परिचय एवं भक्ति भाव
सनातन धर्म में आदिशक्ति माँ दुर्गा की उपासना का विशेष स्थान है। नवरात्रि हो या किसी भी मंगलवार एवं शुक्रवार की पावन बेला, माता के दरबार में होने वाले संकीर्तन और जागरण में 'सज धज कर बैठी (Saj Dhaj Kar Baithi Maa Lyrics in Hindi)' जैसे मधुर और मनमोहक भजन विशेष रूप से गाए जाते हैं। यह भजन माता के अलौकिक श्रृंगार, उनके सोलह श्रृंगार से सजे दिव्य स्वरूप और भक्तों के हृदय में उनके प्रति उमड़ने वाले वात्सल्य और प्रेम का एक अत्यंत सुंदर जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है। इस भजन का मुख्य भाव 'नजर उतारने' (बूरी नजर से रक्षा की प्रार्थना) और माँ के प्रति अनन्य वात्सल्य का है, जहाँ भक्त अपनी आराध्य को एक छोटी बालिका या अपनी पुत्री और जगत जननी दोनों रूपों में देखता है। लोक-संस्कृति और पारंपरिक भक्ति संगीत की यह अनमोल कृति श्रोताओं के मन को शांति, आनंद और अगाध आस्था से भर देती है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
सज धज कर बैठी (Saj Dhaj Kar Baithi Maa Lyrics in Hindi)
साज़ धज कर बैठी माँ,
और मन्द मन्द मुस्काए।
आओ नज़र उतारें मैया की,
मेरी माँ को नज़र न लग जाय।
कोई काजल डिब्बी ले आओ,
मेरी माँ को टीका लगा जाओ।
मेरी प्यारी प्यारी मैया को,
भगतो की नज़र ना लग जाय..
जब मैया चलती पग रख कर,
पैरो के घुंघरू बोल रहे।
इस सुंदर सुंदर पायल को,
कंजकों की नज़र ना लग जाये..
मेरी माँ का मुखड़ा भोला हैं,
चुनरी मे चंदा लिपटा हैं।
इस सोने सोने मुखड़े को,
चंदा की नज़र न लग जाय..
मेरी माँ की लीला न्यारी हैं,
तेरी सुंदर शेर सवारी हैं।
इस जग की पालन हारी को,
कही खुद की नज़र ना लग जय..
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह एक भक्त और भगवान के बीच के आत्मीय और पारिवारिक संबंध की पराकाष्ठा है। भजन की पंक्तियों में भक्त माता के श्रृंगार का वर्णन करते हुए कहता है कि माँ जब सोलह श्रृंगार करके अपने सिंहासन पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए विराजमान होती हैं, तो उनका वह रूप इतना सम्मोहक और सुंदर होता है कि हर देखने वाले के मन में यह विचार आता है कि कहीं मेरी ही प्यारी मैया को किसी की बुरी नजर न लग जाए। भारतीय संस्कृति में नजर उतारने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है, जो अगाध प्रेम और सुरक्षा के भाव को दर्शाती है।
भक्त आगे कहता है कि कोई काजल की डिब्बी ले आओ जिससे मैया के कपोलों पर एक काला टीका लगाया जा सके। जब मैया अपने चरणों में पायल पहनकर चलती हैं और उनके पैरों के घुंघरू झनकार करते हैं, तो वह संगीत पूरे ब्रह्मांड को आनंदित कर देता है। माता का मुखड़ा चंद्रमा के समान भोला और शीतल है, और उनकी चुनरी में मानो चाँदस्वयं लिपटा हुआ है। अंत में कवि और भक्त यह स्वीकार करते हैं कि यह संपूर्ण जगत की पालनहारी हैं, जो सिंह पर सवार होकर भक्तों के सभी संकटों का नाश करती हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह लोक-भजन भारतीय ग्रामीण और नगरीय दोनों ही संस्कृतियों में समान रूप से लोकप्रिय है। इसकी भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और लोक-भाषा के निकट है, जिससे सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी इसे आसानी से गा और समझ सकता है। इस भजन का मुख्य महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में निहित है:
- वात्सल्य भाव की प्रधानता: इसमें केवल भय या ऐश्वर्य का भाव नहीं, बल्कि माँ के प्रति अनन्य वात्सल्य और अपनत्व का भाव झलकता है।
- नजर उतारने की परंपरा: भारतीय लोक-जीवन की सुंदर परंपरा 'नजर उतारना' इस भजन का केंद्रीय विषय है, जो भक्त के गहन प्रेम को दर्शाता है।
- सरल और संगीतमय रचना: इसकी लय इतनी कर्णप्रिय है कि ढोलक और मंजीरे की थाप पर इसे आसानी से गाया जा सकता है।
- मानसिक शांति: इस प्रकार के संकीर्तन के श्रवण से मन का तनाव दूर होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पावन भजन को किसी भी समय गाया जा सकता है, परंतु इसकी प्रासंगिकता निम्नलिखित अवसरों पर और अधिक बढ़ जाती है:
- माता के जागरण और चौकी में: रात्रि कालीन जागरण के समय जब माता का दरबार सजता है, तब इस भजन को मुख्य रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
- नवरात्रि के पावन दिनों में: शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा की आराधना के समय।
- शुक्रवार की पूजा में: माता संतोषी या महालक्ष्मी की पूजा एवं व्रत के दौरान।
- पारिवारिक अनुष्ठानों में: मुंडन, गृह प्रवेश या कन्या पूजन (कंजकों) के विशेष अवसरों पर।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मूल रूप से जगत जननी आदिशक्ति, महामाया, माँ दुर्गा, शेरावाली और अम्बे माँ को समर्पित है। सनातन धर्म में आदि शक्ति को ही इस संपूर्ण चराचर जगत की माता माना गया है। श्री दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती में भी माँ के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन और उनके सौंदर्य का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह लोक-रचना किसी एक संत विशेष के नाम से तो नहीं, बल्कि पारंपरिक लोक-साहित्य और भजन परंपरा का हिस्सा है जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी भक्तों ने आगे बढ़ाया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा ठेठ हिंदी और अवधी-ब्रज मिश्रित लोक-बोली है। इसमें काव्यात्मक सौंदर्य और अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। 'चुनरी में चंदा लिपटा है' जैसी पंक्तियों में उपमा और रूपक अलंकार का सुंदर समावेश है जो माता के सौंदर्य को अलौकिक ऊंचाइयों पर ले जाता है। शब्दों की सादगी ही इस रचना की सबसे बड़ी शक्ति है जो सीधे हृदय को स्पर्श करती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
हर श्रेष्ठ भजन हमें कोई न कोई जीवन मूल्य सिखाता है। इस भजन से हमें निम्नलिखित आध्यात्मिक सीख मिलती हैं:
- पूर्ण शरणागति: भक्त जब माँ को अपनी सब कुछ मान लेता है, तो उसके सारे भय और संताप दूर हो जाते हैं।
- प्रेम और निष्ठा: भगवान के प्रति यदि बालक जैसा निश्चल प्रेम हो, तो ईश्वर भी भक्त के वशीभूत हो जाते हैं।
- कृतज्ञता का भाव: संसार का पालन करने वाली शक्ति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना ही सच्ची भक्ति है।
| मुख्य शब्द / पंक्ति | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| सज धज कर बैठी | सोलह श्रृंगार करके सुशोभित होना | माँ की दिव्य और जागृत ऊर्जा का प्रतीक |
| नज़र उतारना | बुरी नजर या नकारात्मकता से रक्षा की कामना | भक्त का ईश्वर के प्रति अगाध स्नेह और सुरक्षा भाव |
| काजल की डिब्बी | पारंपरिक रूप से नजर से बचाने का उपाय | माता के साथ एक घरेलू और आत्मीय संबंध |
| पालण हारी | संपूर्ण ब्रह्मांड का पालन-पोषण करने वाली | जगदम्बा का मातृस्वरूप और सर्वशक्तिमत्ता |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: 'सज धज कर बैठी' भजन किस देवी को समर्पित है?
उत्तर: यह भजन जगत जननी आदिशक्ति माँ दुर्गा, शेरावाली और माता अम्बे को समर्पित है।
प्रश्न 2: इस भजन को किस अवसर पर विशेष रूप से गाया जाता है?
उत्तर: इसे नवरात्रि, माता के जागरण, चौकी, कन्या पूजन और शुक्रवार की पूजा के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है।
प्रश्न 3: भजन में 'नजर उतारने' का क्या आध्यात्मिक अर्थ है?
उत्तर: नजर उतारना भक्त के अपनी इष्ट के प्रति अगाध वात्सल्य, प्रेम और अत्यधिक लगाव को दर्शाता है, जहाँ वह अपनी माँ की रक्षा की कामना करता है।
प्रश्न 4: क्या इस भजन को घर पर सामान्य पूजा के दौरान गाया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, इसे घर पर संध्या आरती या किसी भी शुभ अवसर पर आसानी से गाया जा सकता है।
प्रश्न 5: इस भजन के बोल किस भाषा में हैं?
उत्तर: इस भजन के बोल सरल हिंदी और लोक-बोली में हैं, जो समझने और याद करने में अत्यंत सहज हैं।
प्रश्न 6: माँ दुर्गा की उपासना से जीवन में क्या लाभ मिलता है?
उत्तर: माँ की उपासना से मानसिक शांति, साहस, आत्मविश्वास और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है।
प्रश्न 7: क्या माता के जागरण में ढोलक और मंजीरे का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर: हाँ, पारंपरिक भजनों को गाने के लिए ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम का उपयोग किया जाता है जिससे भक्ति का माहौल बनता है।
प्रश्न 8: इसी प्रकार के अन्य प्रसिद्ध भजन कौन से हैं?
उत्तर: भोर भई दिन चढ़ मेरी अम्बे और मंगल की सेवा सुन मेरी देवा जैसे भजन भी अत्यंत लोकप्रिय हैं।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख Bhaktilok के समर्पित विद्वानों और संपादकीय टीम द्वारा सनातन लोक-साहित्य, पारंपरिक भजन संग्रह और भक्तों के अनुभवों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, प्रामाणिक और भावपूर्ण सामग्री पहुँचाना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- सनातन लोक-साहित्य एवं पारंपरिक भजन परंपरा।
- श्रीमद्देवीभागवत पुराण एवं दुर्गा सप्तशati के व्याख्यान।
- भक्तिकालिन एवं आधुनिक लोकगीत संग्रह।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें