"बुला के हमको बांके बिहारी" एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और लोकप्रिय भजन है, जो भक्त और भगवान के बीच की उस गहरी आत्मीयता, विरह, और समर्पण को व्यक्त करता है, जिसे श्रीकृष्ण के बांके बिहारी स्वरूप के प्रति गहन श्रद्धा के रूप में जाना जाता है। यह भजन भक्तों के दिलों में एक विशेष स्थान रखता है, क्योंकि यह उस मानवीय भावना को उजागर करता है जो भगवान को अपने सबसे करीबी सखा और प्रियतम के रूप में देखती है। इसकी पंक्तियाँ, जैसे "छुप गए क्यों मुरारी, ये पर्दा क्यों किया है", भक्त की उस व्याकुलता को दर्शाती हैं जो भगवान के दर्शन के बिना अधूरी है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है जो साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर, और दूरी से निकटता की ओर ले जाती है। बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन से जुड़ी इस भक्ति परंपरा में, यह भजन उस आत्मा की पुकार है जो अपने स्रोत से मिलन के लिए व्याकुल है। यह रचना भक्ति आंदोलन की उस धारा का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ भगवान को "संवरिया" और "मुरारी" जैसे स्नेहिल नामों से पुकारा जाता है, और उनसे शिकायत भी की जाती है, प्रेम भी किया जाता है। इस भजन का प्रत्येक शब्द भक्त के हृदय की गहराई से निकला हुआ प्रतीत होता है, जो ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और उनके दर्शन की तीव्र लालसा को प्रकट करता है।
मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ
बुला के हमको बांके बिहारी , छुप गए क्यों मुरारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है !
दिखा दो हमको सूरत प्यारी , आये शरण तुम्हारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है !!
ओ रे संवरिया मेरे, मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में , हा रंग में ,
मुझसे मिला के नज़रे , चल दो बिहारी मेरे संग में , हा संग में ,
सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी , बन के तेरा पुजारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है ,
ओ रे संवरिया मेरे, दिल में छुपे हैं कई राज रे, कई राज रे ,
कैसे बताऊ मोहन तुमको दिल की सारी बात रे ,सारी बात रे,
दिल में मेरे तुम रहते हो , ओढ़ के कामल कारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है ,
हुए ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है ,
हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग रे , सारे लोग रे ,
कैसा लगाया तुमने मुझको मुरारी ये रोग रे , ये रोग रे,
रोग ये दिल का तुमने लगाया , सु...
पदच्छेद एवं अन्वय
इस भजन की भाषा ब्रजभाषा और हिंदी का मिश्रण है, जिसमें भक्ति भावना की सरलता और गहराई एक साथ विद्यमान है। इसके पदों का पदच्छेद एवं अन्वय निम्नलिखित है:
पदच्छेद: बुला के हमको बांके बिहारी, छुप गए क्यों मुरारी, ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है। दिखा दो हमको सूरत प्यारी, आये शरण तुम्हारी, ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है। ओ रे संवरिया मेरे, मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में, हा रंग में, मुझसे मिला के नज़रे, चल दो बिहारी मेरे संग में, हा संग में, सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी, बन के तेरा पुजारी, ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है। ओ रे संवरिया मेरे, दिल में छुपे हैं कई राज रे, कई राज रे, कैसे बताऊ मोहन तुमको दिल की सारी बात रे, सारी बात रे, दिल में मेरे तुम रहते हो, ओढ़ के कामल कारी, ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है। हुए ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है, हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग रे, सारे लोग रे, कैसा लगाया तुमने मुझको मुरारी ये रोग रे, ये रोग रे, रोग ये दिल का तुमने लगाया, सु...
अन्वय: हे बांके बिहारी! हमको बुला के (बुलाकर), (तुम) क्यों छुप गए मुरारी? ये पर्दा क्यों किया है? हमको सूरत प्यारी दिखा दो, (हम) तुम्हारी शरण आये हैं, ये पर्दा क्यों किया है? ओ रे मेरे संवरिया! मैं तो तेरे रंग में रंगा हूँ, मुझसे नज़रे मिला के, हे बिहारी! मेरे संग में चल दो। मैं भी तेरा पुजारी बन के तुम्हारी सेवा करूँगा, ये पर्दा क्यों किया है? ओ रे मेरे संवरिया! दिल में कई राज छुपे हैं, हे मोहन! तुमको दिल की सारी बात कैसे बताऊँ? दिल में मेरे तुम रहते हो, कामल कारी (काली कम्बल) ओढ़ के, ये पर्दा क्यों किया है? ये पर्दा क्यों किया है? हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग, हे मुरारी! तुमने मुझको कैसा ये रोग लगाया? ये दिल का रोग तुमने लगाया, सु...
विस्तृत शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बुला के | बुलाकर, आह्वान करके |
| बांके बिहारी | श्रीकृष्ण का एक विशेष नाम, जो उनके तिरछे (बांके) स्वरूप और वृंदावन में विहार करने वाले रूप को दर्शाता है |
| छुप गए | अदृश्य हो गए, ओझल हो गए |
| मुरारी | मुरा नामक दैत्य का संहार करने वाले, श्रीकृष्ण |
| पर्दा | आवरण, ओट, जो दर्शन में बाधा डालता है |
| सूरत प्यारी | प्रिय मुखाकृति, सुंदर चेहरा |
| शरण | आश्रय, रक्षा का स्थान |
| संवरिया | साँवले रंग वाले, श्रीकृष्ण का स्नेहिल संबोधन |
| रंगा हूँ तेरे रंग में | तुम्हारे प्रेम और भक्ति के रंग में रंगा हुआ हूँ |
| नज़रे मिला के | आँखों में आँखें डालकर, साक्षात्कार करके |
| संग में | साथ में |
| सेवा | सेवा, शुश्रूषा, भक्ति |
| पुजारी | पूजा करने वाला, भक्त |
| राज | रहस्य, गुप्त बातें |
| मोहन | मोहित करने वाले, श्रीकृष्ण |
| कामल कारी | काली कम्बल, जो श्रीकृष्ण ने ओढ़ी हुई है |
| रोग | व्याधि, यहाँ प्रेम की पीड़ा या विरह की अग्नि |
सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या
इस भजन का मूल भाव यह है कि भक्त भगवान को अपने अत्यंत निकट अनुभव करता है, लेकिन उनके दर्शन न होने पर व्याकुल हो जाता है। भक्त कहता है, "हे बांके बिहारी! आपने मुझे बुलाया, फिर क्यों छुप गए? यह पर्दा क्यों किया है?" यह पर्दा केवल भौतिक नहीं, बल्कि अज्ञानता का, माया का, और अहंकार का प्रतीक है जो भक्त और भगवान के बीच आ जाता है। भक्त अपनी ओर से पूर्ण समर्पण प्रकट करता है—"मैं तो तेरे रंग में रंगा हूँ", अर्थात् मैं पूरी तरह तुम्हारा हो चुका हूँ। वह भगवान से नज़रें मिलाने और साथ चलने की प्रार्थना करता है, और स्वयं को उनका पुजारी बताकर सेवा का वचन देता है।
आगे भक्त कहता है कि उसके दिल में कई राज छुपे हैं, जिन्हें वह भगवान को बताना चाहता है, क्योंकि भगवान तो उसके दिल में ही काली कम्बल ओढ़े विराजमान हैं। यहाँ "कामल कारी" का प्रयोग अत्यंत सुंदर है—भगवान बाहर नहीं, भीतर हैं, फिर भी दिखते नहीं। भक्त की विरह-व्यथा इतनी तीव्र है कि दुनिया उस पर हँसती है, और वह इसे भगवान द्वारा लगाया गया "रोग" कहता है—प्रेम का रोग, जो दिल को जलाता है। यह भजन भक्ति के उस उच्चतम भाव को दर्शाता है जहाँ भक्त भगवान से शिकायत करते हुए भी उन्हीं में लीन है। यह माधुर्य भक्ति की पराकाष्ठा है, जहाँ आत्मा परमात्मा से मिलन के लिए तड़पती है।
शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ
यह भजन ब्रज क्षेत्र की भक्ति परंपरा, विशेषकर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर से गहराई से जुड़ा हुआ है। बांके बिहारी स्वयं श्रीकृष्ण का वह स्वरूप हैं जो तिरछे (बांके) खड़े हैं, और जिनकी मूर्ति वृंदावन में प्रतिष्ठित है। यह मंदिर स्वामी हरिदास जी से जुड़ा है, जो श्रीकृष्ण के परम भक्त थे और जिन्होंने अपनी संगीत साधना से बांके बिहारी को प्रसन्न किया था। यह भजन उसी परंपरा का हिस्सा है जहाँ भक्त भगवान को "संवरिया", "मुरारी", "मोहन" जैसे नामों से पुकारता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन है, जहाँ वे गोपियों के साथ प्रेम और विरह के खेल रचते हैं। गोपियों की विरह-व्यथा इस भजन का मूल स्रोत है। इसके अतिरिक्त, सूरदास, मीराबाई, और रसखान जैसे भक्त कवियों ने भी श्रीकृष्ण के प्रति ऐसे ही भावों को व्यक्त किया है। यह भजन उसी भक्ति आंदोलन की देन है जिसने भगवान को "प्रियतम" और "सखा" के रूप में देखा। पौराणिक संदर्भ में, मुरारी नाम मुरा दैत्य के वध से जुड़ा है, जो श्रीकृष्ण की विजय और रक्षक स्वरूप को दर्शाता है। इस प्रकार, यह भजन शास्त्रीय, पौराणिक, और लोक भक्ति तीनों का संगम है।
दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व
दार्शनिक दृष्टि से, यह भजन द्वैत और अद्वैत के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। भक्त भगवान को अलग देखता है, इसलिए "पर्दा" की शिकायत करता है, लेकिन साथ ही कहता है "दिल में मेरे तुम रहते हो"—यह अद्वैत का बोध है। यह भजन बताता है कि भगवान और भक्त के बीच का पर्दा वास्तव में अज्ञानता, अहंकार, और माया के कारण है। जब भक्त "मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में" कहता है, तो वह अपने अहंकार का त्याग करता है और भगवान के रंग में रंग जाता है। यह समर्पण की पराकाष्ठा है। कर्म सिद्धांत के अनुसार, भक्त का यह प्रेम और विरह पिछले जन्मों के संस्कारों का फल है, और यह "रोग" वास्तव में भक्ति का रोग है जो मोक्ष की ओर ले जाता है। ध्यान की गहराई में, यह भजन साधक को उस अवस्था तक ले जाता है जहाँ वह भगवान के दर्शन के लिए तड़पता है, और यही तड़प उसे आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है। यह भजन बताता है कि भगवान को पाने के लिए केवल बुद्धि नहीं, बल्कि हृदय की भावना आवश्यक है। "सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी, बन के तेरा पुजारी" पंक्ति में सेवा और भक्ति का समन्वय है, जो कर्मयोग और भक्तियोग दोनों को समाहित करता है। इस प्रकार, यह भजन आध्यात्मिक साधक के लिए एक मार्गदर्शक है जो उसे प्रेम, समर्पण, और विरह के माध्यम से परमात्मा से मिलन कराता है।
दैनिक जीवन में इस रचना की उपयोगिता
विद्यार्थियों के लिए
विद्यार्थियों के लिए यह भजन एकाग्रता और धैर्य का पाठ पढ़ाता है। जब वे पढ़ाई में असफल होते हैं या मन भटकता है, तो यह भजन उन्हें सिखाता है कि जैसे भक्त भगवान के दर्शन के लिए व्याकुल है, वैसे ही उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए। "मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में" पंक्ति उन्हें अपने अध्ययन में पूर्ण तल्लीनता का संदेश देती है।
पेशेवरों के लिए
पेशेवर जीवन में यह भजन सिखाता है कि सफलता के लिए समर्पण और सेवा भाव आवश्यक है। "सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी, बन के तेरा पुजारी" पंक्ति कार्य के प्रति निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का प्रतीक है। यह भजन कार्यस्थल पर अहंकार त्यागने और टीम भावना से काम करने की प्रेरणा देता है।
मानसिक शांति के लिए
मानसिक तनाव और चिंता के समय यह भजन एक औषधि की तरह कार्य करता है। इसके भावपूर्ण गायन से मन शांत होता है और भगवान के प्रति समर्पण का भाव जागृत होता है। "ये पर्दा क्यों किया है" की पुकार मन की गहराइयों को छू लेती है और साधक को आंतरिक शांति प्रदान करती है।
परिवार और समाज के लिए
परिवार और समाज में यह भजन प्रेम, सहयोग, और सामंजस्य का संदेश देता है। जब परिवार के सदस्य साथ मिलकर इस भजन का गायन करते हैं, तो आपसी प्रेम और एकता बढ़ती है। यह भजन सिखाता है कि जैसे भक्त भगवान से मिलन चाहता है, वैसे ही हमें अपने परिवार और समाज से जुड़े रहना चाहिए।
साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त
इस भजन का पाठ करने का सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) या संध्या काल (सूर्यास्त के बाद) है। विशेष रूप से एकादशी, जन्माष्टमी, और राधाष्टमी के दिन इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। पाठ करने से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बांके बिहारी की मूर्ति या चित्र के समक्ष घी का दीपक और तुलसी दल अर्पित करें। इस भजन को 108 बार या 11 बार गाया जा सकता है। यदि संभव हो तो तुलसी की माला से जप करें। पाठ के दौरान मन को भगवान के चरणों में केंद्रित रखें और "ये पर्दा क्यों किया है" पंक्ति पर विशेष ध्यान दें। मान्यता है कि इस भजन के नियमित पाठ से भगवान के दर्शन की प्राप्ति होती है, मन की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं, और जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि आती है। साथ ही, यह भजन भक्ति भाव को जागृत करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: "बुला के हमको बांके बिहारी" भजन किसने लिखा है?
उत्तर: यह भजन पारंपरिक ब्रज भक्ति परंपरा का हिस्सा है और इसका श्रेय किसी एक विशिष्ट कवि को नहीं दिया जा सकता। यह पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से चला आ रहा है और विभिन्न भक्त गायकों द्वारा गाया जाता रहा है।
प्रश्न 2: इस भजन में "पर्दा" का क्या अर्थ है?
उत्तर: "पर्दा" यहाँ माया, अज्ञानता, और अहंकार का प्रतीक है जो भक्त और भगवान के बीच आ जाता है। भक्त भगवान से इस पर्दे को हटाने की प्रार्थना करता है ताकि वह उनके दर्शन कर सके।
प्रश्न 3: क्या इस भजन का पाठ करने से भगवान के दर्शन होते हैं?
उत्तर: यह भजन भक्ति भाव से गाया जाए तो भगवान के दर्शन की अनुभूति होती है। दर्शन केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होते हैं। जब भक्त का हृदय पूर्ण समर्पण से भर जाता है, तो भगवान उसके भीतर ही प्रकट होते हैं।
प्रश्न 4: इस भजन को गाने का सर्वोत्तम समय कौन सा है?
उत्तर: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4-6 बजे) और संध्या काल सर्वोत्तम है। एकादशी, जन्माष्टमी, और राधाष्टमी के दिन इसका विशेष महत्व है।
प्रश्न 5: क्या इस भजन को गाने के लिए किसी विशेष नियम का पालन करना आवश्यक है?
उत्तर: हाँ, पाठ से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें, और मन को एकाग्र रखें। तुलसी की माला का उपयोग करना शुभ माना जाता है।
प्रश्न 6: इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस भजन का मुख्य संदेश है कि भगवान प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण, प्रेम, और विरह की भावना आवश्यक है। भगवान भक्त के हृदय में ही निवास करते हैं, केवल अज्ञानता का पर्दा हटाना है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिकता
यह लेख भक्तिलोक.इन के वेदांत और भक्ति साहित्य के विशेषज्ञ संपादकीय दल द्वारा तैयार किया गया है। हमने इस भजन के मूल पाठ का संकलन पारंपरिक ब्रज भक्ति ग्रंथों, बांके बिहारी मंदिर की परंपरा, और प्रामाणिक भक्ति संग्रहों से किया है। भाषाई शुद्धता और भावार्थ की सटीकता के लिए हमने संस्कृत, ब्रजभाषा, और हिंदी के विद्वानों से परामर्श किया है। इस लेख का उद्देश्य भक्तों को इस भजन के गहरे आध्यात्मिक अर्थ से परिचित कराना और उनकी साधना में सहायता करना है। हम पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वे इस भजन को श्रद्धा और समर्पण भाव से गाएँ और इसके संदेश को अपने जीवन में उतारें। यदि आपके पास इस भजन के किसी अन्य प्रामाणिक संस्करण या व्याख्या के बारे में जानकारी हो, तो हमें अवश्य बताएँ।
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