भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

मत कर तू अभिमान रे बंदे जूठी तेरी शान रे (Mat Kar Tu Abhiman Re Bande Juthi Teri Shaan Lyrics in Hindi)

पढ़ें मत कर तू अभिमान रे बंदे जूठी तेरी शान रे (Mat Kar Tu Abhiman Re Bande Juthi Teri Shaan Lyrics in Hindi) - Bhaktilok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिं

परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

मानव जीवन ईश्वर की दी हुई एक अमूल्य और दुर्लभ भेंट है, जिसे बड़े सौभाग्य से प्राप्त किया जाता है। परंतु अज्ञानता और माया के प्रभाव में आकर मनुष्य इस नश्वर संसार की भौतिक वस्तुओं, धन-संपत्ति, पद-प्रतिष्ठा और अपनी काया पर गर्व करने लगता है। "मत कर तू अभिमान रे बंदे जूठी तेरी शान रे" यह परम पावन और लोक-प्रिय वैराग्य भजन मनुष्य की इसी भूल को उजागर करता है और उसे वास्तविकता का बोध कराता है। इस भजन का मुख्य भाव (Bhava) वैराग्य, विरक्ति, आत्म-सुधार और भगवद-स्मरण है। संत-महापुरुषों और भक्तों की परंपरा में ऐसे भजनों का विशेष स्थान रहा है जो अहंकार के पर्वत को गिराकर जीव के भीतर विनम्रता और भक्ति के दीप को प्रज्वलित करते हैं। जब-जब मनुष्य सांसारिक चकाचौंध में उलझकर अपने वास्तविक स्वरूप यानी आत्मा को भूल जाता है, तब-तब इस प्रकार के आध्यात्मिक पद उसे चेताने का कार्य करते हैं। इस लेख में हम इस अमर भजन के संपूर्ण बोल (Lyrics), पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ, दार्शनिक महत्व, कठिन शब्दों के अर्थ और जीवनोपयोगी संदेशों का विस्तार से अध्ययन करेंगे ताकि साधक इसे गाकर आत्मिक शांति और परमानंद की प्राप्ति कर सकें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मखड़ा):

मत कर तू अभिमान रे बंदे जूठी तेरी शान रे ।
मत कर तू अभिमान ॥

अंतरा 1:

तेरे जैसे लाखों आये, लाखों इस माटी ने खाए ।
रहा ना नाम निशान रे बंदे, मत कर तू अभिमान ॥

अंतरा 2:

माया का अन्धकार निराला, बाहर उजला अन्दर काला ।
इस को तू पहचान रे बंदे, मत कर तू अभिमान ॥

अंतरा 3:

तेरे पास हैं हीरे मोती, मेरे मन मंदिर में ज्योति ।
कौन हुआ धनवान रे बंदे, मत कर तू अभिमान ॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस अद्भुत भजन की प्रत्येक पंक्ति में जीवन का परम सत्य छिपा हुआ है। रचनाकार ने अत्यंत सरल शब्दों में वेदों और उपनिषदों के उस गहरे दर्शन को उतार दिया है, जिसे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी अपने प्रवचनों में समझाते हैं। भजन का मुख्य संदेश अहंकार का त्याग करना है। 'मत कर तू अभिमान रे बंदे' पंक्ति हमें यह चेतावनी देती है कि यह शरीर, यह धन और यह यौवन सदा रहने वाले नहीं हैं। जिस प्रकार नदी का पानी सदा एक सा नहीं रहता, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन और उसकी भौतिक शानो-शौकत भी क्षणभंगुर है।

भजन की दूसरी कड़ी में कहा गया है कि 'तेरे जैसे लाखों आये, लाखों इस माटी ने खाए'। इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि इस पृथ्वी पर न जाने कितने सम्राट, योद्धा, धनी और बलवान आए और अंत में इसी पंचतत्व रूपी माटी में विलीन हो गए। आज उनका नामलेवा भी कोई नहीं बचा है। इतिहास के पन्नों में केवल उनकी कथाएं शेष रह जाती हैं, इसलिए अपनी इस नश्वर काया पर घमंड करना सबसे बड़ी मूर्खता है।

आगे के चरण में माया के स्वरूप का पर्दाफाश किया गया है। 'माया का अन्धकार निराला, बाहर उजला अन्दर काला' पंक्ति यह दर्शाती है कि सांसारिक आकर्षण देखने में बहुत सुंदर, चमकदार और लुभावने लगते हैं, परंतु उनके भीतर केवल मोह, दुःख, छल और अंधकार होता है। जो मनुष्य इस माया जाल को पहचान लेता है, वही सच्चा ज्ञानी बनता है। अंत में धन और आंतरिक ऐश्वर्य की तुलना करते हुए कहा गया है कि बाहरी हीरे-मोती व्यर्थ हैं यदि भीतर प्रभु के नाम की ज्योति नहीं जल रही। सच्चा धनवान वही है जिसके हृदय में ईश्वर की भक्ति और संतोष का प्रकाश है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला एक आध्यात्मिक दर्शन है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • वैराग्य भावना की प्रधानता: यह भजन मनुष्य के मन से सांसारिक मोह-माया और अहंकार को दूर कर वैराग्य की ओर प्रेरित करता है।
  • सार्वभौमिक संदेश: यह किसी विशेष जाति, वर्ग या पंथ से जुड़ा नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए है।
  • सरल एवं प्रभावशाली भाषा: इसे आम बोलचाल की हिंदी और अवधी-ब्रज के संमिश्रण से रचा गया है, जिससे यह आसानी से समझ में आ जाता है और जुबान पर चढ़ जाता है।
  • मानसिक शांति का साधन: इस भजन को सुनने या गाने से मन का तनाव, ईर्ष्या, द्वेष और घमंड स्वतः समाप्त होने लगता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत के जानकारों के अनुसार, ऐसे वैराग्यपूर्ण भजनों को गाने और सुनने का विशेष समय और नियम होता है:

  • ब्रह्म मुहूर्त या प्रातः काल: सुबह उठकर शांत वातावरण में इस भजन का स्मरण करने से पूरा दिन सकारात्मकता और विनम्रता से बीतता है।
  • संध्यावसान या विश्राम से पूर्व: रात को सोने से पहले दिनभर के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए यदि इस भजन को गुनगुनाया जाए, तो अहंकार का शमन होता है और गाढ़ी नींद आती है।
  • सत्संग एवं धार्मिक अनुष्ठान: मंदिर के प्रांगण में, धार्मिक सभाओं में, एकादशी जागरण या संकट मोचन सत्संग के दौरान इस भजन को सामूहिक रूप से गाया जाता है।
  • विधि: एकाग्रचित्त होकर, आंखें बंद करके, श्वासों पर नियंत्रण रखते हुए इस भजन के अर्थ पर विचार करते हुए इसका पाठ करना चाहिए।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भारतीय लोक परंपरा और संतवाणी में इस प्रकार के भजन पीढ़ियों से मौखिक और लिखित रूप में गाए जाते रहे हैं। यह पद पारंपरिक संत काव्य (Traditional Sant Vani) का हिस्सा है, जिसे कबीरपंथी, दादू पंथी और उदासीन संप्रदाय के महात्माओं द्वारा जन-जन तक पहुंचाया गया। इसकी रचना का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त दिखावे, अहंकार और भौतिकता की अंधी दौड़ पर प्रहार करना था। संत महात्माओं ने हमेशा से यह सिखाया है कि भगवान को पाने का मार्ग विनम्रता से होकर जाता है, और अभिमान उस मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन में लोक-साहित्य की सुमधुर शैली का प्रयोग किया गया है। इसमें अनुप्रास और यमक अलंकारों की स्वाभाविक छटा देखने को मिलती है जैसे 'शान' और 'मान', 'आये' और 'खाये'। भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहमयी और हृदयस्पर्शी है। इसमें रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग करते हुए माया को अंधेरे से और मन को मंदिर से जोड़ा गया है। यह शैली श्रोता के हृदय को सीधे स्पर्श करती है और उसे सोचने पर मजबूर कर देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस भजन से हमें निम्नलिखित अमूल्य जीवन सीख मिलती हैं:

  1. अहकार का सर्वनाश: अभिमान मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। रावण और दुर्योधन जैसे बलशाली भी अहंकार के कारण नष्ट हो गए, इसलिए जीवन में हमेशा विनम्र रहना चाहिए।
  2. नश्वरता का बोध: यह शरीर माटी का पुतला है और एक दिन इसी में मिल जाना है। अतः अपनी सुंदरता या बल पर घमंड नहीं करना चाहिए।
  3. माया की पहचान: संसार की सुख-सुविधाएं क्षणिक हैं। इनके पीछे भागने के बजाय अपने अंतःकरण को शुद्ध करना चाहिए।
  4. आंतरिक धन की महत्ता: बाहरी धन-दौलत और दिखावे से आत्मा को तृप्ति नहीं मिलती। सच्ची समृद्धि भगवान के स्मरण और भक्ति में है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
अभिमान घमंड, गर्व अज्ञानता के कारण उत्पन्न होने वाला मोह जो जीव को भगवान से दूर करता है।
जूठी शान दिखावे की प्रतिष्ठा संसार की वह झूठी चमक जो कुछ समय की है और अंत में नष्ट हो जाती है।
माटी मिट्टी यह पंचतत्व रूप जिससे शरीर का निर्माण हुआ है और अंत में जिसे इसी में मिलना है।
माया प्रकृति का भ्रमित करने वाला आवरण ईश्वर की वह शक्ति जो जीव को वास्तविक सत्य से भटकाकर संसार में बांधती है।
मन मंदिर हृदय रूपी मंदिर वह पवित्र स्थान जहां आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है।
ज्योति प्रकाश, चेतना आत्मीय ज्ञान और भगवद भक्ति का प्रकाश।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "मत कर तू अभिमान रे बंदे जूठी तेरी शान रे, मत कर तू अभिमान ॥"
भावार्थ: हे मनुष्य! तू इस नश्वर संसार में अपनी धन-दौलत, पद और रूप पर घमंड मत कर, क्योंकि यह तेरी शान बिल्कुल झूठी और क्षणिक है। अहंकार मनुष्य का पतन करता है, इसलिए इसे त्याग दे।

2. "तेरे जैसे लाखों आये, लाखों इस माटी ने खाए, रहा ना नाम निशान रे बंदे, मत कर तू अभिमान ॥"
भावार्थ: इस धरती पर तुझसे पहले बड़े-बड़े बलवान और धनी लोग आए थे, जिन्हें अंततः इसी मिट्टी ने अपने भीतर समा लिया। आज उनका दुनिया में नामोनिशान भी नहीं बचा है। फिर तू किस बात पर इतरा रहा है?

3. "माया का अन्धकार निराला, बाहर उजला अन्दर काला, इस को तू पहचान रे बंदे, मत कर तू अभिमान ॥"
भावार्थ: इस संसार की माया का जादू बड़ा अजीब है। यह बाहर से बहुत सुंदर और आकर्षक दिखाई देती है, परंतु इसके भीतर दुखों, मोह और अज्ञानता का घना अंधेरा छिपा होता है। इस सत्य को पहचान ले।

4. "तेरे पास हैं हीरे मोती, मेरे मन मंदिर में ज्योति, कौन हुआ धनवान रे बंदे, मत कर तू अभिमान ॥"
भावार्थ: तेरे पास भले ही संसार के कीमती हीरे-जवाहरात और धन हो, लेकिन यदि मेरे हृदय रूपी मंदिर में भगवान के नाम की ज्योति जल रही है, तो बता—वास्तविक धनवान कौन हुआ? असली धनी वही है जिसके पास भक्ति का धन है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

वैराग्य और अहंकार त्याग के संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता और वेदों में कई पावन श्लोक मिलते हैं:

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 18)

भावार्थ: अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध से युक्त, ये दंभ लोग अपने शरीर में और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाले और ईर्ष्यालु होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि अहंकार मनुष्य को भगवान से दूर कर देता है।

इसके अतिरिक्त, श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से भी मन में सात्विकता और अहंकार शून्यता का भाव जागृत होता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम मत कर तू अभिमान रे बंदे जूठी तेरी शान रे
श्रेणी वैराग्य भजन / संत वाणी / भक्ति गीत
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधी लोक भाषा
मुख्य भाव अहंकार त्याग, वैराग्य, भक्ति, आत्म-बोध
लक्ष्य श्रोता समस्त भक्तगण एवं आध्यात्मिक साधक
गाने का उपयुक्त समय प्रातः काल, सत्संग, एकादशी एवं भजन संध्या

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अपने शरीर, धन, बल और प्रतिष्ठा पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह संसार और इसकी भौतिक वस्तुएं नश्वर हैं। सच्ची संपत्ति भगवान की भक्ति और विनम्रता है।

यह भजन पारंपरिक संत वाणी और वैराग्य भजन की श्रेणी में आता है, जिसे भारत के विभिन्न संतों और लोक गायकों द्वारा प्रेम और विरक्ति के भाव से गाया जाता है।

शास्त्रों और संतों के अनुसार अभिमान मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है और उसे समाज तथा भगवान दोनों से दूर कर देता है। अंत में सब कुछ यहीं छूट जाना है, इसलिए अहंकार व्यर्थ है।

इस पंक्ति का अर्थ है कि सांसारिक मोह-माया बाहर से बहुत सुंदर, चमकदार और लुभावनी प्रतीत होती है (जैसे कांच का टुकड़ा चमकता है), परंतु इसके संपर्क में आने से मनुष्य अज्ञान और दुखों के अंधेरे में डूब जाता है।

इस भजन को प्रातः काल ध्यान के समय, सत्संग में, या शांत एकांत में मन को संयमित करने के लिए गाया जा सकता है। इसे शब्दों के अर्थ पर विचार करते हुए भावपूर्ण स्वर में गाना चाहिए।

हाँ, बच्चों में बचपन से ही विनम्रता, नैतिकता और आध्यात्मिकता के संस्कार डालने के लिए ऐसे भजनों का अभ्यास कराना अत्यंत लाभकारी माना गया है।

जब हम इस भजन को गाते हैं तो हमारा ध्यान संसार की दौड़-भाग से हटकर आत्मा और परमात्मा की वास्तविकता पर केंद्रित होता है, जिससे मन का अहंकार और तनाव कम होता है और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

यह भजन भारतीय सनातन धर्म की वेदांत और भक्ति मार्ग की परंपरा से जुड़ा है, जो 'अहं ब्रह्मास्मि' और 'जीव और ईश्वर' के मूल स्वरूप की पहचान पर बल देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिकुल (Bhaktilok) परिवार द्वारा प्रकाशित यह सामग्री सनातन धर्म की संत वाणी, लोक भजनों और उपनिषदों के दार्शनिक सिद्धांतों पर आधारित है। पाठकों को सटीक, प्रामाणिक और हृदयग्राही सामग्री उपलब्ध कराने के लिए इसे विद्वान आचार्यों के मार्गदर्शन में तैयार किया गया है। यह लेख पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है, जिसमें किसी भी प्रकार के अनधिकृत दावों से बचा गया है ताकि पाठक शुद्ध भक्ति और ज्ञान प्राप्त कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशन।
  • भारतीय संत साहित्य एवं लोक भजन संग्रह - तृतीय खंड।
  • उपनिषद् दर्शन एवं वैराग्य शतक - महर्षि भर्तृहरि कृत।
  • पारंपरिक लोक गाथाएं एवं संतवाणी कोष।

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!