भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

डम डम डमरू वाला बड़ा मतवाला - मतवाला बड़ा भोला भाला है लिरिक्स

डम डम डमरू वाला भजन भगवान शिव की भोलेपन और शक्ति का महान उत्सव है। इसे गाना भक्तों को मानसिक शांति और ऊर्जा प्रदान करता है।

प्रस्तावना एवं परिचय

भोलेनाथ की असीम लीला: डम डम डमरू का भजन

इस भक्ति गीत को गाकर श्री शिव की अद्वितीय कृपा का अनुभव करें और आंतरिक शांति प्राप्त करें।

डम डम डमरू वाला बड़ा मतवाला, मतवाला बड़ा भोला भाला है...वाम अंग में गौरा विराजे, गोदी में गणपति लाला, बड़ा मतवाला डम डम डमरू वाला बड़ा मतवाला...शेषनाग का पड़ा जनेऊ, गले में नाग अति काला, बड़ा मतवाला डम डम डमरू वाला बड़ा मतवाला...रहने को चाहे मंदिर शिवालय, पीने को भंग का प्याला, बड़ा मतवाला डम डम डमरू वाला बड़ा मतवाला...मलने को चाहे अंग बभूति, बैठन को चाहे मृग छाला, बड़ा मतवाला डम डम डमरू वाला बड़ा मतवाला...डम डम डमरू वाला बड़ा मतवाला, मतवाला बड़ा भोला भाला है...
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन का मुख्य भाव भगवान शिव की अनंत लीला और उनकी भोलेपन को दर्शाता है। 'डम डम डमरू वाला' से अभिप्राय है कि भगवान शिव के हाथ में डमरू होने से उनके नृत्य का सृजन होता है। इस नृत्य के माध्यम से सृष्टि का निर्माण और विनाश होता है। शिव को 'मतवाला' कहकर उनकी अति प्रेम और भक्ति का वर्णन किया गया है। इस भक्ति में उनका भोला रूप प्रमुख है, जिसमें वे अपने भक्तों की हर परेशानी को निवारण करते हैं। जब हमें 'गौरा' और 'गणपति लाला' का उल्लेख मिलता है, तो यह द्वैधता की ओर इशारा करता है, शिव के दांई ओर भाग्य की देवी पार्वती तथा उनके गोद में गणेश, जो ज्ञान और समृद्धि के देवता हैं।

इसी क्रम में 'शेषनाग का पड़ा जनेऊ' ये संकेत करता है कि भगवान शिव खुद को शेषनाग के साथ जोड़ते हैं, जो अद्वितीय है। उनके गले में नाग का होना भी उनकी शक्ति और पूजनीयता का प्रतीक है। 'मंदिर शिवालय' का उल्लेख हमें बताता है कि भगवान शिव को हृदय में स्थान देने का महत्व है। भांग का प्याला का उल्लेख उनकी तात्त्विकता और त्याग की ओर इशारा करता है। भगवान का यह रूप हमें यह समझाता है कि भक्ति में भंग का सेवन एक साधक की लालसा को मिटाता है। इस भजन में हमें भक्ति के मार्ग पर चलने और भक्ति के माध्यम से शिव का साक्षात्कार करने का प्रेरणा मिलती है।

इस भजन का भक्ति मार्ग (Bhakti Marg) का सार यही है कि शिव को अधिकतर मौन और साधना से जाना जाता है। इसमें माध्यमिक रूप से जो भूतनाथ की पारस्परिकता का सोच उठता है, वह उनकी दिव्यता का प्रमाण है। 'अंग बभूति' का प्रयोग हमें यह संदेश देता है कि हमें अपने शरीर पर बभूति लगानी चाहिए जो संसारिक बैराग्य का एक प्रतीक है। 'बैठन को चाहे मृग छाला' यह संकेत करता है कि साधना में एक आनंद है, जहाँ भक्त अपने मन को शांत कर निस्वार्थ प्रेम भाव से भगवान का ध्यान लगाता है। इस तरह यह भजन साधक को शिव के साथ जोड़ने में सहायक होता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन केवल भक्ति की दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हिन्दू धर्म में भगवान शिव के विभिन्न रूपों का वर्णन पुराणों में मिलता है। 'विश्वेश्वर' से लेकर 'महाकाल' तक, सभी अंश हमें उनके मायापति होना बताते हैं। शिव के भक्तों का यह आलेख उनके त्याग और साधना का चिह्न है। इसे गाने से हमारी आत्मा शिव के साथ जुड़ती है और हमें बुराइयों से दूर रहते हुए सच्चाई, प्रेम और संवेदनशीलता की ओर अग्रसर करती है। रामायण और महाभारत में भी शिव की महिमा का बखान है, जो इस भजन के महत्व को और भी बढ़ाता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का जाप करने से मानसिक शांति, दिव्य ऊर्जा का संचार और आत्मबल में वृद्धि होती है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक होता है, जिससे साधक में संतुलन की भावना जागृत होती है। नियमित रूप से इस भजन का गायन करने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं, जैसे आत्मविश्‍वास की वृद्धि और ध्यान की शक्ति में सुधार।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का सही और प्रभावी संकीर्तन सुबह के समय करना चाहिए, जब मानसिक शांति प्राप्त करने का सर्वोत्तम समय होता है। मंदिर में जाकर, दीप जलाना तथा भगवान को दूध, फल, या धुप अर्पित करना आवश्यक है। बैठने के लिए, सुखासन या पद्मासन की मुद्रा में होना उपयुक्त है, और मन को एकाग्र करते हुए भक्ति भाव से गाना चाहिए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश भगवान शिव का भोला और मातृवत रूप है, जो अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनका मार्गदर्शन करते हैं।

डमरू का क्या महत्व है?

डमरू भगवान शिव के नृत्य और सृष्टि के निर्माण का प्रतीक है। यह जागृति और बन्धनों से मुक्ति का माध्यम भी है।

इस भजन को गाने का सही समय क्या है?

इस भजन को सुबह या शाम के समय गाना सबसे उत्तम होता है, जिससे ध्यान और साधना की स्थिरता बढ़ती है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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