भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

तु राजा की राज दुलारी में सर्फ लगोटे आला सु (too raaja kee raaj dulaaree mein sarf lagote ala su lyrics in hindi) - लिरिक्स

तु राजा की राज दुलारी में सर्फ लगोटे आला सु भजन के संपूर्ण लिरिक्स, शिव-पार्वती संवाद और भावार्थ पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित।

शिव-पार्वती संवाद भजन

तु राजा की राज दुलारी में सर्फ लगोटे आला सु (Too Raaja Kee Raaj Dulaaree Mein Sarf Lagote Ala Su) - सम्पूर्ण लिरिक्स एवं भावार्थ

भारतीय लोक संगीत और भक्ति परंपरा में शिव-पार्वती का संवाद हमेशा से भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहा है। हरियाणवी और उत्तर भारतीय लोक संस्कृति की लोक-गायन शैली में रचित यह अनूठा भजन (लोक भजन संग्रह) भगवान शिव के वैरागी स्वरूप और माता पार्वती के राजसी वैभव के बीच के अत्यंत सुंदर, हास्य-विनोदपूर्ण और दार्शनिक संवाद को प्रस्तुत करता है। इस भजन में महादेव के अघोरी, दिगंबर और मस्त-मौला स्वरूप का सजीव चित्रण किया गया है, जहाँ वे माता पार्वती को अपनी फक्कड़ और अलौकिक जीवनशैली से अवगत कराते हैं। भक्तलोक (Bhaktilok) के इस विस्तृत आलेख में हम इस लोकप्रिय भजन के संपूर्ण बोल, इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ, और इसके अंतर्निहित दार्शनिक संदेश को समझेंगे।

अपडेटेड वर्ष: 2025
श्रेणी: शिव भजन / लोक परंपरा
भाषा: हरियाणवी मिश्रित हिंदी

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

तु राजा की राज दुलारी में सर्फ लगोटे आला सु, भांग रगड के पिआ करू में कुण्डी सौटै आला सु। में अवधुत दर्शीनी बाबा राग देख के डर जागी, सौ सौ नाग रहे गल में तु नाग देख के डर जागी, में राख घोल के पिआ करू मेरा भाग देख के डर जागी, धरती उपर सोया करु मेरी सहत देख के डर जागी, एक कमण्डल एक कटोरा में फुटे लोटे आला सु, भांग रगड के पिआ करू में कुण्डी सौटै आला सु।। तेरे सौ सौ दासी दास रहे मेरे एक भी दासी दास नही, महला आला सुख चहिए अडे संतरज चौपड तास नही, तु बागा की कोयल से अडे बर्फ पडे हरि घास नही, साल दुसाले मांगेगी मेरे कम्बल तक भी पास नही, तु साहुकार गुजारे आली मे बिल्कुल टोटे आला सु, भांग रगड के पिआ करू में कुण्डी सौटै आला सु।। तु पालकियां में सैर करे में पैदल सवारी करया करु, तु महलो मे रहने वाली में बिन घरबारी रहया करु, प्रर्वत उपर लगा समाधी मे अटल अटारी रहया करू, तैने बडिया भोजन मिले खान ने में पेट पुजारी रहया करु, तैने बदडा चाहिए जुल्मों वाल मे लम्बे चौटे आला सु, भांग रगड के पिआ करू में कुण्डी सौटै आला सु।। मे कहरा सु पार्वती तैने बह्या करवाना ठीक नहीं, मेरे संग मे बच्चों आला खेल खिलाना ठीक नहीं, में भांग रगड के पिआ करू मैने तैल पिलाना ठीक नहीं, मेरी जटा मे गंग बहे मैने महावर लगाना ठीक नहीं, तेरी मेरी बणे ना जोड़ी में फक्कड़ मौजी आला सु, भांग रगड के पिआ करू में कुण्डी सौटै आला सु।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन की पंक्तियाँ भगवान शिव और माता पार्वती के बीच के वैवाहिक जीवन के उस यथार्थ को हास्य और दर्शन के माध्यम से उजागर करती हैं जहाँ एक ओर हिमवान की राजकन्या पार्वती हैं जो महलों के सुख, वैभव और राजसी परिवेश में पली-बढ़ी हैं, तो दूसरी ओर कैलाशपति महादेव हैं जो ब्रह्मांड के स्वामी होते हुए भी एक परम वैरागी, अघोरी और फक्कड़ की भांति जीवन जीते हैं।

मखड़े में महादेव स्पष्ट कहते हैं कि हे पार्वती! तू राजा हिमालय की राजदुलारी पुत्री है और मैं मात्र एक लगोटी पहनने वाला अघोरी बाबा हूँ। मैं भांग को कुंडी-सोटे में घोंटकर पीने वाला हूँ। महादेव अपने भयंकर स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मेरे गले में सैकड़ों नाग लिपटे रहते हैं, मेरा शरीर चिता की भस्म से लिपटा रहता है और मैं धरती पर ही सोता हूँ। मेरे पास सोने के महल या दासी-दास नहीं हैं, बल्कि एक टूटा हुआ कमंडल और कटोरा ही मेरी कुल संपत्ति है।

आगे महादेव माता पार्वती को समझाते हैं कि कहाँ तू कोमल बंशी की कोयल जैसी और कहाँ मेरा यह रूखा-सूखा कैलाश पर्वत जहाँ बर्फ जमी रहती है। तेरे पास साल-दुसाले और रेशमी वस्त्र हैं, जबकि मेरे पास ओढ़ने के लिए एक साधारण सा कंबल भी ठीक से नहीं है। अंत में महादेव प्रेमपूर्वक पार्वती जी से कहते हैं कि हे पार्वती! मेरे साथ तेरा यह ब्याह व्यावहारिक रूप से मेल नहीं खाता, क्योंकि मेरी फक्कड़ और मस्त-मौला जीवनशैली तेरे राजसी स्वभाव से सर्वथा भिन्न है। यह भजन बाहरी भौतिक सुखों और आंतरिक आध्यात्मिक संतुष्टि के बीच के सुंदर अंतर को दर्शाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • शिव-पार्वती का घरेलू व दार्शनिक संवाद: यह भजन देवर्षि और लोककथाओं की परंपरा से प्रेरित होकर शिव-पार्वती के प्रेम और वैराग्य के संतुलन को बेहद सहज भाषा में प्रस्तुत करता है।
  • लोक शैली का अनूठा प्रयोग: हरियाणवी लोक संगीत और रागिनी शैली में रचे जाने के कारण यह जन-जन के हृदय को तुरंत स्पर्श करता है।
  • वैराग्य और त्याग का संदेश: यह सिखाता है कि भौतिक सुख-सुविधाएं आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य नहीं हैं; असली आनंद आंतरिक संतोष में है।
  • भक्ति में सहजता: भगवान शिव के अलौकिक और डरावने कहे जाने वाले स्वरूप को भी भक्त कितने अपनेपन से अपनाते हैं, यह इस भजन का मुख्य भाव है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस प्रकार के लोक भजनों और स्वांग/रागिनी शैली के गीतों को विशेष अवसरों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, रात्रि जागरण, और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर अत्यंत उत्साह के साथ गाया जाता है।

  • अवसर: महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत, सावन मास के सोमवार, या ग्रामीण एवं सांस्कृतिक संकीर्तन संध्या।
  • वाद्य यंत्र: ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा, और चिमटा इस भजन की लय को और अधिक जीवंत बनाते हैं।
  • मानसिक स्थिति: इसे गाते समय और सुनते समय चेहरे पर हल्की मुस्कान और शिव के प्रति अगाध प्रेम का भाव होना चाहिए, क्योंकि यह भजन भक्ति के साथ-साथ हास्य रस का भी अनूठा मिश्रण है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के मुख्य आराध्य भगवान शिव (महादेव) और माता पार्वती हैं। शिवजी को वेदों में 'रुद्र' और 'भोलेनाथ' कहा गया है जो अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होने वाले और संसार के समस्त बंधनों से मुक्त अघोरी हैं। वहीं माता पार्वती शक्ति, प्रकृति और गृहस्थ जीवन की अधिष्ठात्री देवी हैं। लोक कवियों और स्वांग कलाकारों (जैसे लख्मीचंद या अन्य पारंपरिक लोक कलाकारों) ने इन दोनों दिव्य स्वरूपों के माध्यम से दांपत्य जीवन के यथार्थ और वैराग्य की महिमा का अद्भुत गुणगान किया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन मुख्य रूप से हरियाणवी और उत्तर भारतीय लोक भाषा (खड़ी बोली व ब्रज के प्रभावयुक्त) में रचित है। इसकी काव्य शैली 'रागिनी' या 'लोक-गीत' शैली है। इसमें ग्रामीण परिवेश के बिंबों (जैसे कुंडी-सोटा, कमंडल, टूटा लोटा, ताश-चौपड़, बागा की कोयल, साल-दुसाला) का बहुत ही सजीव और यथार्थवादी उपयोग किया गया है, जो श्रोताओं को अपनी मिट्टी से जोड़ता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • भौतिकता से परित्याग: सच्ची शांति महलों और ऐशो-आराम में नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और संतोष में है।
  • प्रेम की सर्वोच्चता: जहाँ एक ओर शिव का वैराग्य है और दूसरी ओर पार्वती का राजसी जीवन, फिर भी दोनों का प्रेम ब्रह्मांड का सबसे बड़ा आदर्श है, जो सिखाता है कि प्रेम भिन्नताओं से परे होता है।
  • सरलता और सहजता: महादेव का फक्कड़पन हमें यह सिखाता है कि जीवन में दिखावे से दूर रहकर सहज और प्राकृतिक रूप से जीना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पंक्ति सरल अर्थ सांस्कृतिक / आध्यात्मिक संदर्भ
सर्फ लगोटे आला सु केवल लगोटी धारण करने वाला महादेव का अत्यंत सरल और अघोरी वेश
कुण्डी सौटै आला भांग पीसने के उपकरण (कुंडी-घोटना) वाला शिव की मस्ती और नशा-मुक्ति का लोक प्रतीक
अवधुत दर्शीनी भेष बदलने वाला या मस्त मौला अघोरी सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त संत स्वभाव
टोटे आला कमी या घाटे में रहने वाला / निर्धन सांसारिक धन-दौलत से विरक्त होने की स्थिति
पेट पुजारी केवल भोजन या सामान्य निर्वाह चाहने वाला भोग-विलास से दूर साधारण जीवन

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम तु राजा की राज दुलारी में सर्फ लगोटे आला सु (Too Raaja Kee Raaj Dulaaree)
मुख्य आराध्य भगवान शिव एवं माता पार्वती
संगीत शैली हरियाणवी लोकगीत / रागिनी परंपरा
भाषा हरियाणवी मिश्रित हिंदी
प्रमुख भाव हास्य-विनोद, वैराग्य, प्रेम एवं दांपत्य संवाद
उपयुक्त अवसर महाशिवरात्रि, जागरण, लोक संगीत उत्सव

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन उत्तर भारतीय लोक संगीत, विशेषकर हरियाणवी लोक-गायन और रागिनी परंपरा के अंतर्गत आता है, जो शिव और पार्वती के संवाद पर आधारित है।

इस भजन में भगवान शिव अपने फक्कड़, अघोरी, दिगंबर और मस्त-मौला स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, जिनके पास कोई महल या दासी-दास नहीं हैं, बल्कि वे भस्म रमाते हैं और भांग पीते हैं।

माता पार्वती को "राजा की राज दुलारी" और महलों में रहने वाली कोमल स्वभाव की देवी के रूप में संबोधित किया गया है जो सभी सुख-सुविधाओं से संपन्न हैं।

इसे महाशिवरात्रि, रात्रि जागरण, लोक संगीत कार्यक्रमों और सांस्कृतिक मंचों पर शिव भक्तों द्वारा आनंद और उल्लास के साथ गाया जाता है।

यह भजन सिखाता है कि सच्चा प्रेम भौतिकता से परे होता है और जीवन में सादगी तथा आंतरिक संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

हाँ, यद्यपि इसमें हल्की-फुल्की नोक-झोक और विरोधाभास दिखाया गया है, लेकिन यह उनके बीच के अनूठे और अटूट प्रेम तथा सामंजस्य को ही प्रदर्शित करता है।

कुंडी-सोटा पारंपरिक पत्थर का बर्तन और घोटना है जिसका उपयोग ठंडाई या भांग पीसने के लिए किया जाता है।

आप भक्तलोक वेबसाइट के भजन अनुभाग में जाकर शिव तांडव स्तोत्र और अन्य लोकप्रिय शिव भजनों के लिरिक्स पढ़ सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री लोक परंपराओं, पारंपरिक मौखिक कथाओं और क्षेत्रीय संगीत के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों तक भारतीय लोक-संस्कृति और शिव भक्ति के विविध रूपों को प्रामाणिक रूप से पहुंचाना है। यदि आपके पास इस भजन का कोई अन्य पारंपरिक संस्करण या सुझाव है, तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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