सनातन धर्म की भक्ति परंपरा में संकटमोचन महावीर श्री हनुमान जी की उपासना को कलिकाल में साक्षात् कल्पवृक्ष के समान फलदायी माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अथवा हनुमान जी के सिद्ध उपासकों द्वारा अनुभूत 'श्री बजरंग बाण' एक ऐसा दिव्य, तीव्र और अमोघ आध्यात्मिक अस्त्र है, जिसके सम्मुख संसार की कोई भी नकारात्मक ऊर्जा, भूत-पिशाच, ग्रह-दोष अथवा तांत्रिक पीड़ा टिक नहीं सकती।
श्री बजरंग बाण - आध्यात्मिक परिचय एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
बजरंग बाण का शाब्दिक अर्थ है—'बजरंग' अर्थात् वज्र के समान सुदृढ़ अंगों वाले महाबली हनुमान का 'बाण' अर्थात् अचूक अस्त्र। जिस प्रकार भगवान श्री राम का बाण कभी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता और निष्फल नहीं लौटता, ठीक उसी प्रकार बजरंग बाण का पाठ साधक के जीवन के समस्त संकटों, भयों, व्याधियों और शत्रुकृत बाधाओं का समूल नाश करने में सक्षम है।
पौराणिक एवं तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार, बजरंग बाण केवल एक स्तुति गान नहीं है, अपितु यह उच्च कोटि के शाबर मंत्रों और बीजाक्षरों से समन्वित एक जाग्रत स्तोत्र है। इसमें 'ॐ हं हनुमंते नमः', 'ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं', 'हुं हुं हुं हनुमंत कपीसा' जैसे प्रचंड एकाक्षरी और त्रयाक्षरी बीजों का समावेश है, जो ब्रह्मांडीय तरंगों को तुरंत स्पंदित कर देते हैं। इस स्तोत्र की सबसे विशिष्ट और गंभीर बात यह है कि इसमें भक्त अपने आराध्य हनुमान जी को उनके प्राणप्रिय प्रभु श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण जी की आन (शपथ) दिलाकर तुरंत कार्य सिद्ध करने की प्रार्थना करता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब काशी में तांत्रिकों और अघोरियों द्वारा रचित अभिचार कर्मों (मूठ और मारण प्रयोगों) से भारी शारीरिक पीड़ा झेली थी, तब उन्होंने हनुमान बाहुक और इस प्रकार के अमोघ रक्षा-स्तोत्रों के माध्यम से आत्मरक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना की थी। बजरंग बाण का आश्रय वही साधक लेता है, जो संसार के छल-प्रपंच, असाध्य रोगों या दुष्ट शक्तियों से घिरकर पूरी तरह असहाय हो चुका हो और केवल और केवल पवनपुत्र की शरण में अपने प्राणों की गुहार लगा रहा हो।
श्री बजरंग बाण - सम्पूर्ण प्रामाणिक मूल पाठ
सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)
॥
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥
॥
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका ॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥
बाग उजारि सिंधु महं बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा ॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा ॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी ॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख हरहु निपाता ॥
जै गिरिधर जै बिपिन बिहारी। जै गिरिधरन धीर ब्रजकारी ॥
एहि प्रकार बल बुधि बिक्रमा। सेवत चरण पूरहु कामा ॥
जै हनुमंत अनंत अथाहा। बसत हृदय रघुपति बलि दाहा ॥
जलधि लांघि जेहिं मुद्रिका दीन्हा। सीता सोच बिदारन कीन्हा ॥
आनंद करहु चरन मन लाए। दुष्ट निकंदन असुर खपाए ॥
सब दुख दूर करहु यतिराया। रघुपति चरन धोय सुख पाया ॥
जै कपि रूप राम के दासा। सदा करत संतन की आसा ॥
सदा रहो सेवक अनुकूला। कीजै कृपा हरहु भव सूला ॥
नाथ गहो अब काल भुजंगा। छिटकहिं बिष नख दंत प्रसंगा ॥
राहु केतु शनि अवनि कुमारा। पीर करहिं जब अतिहि अपारा ॥
तब तब कनक बदन हनुमाना। धावहु वेगि महा बलवाना ॥
जहं जहं पीर होइ तन भारी। सुमिरत होत मिटत संसारी ॥
जंतर मंतर टोटक भ्रामा। करहिं न व्यापहिं कबहूं कामा ॥
भूत पिसाच प्रेत औ दाना। बेताल काक बागी बलवाना ॥
डाकिनी साकिनी प्रमथ मलीना। जिन्हहिं देखि थर-थर तन कीना ॥
चहुं दिसि कटक कटहिं खन माहीं। पवनपुत्र सुमिरत भजि जाहीं ॥
सत्य होहु हरि सपथ पाय कै। राम दूत धरु मारू धाय कै ॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा ॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा ॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होत दुसह दुख नासा ॥
चरन पकरि कर जोरि मनावौं। यहि औसर केहि गोहिहरावौं ॥
उठु उठु चलु तोहि राम दोहाई। पांय परौं कर जोरि मनाई ॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल ॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ ॥
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिर कौन उबारै ॥
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की ॥
यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत-प्रेत सब कांपै ॥
धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेसा ॥
॥
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब बैकुंठ को, पावै बिगत-कल्यान ॥
प्रत्येक श्लोक एवं चौपाई का सरल हिंदी भावार्थ तथा आध्यात्मिक रहस्य
बजरंग बाण का प्रत्येक पद केवल तुकांत कविता नहीं है, अपितु वह साधक के अंतर्मन का वह आर्तनाद है जो सीधा पवनपुत्र के हृदय को स्पर्श करता है:
प्रारंभिक दोहा एवं शरणागति का भाव
'निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान...' - इस दोहे का गूढ़ अर्थ यह है कि जो साधक पूर्ण निष्ठा (निश्चय), अगाध प्रेम और अटूट विश्वास (प्रतीति) के साथ अत्यंत विनय और सम्मानपूर्वक हनुमान जी से प्रार्थना करता है, वीर हनुमान उसके समस्त शुभ कार्यों को तत्काल सिद्ध कर देते हैं। साधना में 'प्रतीति' अर्थात् संशय-रहित आस्था ही सबसे बड़ा साधन है।
पराक्रम का स्मरण और लंका दहन की लीला
'जय हनुमंत संत हितकारी... लाह समान लंक जरि गई...' - इन चौपाइयों में भक्त हनुमान जी को उनके संतों के प्रति कृपालु स्वभाव की याद दिलाता है। साधक कहता है कि हे प्रभु! आपने जैसे समुद्र लांघा, सुरसा का मान मर्दन किया, लंकिनी को लात मारकर यमलोक का मार्ग दिखाया, विभीषण को जीवनदान दिया और माता जानकी की खोज कर प्रभु का कार्य सिद्ध किया; उसी वेग से आज मेरे दुखों का भी अंत कीजिए। जिस प्रकार आपने अक्षय कुमार का संहार किया और सोने की लंका को लाख के समान क्षणभर में भस्म कर दिया, उसी प्रकार मेरे जीवन के दारुण दुखों को भस्म कर दीजिए।
प्रभु श्री राम की सौगंध एवं आध्यात्मिक विवशता
'सत्य होहु हरि सपथ पाय कै... उठु उठु चलु तोहि राम दोहाई...' - यह बजरंग बाण का सबसे रहस्यमयी और उग्र अंश है। भक्त जब अत्यंत विपदा में होता है, तब वह हनुमान जी को भगवान श्री रामचंद्र जी और जनकसुता माता सीता की सौगंध देता है। हनुमान जी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अनन्य सेवक हैं; वे प्रभु राम की सौगंध को कभी टाल नहीं सकते। भक्त कहता है कि हे मारुतिनंदन! मैं किसी नियम, जप, तप या पूजा की विधि को नहीं जानता, मैं केवल आपकी शरण में हूँ। यदि आप देर करेंगे तो आपके प्रभु की मर्यादा पर बात आएगी, अतः उठिए और दौड़कर मेरे संकटों का संहार कीजिए।
तांत्रिक बीजाक्षरों की शक्ति का प्रकटीकरण
'ॐ चं चं चं चं चपल चलंता... ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल...' - इन पंक्तियों में 'चं', 'हनु', 'हं', और 'सं' बीजाक्षरों का गुंजन हुआ है। यह शाबर तंत्र का प्रत्यक्ष प्रभाव है। 'चं' बीज वायु तत्व की प्रचंड गति को प्रकट करता है, 'हं' बीज शिव रूपी रुद्रावतार के क्रोध और तेज को दर्शाता है, तथा 'सं' बीज समस्त दुष्ट शक्तियों के संहार और शांति का द्योतक है। जब इन बीजों का सस्वर पाठ होता है, तो साधक के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा कवच निर्मित होता है जिसे भेदना त्रैलोक्य की किसी भी आसुरी शक्ति के लिए असंभव है।
शास्त्रीय पाठ / जप विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां
बजरंग बाण एक अत्यंत उग्र और शीघ्र फलदायी स्तोत्र है। इसलिए इसका पाठ करते समय शास्त्रों और सिद्ध संतों द्वारा बताए गए नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है।
| साधना का अंग | शास्त्रीय निर्देश एवं नियम |
|---|---|
| शुभ दिन एवं मुहूर्त | शुक्ल पक्ष का मंगलवार, शनिवार, हनुमान जयंती, नरक चतुर्दशी या किसी भी मास की पूर्णिमा। ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्याकाल। |
| आसन एवं दिशा | लाल रंग का ऊनी या कुशा का शुद्ध आसन। मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। |
| दीपक एवं भोग | चमेली के तेल अथवा गाय के शुद्ध घी का दीपक (लाल बत्ती सहित)। भोग में बूंदी, बेसन के लड्डू, या लाल फल अर्पित करें। |
| वस्त्र की शुद्धता | साधक को बिना सिला हुआ अथवा स्वच्छ लाल या पीला सूती वस्त्र धारण करना चाहिए। |
| संकल्प एवं आचमन | हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपना नाम, गोत्र और अभीष्ट कार्य बोलकर पृथ्वी पर जल छोड़ें। |
पाठ करते समय रखी जाने वाली अनिवार्य सावधानियां
- सात्विक जीवनशैली: अनुष्ठान काल के दौरान तामसिक भोजन, मदिरा, लहसुन, प्याज का स्पर्श भी वर्जित है। पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- बिना कारण पाठ न करें: छोटी-मोटी इच्छाओं या साधारण दैनिक कार्यों के लिए बजरंग बाण का पाठ न करें। साधारण दिनों में केवल हनुमान चालीसा का पाठ करें। केवल विशेष विपत्तियों में ही इसका आश्रय लें।
- किसी के अनिष्ट की कामना न करें: अपने स्वार्थ के लिए किसी अन्य व्यक्ति का बुरा चाहकर बजरंग बाण का पाठ कभी न करें। हनुमान जी धर्म के रक्षक हैं, अधर्म में वे कभी सहायक नहीं होते; ऐसा करने पर उलटा साधक को भारी क्षति हो सकती है।
- शुद्ध उच्चारण: बीजाक्षरों (चं चं, हं हं, सं सं) का उच्चारण अत्यंत स्पष्ट, शुद्ध और एकाग्रचित्त होकर करें।
नित्य पाठ के दिव्य फल, लाभ एवं फलश्रुति
जो साधक मर्यादा और श्रद्धा के साथ बजरंग बाण का विधिवत पाठ करते हैं, उन्हें लौकिक और पारलौकिक दोनों क्षेत्रों में अद्भुत परिणामों की प्राप्ति होती है:
- समस्त नकारात्मक ऊर्जा और भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति: जिस घर में अगरबत्ती या गुग्गुल की धूप देकर बजरंग बाण का पाठ होता है, वहाँ प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी या तंत्र-मंत्र का कोई दुष्प्रभाव नहीं ठहर सकता।
- असाध्य रोगों और शारीरिक पीड़ा का शमन: गंभीर वात-व्याधि, असाध्य ज्वर, रक्त विकार और मानसिक अवसाद से पीड़ित व्यक्ति यदि नियमित रूप से तांबे के पात्र में जल रखकर पाठ करे और वह जल पिए, तो उसे त्वरित स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
- ग्रह पीड़ा और शनि की साढ़ेसाती का निवारण: शनि, राहु और केतु जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव से उत्पन्न घोर आर्थिक और पारिवारिक संकट बजरंग बाण के प्रभाव से शांत हो जाते हैं।
- अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा: यह बाण साधक के चारों ओर 'सुदर्शन' चक्र की भांति सुरक्षा कवच बनाता है, जिससे शत्रु षड्यंत्र, न्यायालयी विवाद और मार्ग दुर्घटनाओं से पूर्ण रक्षा होती है।
- आत्मविश्वास और ओज की वृद्धि: नित्य पाठ से व्यक्ति के भीतर से भय, हीनभावना और चिंता का समूल नाश होकर अद्भुत आत्मबल, संकल्प शक्ति और तेज की वृद्धि होती है।
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