की याद दिलाता है। रामायण हमें धैर्य, त्याग और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। जिस प्रकार तुलसीदास जी ने रामायण को अपना 'तात-मात' (माता-पिता) माना, उसी प्रकार हमें भी सद्ग्रंथों को अपना मार्गदर्शक मानना चाहिए।

एक नजर में आरती की जानकारी | Quick Information Table

आरती का नाम श्री रामायण जी की आरती
मुख्य विषय रामायण और प्रभु श्री राम की महिमा
रचयिता गोस्वामी तुलसीदास (पारंपरिक मान्यता)
उपयुक्त अवसर रामायण पाठ, राम नवमी, दैनिक संध्या पूजा
मुख्य पात्र श्री राम, माता सीता, हनुमान जी, ब्रह्मा, नारद, वाल्मीकि
भाषा अवधि / हिंदी

मुख्य आध्यात्मिक सीख | Key Takeaways

  • रामायण समस्त वेदों और पुराणों का सार है।
  • यह आरती कलियुग के दोषों को दूर करने वाली महा-औषधि है।
  • सच्ची शांति भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि राम-नाम के यश में है।
  • ज्ञानियों (वाल्मीकि, शुकदेव) और भक्तों (हनुमान, गरुड़) दोनों के लिए रामायण वंदनीय है।
  • आरती के माध्यम से हम प्रभु के वांग्मय स्वरूप के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

रामायण की आरती मुख्य रूप से रामायण या रामचरितमानस के पाठ के समापन पर की जाती है। इसके अलावा इसे प्रतिदिन संध्या काल में भी किया जा सकता है।

इसका अर्थ है - माता सीता के प्रियतम (प्रभु श्री राम) की वह कीर्ति जो अत्यंत सुंदर, मनोहर और पवित्र है।

हाँ, शास्त्रीय मान्यता के अनुसार आरती पूजा या पाठ की त्रुटियों को क्षमा करने और उसे पूर्णता प्रदान करने के लिए अनिवार्य है।

आरती में 'घटसंभव' महर्षि अगस्त्य को कहा गया है, जिनका जन्म घड़े से माना जाता है और वे महान आध्यात्मिक वैज्ञानिक थे।

सामान्यतः आरती के दीपक को सात बार घुमाया जाता है - चार बार चरणों की ओर, दो बार नाभि की ओर और एक बार मुख मंडल की ओर।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री धार्मिक ग्रंथों, पारंपरिक मान्यताओं और गोस्वामी तुलसीदास जी की रचनाओं के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। रामायण की यह आरती सदियों से भक्तों का मार्गदर्शन कर रही है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ

  • श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
  • श्रीरामचरितमानस - गीता प्रेस, गोरखपुर
  • कल्याण (विशेषांक) - भक्ति अंक

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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