"कन्हैया लाज बचा जाओ" सनातन धर्म के अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भजनों में से एक है। यह भजन 'आर्त भाव' और 'अनन्य शरणागति' (पूर्ण समर्पण) की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है। महाभारत के ऐतिहासिक और अत्यंत संवेदनशील प्रसंग 'द्रौपदी चीरहरण' पर आधारित यह भजन जीवात्मा की उस पुकार को दर्शाता है, जब वह संसार के सभी आश्रयों को व्यर्थ पाकर केवल और केवल परमात्मा की शरण में जाती है। जब मनुष्य के अपने बल, बुद्धि, सगे-संबंधी और सांसारिक साधन निष्फल हो जाते हैं, तब हृदय की अतल गहराइयों से निकली करुण पुकार ही भगवान श्रीकृष्ण (कन्हैया) को द्वारका से दौड़े आने पर विवश कर देती है। इस भजन को अत्यंत करुण रस और समर्पण भाव के साथ गाया जाता है, जो श्रोताओं और गायकों के नेत्रों में अश्रुधारा प्रवाहित कर देता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
कन्हैया लाज बचा जाओ
तर्ज- कन्हैया ले चल परली पार
कन्हैया लाज बचा जाओ-2
खीच रहा मेरा चीर दुशासन
आके बचा जाओ।। कन्हैया.....
द्रोपति तुझको पुकार रही है
रो रो नीर बहाय रही है
दुखड़ा अपना सुनाए रही है
धीर नही अब मोहन मुझ में
जरा धीर बंधा जाओ।। कन्हैया.....
अपनो की मुझे आस नही है
कोई दूसरी राह नही है
खुद पर भी विश्वास नहीं है
निर्बल हो गए हाथ ये मेरे
जरा बल ही बड़ा जाओ।। कन्हैया.....
लाज गई तो कुछ ना बचेगा
मर मर कर फिर जीना पड़ेगा
बहन पुकारे ओ मेरे भैया
जरा कर्ज चुका जाओ।। कन्हैया....
बहन की सुनकर दौड़ा आया
चीर बढ़ा कर लाज बचाया
हर एक को ये नजर ना आया
"गौतम" कहता तेरी महिमा
तुम ही सुना जाओ।। कन्हैया.....
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और दार्शनिक है। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन की उस स्थिति का प्रतीक है जब वह माया और विकारों (दुशासन) द्वारा घेरा जाता है।
भजन के प्रथम भाग में द्रौपदी के माध्यम से जीवात्मा पुकारती है कि हे कन्हैया! दुशासन रूपी संसार मेरे शील, मेरी मर्यादा और मेरी आत्मा के वस्त्र (चीर) को खींच रहा है। इस संकट की घड़ी में आपके अतिरिक्त मेरा कोई रक्षक नहीं है। द्रौपदी अश्रु बहाते हुए अपने मोहन को पुकार रही है क्योंकि अब उसके भीतर का धैर्य समाप्त हो चुका है।
भजन का सबसे मर्मस्पर्शी अंश वह है जहां द्रौपदी कहती है कि "अपनो की मुझे आस नही है"। कुरुसभा में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, महाराज धृतराष्ट्र और स्वयं उनके पराक्रमी पति युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव उपस्थित थे, किंतु कोई भी उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आया। यह इस बात का प्रतीक है कि संकट के समय सांसारिक संबंध और सांसारिक शक्ति काम नहीं आती। जब द्रौपदी अपने दोनों हाथ उठाकर, अपने स्वयं के बल का अहंकार छोड़कर भगवान को पुकारती है, तब भगवान अनंत वस्त्र बनकर उसकी लाज बचाते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर की कृपा वहीं से शुरू होती है जहां मनुष्य के अहंकार का अंत होता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- आर्त भक्ति का प्रतीक: श्रीमद्भागवत महापुराण में चार प्रकार के भक्तों (आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी) का वर्णन है। यह भजन 'आर्त भक्ति' का सर्वोत्तम उदाहरण है, जहां भक्त अत्यंत संकट में भगवान को पुकारता है।
- शरणागति का सिद्धांत: जब तक द्रौपदी ने अपने दांतों से साड़ी का छोर पकड़ रखा था (अर्थात अपना बल लगा रही थी), तब तक भगवान नहीं आए। जैसे ही उसने दोनों हाथ उठाकर पूर्ण आत्मसमर्पण किया, भगवान तुरंत प्रकट हो गए।
- सच्चे संबंध की पहचान: यह भजन दर्शाता है कि संसार के सारे नाते-रिश्ते नाशवान और स्वार्थी हो सकते हैं, परंतु परमात्मा के साथ जीव का नाता (जैसे द्रौपदी का श्रीकृष्ण के साथ भाई-बहन का नाता) शाश्वत और सच्चा है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष समय की बाध्यता नहीं है, परंतु इसे निम्नलिखित अवसरों पर गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
- संध्या आरती के समय: संध्याकाल में जब मन शांत होता है, तब इस भजन का गायन करने से मन में वैराग्य और ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत होता है।
- सत्संग और कीर्तन में: सामूहिक संकीर्तन के दौरान इस भजन को गाने से वातावरण अत्यंत भक्तिमय और करुणामय हो जाता है।
- संकट काल में: जब मनुष्य स्वयं को जीवन की कठिनाइयों से घिरा हुआ पाए और कोई मार्ग न दिखे, तब एकांत में बैठकर इस भजन का स्मरण करने से अद्भुत मानसिक शांति और संबल प्राप्त होता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण (द्वारकाधीश रूप में) और उनकी अनन्य भक्त देवी द्रौपदी को समर्पित है। महाभारत के अनुसार, द्रौपदी पूर्वजन्म में एक तपस्विनी थीं और इस जन्म में वे श्रीकृष्ण की सखी और मानस-बहन थीं। श्रीकृष्ण ने उन्हें 'कृष्णा' नाम दिया था। इस भजन के अंत में "गौतम" नाम के कवि का उल्लेख आता है, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से इस करुण प्रसंग को अत्यंत सरल और सुगम शब्दों में पिरोया है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि महाभारत के 'सभा पर्व' से ली गई है। द्यूत क्रीड़ा (जुआ) में जब पांडव अपना सब कुछ हार गए, जिसमें उन्होंने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया और हार गए, तब दुर्योधन के आदेश पर दुशासन द्रौपदी को केशों से पकड़कर घसीटते हुए सभा में लाया। वहां उसने द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया। उस समय द्रौपदी ने कुरुवंश के सभी वीरों से न्याय की भीख मांगी, परंतु सब मौन रहे। अंत में, निराश होकर द्रौपदी ने द्वारकाधीश श्रीकृष्ण का ध्यान किया और भगवान ने अदृश्य रूप से आकर वस्त्र अवतार ले लिया, जिससे दुशासन थककर गिर गया परंतु वस्त्र समाप्त नहीं हुआ।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कहीं-कहीं ब्रजभाषा के मधुर शब्दों का पुट मिलता है। इसकी काव्य शैली 'प्रार्थना गीत' या 'विनय पद' जैसी है। इसमें करुण रस की प्रधानता है। "धीर बंधा जाओ", "कर्ज चुका जाओ" जैसे मुहावरों का प्रयोग गीत को अधिक प्रभावशाली और मर्मस्पर्शी बनाता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक और आध्यात्मिक संदेश देता है:
- अहंकार का त्याग: जब तक मनुष्य को अपनी शक्ति, धन या संबंधों का घमंड रहता है, तब तक वह ईश्वर की पूर्ण कृपा का अनुभव नहीं कर पाता। पूर्ण शरणागति ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है।
- ईश्वर पर अटूट विश्वास: विषम से विषम परिस्थितियों में भी यह विश्वास बनाए रखना चाहिए कि भगवान हमारी पुकार अवश्य सुनेंगे।
- संसार की असारता: संकट के समय संसार के लोग पीछे हट सकते हैं, परंतु परमात्मा कभी अपने भक्त का साथ नहीं छोड़ते।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| कन्हैया | भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय नाम | भक्तों द्वारा प्रेम से पुकारा जाने वाला नाम। |
| लाज | मर्यादा, सम्मान, प्रतिष्ठा | जीवात्मा की पवित्रता और गरिमा। |
| चीर | वस्त्र, साड़ी | संसार में जीव का आवरण या शरीर। |
| दुशासन | बुरा शासन या दुष्ट प्रवृत्ति | संसार के विकार, वासनाएं और कठिनाइयां। |
| नीर | आंसू, जल | भक्त के हृदय की व्याकुलता और अश्रु। |
| धीर | धैर्य, धीरज | कठिन समय में मन की स्थिरता। |
| निर्बल | बलहीन, कमजोर | जब मनुष्य अपने सारे प्रयास कर हार जाता है। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"कन्हैया लाज बचा जाओ... खीच रहा मेरा चीर दुशासन आके बचा जाओ।"
हे कृष्ण! मेरी मर्यादा संकट में है। दुशासन रूपी बुराइयां मेरी आत्मा के वस्त्र को खींच रही हैं। आप तुरंत आकर मेरी रक्षा करें।
"द्रोपति तुझको पुकार रही है... जरा धीर बंधा जाओ।"
द्रौपदी रो-रोकर अपने आंसू बहा रही है और आपको अपना दुख सुना रही है। अब उसके भीतर सहन करने की शक्ति नहीं बची है, आप आकर उसे सांत्वना दें।
"अपनो की मुझे आस नही है... जरा बल ही बड़ा जाओ।"
मुझे अब अपने सगे-संबंधियों से कोई आशा नहीं है। मुझे स्वयं की शक्ति पर भी भरोसा नहीं रहा। मेरे हाथ थक चुके हैं, आप ही मुझे आत्मबल प्रदान करें।
"लाज गई तो कुछ ना बचेगा... जरा कर्ज चुका जाओ।"
यदि आज मेरी मर्यादा नष्ट हो गई, तो मेरा जीवन मृत समान हो जाएगा। हे भैया कृष्ण! आपने जो रक्षा का वचन दिया था, आज उस कर्तव्य और कर्ज को निभाने का समय आ गया है।
"बहन की सुनकर दौड़ा आया... तुम ही सुना जाओ।"
अपनी बहन की करुण पुकार सुनकर भगवान नंगे पैर दौड़े चले आए और वस्त्र बढ़ाकर उसकी लाज बचाई। कवि गौतम कहते हैं कि प्रभु की इस लीला और महिमा का गान स्वयं भगवान ही कर सकते हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
महाभारत के सभा पर्व में द्रौपदी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति में गाया गया प्रसिद्ध श्लोक इस प्रकार है:
"शंखचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत।
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागतम्॥"
अर्थ: हे हाथ में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, हे द्वारकावासी अच्युत, हे गोविन्द, हे कमलनेत्र! मैं आपकी शरण में आई हूँ, मेरी रक्षा करें।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | कन्हैया लाज बचा जाओ |
|---|---|
| मुख्य देवी-देवता | भगवान श्रीकृष्ण (द्वारकाधीश) |
| मुख्य चरित्र | देवी द्रौपदी |
| काव्य शैली | करुण रस प्रधान प्रार्थना गीत |
| तर्ज (धुन) | कन्हैया ले चल परली पार |
| मुख्य संदेश | पूर्ण शरणागति और ईश्वर पर अटूट विश्वास |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, संध्या प्रार्थना, जन्माष्टमी, संकट काल |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों जैसे महाभारत (सभा पर्व) और श्रीमद्भागवत महापुराण के सिद्धांतों के आलोक में तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और भक्तिमय जानकारी पहुंचाना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- महाभारत: वेदव्यास रचित महाभारत का 'सभा पर्व' (द्रौपदी वस्त्रहरण प्रसंग)।
- श्रीमद्भागवत महापुराण: भगवान श्रीकृष्ण की शरणागति और भक्त-वत्सलता के प्रसंग।
- पारंपरिक संकीर्तन संग्रह: वैष्णव संतों द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक विनय के पद।
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