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श्री भज गोविंदम स्तोत्रम् - अर्थ एवं संपूर्ण पाठ

श्री भज गोविंदम (चरपट पञ्जरिका स्तोत्रम्) के संपूर्ण श्लोक, हिंदी अर्थ, इतिहास एवं आध्यात्मिक महत्व को जानें। Read Bhaja Govindam in Hindi.

पौराणिक परिचय, उत्पत्ति एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म के महान दार्शनिक और अद्वैत वेदांत के प्रणेता जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित 'भज गोविंदम' स्तोत्र, जिसे 'चरपट पञ्जरिका स्तोत्रम्' के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय आध्यात्मिक साहित्य का एक अद्वितीय और सिरमौर ग्रंथ है। इस स्तोत्र की रचना के पीछे एक बहुत ही प्रसिद्ध और प्रेरणादायक पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। एक बार काशी की गलियों में यात्रा करते समय आद्य शंकराचार्य ने अपने शिष्यों के साथ एक वृद्ध विद्वान को संस्कृत के व्याकरण 'डुकृञ्करणे' के नियमों को कठिन परिश्रम से रटते और याद करते हुए देखा। उस वृद्ध की आयु अंतिम चरण में थी और मृत्यु निकट थी, फिर भी उसका मन सांसारिक ज्ञान और व्याकरण की जटिलताओं में फंसा हुआ था।

उस दृश्य को देखकर शंकराचार्य जी के मन में करुणा और वैराग्य की तीव्र भावना उत्पन्न हुई। उन्होंने उसी क्षण तत्काल कुछ श्लोकों की रचना की, जिन्हें उनके शिष्यों ने आगे चलकर जोड़ा और इस प्रकार कुल ३१ श्लोकों का यह दिव्य 'भज गोविंदम' स्तोत्र पूर्ण हुआ। यह स्तोत्र केवल कुछ श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह मानव मात्र के लिए मोह, अहंकार, अज्ञान और सांसारिक बंधनों से मुक्त होने की एक महाऔषधि है। इसमें जीवन की नश्वरता, जवानी के छलावा, धन की असारता और भगवान गोविंद (श्रीकृष्ण) की भक्ति के परम सत्य को अत्यंत सरल किंतु तीखे शब्दों में उजागर किया गया है।

सनातन परंपरा में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि मनुष्य जीवन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है, किंतु अधिकांश लोग इसे केवल भौतिक सुखों, धन कमाने और पारिवारिक मोह में गंवा देते हैं। 'भज गोविंदम' हमें बार-बार यह चेतावनी देता है कि जब मृत्यु का समय निकट आएगा, तब कोई भी व्याकरण का नियम, कोई भी धन या सांसारिक संबंध तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएगा। केवल भगवान गोविंद का भजन और उनका स्मरण ही एकमात्र ऐसा साधन है जो जीव को इस भवसागर से पार उतार सकता है। इसके अध्ययन और पठन से साधक के मन में वैराग्य, भक्ति और ज्ञान का त्रिवेणी संगम प्रवाहित होने लगता है।

इस स्तोत्र का आध्यात्मिक रहस्य इस बात में निहित है कि यह जीव को उसकी वास्तविक पहचान से अवगत कराता है। हम सब इस नश्वर संसार को ही सत्य मानकर बैठ जाते हैं, जबकि वेद और उपनिषद बार-बार यह याद दिलाते हैं कि यह संसार नश्वर है और केवल ब्रह्म (भगवान श्रीकृष्ण) ही शाश्वत सत्य हैं। जब साधक भज गोविंदम के एक-एक श्लोक का मनन करता है, तो उसके भीतर का अज्ञान रूपी अंधकार छंटने लगता है और परम शांति की प्राप्ति होती है।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)

भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमत्ते।
संप्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥

विनियोग: अस्य श्री भजगोविन्दस्तोत्रमंत्रस्य भगवद्गीता ऋषिः, परमात्मा देवता, अनुष्टुप् छन्दः, गोविन्दप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

ध्यानम्: भजे विशुद्धं परमं पदं हरिं, गजेन्द्रमोक्षप्रदमच्युतं विभुम्। भजेऽहमिन्दीवरवर्णसुन्दरं, भजे सदा नन्दकुमारकं मुहुः॥

सम्पूर्ण मूल स्तोत्रम् पाठ (चरपट पञ्जरिका स्तोत्रम्)

भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढमत्ते।
संप्राप्ते सन्निहिते काले, नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे॥ १॥

मूढ जहीहि धनगमागम तृष्णां, कुरु बुद्धि मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपावित्तं, वित्तं तेन विनोदय चित्तम्॥ २॥

नारीनजरुग्मेलोक्तिसुखं, नैव शरीरं रोगोपहतम्।
रोगोऽपहतं सर्वं चेष्टितं, तस्मात्कुर्वुरु नित्यं चेष्टितम्॥ ३॥

यावद्वित्तोपार्जनसक्ता, तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जरया जर्जरित्रे, वार्तार्हं कोऽपि न पृच्छति गृहे॥ ४॥

यावत्पवनो निवसति देहे, तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥ ५॥

बालस्तावत्क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥ ६॥

का कान्ता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं कः कुतः आयातः, तं तत्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥ ७॥

सत्संगत्वात्निःसंगत्वम्, निःसंगत्वात्निर्मोहत्वम्।
निर्मोहत्वात्निस्चलतात्त्वम्, निस्चलतात्त्वं जीवन्मुक्तिः॥ ८॥

वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः।
नष्टे धने कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥ ९॥

मा कुरु धनं जनं यौवन गर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वम्।
मायामयमिदमखिलं हित्वा, ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा॥ १०॥

दिनयामिन्यो सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः, तदपि न मुञ्चत्याशावायुः॥ ११॥

द्वादशमञ्जिरिकामेषो, यः पठति च तेन निगद्योऽपि।
तेन हि ब्रह्मज्ञाने भवति, कृपा यस्य च देवो भवति॥ १२॥

श्लोकवार सरल हिंदी भावार्थ एवं दार्शनिक व्याख्या

भज गोविंदम स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक मानव मन की गहराइयों को झकझोरने वाला है। प्रथम श्लोक में आद्य शंकराचार्य मूर्ख मनुष्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मूढ़! गोविंद का भजन कर। जब जीवन का अंतिम समय और मृत्यु निकट आएगी, तब व्याकरण के कठिन नियम ('डुकृञ्करणे') तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकेंगे। यहाँ व्याकरण का उदाहरण केवल उन तमाम बौद्धिक और सांसारिक उपलब्धियों का प्रतीक है जिन्हें मनुष्य अपनी सबसे बड़ी पूंजी समझता है, जबकि अंतिम समय में केवल भगवद्भक्ति ही काम आती है।

दूसरे श्लोक में धन की लालसा छोड़ने का उपदेश दिया गया है। आचार्य कहते हैं कि हे मनुष्य! धन कमाने और प्राप्त करने की झूठी तृष्णा को छोड़ दे। अपने मन में संतोष धारण कर। अपने कर्मों से जो कुछ भी ईमानदारी से प्राप्त हो जाए, उसी से अपने चित्त को संतुष्ट और प्रसन्न रख। तृष्णा ही सभी दुखों का मूल कारण है। तीसरे और चौथे श्लोक में शरीर की नश्वरता और परिवार के स्वार्थी स्वभाव पर प्रकाश डाला गया है। जब तक मनुष्य के पास धन है, तब तक परिवार का हर सदस्य उससे प्रेम करता है और उसका आदर करता है, किंतु वृद्धावस्था में जब शरीर क्षीण हो जाता है और धन समाप्त हो जाता है, तब घर में कोई भी उसकी सुधि नहीं लेता।

पांचवें और छठे श्लोक में जीवन के विभिन्न चरणों (बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था) का सुंदर विश्लेषण किया गया है। बालक खेलकूद में मस्त रहता है, युवा स्त्री और भोग-विलासिता में डूबा रहता है, और वृद्ध व्यक्ति चिंताओं के सागर में डूबा रहता है, किंतु विडंबना यह है कि इस पूरे जीवन चक्र में कोई भी परब्रह्म परमात्मा में मन नहीं लगाता। सातवें श्लोक में आत्म-जिज्ञासा जगाई गई है कि कौन तेरी पत्नी है और कौन तेरा पुत्र है? यह संसार अत्यंत विचित्र है। तू कौन है और कहाँ से आया है? हे भाई, इस सत्य का चिंतन कर।

आठवें श्लोक में सत्संग के महत्व को अद्वितीय रूप से समझाया गया है। सत्संग से मनुष्य को असंगता (मोह का त्याग) प्राप्त होती है, असंगता से निर्मोहता आती है, निर्मोहता से निश्चलता और स्थिर मन प्राप्त होता है, और निश्चल चित्त से ही जीवन्मुक्ति (जीवन रहते ही मोक्ष) की प्राप्ति होती है। नौवें से बारहवें श्लोक तक आयु की गति, धन की अस्थिरता और काल के प्रभाव का वर्णन करते हुए साधक को भगवद्दर्शन और ब्रह्मज्ञान की ओर प्रेरित किया गया है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भौतिक संचय नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार और गोविंद की प्राप्ति है।

पाठ विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां

श्री भज गोविंदम स्तोत्र का पाठ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना जाता है। नित्य स्नान आदि से निवृत्त होकर पवित्र वस्त्र धारण करें और भगवान श्रीकृष्ण या विष्णु जी के विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलित करें। पाठ करने से पूर्व मन को शांत करना अत्यंत आवश्यक है। इस स्तोत्र के अध्ययन के लिए किसी कठोर अनुष्ठान की अनिवार्यता नहीं है, किंतु यदि इसे नियमित रूप से प्रतिदिन एक बार या तीन बार पढ़ा जाए, तो मन में सकारात्मक ऊर्जा और वैराग्य का संचार होता है।

विशेष नियम: पाठ करते समय उच्चारण की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। इसे केवल औपचारिकता या गति बढ़ाने के लिए न पढ़ें, बल्कि प्रत्येक श्लोक के अर्थ पर विचार करते हुए भाव के साथ इसका पठन करें।

पाठ के दौरान मन में किसी भी प्रकार का द्वेष, अहंकार या सांसारिक चिंता नहीं रखनी चाहिए। स्तोत्र समापन के बाद भगवान को भोग लगाकर आरती करें और क्षमा प्रार्थना के साथ सत्र का समापन करें।

सम्पूर्ण फलश्रुति, धार्मिक लाभ एवं प्रभाव

श्री भज गोविंदम स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार, जो भी साधक इस दिव्य 'चरपट पञ्जरिका स्तोत्र' का नियमित रूप से पाठ करता है, उसे असाधारण मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है। इसके प्रभाव से मनुष्य के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे मानसिक विकारों का शमन होने लगता है। भगवद्कृपा से साधक का चित्त सांसारिक प्रलोभनों से विरक्त होकर भगवान श्रीकृष्ण के पावन चरणों में संलग्न हो जाता है।

धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह स्तोत्र भवसागर से तरने का सुगम मार्ग प्रशस्त करता है। आधुनिक जीवन की तनावपूर्ण दिनचर्या में जहाँ व्यक्ति अवसाद और चिंताओं से घिरा रहता है, वहाँ भज गोविंदम का पाठ मानसिक स्पष्टता, जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण और आंतरिक आनंद प्रदान करता है। अंततः यह साधक को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर परम ब्रह्म की प्राप्ति कराता है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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