"कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे, निर्धन के घर भी आ जाना" यह भजन माँ दुर्गा के प्रति एक भक्त की अत्यंत भावुक और आत्मीय पुकार है। भारतीय भक्ति परंपरा में, जहाँ ईश्वर को 'दीनबंधु' और 'गरीब निवाज़' कहा गया है, यह भजन उसी भाव को पुष्ट करता है। यहाँ भक्त का उद्देश्य कोई भव्य अनुष्ठान या स्वर्ण-सिंहासन सजाना नहीं है, बल्कि माँ के साथ एक हृदय का संबंध स्थापित करना है। यह रचना उन सभी भक्तों के लिए एक संबल है जो साधनहीन होने के बावजूद माँ की असीम कृपा के पात्र बनना चाहते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि भक्ति के मार्ग में भौतिक वस्तुओं की तुलना में 'भाव' की प्रधानता सर्वोपरि है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे, निर्धन के घर भी आ जाना,
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना।
ना छत्र बना सका सोने का, ना चुनरी घर मेरे तारों जड़ी,
ना पेड़े बर्फी मेवा है माँ, बस श्रद्धा है नैन बिछाए खड़े।
इस श्रद्धा की रख लो लाज हे माँ, इस विनती को ना ठुकरा जाना,
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना।
जिस घर के दिए में तेल नहीं, वहां जोत जगाऊं कैसे,
मेरा खुद ही बिछौना दरिद्र माँ, तेरी चौकी लगाऊं मैं कैसे।
जहाँ मैं बैठा वहीं बैठ के माँ, बच्चों का दिल बहला जाना,
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना।
ना मंत्र जानूं ना तंत्र जानूं, बस नाम तेरा ही जपते हैं,
हम जैसे भी हैं तेरे ही हैं, तेरे दर पे ही तो पलते हैं।
तू ममता की है सागर माँ, अपनी ममता का रस बरसा जाना,
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना।
कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे, निर्धन के घर भी आ जाना,
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का अर्थ अत्यंत गहरा है। भक्त माँ जगदम्बे से प्रार्थना करता है कि यदि उन्हें कभी समय मिले, तो वे उसके निर्धन घर में भी पधारें। यहाँ 'फुर्सत' शब्द का प्रयोग भक्त की विनम्रता को दर्शाता है, मानो वह कह रहा हो कि माँ तो ब्रह्मांड के कार्यों में व्यस्त हैं, फिर भी वह एक बार उसके घर की ओर दृष्टि डालें। भक्त स्वीकार करता है कि उसके पास माँ को अर्पित करने के लिए न तो स्वर्ण का छत्र है और न ही मखमली वस्त्र, उसके पास केवल 'श्रद्धा' है।
भजन का भाव यह है कि ईश्वर को भौतिक वैभव की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार शबरी के जूठे बेरों को प्रभु श्री राम ने प्रेम से ग्रहण किया था, उसी प्रकार भक्त चाहता है कि माँ उसके द्वारा दिए गए रूखे-सूखे भोजन को ही प्रसाद मानकर स्वीकार करें। यह समर्पण का चरम है, जहाँ भक्त अपनी दरिद्रता को छिपाता नहीं, बल्कि उसे माँ के चरणों में समर्पित कर देता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- भाव-प्रधान भक्ति: यह भजन 'भाव' को 'सामग्री' से श्रेष्ठ मानता है।
- दीनता का समर्पण: भक्त अपनी निर्धनता को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि माँ के प्रति अपनी पात्रता का आधार मानता है।
- आत्मीयता: यह माँ और संतान के बीच के उस रिश्ते को दर्शाता है जहाँ कोई औपचारिकता नहीं होती।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को नवरात्रि के दिनों में, माँ दुर्गा की चौकी सजाते समय या दैनिक संध्या वंदन के समय गाया जा सकता है। इसे गाते समय मन में पूर्ण समर्पण का भाव होना चाहिए। किसी भी वाद्य यंत्र की आवश्यकता नहीं है, केवल एक शुद्ध हृदय और एकाग्रता ही पर्याप्त है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द | अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| जगदम्बे | जगत की माता (माँ दुर्गा) | संबोधन |
| निर्धन | गरीब / साधनहीन | भक्त की स्थिति |
| श्रद्धा | आस्था / विश्वास | भक्त की एकमात्र पूंजी |
| दरिद्र | अभावग्रस्त | भक्त का घर |
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत
यह भजन आदि शक्ति माँ दुर्गा को समर्पित है। माँ दुर्गा को 'करुणामयी' और 'भक्तवत्सला' माना गया है। वे अपने भक्तों के अहंकार को नष्ट कर उन्हें अपनी शरण में लेती हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख
यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर के द्वार पर जाने के लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है। जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां या अभाव क्यों न हों, यदि हृदय में माँ के प्रति प्रेम है, तो वे अवश्य ही भक्त की पुकार सुनती हैं। यह हमें 'संतोष' और 'निष्कपट भक्ति' का मार्ग दिखाता है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे |
| आराध्य | माँ दुर्गा |
| मुख्य भाव | समर्पण एवं दीनता |
| भाषा | हिंदी |
| उपयुक्त अवसर | नवरात्रि, दैनिक पूजा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
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स्रोत एवं संदर्भ
यह सामग्री पारंपरिक भक्ति साहित्य और लोक-भजनों के संकलन पर आधारित है।
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