सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी के बीच की मधुर नोक-झोंक को दर्शाने वाले भजनों का एक विशेष स्थान है। ऐसा ही एक अत्यंत लोकप्रिय, कर्णप्रिय और भक्ति रस से सराबोर पारंपरिक लोक भजन है—"काला काला करे गुजरी मत काले का जिक्र करै"। यह भजन मुख्य रूप से ब्रज और हरियाणा के लोक अंचलों में गाया जाता है, जिसमें श्री कृष्ण के श्याम वर्ण (काले रंग) की महिमा का अत्यंत सुंदर और तार्किक वर्णन किया गया है। इस भजन में एक गोपी (गुजरी) द्वारा श्री कृष्ण के काले रंग पर कटाक्ष करने और उसके उत्तर में कृष्ण के दिव्य सौंदर्य व उनकी प्रिय वस्तुओं के कालेपन की श्रेष्ठता सिद्ध करने का अद्भुत ताना-बाना बुना गया है। यह भजन केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के बीच के उस मधुर संबंध को दर्शाता है जहां बाह्य रंग-रूप गौण हो जाता है और केवल अनन्य प्रेम ही शेष रहता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
काला काला करे गुजरी मत काले का जिक्र करै
काला काला करे गुजरी मत काले का जिक्र करै।
काले रंग पे मोरनी रुदन करै॥
काला काला करे गुजरी...॥
मोटे मोटे नैन राधा के इसमें यो सुरमा अजब सजै।
काले रंग पे मोरनी रुदन करै॥
काला काला करे गुजरी...॥
लाम्बे लाम्बे केश राधा के जिसमें या मांग सिंदूर भरै।
काले रंग पे मोरनी रुदन करै॥
काला काला करे गुजरी...॥
लाम्बे लाम्बे पंख मोर के इसके सिर पर मुकुट सजै।
काले रंग पे मोरनी रुदन करै॥
काला काला करे गुजरी...॥
हरे हरे बासां की हरी मुरलिया जिसका खोया जग फिरै।
काले रंग पे मोरनी रुदन करै॥
काला काला करे गुजरी...॥
काला सर्प पड़्या बूमबी महँ जिसका खाया तुरंत मरै।
काले रंग पे मोरनी रुदन करै॥
काला काला करे गुजरी...॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और दार्शनिक है। यहाँ 'गुजरी' (गोपी) श्री कृष्ण को उनके काले रंग के कारण चिढ़ाती है, जिस पर भक्त या स्वयं भगवान उत्तर देते हैं कि हे गुजरी! तू बार-बार 'काला-काला' कहकर इस दिव्य रंग का उपहास मत कर। इस काले रंग की महिमा तो इतनी अपार है कि वन की सुंदर मोरनी भी इस रंग को पाने के लिए तरसती है और रुदन (विलाप) करती है।
भजन में आगे तर्क दिया गया है कि श्री राधा रानी के जो विशाल और सुंदर नेत्र हैं, उनमें जो काला सुरमा (काजल) लगाया जाता है, वही उनकी सुंदरता को पूर्ण करता है। राधा जी के लंबे और घने काले केश (बाल) ही उनकी मांग के सिंदूर की शोभा बढ़ाते हैं। भगवान के मस्तक पर सुशोभित मुकुट में जो मोरपंख लगा है, वह भी श्याम वर्ण की आभा से ही चमकीला दिखाई देता है।
इस प्रकार, यह भजन हमें यह संदेश देता है कि जिसे संसार 'काला' या अंधकारमय समझकर उपेक्षित करता है, वही ईश्वर का वास्तविक और सबसे प्रिय रूप है। श्री कृष्ण का श्याम वर्ण अनंत ब्रह्मांड का प्रतीक है, जो सभी रंगों को अपने भीतर समाहित कर लेता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- माधुर्य भाव की पराकाष्ठा: यह भजन भक्ति मार्ग के 'माधुर्य भाव' को प्रदर्शित करता है, जहाँ भक्त अपने आराध्य के साथ अत्यंत आत्मीय और अनौपचारिक संबंध रखता है।
- श्याम वर्ण की दार्शनिक व्याख्या: सनातन दर्शन में काला रंग (श्याम वर्ण) अनंतता का प्रतीक है। जैसे असीम आकाश और अगाध सागर दूर से नीले या काले दिखाई देते हैं, वैसे ही परमात्मा भी अनंत होने के कारण श्याम वर्ण हैं।
- लोक संस्कृति का जीवंत रूप: यह भजन ब्रज और हरियाणा की लोक धुनों पर आधारित है, जो जनमानस को तुरंत अपनी ओर आकर्षित करता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि भगवान के नाम और संकीर्तन के लिए सभी समय शुभ माने गए हैं, परंतु इस भजन को विशेष रूप से निम्नलिखित अवसरों पर गाया जाता है:
- श्री कृष्ण जन्माष्टमी: भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के पावन अवसर पर मंदिरों और घरों में इस भजन का गायन अत्यंत उत्साह के साथ किया जाता है।
- राधाष्टमी व होली उत्सव: ब्रज की होली और राधाष्टमी के दौरान इस भजन की धूम रहती है।
- संध्याकालीन सत्संग: दैनिक पूजा या पारिवारिक कीर्तन के समय इस भजन को ढोलक, मंजीरे और चिमटे की थाप पर सामूहिक रूप से गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण (श्यामल सुंदर) और उनकी आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी को समर्पित है। इस भजन के माध्यम से भक्त दोनों के युगल स्वरूप की वंदना करते हैं। यद्यपि इसके मूल रचयिता का नाम अज्ञात है, परंतु यह सदियों से ब्रज के संतों और लोक गायकों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाया और सहेजा जा रहा है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि ब्रजभूमि की लोक विरासत से जुड़ी है। ब्रज में गोपियाँ और श्री कृष्ण के बीच हास-परिहास की एक लंबी परंपरा रही है। जब श्री कृष्ण गोपियों को तंग करते थे, तो गोपियाँ उन्हें 'काला' कहकर चिढ़ाती थीं। इसी लोक-व्यवहार को संतों ने आध्यात्मिक रूप देकर इस सुंदर भजन की रचना की, ताकि साधारण लोग भी मनोरंजन के साथ-साथ ईश्वर की भक्ति में लीन हो सकें।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-बोली (मिश्रित हरियाणवी और ब्रजभाषा) है। इसमें 'गुजरी', 'जिक्र', 'रुदन', 'सुरमा', 'मुरलिया' और 'बूमबी' जैसे ठेठ लोक शब्दों का प्रयोग किया गया है। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर समावेश है। प्रत्येक अंतरे के बाद "काले रंग पे मोरनी रुदन करै" की टेक (ध्रुवपद) भजन के प्रवाह को और अधिक संगीतमय बनाती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:
- बाहरी रूप-रंग का महत्व नहीं: ईश्वर की दृष्टि में किसी व्यक्ति का बाहरी रंग-रूप या जाति महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसका आंतरिक भाव और प्रेम ही सर्वोपरि है।
- सकारात्मक दृष्टिकोण: जिस काले रंग को सामान्यतः अशुभ या कमतर माना जाता है, भजनकार ने उसकी उपयोगिता और सुंदरता को सिद्ध करके हमें हर परिस्थिति में सकारात्मकता ढूंढने की सीख दी है।
- समर्पण की भावना: जब हम भगवान के रंग में रंग जाते हैं, तो संसार के अन्य सभी रंग फीके पड़ जाते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | भजन के संदर्भ में महत्व |
|---|---|---|
| गुजरी (Gujaree) | दूध-दही बेचने वाली गोपी | श्री कृष्ण की अनन्य भक्त और सखी। |
| जिक्र (Zikr) | चर्चा या उल्लेख करना | काले रंग की बार-बार बात करना। |
| रुदन (Rudan) | रोना या विलाप करना | मोरनी का कृष्ण के काले रंग को पाने के लिए लालायित होना। |
| सुरमा (Surma) | काजल | राधा जी के नैनों की शोभा बढ़ाने वाला काला तत्व। |
| बूमबी (Boombi) | सांप की बांबी या बिल | वह स्थान जहाँ काला सर्प रहता है। |
| मुरलिया (Muraliya) | बांसुरी | श्री कृष्ण की वह बांसुरी जिसके पीछे सारा संसार दीवाना है। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"काला काला करे गुजरी मत काले का जिक्र करै, काले रंग पे मोरनी रुदन करै"
हे गोपी! तू बार-बार कन्हैया को काला कहकर उसका उपहास मत उड़ा। इस काले रंग की महिमा इतनी दिव्य है कि वन की सुंदर मोरनी भी इस श्याम रंग को पाने के लिए तरसती है और विलाप करती है।
"मोटे मोटे नैन राधा के इसमें यो सुरमा अजब सजै"
श्री राधा रानी के जो बड़े-बड़े और अत्यंत सुंदर नेत्र हैं, उनकी सुंदरता तब तक अधूरी है जब तक उनमें काले रंग का सुरमा न लगाया जाए। वह काला सुरमा ही उनके नैनों की शोभा बढ़ाता है।
"लाम्बे लाम्बे केश राधा के जिसमें या मांग सिंदूर भरै"
राधा जी के जो लंबे, घने और काले बाल हैं, वे ही उनके मस्तक की लाल सिंदूर की मांग को और अधिक चमकीला और दर्शनीय बनाते हैं। काले बालों के बिना सिंदूर की लालिमा भी अधूरी लगती है।
"लाम्बे लाम्बे पंख मोर के इसके सिर पर मुकुट सजै"
मोर के जो सुंदर और लंबे पंख होते हैं, वे भगवान श्री कृष्ण के मुकुट पर सजते हैं। उन पंखों में भी श्याम वर्ण की ही प्रधानता होती है, जो प्रभु के मस्तक की शोभा बढ़ाते हैं।
"हरे हरे बासां की हरी मुरलिया जिसका खोया जग फिरै"
हरे बांस से बनी वह बांसुरी जब श्री कृष्ण के अधरों पर सजती है, तो उसकी तान पर पूरा संसार अपनी सुध-बुध खोकर खिंचा चला आता है।
"काला सर्प पड़्या बूमबी महँ जिसका खाया तुरंत मरै"
बांबी (बिल) में रहने वाला काला सर्प अत्यंत शक्तिशाली होता है। यहाँ सर्प के काले रंग के माध्यम से काल (समय) और भगवान की अमोघ शक्ति को दर्शाया गया है, जिसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
भगवान श्री कृष्ण के श्याम वर्ण और उनके दिव्य रूप का ध्यान करने के लिए निम्नलिखित श्लोक का पाठ किया जाता है:
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिं
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥
यह श्लोक भगवान गोपाल के उसी मनमोहक रूप का वर्णन करता है जो इस भजन का मुख्य आधार है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | काला काला करे गुजरी मत काले का जिक्र करै |
| मुख्य आराध्य | भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी |
| भाषा / बोली | मिश्रित हरियाणवी और ब्रजभाषा (लोक शैली) |
| भजन का भाव | माधुर्य भाव, सख्य भाव, हास-परिहास |
| उपयुक्त अवसर | जन्माष्टमी, होली, राधाष्टमी, दैनिक कीर्तन |
| मुख्य वाद्य यंत्र | ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम, चिमटा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को पारंपरिक ब्रज साहित्य, लोक गीतों के संकलन और वैष्णव संकीर्तन परंपरा के आधार पर अत्यंत प्रामाणिकता के साथ संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म के लोक भजनों की समृद्ध विरासत को शुद्ध रूप में पाठकों तक पहुँचाना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण (रासपंचाध्यायी प्रसंग)
- ब्रज लोक साहित्य एवं पारंपरिक संकीर्तन संग्रह
- कल्याण (गीताप्रेस गोरखपुर) के विशेषांक
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