कौन जाने गुण तेरे लिरिक्स || Kaun jaane gun tere lyrics in hindi || Bhaktilok
अपडेटेड वर्ष 2025 | श्रेणी: सिख गुरुवाणी एवं भक्ति भजन
सनातन और सिख संत परंपरा की पावन धरा पर रचित यह अत्यंत ही दिव्य एवं भक्ति-रस से परिपूर्ण भजन "कौन जाने गुण तेरे" परमपिता परमात्मा की अनंत महिमा, अगाध करुणा और मानव मात्र की असमर्थता का अत्यंत सुंदर और भावुक चित्रण प्रस्तुत करता है। सिख पंथ के महान गुरुओं, विशेषकर जगत उद्धारकर्ता श्री गुरु नानक देव जी की वाणी और उनके अनुयायी संतों की परंपरा से उपजा यह संकीर्तन साधक के हृदय में पूर्ण शरणागति (Surrender) और नम्रता का भाव जाग्रत करता है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में इस बात का अहसास कराया गया है कि बुद्धि, बल और विद्या से परे उस अगाध और अपार ब्रह्म (Supreme Soul) के गुणों को पूरी तरह से जान पाना इस नश्वर संसार के किसी भी जीव के लिए संभव नहीं है। जब मनुष्य अपने अहंकार का त्याग कर उस 'ऊंचे अपार बेअंत स्वामी' की शरण में जाता है, तब उसके जन्म-जन्मंतर के पाप और संताप क्षीण होने लगते हैं। कलयुग के इस भौतिक युग में प्रभु के नाम का संकीर्तन और पावन स्मरण ही भवसागर से पार उतरने का एकमात्र और अचूक साधन माना गया है। श्री हनुमान चालीसा और अन्य दिव्य स्तोत्रों की भांति ही यह भजन भी मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:
कौन जाने गुण तेरे, कौन जाने गुण तेरे,
ऊंचे अपार बेअंत स्वामी, ऊंचे अपार बेअंत स्वामी,
कौन जाने गुण तेरे, कौन जाने गुण तेरे.......
तेरे गुण बहुते, मैं एक ना जाणिया,
मैं मुर्ख किछ दीजै, धन नानक, सुण मेरे साहिबा,
दुबदा पत्थर लीजै, कौन जाने गुण तेरे...
गावत ऊधरे सुनते ऊधरे, गावत ऊधरे सुनते ऊधरे,
बिनसे पाप घनेरे,
ऊंचे अपार बेअंत स्वामी, कौन जाने गुण तेरे...
पशु परेत मुगद को तारे, पशु परेत मुगद को तारे,
पाहन पार उतारे,
ऊंचे अपार बेअंत स्वामी, कौन जाने गुण तेरे...
नानक दास तेरी सरनाई, नानक दास तेरी सरनाई,
सदा सदा बलिहारै,
ऊंचे अपार बेअंत स्वामी, कौन जाने गुण तेरे...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस दिव्य भजन के मर्म में उतरने पर हमें यह ज्ञात होता है कि यह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक पुकार है। साधक भगवान से कहता है कि हे प्रभु! आपके गुण अनंत हैं, आपकी महिमा अपरंपार है और इस संसार में ऐसा कौन है जो आपके सभी गुणों को पूर्ण रूप से जान सके। आप इस सृष्टि के सबसे ऊंचे, विशाल और असीम (बेअंत) स्वामी हैं।
भजन की पंक्तियों में आगे कहा गया है—'तेरे गुण बहुते, मैं एक ना जाणिया' यानी हे साहिब! आपके गुण तो अनगिनत हैं, किंतु मुझ अज्ञानी ने उनमें से एक भी गुण को ठीक से नहीं जाना है। मैं मूर्ख हूँ, बुद्धिहीन हूँ, अतः हे प्रभु! मुझे अपनी कृपा रूपी धन प्रदान कीजिए। श्री गुरु नानक देव जी के चरणों में समर्पित यह भाव जीव को अपनी लघुता और ईश्वर की महानता का बोध कराता है। 'दुबदा पत्थर लीजै' का अर्थ है कि मन के संशय और दुविधा रूपी भारी पत्थरों को भी आप अपनी कृपा से तार देते हैं।
आगे भजन में संकीर्तन की महिमा बताते हुए रचयिता कहते हैं कि इस पावन नाम को गाने वाले और सुनने वाले दोनों ही इस भवसागर से उद्धार पा जाते हैं। मनुष्य के जन्म-जन्मंतर के घने पाप और अज्ञानता का अंधकार क्षण भर में नष्ट हो जाता है। चाहे कोई पशु स्वभाव का हो, प्रेत योनि जैसा आचरण करने वाला हो या महामूढ़ (मुगद) हो, प्रभु की कृपा उन सभी का उद्धार कर देती है। यहाँ तक कि जड़ पाषाण (पत्थर) को भी भगवान ने अपनी भक्ति की शक्ति से पार उतार दिया है। अंत में नानक दास प्रभु की शरण में आकर सदा-सदा के लिए उन पर बलिहारी (न्योछावर) होने की बात कहते हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- अनंत महिमा का बखान: यह भजन परमेश्वर की असीम शक्ति और गुणों की विशालता को रेखांकित करता है।
- पूर्ण शरणागति (आत्मसमर्पण): इसमें अहंकार का त्याग कर भगवान के चरणों में पूरी तरह समर्पित होने का संदेश दिया गया है।
- पाप विनाशन शक्ति: संकीर्तन को सुनने और गाने मात्र से मानसिक विकारों और पापों के नाश का शास्त्रीय विधान इसमें समाहित है।
- समानता और करुणा: यह भजन जाति, योनि या ज्ञान के भेद से परे भगवान की अहैतुकी कृपा को दर्शाता है जो पशु और पाषाण तक को तार देती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पावन भजन को प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा संध्या बेला की आरती के समय गाना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसे गुरुद्वारा साहिब के दीवान, सत्संग भवन, या घर में संध्या समय धूप-दीप प्रज्वलित करके शांत चित्त से गाया जा सकता है। इसे गाते समय या सुनते समय हाथों को जोड़कर आँखें बंद करके मानसिक रूप से परमात्मा के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। संगीत प्रेमियों के लिए इसे हारमोनियम और ढोलक की संगत में कोमल स्वर में गाना मन को अद्भुत शांति प्रदान करता है। शिव तांडव स्तोत्र की तरह यह भी ऊर्जा का संचार करता है, परंतु इसका भाव पूरी तरह शांत, विनीत और प्रेममयी है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से सिख पंथ के संस्थापक, जगतगुरु श्री गुरु नानक देव जी की वाणी और उनके दार्शनिक सिद्धांतों से प्रेरित है। इसमें 'बेअंत स्वामी' (असीम परमेश्वर, वाहिगुरु) को समर्पित किया गया है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता, पालक और संहारक हैं। संत परंपरा में गुरु नानक देव जी ने हमेशा निराकार और सर्वव्यापक ईश्वर की भक्ति पर जोर दिया है, जिसमें नाम सिमरन ही जीवन का सार है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
सिख गुरुवाणी और पारंपरिक संकीर्तन शैलियों में ऐसे पदों का बहुत बड़ा स्थान है। संत महात्माओं ने आम जनमानस को ईश्वर की महिमा समझाने के लिए सरल और सुबोध ब्रज, पंजाबी और संतकबीर मिश्रित भाषा का प्रयोग किया। "कौन जाने गुण तेरे" भजन उसी महान मौखिक और लिखित संत परंपरा की देन है, जो पीढ़ियों से भक्तों के कंठों से होती हुई आज भी जीवित है और साधकों को आध्यात्मिक संबल दे रही है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा बहुत ही मधुर, सहज और प्रभावोत्पादक है। इसमें हिंदी, ब्रज और गुरुमुखी शब्दावली का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है। काव्य शैली की दृष्टि से यह पद गान योग्य (Musical) है, जिसमें अनुप्रास और सादृश्य अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। "गावत ऊधरे सुनते ऊधरे" जैसी पंक्तियाँ इसकी लयबद्धता और कर्णप्रियता को और अधिक बढ़ा देती हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें निम्नलिखित प्रमुख जीवन सीख मिलती हैं:
- अहंकार का त्याग: मनुष्य को अपनी बुद्धि और विद्या पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि उस प्रभु के गुणों का अंत पाना असंभव है।
- नियमित नाम सिमरन: जीवन की व्यस्तताओं के बीच ईश्वर के नाम का स्मरण और कीर्तन अवश्य करना चाहिए।
- शरणागति का भाव: संकट के समय अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए परमात्मा की शरण में जाना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
- दूसरों के प्रति करुणा: भगवान जब पाषाण और पशुओं को तार सकते हैं, तो हमें भी सभी जीवों के प्रति दया भाव रखना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल अर्थ | संदर्भ / भावार्थ |
|---|---|---|
| बेअंत | जिसका कोई अंत न हो (असीम) | परमात्मा का ऐसा स्वरूप जिसकी कोई सीमा नहीं है। |
| दुबदा | दुविधा या संशय | मन का असमंजस और सांसारिक मोह-माया। |
| मुगद | अज्ञानी या मूर्ख | वह व्यक्ति जो परमात्मा के ज्ञान से वंचित है। |
| पाहन | पत्थर (पाषाण) | जड़ वस्तु या कठोर हृदय वाला मनुष्य। |
| बलिहारै | न्योछावर होना | ईश्वर के चरणों में अपना सब कुछ समर्पित कर देना। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
कौन जाने गुण तेरे...
साधक विस्मय और विनम्रता के साथ यह स्वीकार करता है कि हे प्रभु, आपके गुणों की थाह कोई नहीं पा सकता।
तेरे गुण बहुते, मैं एक ना जाणिया...
हे साहिब! आपके गुण असीम हैं, मैंने तो एक भी गुण को ठीक से नहीं समझा है। मैं अज्ञानी हूँ, मुझे अपना ज्ञान और भक्ति का धन प्रदान कीजिए।
गावत ऊधरे सुनते ऊधरे, बिनसे पाप घनेरे...
आपके इस पावन नाम को गाने और सुनने मात्र से प्राणी भवसागर से तर जाते हैं और उनके बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव से मिलता-जुलता एक प्रसिद्ध मूल मंत्र स्मरण किया जाता है:
यह मूल मंत्र भगवान के सत्य स्वरूप और उनकी असीम कृपा का परिचायक है, जो साधक को आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | कौन जाने गुण तेरे (Kaun Jaane Gun Tere) |
|---|---|
| समर्पित देवता | परमपिता परमात्मा / वाहिगुरु / बेअंत स्वामी |
| प्रेरणा स्रोत | सिख संत परंपरा एवं गुरुवाणी |
| भाषा | हिंदी, ब्रज एवं पंजाबी मिश्रित संत भाषा |
| मुख्य विषय | भक्ति, शरणागति और नाम सिमरन |
| भक्ति भाव | विनय, समर्पण और अगाध प्रेम |
| उपयुक्त अवसर | नित्य पूजा, सत्संग, गुरु पर्व और सुबह-शाम संकीर्तन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री Bhaktilok के उच्च संपादकीय मानकों के तहत तैयार की गई है। इसमें प्रामाणिक पारंपरिक पदों, गुरुवाणी के भावों और सांस्कृतिक संदर्भों का सूक्ष्म ध्यान रखा गया है। यह लेख पाठकों को आध्यात्मिक संतुष्टि और सटीक जानकारी देने के लिए प्रतिबद्ध है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री
स्रोत एवं संदर्भ
- सनातन और सिख संत साहित्य के पारंपरिक संग्रह एवं ग्रंथ
- भक्ति संगीत एवं संकीर्तन परंपरा के मौखिक एवं लिखित पाठ
- Bhaktilok आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक शोध अभिलेख
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