पौराणिक परिचय, उत्पत्ति एवं आध्यात्मिक महत्व
श्री जगन्नाथ अष्टकम भगवान जगन्नाथ की स्तुति में रचित एक अत्यंत पावन और दिव्य स्तोत्र है। मान्यता है कि इस अष्टक की रचना अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य ने की थी। जब वे पुरी धाम की यात्रा पर गए, तो भगवान जगन्नाथ के अलौकिक सौंदर्य और उनकी लीलाओं को देखकर वे भाव-विभोर हो गए और उनके मुख से ये आठ श्लोक स्वतः ही प्रवाहित हो गए।
यह स्तोत्र न केवल भगवान जगन्नाथ के भौतिक स्वरूप का वर्णन करता है, बल्कि उनके आध्यात्मिक स्वरूप, उनकी करुणा और भक्तों के प्रति उनके वात्सल्य को भी प्रकट करता है। 'जगन्नाथ' का अर्थ है 'जगत के नाथ' (स्वामी)। पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर चार धामों में से एक है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान के नयनपथ (दृष्टि) में रहने की प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करता है, जिसका अर्थ है कि भक्त सदैव भगवान को अपने हृदय और दृष्टि में देखना चाहता है।
सम्पूर्ण मूल स्तोत्रम् पाठ
सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)
कदाचित् कालिन्दी तटविपिनसङ्गीततरलो मुदाभीरीनारीवदनकमलास्वादमधुपः।
रमा शम्भुब्रह्मामरपतिगणेशार्चितपदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
१ ॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे दुकूलं नेत्रान्ते सहचरकटाक्षं च विदधत्।
सदा श्रीमद् वृन्दावनवसतिलीलापरिचयो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
२ ॥
महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरनीलशिखरैर्वसन् प्रासादान्तः सहजबलभद्रेण बलिना।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुरसेवावसरदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
३ ॥
कृपापारावारः सजलजलदश्रेणिरुचिरो रमावाणीरामः स्फुरदमलपङ्केरुहमुखः।
सुरेन्द्रैर्वन्द्यो मुनिगणशुकैर्गीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
४ ॥
रथारूढो गच्छन् पथि मिलितभूदेवपटलैः स्तुतिप्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः।
दयासिन्धुर्बन्धुः सकलजगतां सिन्धुसुतया जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
५ ॥
परब्रह्मापीडः कुवलयदलैरुज्जलतरैर्लसल्लीलाकान्तो निजजनगुणाकीर्तनपरः।
अहो रात्रं यस्य स्थिरमपि च कर्माभिरुचिर्जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
६ ॥
न वै याचे राज्यं न च कनकमाणिक्यविभवं न याचेऽहं रम्यां सकलजनकाम्यां वरवधूम्।
सदा काले काले प्रमथपतनादिश्रुतपदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
७ ॥
हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते।
अहो दीनेऽनाथे निहितचरणो निश्चितमिदं जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
८ ॥
जगन्नाथाष्टकं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः। सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥
श्लोकवार सरल हिंदी भावार्थ
प्रथम श्लोक में भगवान की यमुना तट पर की गई लीलाओं का वर्णन है। द्वितीय श्लोक में उनके वेणु (बांसुरी) और मोरपंख धारण किए हुए स्वरूप का ध्यान किया गया है। तृतीय श्लोक पुरी धाम और बलभद्र-सुभद्रा के साथ उनकी उपस्थिति को दर्शाता है। चतुर्थ श्लोक में उन्हें करुणा का सागर बताया गया है। पंचम श्लोक रथ यात्रा के समय उनके भक्तों पर कृपा करने का वर्णन करता है। छठे श्लोक में उन्हें परब्रह्म स्वरूप कहा गया है। सातवें श्लोक में भक्त सांसारिक सुखों की नहीं, बल्कि केवल भगवान के सानिध्य की कामना करता है। अंतिम श्लोक में संसार के दुखों और पापों को हरने की प्रार्थना की गई है।
पाठ विधि एवं नियम
नियमित पाठ से मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। इसे किसी भी दिन शुरू किया जा सकता है, किंतु एकादशी या रथ यात्रा के दिन इसका विशेष महत्व है।
सम्पूर्ण फलश्रुति
अंतिम श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति पवित्र होकर इस जगन्नाथाष्टक का पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अंत में विष्णुलोक (वैकुंठ) को प्राप्त करता है। यह स्तोत्र मोक्ष प्रदायक और भक्ति को दृढ़ करने वाला है।
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