भगवान श्री गणेश, जिन्हें हम विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति और प्रथम पूज्य के रूप में जानते हैं, उनकी आराधना का यह भजन "संकट हरलो मंगल करदो" (Sankat Harlo Mangal Kardo) भक्तों के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है। यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक भक्त की अपने आराध्य के प्रति अटूट श्रद्धा, पूर्ण समर्पण और करुणा भरी पुकार है। जब जीवन में दुखों के बादल छा जाते हैं और विश्वास की डोरी कमजोर पड़ने लगती है, तब यह भजन भक्त को संबल प्रदान करता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, दार्शनिक संदेश और श्री गणेश की महिमा का विस्तार से वर्णन करेंगे। यह भजन विशेष रूप से गणेश चतुर्थी, बुधवार की पूजा और किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में गाया जाता है ताकि जीवन से अमंगल दूर हो और सुख-समृद्धि का आगमन हो।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ संकट हरलो मंगल करदो ॥
मुखड़ा:
संकट हरलो मंगल करदो,
प्यारे शिव गौरा के लाल।
अब विनती सुनलो गणपति देवा,
संकट हरलो मंगल करदो॥
अंतरा 1:
हे गणनायक देव गजानन,
मूषक चढ़कर आओ।
हाथ जोड़कर द्वार खड़े हैं,
अब ना देर लगाओ।
गजानन जल्दी से तुम आओ,
आ कर के अपने भक्तों का,
तुम जान लो दिल का हाल।
अब विनती सुनलो गणपति देवा,
संकट हरलो मंगल करदो॥
अंतरा 2:
तुमको ना बतलाएं तो हम,
अपनी किसे बताएं।
तुम ही बता दो सिद्धि विनायक,
किसके द्वार पे जाएं।
बताओ किसको अपनी सुनाएं,
दुःख के बादल ने घेरा हमें,
संकट का फैला जाल।
अब विनती सुनलो गणपति देवा,
संकट हरलो मंगल करदो॥
अंतरा 3:
संकटहर्ता संकट काटो,
चारों तरफ तेरा राज।
कर दो अब खुशियों की वर्षा,
हे गणपति महाराज।
हमारे पूरण कर दो काज,
सबके पूरण तुम काम करो,
जग में है तेरी मिसाल।
अब विनती सुनलो गणपति देवा,
संकट हरलो मंगल करदो॥
अंतरा 4:
टूट रही है आस की डोरी,
डोल रहा विश्वास।
अब तो हमें तुम अपनी दया का,
दे दो प्रभु प्रसाद।
कहीं अब टूट ना जाए आस,
जैसे भी हो अब तो तुमको,
देवा करना है कमाल।
अब विनती सुनलो गणपति देवा,
संकट हरलो मंगल करदो॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन "विनय" और "शरणागति" के भाव से ओत-प्रोत है। इसमें भक्त भगवान गणेश को उनके माता-पिता (शिव और पार्वती) के संदर्भ से संबोधित करते हुए अपने जीवन के कष्टों को दूर करने की प्रार्थना कर रहा है।
प्रथम भाव: भजन की शुरुआत में ही गणेश जी को 'संकटहर्ता' और 'मंगलकर्ता' कहा गया है। भारतीय संस्कृति में गणेश जी का स्वरूप ही ऐसा है जो अमंगल को नष्ट कर मंगल का संचार करता है। भक्त कहता है कि हे शिव-गौरी के लाडले पुत्र, मेरी प्रार्थना स्वीकार करें और मेरे जीवन के सभी संकटों को हर लें।
द्वितीय भाव: भक्त भगवान को उनके वाहन 'मूषक' पर सवार होकर शीघ्र आने का निमंत्रण देता है। यहाँ 'हाथ जोड़कर द्वार खड़े हैं' पंक्ति भक्त की विनम्रता और धैर्य को दर्शाती है। वह चाहता है कि भगवान उसके हृदय की पीड़ा को स्वयं आकर समझें।
तृतीय भाव: इस संसार में जब व्यक्ति चारों ओर से समस्याओं से घिर जाता है, तो उसे केवल ईश्वर का ही सहारा दिखता है। भक्त कहता है कि यदि मैं आपको अपनी व्यथा नहीं सुनाऊंगा, तो और किसके पास जाऊंगा? 'दुःख के बादल' और 'संकट का जाल' सांसारिक मोह-माया और कठिनाइयों के प्रतीक हैं, जिनसे केवल 'सिद्धि विनायक' ही मुक्ति दिला सकते हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन श्री गणेश की स्तुति का एक सरल माध्यम है, जिसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- सरलता: इस भजन की भाषा अत्यंत सरल और सुबोध है, जिससे कोई भी सामान्य भक्त इसे आसानी से गा सकता है।
- समर्पण भाव: इसमें भक्त का पूर्ण समर्पण झलकता है, जहाँ वह स्वीकार करता है कि उसके पास भगवान के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
- विघ्न विनाशक शक्ति: भजन में गणेश जी की उस शक्ति का गुणगान है जो बड़े से बड़े संकट के जाल को काटने में सक्षम है।
- सांस्कृतिक जुड़ाव: यह भजन उत्तर भारत के मंदिरों और घरों में होने वाले गणेश उत्सवों का अभिन्न हिस्सा है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भजन का प्रभाव तब और बढ़ जाता है जब इसे सही समय और विधि के साथ गाया जाए:
- शुभ मुहूर्त: बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित है, अतः इस दिन सुबह या शाम को यह भजन गाना अत्यंत फलदायी होता है।
- गणेश चतुर्थी: गणेशोत्सव के दौरान प्रतिदिन इस भजन का संकीर्तन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- पूजा विधि: शुद्ध होकर, गणेश जी की प्रतिमा के सम्मुख दीपक जलाकर, दूर्वा और मोदक अर्पित करने के बाद शांत मन से इस भजन का गायन करना चाहिए।
- सामूहिक संकीर्तन: सत्संग या कीर्तन मंडली में ढोलक और मंजीरे के साथ इस भजन को गाने से भक्ति का वातावरण निर्मित होता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में भगवान श्री गणेश हैं। गणेश जी को वेदों में 'ब्रह्मणस्पति' कहा गया है। वे बुद्धि के अधिष्ठाता देव हैं। भजन में उन्हें 'शिव-गौरा के लाल' कहकर संबोधित किया गया है, जो उनके दिव्य परिवार और उनकी उत्पत्ति की पवित्रता को दर्शाता है। यद्यपि यह भजन पारंपरिक लोक भक्ति धारा से प्रेरित है, लेकिन इसका भाव गोस्वामी तुलसीदास और संत कबीर की 'विनय' परंपरा से मेल खाता है, जहाँ भक्त अपनी असमर्थता प्रकट कर ईश्वर की कृपा की याचना करता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
भजन की भाषा खड़ी बोली हिंदी है जिसमें भक्ति रस के शब्दों का सुंदर समावेश है। इसकी काव्य शैली 'पद' शैली के निकट है।
- रूपक अलंकार: 'दुःख के बादल' और 'संकट का जाल' में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है, जो जीवन की समस्याओं की गंभीरता को दर्शाता है।
- प्रतीकात्मकता: 'आस की डोरी' और 'विश्वास का डोलना' मानवीय मन की अस्थिरता और ईश्वर पर निर्भरता का प्रतीक है।
- लयबद्धता: भजन का मुखड़ा और अंतरा एक निश्चित लय में बंधे हैं, जो इसे गेय (गाने योग्य) बनाते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द | सरल अर्थ | संदर्भ/महत्व |
|---|---|---|
| गणनायक | गणों के स्वामी | शिव के गणों के अधिपति |
| गजानन | गज (हाथी) के समान मुख वाले | बुद्धि और विशालता का प्रतीक |
| सिद्धि विनायक | सफलता देने वाले | कार्यों को सिद्ध करने वाले देव |
| संकटहर्ता | कष्टों को हरने वाले | विघ्नों का नाश करने वाले |
| मंगल | शुभ/कल्याणकारी | जीवन में शुभता लाने वाले |
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message
यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पाठ पढ़ाता है:
- धैर्य और विश्वास: जब 'आस की डोरी' टूटने लगे, तब भी ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना ही सच्ची भक्ति है।
- अहंकार का त्याग: 'हाथ जोड़कर द्वार खड़े हैं' यह दर्शाता है कि ईश्वर के सामने हमें अपने अहंकार को त्याग कर विनम्र होना चाहिए।
- ईश्वर ही अंतिम आश्रय: संसार के लोग साथ छोड़ सकते हैं, लेकिन 'सिद्धि विनायक' कभी अपने भक्त का हाथ नहीं छोड़ते।
- प्रार्थना की शक्ति: सच्ची पुकार और विनती में इतनी शक्ति होती है कि वह भगवान को भक्त के द्वार तक आने पर विवश कर देती है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
भजन के साथ इन मंत्रों का जाप करने से गणेश जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
ॐ गं गणपतये नमः
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | संकट हरलो मंगल करदो |
| मुख्य देवता | भगवान श्री गणेश |
| विषय | विघ्न विनाश और मंगल कामना |
| भाषा | हिंदी |
| भक्ति भाव | विनय और शरणागति (Surrender) |
| उपयुक्त अवसर | गणेश चतुर्थी, बुधवार, गृह प्रवेश, शुभ कार्य |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तिलोक के विद्वानों द्वारा धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक भक्ति गीतों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। सामग्री की शुद्धता और प्रामाणिकता का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि पाठकों को सही आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्री गणेश पुराण एवं मुद्गल पुराण
- पारंपरिक गणेश भजन संग्रह
- भक्ति साहित्य और संकीर्तन परंपरा
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