भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे

पढ़ें रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे" अत्यंत पावन, भावपूर्ण और हृदय को झकझोर देने वाला एक ऐसा अमर भजन है, जो भगवान श्री कृष्ण (मोहन) के प्रति एक निश्छल, अनन्य और पूर्ण शरणागति (Surrender) की भावना को प्रकट करता है। कलयुग के इस प्रपंच भरे संसार में जहां हर पग पर स्वार्थ और छलावा है, वहां एक भक्त का अपने आराध्य के साथ संबंध केवल पूजा-पाठ का नहीं, बल्कि प्राणों से प्रिय सखा, स्वामी और पालक का होता है। इस भजन का मुख्य भाव 'विरह' और 'विनय' का अद्भुत संगम है, जहां भक्त अपने प्रियतम मोहन से यह गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! यदि आप मुझसे रूठ जाएंगे, तो इस भवसागर में मेरा सहारा कौन बनेगा? भजन की यह रचना संकीर्तन परंपरा का एक उत्कृष्ट रत्न है, जिसे विशेषकर संध्या वंदन, एकादशी जागरण, जन्माष्टमी उत्सव और सामूहिक सत्संगों के दौरान अत्यंत प्रेम और आर्त भाव से गाया जाता है। इसके शब्द भले ही सरल और लोक-बोली के निकट प्रतीत होते हैं, किंतु इनका आध्यात्मिक स्तर अद्वैत और भक्ति के उच्च शिखर को छूता है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन भजन के प्रत्येक शब्द, उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, रचना के भाव, गायन की विधि और जीवन पर पड़ने वाले उसके सकारात्मक प्रभावों का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें


रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे
रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे

चंगे माड़े असीं हां तेरे, माफ़ तू करदे अवगुण मेरे
हाथ रहे तेरा सर ते मेरे, जीवन मेरा सहारे तेरे
रूस ना जावीं मोहन मेरे...

अपने पराये ताने मारदे, वास्ते तैनू मेरे प्यार दे
अपना बना ले प्रीतम मेरे, जीवन मेरा सहारे तेरे
रूस ना जावीं मोहन मेरे...

तू रुसेया ते किस दर जावां, हाल दिलां दा किसनू सुनवा
कौन सुनेगा दुखड़े मेरे, जीवन मेरा सहारे तेरे
रूस ना जावीं मोहन मेरे...

मेरा जीवन काहदा जीवन, तेरी याद बिना जो बीते
मेरी निभ जावे दर ते तेरे, जीवन मेरा सहारे तेरे
रूस ना जावीं मोहन मेरे...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन जीवात्मा की परमात्मा के प्रति उस पुकार का प्रतीक है जो एक छोटे बच्चे की अपने माता-पिता के प्रति होती है। भजन की पहली पंक्ति "रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे" में भक्त अपने आराध्य श्री कृष्ण से विनती करता है कि हे मेरे प्राणधन मोहन! तुम मुझसे कभी भी नाराज (रूठ) मत होना, क्योंकि इस विशाल और निर्दयी संसार में मेरे जीवन का एकमात्र सहारा केवल आप ही हो। यदि आप ही मुंह मोड़ लेंगे, तो मेरा अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा।

अगली पंक्तियों में भक्त अपनी कमियों और संसार की कठोरता का वर्णन करता है—"चंगे माड़े असीं हां तेरे, माफ़ तू करदे अवगुण मेरे"। भक्त कहता है कि प्रभु! हम अच्छे हैं या बुरे, जैसे भी हैं, हैं तो आपके ही बालक। आप तो करुणा के सागर हैं, इसलिए मेरे समस्त अवगुणों और भूलों को क्षमा कर दीजिए। मेरा जीवन तभी सुरक्षित है जब आपका वरद हस्त मेरे सिर पर हमेशा बना रहे। संसार के लोग जब अपने-पराए तानों से आहत करते हैं, तब भगवान का प्रेम ही एकमात्र ढाल बनता है। भक्त कहता है कि हे प्रीतम! मुझे पूरी तरह अपना बना लो, क्योंकि आपके सिवा मेरा इस संसार में कोई अपना नहीं है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और मार्मिकता है। इसमें किसी क्लिष्ट दार्शनिक शब्दावली के बजाय सीधे हृदय को छूने वाली लोक-भाषा का प्रयोग किया गया है, जो श्रोता की आंखों में आंसू लाने की क्षमता रखती है। यह भजन सनातन संस्कृति की उस सनातन धारा का प्रतिनिधित्व करता है जहां भगवान को केवल भय या नियम से नहीं, बल्कि प्रेम, अधिकार और अपनेपन के भाव से बांधा जाता है।

  • भक्ति का स्वरूप: यह भजन माधुर्य और कांता/वात्सल्य भाव की मिश्रित भक्ति का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
  • शरणगति का संदेश: यह सिखाता है कि जब चारों तरफ से रास्ते बंद हो जाएं और दुनिया ताने मारे, तब ईश्वर के चरणों में गिरकर ही सच्ची शांति मिलती है।
  • मानसिक शांति: इस संकीर्तन का निरंतर श्रवण और गायन मन के विकारों, अहंकार और अकेलेपन के डर को दूर करता है।
  • सामूहिक संकीर्तन: मंदिर परिसरों और पारिवारिक अनुष्ठानों में इसे गाने से सकारात्मक ऊर्जा और भक्तिमय वातावरण का निर्माण होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत के नियमानुसार, भावप्रधान भजनों को गाने या सुनने के लिए एकाग्रता और शांत मन की आवश्यकता होती है। इस पावन भजन को निम्नलिखित अवसरों और विधियों से अपनाया जा सकता है:

  • ब्रह्ममुहूर्त एवं संध्याकाल: सुबह उठकर या शाम को दीप प्रज्वलन के समय इसे गुनगुनाने से मन पूरे दिन के तनाव से मुक्त रहता है।
  • सत्संग एवं एकादशी जागरण: श्री कृष्ण जन्मास्टमी, राधा अष्टमी, या किसी भी पवित्र एकादशी की रात्रि के संकीर्तन में इस भजन का विशेष स्थान है।
  • व्यक्तिगत साधना: जब भी जीवन में निराशा या अकेलापन महसूस हो, तब एकांत में बैठकर इस भजन को आर्त भाव से दोहराना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में भगवान श्री कृष्ण हैं, जिन्हें 'मोहन', 'प्रीतम' और 'जीवन का सहारा' कहकर पुकारा गया है। श्री कृष्ण हिंदू सनातन परंपरा में प्रेम, आनंद, योगेश्वर और परम आराध्य के रूप में पूजे जाते हैं। संकीर्तन परंपरा के संत और महापुरुष हमेशा से यह उपदेश देते आए हैं कि भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग प्रेम और शरणागति है। मीराबाई, सूरदास और चैतन्य महाप्रभु की परंपरा में भी इसी प्रकार की विरह और मिलन की तड़प को सर्वोच्च भक्ति माना गया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक पंजाबी और ब्रज लोक-भक्ति परंपरा की मिश्रित शैली से उपजा हुआ एक अनमोल लोक-गीत है, जिसे पीढ़ियों से संकीर्तन प्रेमियों द्वारा गाया जाता रहा है। इसके रचयिता किसी एक विशिष्ट नाम से भले ही सर्वविख्यात न हों, किंतु यह पंजाब और उत्तर भारत के लोक-संतों और संकीर्तन मंडलों की देन है जिन्होंने इसे जन-जन तक पहुंचाया। इसकी भाषा में पंजाबी और हिंदी (खड़ी बोली/ब्रज प्रभाव) का जो सुंदर मिश्रण है, वह इसकी आत्मीयता को और अधिक बढ़ा देता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा ठेठ लोक-भाषा (पंजाबी मिश्रित हिंदी) है, जो सीधे हृदय में उतरती है। इसमें व्याकरण की जटिलता के बजाय भावनाओं की गहराई को प्राथमिकता दी गई है। 'रूस ना जावीं' (न रूठना), 'चंगे माड़े' (अच्छे-बुरे), 'किस दर जावां' (किस द्वार जाऊं) जैसे प्रयोग इसे अत्यंत सजीव बनाते हैं। रूपक और अनुप्रास अलंकार का स्वतःस्फूर्त प्रयोग इस रचना को एक उच्च कोटि का लोक-काव्य बनाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें सिखाता है कि मनुष्य जीवन नश्वर है और सांसारिक संबंध स्वार्थ पर टिके होते हैं। जब अपने भी पराया व्यवहार करने लगें, तब केवल परमात्मा ही शाश्वत मित्र और रक्षक बचते हैं। अहंकार का त्याग करके अपनी कमजोरियों को भगवान के सामने स्वीकार करना ही सच्चे भक्त का लक्षण है। यह भजन हमें धैर्य, निरंतर स्मरण और भगवान के प्रति अगाध विश्वास की प्रेरणा देता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
रूस ना जावीं नाराज मत होना / रूठना मत भक्त की ईश्वर से कभी दूर न होने की विनती
मोहन मोहने वाले, भगवान श्री कृष्ण आराध्य परमेश्वर का संबोधन
चंगे माड़े अच्छे या बुरे जीव के स्वभाव और उसकी त्रुटियां
अवगुण दोष, पाप या कमियां मानव जीवन की भूले जिन्हें ईश्वर क्षमा करते हैं
प्रीतम प्रियतम, प्रेमी (परमात्मा) आत्मा का परमात्मा से मधुर संबंध
दुखड़े दुख, कष्ट और वेदनाएं संसार की पीड़ाएं जो ईश्वर हरते हैं

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे
भावार्थ: हे मेरे आराध्य मोहन! आप मुझसे कभी रुष्ट मत होना। इस भवसागर में मेरे प्राणों और जीवन का एकमात्र आधार केवल आप ही हैं। आपके बिना मेरा कोई वजूद नहीं है।

पंक्ति: चंगे माड़े असीं हां तेरे, माफ़ तू करदे अवगुण मेरे
भावार्थ: हम चाहे अच्छे हों या बुरे, हैं तो आपके ही बच्चे। मेरे द्वारा किए गए समस्त अपराधों और अवगुणों को अपनी विशाल कृपा से माफ कर दीजिए।

पंक्ति: अपने पराये ताने मारदे, वास्ते तैनू मेरे प्यार दे
भावार्थ: जब संसार के अपने और पराए लोग मुझे ताने मारते हैं और तिरस्कार करते हैं, तो हे प्रभु! मैं आपके पवित्र प्रेम का वास्ता देकर आपसे शरण मांगता हूँ। मुझे अपना लीजिए।

पंक्ति: तू रुसेया ते किस दर जावां, हाल दिलां दा किसनू सुनवा
भावार्थ: यदि आप ही मुझसे मुंह मोड़ लेंगे, तो मैं दुनिया में किस के द्वार पर जाऊंगा? अपने दिल की पीड़ा और दर्द किसे सुनाऊंगा? इस संसार में आपके सिवा कोई मेरे आंसू पोछने वाला नहीं है।

भजन से जुड़े जुड़े श्लोक एवं प्रार्थना | Related Shlok & Prayer

संस्कृति और शास्त्रों में शरणागति का सबसे प्रसिद्ध श्लोक भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:

"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।"

अर्थात: सभी धर्मों (कर्तव्यों और आश्रयों) को मुझमें त्यागकर तू केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर। यही संदेश इस भजन के मूल भाव में जीवंत होता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम रूस ना जावीं मोहन मेरे जीवन मेरा सहारे तेरे (Rus Na Jaavi Mohan Mere)
आराध्य देव भगवान श्री कृष्ण (मोहन, प्रीतम)
मुख्य भाव / रस भक्ति, विरह, शरणागति और विनय रस
भाषा लोक-भाषा (पंजाबी एवं हिंदी मिश्रित)
संगीत शैली पारंपरिक संकीर्तन एवं लोक भजन
उपयुक्त अवसर एकादशी, जन्माष्टमी, सत्संग, और दैनिक संध्या वंदन
मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति और अनन्य प्रेम है। यह सिखाता है कि सुख-दुख चाहे जैसे भी हों, भगवान से कभी दूर नहीं होना चाहिए क्योंकि वही जीवन के एकमात्र सच्चे सहारे हैं।

इस भजन को संध्या आरती, श्री कृष्ण जन्माष्टमी, एकादशी जागरण, मासिक सत्संग और व्यक्तिगत साधना के समय अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।

'मोहन' शब्द का तात्पर्य सबका मन मोहने वाले भगवान श्री कृष्ण से है, जिन्हें भक्त अपने प्रियतम और जीवन का आधार मानता है।

हाँ, इसकी धुन बहुत सरल, धीमी और लयबद्ध होती है, जिससे इसे हारमोनियम या ढोलक की थाप पर आसानी से गाया और सीखा जा सकता है।

भक्ति संगीत और संकीर्तन मन के कोलाहल को शांत करते हैं। जब हम भगवान के सामने अपनी लाचारी और प्रेम व्यक्त करते हैं, तो अहंकार का बोझ कम होता है जिससे गहरी मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

यद्यपि यह एक लोक-भजन है, किंतु इसका मूल दर्शन श्रीमद्भागवत गीता और भक्ति संप्रदायों की 'शरणागति पद्धति' पर पूरी तरह आधारित है।

इस भजन में पंजाबी लोक-बोली और हिंदी (खड़ी बोली) का सहज मिश्रण है, जो उत्तर भारत के संकीर्तन परिवेश में अत्यंत लोकप्रिय है।

आप प्रतिदिन सुबह की पूजा के समय या रात को सोने से पहले इस भजन के बोलों का स्मरण कर सकते हैं या इसे ऑडियो के माध्यम से सुन सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस आलेख को सनातन भक्ति परंपरा, लोक-साहित्य और संकीर्तन के मानदंडों को ध्यान में रखते हुए प्रामाणिक और भावपूर्ण रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को आध्यात्मिक आनंद और मानसिक शांति प्रदान करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक संकीर्तन एवं लोक-भजन संग्रह
  • श्रीमद्भागवत गीता (शरणागति योग प्रसंग)
  • भक्ति रसामृत सिंधु - श्री रूप गोस्वामी
  • सनातन धर्म एवं लोक-साहित्य सांस्कृतिक कोष

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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