"बुला के हमको बांके बिहारी" भजन भक्तों के दिल की गहराई को छूता है। यह पद श्री बांके बिहारी जी की दिव्य लीलाओं और उनके प्रति भक्त की तीव्र आकांक्षा का सजीव चित्रण है। इस भजन में भक्त अपने आराध्य से प्रश्न करता है कि हे मुरारी! तुमने मुझे बुलाकर भी अपने दर्शन क्यों नहीं दिए? यह पर्दा क्यों किया है? भक्त की व्याकुलता, समर्पण और प्रेम इस भजन की प्रत्येक पंक्ति में झलकता है। बांके बिहारी जी वृंदावन के प्रसिद्ध देवता हैं, जिनकी मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है और जिनके दर्शन मात्र से भक्तों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भजन भक्ति रस का अद्भुत संगम है, जिसमें शरणागति, वियोग, मिलन की आकांक्षा और आत्मसमर्पण की भावना समाहित है। भक्त कहता है कि मैं तो तेरे रंग में रंग चुका हूँ, अब तू मुझसे नज़रें मिला और मुझे अपने संग चल। यह भजन उन साधकों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है जो भगवान के प्रेम में डूबकर उन्हें पाना चाहते हैं।
मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ
बुला के हमको बांके बिहारी , छुप गए क्यों मुरारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है !
दिखा दो हमको सूरत प्यारी , आये शरण तुम्हारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है !!
ओ रे संवरिया मेरे, मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में , हा रंग में ,
मुझसे मिला के नज़रे , चल दो बिहारी मेरे संग में , हा संग में ,
सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी , बन के तेरा पुजारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है ,
ओ रे संवरिया मेरे, दिल में छुपे हैं कई राज रे, कई राज रे ,
कैसे बताऊ मोहन तुमको दिल की सारी बात रे , सारी बात रे,
दिल में मेरे तुम रहते हो , ओढ़ के कामल कारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है ,
हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग रे , सारे लोग रे ,
कैसा लगाया तुमने मुझको मुरारी ये रोग रे , ये रोग रे,
रोग ये दिल का तुमने लगाया , सुना के बंशी प्यारी ,
ये पर्दा क्यों किया है , ये पर्दा क्यों किया है !
पदच्छेद एवं अन्वय
इस भजन के प्रमुख पदों का पदच्छेद एवं अन्वय निम्नलिखित है:
पदच्छेद: बुला के = बुलाकर; हमको = हमें; बांके बिहारी = श्री बांके बिहारी जी; छुप गए = छिप गए; क्यों = किस कारण; मुरारी = श्री कृष्ण; ये = यह; पर्दा = आवरण, ओट; किया है = किया है; दिखा दो = दिखाइए; हमको = हमें; सूरत = मुखाकृति; प्यारी = प्रिय; आये = आए हैं; शरण = शरण में; तुम्हारी = आपकी; ओ रे = हे; संवरिया = श्यामवर्ण वाले; मेरे = मेरे; मैं = मैं; तो = तो; रंगा = रंगा हुआ; हूँ = हूँ; तेरे = तेरे; रंग = रंग; में = में; मुझसे = मुझसे; मिला के = मिलाकर; नज़रे = दृष्टि; चल दो = चलिए; बिहारी = श्री बांके बिहारी; मेरे = मेरे; संग = साथ; सेवा = सेवा; करूँगा = करूँगा; मैं = मैं; भी = भी; तुम्हारी = आपकी; बन के = बनकर; तेरा = तेरा; पुजारी = पुजारी; दिल = हृदय; में = में; छुपे = छिपे; हैं = हैं; कई = अनेक; राज = रहस्य; रे = हे; कैसे = किस प्रकार; बताऊ = बताऊँ; मोहन = श्री कृष्ण; तुमको = तुम्हें; दिल = हृदय; की = की; सारी = सब; बात = बातें; रे = हे; दिल = हृदय; में = में; मेरे = मेरे; तुम = तुम; रहते = रहते; हो = हो; ओढ़ के = ओढ़कर; कामल = कम्बल; कारी = काला; हँसने = हँसने; लगे = लगे; हैं = हैं; मुझपे = मुझ पर; दुनिया = संसार; के = के; सारे = सभी; लोग = लोग; रे = हे; कैसा = कैसा; लगाया = लगाया; तुमने = तुमने; मुझको = मुझे; मुरारी = श्री कृष्ण; ये = यह; रोग = रोग; रे = हे; रोग = रोग; ये = यह; दिल = हृदय; का = का; तुमने = तुमने; लगाया = लगाया; सुना के = सुनाकर; बंशी = बाँसुरी; प्यारी = प्रिय।
अन्वय: हे बांके बिहारी! हमको बुलाकर आप क्यों छिप गए? हे मुरारी! यह पर्दा क्यों किया है? हमें अपनी प्यारी सूरत दिखा दो, हम आपकी शरण में आए हैं। हे मेरे संवरिया! मैं तो तेरे रंग में रंगा हूँ, मुझसे नज़रें मिलाकर मेरे संग चलो। मैं भी तेरा पुजारी बनकर तुम्हारी सेवा करूँगा। हे संवरिया! दिल में कई राज छुपे हैं, हे मोहन! तुमको दिल की सारी बात कैसे बताऊँ? हे मुरारी! तुम मेरे दिल में काला कम्बल ओढ़कर रहते हो। दुनिया के सारे लोग मुझ पर हँसने लगे हैं, तुमने मुझको कैसा यह रोग लगाया है? यह दिल का रोग तुमने प्रिय बाँसुरी सुनाकर लगाया है। यह पर्दा क्यों किया है?
विस्तृत शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बुला के | बुलाकर, आह्वान करके |
| हमको | हमें |
| बांके बिहारी | श्री बांके बिहारी जी, श्री कृष्ण का एक प्रसिद्ध नाम |
| छुप गए | छिप गए, अदृश्य हो गए |
| क्यों | किस कारण से |
| मुरारी | मुर नामक असुर का संहार करने वाले, श्री कृष्ण |
| ये पर्दा | यह आवरण, यह ओट |
| किया है | किया है |
| दिखा दो | दर्शन कराओ |
| सूरत प्यारी | प्रिय मुखाकृति |
| शरण | शरणागति, आश्रय |
| संवरिया | श्यामवर्ण वाले, श्री कृष्ण |
| रंगा हूँ | रंगा हुआ हूँ, अनुरक्त हूँ |
| नज़रे | दृष्टि |
| संग | साथ |
| सेवा | सेवा, शुश्रूषा |
| पुजारी | पूजा करने वाला |
| राज | रहस्य |
| मोहन | मोहित करने वाले, श्री कृष्ण |
| कामल कारी | काला कम्बल |
| रोग | व्याधि, प्रेम की पीड़ा |
| बंशी | बाँसुरी |
सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या
यह भजन भक्त और भगवान के बीच के अटूट प्रेम संबंध को दर्शाता है। भक्त श्री बांके बिहारी जी को पुकारता है और कहता है कि हे प्रभु! आपने मुझे बुलाया, मैं आपकी शरण में आ गया, लेकिन आपने मुझसे मुख क्यों छिपा लिया? यह पर्दा क्यों किया है? भक्त की आँखें दर्शन के लिए व्याकुल हैं। वह कहता है कि हे मुरारी! मुझे अपनी प्यारी सूरत दिखाओ, मैं आपकी शरण में आया हूँ। भक्त अपने आप को भगवान के रंग में रंगा हुआ बताता है, अर्थात वह पूर्णतः समर्पित हो चुका है। वह कहता है कि हे संवरिया! अब तो मुझसे नज़रें मिलाओ और मेरे साथ चलो। मैं तुम्हारा पुजारी बनकर तुम्हारी सेवा करूँगा। भक्त के हृदय में अनेक रहस्य छुपे हैं, जिन्हें वह भगवान को बताना चाहता है। वह कहता है कि हे मोहन! तुम मेरे दिल में काला कम्बल ओढ़कर विराजमान हो, फिर भी तुम्हें दिल की बात कैसे बताऊँ? भक्त की दशा यह है कि दुनिया के सारे लोग उस पर हँसने लगे हैं, क्योंकि उसे प्रेम रोग लग गया है। यह रोग भगवान ने अपनी मधुर बाँसुरी सुनाकर लगाया है। भक्त इस रोग से पीड़ित है, लेकिन इसी रोग में उसे आनंद भी है। यह भजन वियोग श्रृंगार और मिलन की आकांक्षा का सुंदर उदाहरण है। भक्त भगवान से पर्दा हटाने की प्रार्थना करता है, ताकि वह उनके दर्शन कर सके और उनके साथ एक हो सके। यह भजन उस आत्मा की पुकार है जो परमात्मा से मिलन चाहती है।
शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ
यह भजन श्री बांके बिहारी जी को समर्पित है, जो वृंदावन के प्रसिद्ध देवता हैं। बांके बिहारी जी की मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है, जिसमें भगवान कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाते हुए खड़े हैं। यह मूर्ति स्वयं श्री कृष्ण के वंशज श्री स्वामी हरिदास जी को प्राप्त हुई थी। मान्यता है कि स्वामी हरिदास जी ने वृंदावन में निधिवन में घोर तपस्या की, तब श्री कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए और उनके साथ रहने का वरदान दिया। इस मूर्ति की स्थापना 1864 ईस्वी में बांके बिहारी मंदिर में की गई। यह भजन उसी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें भक्त भगवान को अपने हृदय में बसाकर उनसे मिलन की आकांक्षा करता है। पौराणिक संदर्भों में श्री कृष्ण को मुरारी कहा गया है, क्योंकि उन्होंने मुर नामक असुर का वध किया था। संवरिया शब्द उनके श्याम वर्ण को दर्शाता है। यह भजन भक्ति आंदोलन के समय की रचना प्रतीत होती है, जब संतों ने भगवान को मानवीय भावनाओं से जोड़कर भक्ति को सरल और सुलभ बनाया। इस भजन में वियोग श्रृंगार की भावना प्रधान है, जो सूरदास, मीराबाई और रसखान की रचनाओं में भी देखने को मिलती है। बांके बिहारी जी के दर्शन मात्र से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और उन्हें परमानंद की प्राप्ति होती है। यह भजन उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है।
दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व
इस भजन का दार्शनिक महत्व अत्यंत गहन है। यह भजन अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है, जहाँ जीव और ब्रह्म के बीच कोई भेद नहीं है। भक्त जब कहता है कि मैं तो तेरे रंग में रंगा हूँ, तो वह अपने अहंकार का त्याग करके भगवान में विलीन हो जाता है। यह समर्पण की पराकाष्ठा है। पर्दा शब्द यहाँ अज्ञानता का प्रतीक है, जो जीव को ब्रह्म से अलग करती है। भक्त प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! यह अज्ञान का पर्दा हटाओ, ताकि मैं तुम्हें पहचान सकूँ। यह भजन कर्म सिद्धांत को भी दर्शाता है, जहाँ भक्त अपने कर्मों को भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है। प्रेम रोग का उल्लेख यहाँ भक्ति रस की पराकाष्ठा है, जिसमें भक्त भगवान के प्रेम में इतना डूब जाता है कि उसे संसार की परवाह नहीं रहती। यह भजन ध्यान और साधना का मार्ग भी प्रशस्त करता है। जब भक्त बार-बार पर्दा हटाने की प्रार्थना करता है, तो वह अपने भीतर के अंधकार को दूर करने की कोशिश करता है। यह भजन आत्मा की परमात्मा से मिलन की व्याकुलता है, जो हर जीव के हृदय में विद्यमान है। इसका आध्यात्मिक महत्व यह है कि भक्ति केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि हृदय की गहराई से निकली पुकार है। यह भजन साधक को आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करता है और उसे भगवान के प्रेम में डूबने का साहस देता है।
दैनिक जीवन में इस रचना की उपयोगिता
विद्यार्थियों के लिए
विद्यार्थियों के लिए यह भजन एकाग्रता और धैर्य का पाठ सिखाता है। जब विद्यार्थी पढ़ाई में मन नहीं लगता, तो वे इस भजन को सुनकर अपने मन को शांत कर सकते हैं। यह भजन उन्हें सिखाता है कि जिस प्रकार भक्त भगवान के दर्शन के लिए व्याकुल है, उसी प्रकार विद्यार्थी को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए।
पेशेवरों के लिए
पेशेवर जीवन में तनाव और प्रतिस्पर्धा आम है। यह भजन पेशेवरों को सिखाता है कि अपने कार्य को भगवान को समर्पित करके करें। जब वे कार्य को सेवा भाव से करेंगे, तो सफलता स्वतः मिलेगी। यह भजन उन्हें अहंकार त्यागने और टीम भावना से काम करने की प्रेरणा देता है।
मानसिक शांति के लिए
मानसिक शांति के लिए यह भजन अमृत के समान है। जब मन अशांत हो, तो इस भजन को सुनने से मन को शांति मिलती है। यह भजन ध्यान और जप के लिए उत्तम है। इसके नियमित श्रवण से चिंता, भय और अवसाद दूर होते हैं।
परिवार और समाज के लिए
परिवार और समाज में प्रेम और सद्भाव बनाए रखने के लिए यह भजन प्रेरणा देता है। जब परिवार के सदस्य मिलकर इस भजन का गायन करते हैं, तो आपसी कलह दूर होती है और प्रेम बढ़ता है। समाज में भी यह भजन सामूहिक भक्ति का माध्यम बन सकता है।
साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त
इस भजन का पाठ करने के लिए सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। श्री बांके बिहारी जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक और धूप जलाएँ। तुलसी के पत्ते और पीले फूल अर्पित करें। 108 दानों की माला से इस भजन का 108 बार जाप करें। यदि संभव हो तो एकासन होकर पाठ करें। सोमवार और एकादशी का दिन इस भजन के लिए विशेष शुभ है। पाठ के दौरान मन को भगवान के चरणों में केंद्रित रखें। पाठ के बाद आरती करें और प्रसाद वितरित करें। इस भजन के नियमित पाठ से भक्त को भगवान के दर्शन की प्राप्ति होती है, मन की शांति मिलती है, और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। यह भजन भक्ति और मुक्ति का साधन है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: यह भजन किस देवता को समर्पित है?
उत्तर: यह भजन श्री बांके बिहारी जी को समर्पित है, जो श्री कृष्ण का ही एक रूप हैं और वृंदावन में विराजमान हैं।
प्रश्न 2: इस भजन का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर: इस भजन का मुख्य भाव भक्त की भगवान के प्रति तीव्र आकांक्षा, समर्पण और मिलन की व्याकुलता है।
प्रश्न 3: क्या इस भजन का पाठ घर पर कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ, इस भजन का पाठ घर पर शुद्धता और श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।
प्रश्न 4: इस भजन के पाठ का क्या लाभ है?
उत्तर: इस भजन के पाठ से मानसिक शांति, भक्ति में वृद्धि, और भगवान के दर्शन की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 5: इस भजन को किसने लिखा है?
उत्तर: यह भजन पारंपरिक भक्ति गीत है, जिसे विभिन्न संतों और भक्तों ने अपनी रचनाओं में शामिल किया है। इसका मूल स्रोत लोक परंपरा है।
प्रश्न 6: क्या इस भजन को गाने के लिए किसी विशेष माला की आवश्यकता है?
उत्तर: तुलसी या कमलगट्टे की माला से इस भजन का जाप किया जा सकता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिकता
यह लेख भक्तिलोक.इन के संपादकीय दल द्वारा तैयार किया गया है। हमने इस भजन के मूल पाठ, उसके शब्दार्थ, दार्शनिक महत्व और साधना विधि को प्रामाणिक स्रोतों से संकलित किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और सटीक जानकारी प्रदान करना है। इस लेख में दी गई जानकारी शास्त्रीय ग्रंथों, संत परंपराओं और प्रमाणित भक्ति साहित्य पर आधारित है। हम पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वे इस भजन का पाठ श्रद्धा और समर्पण भाव से करें। यदि आपको इस लेख में कोई त्रुटि मिले, तो हमें सूचित करें। हम निरंतर अपने सामग्री की गुणवत्ता और प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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