देवादिदेव महादेव और नटवर नागर की अलौकिक मिलन कथा
सनातन धर्म और भक्ति परंपरा में देवादिदेव महादेव और भगवान श्रीकृष्ण का संबंध केवल आराध्य और भक्त का नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के दो सर्वोच्च स्वरूपों का अद्भुत और रहस्यमयी समन्वय है। जब भी वैराग्य के अधिपति शिव और प्रेम के सागर कृष्ण की लीलाएं आपस में मिलती हैं, तो एक ऐसा आध्यात्मिक वातावरण बनता है जो भक्त के मन को सुदूर लोक की यात्रा पर ले जाता है। प्रस्तुत भजन "शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद के (dware nand re Shiv ji ne naad bajaya Lyrics in Hindi)" उसी महान दार्शनिक और पौराणिक प्रसंग का जीवंत और काव्यात्मक चित्रण करता है, जहां कैलाश के मूक योगी, श्मशान के वासी और संहारक महाकाल, अपनी संपूर्ण योग-साधना को छोड़कर गोकुल की गलियों में, नंद बाबा के द्वार पर आकर अपने डमरू का नाद बजाते हैं। यह भजन न केवल संगीतमय संकीर्तन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि इसमें शिव के अगाध वैराग्य और यशोदा नंदन के बाल-सौंदर्य के दर्शन की उत्कंठा का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, इसका गहन भावार्थ, इसके पीछे की पौराणिक पृष्ठभूमि, गायन की विधि और इसके आध्यात्मिक रहस्यों का सविस्तार अध्ययन करेंगे, ताकि साधक इसे पूरी तल्लीनता और शुद्ध उच्चारण के साथ स्मरण कर सकें।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
स्थायी (मukhda):
शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद के (dware nand re Shiv ji ne naad bajaya Lyrics in Hindi)
द्वारे नंद रे...
शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद रे
शिवजी ने नाद बजाया द्वारे नंद रे
नाद बजाया हरि के गुण गाया…
मेरे शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद रे
प्रथम अंतरा:
नंद मेहला से आयी नंद रानी, मोती थाल सजाया
ले भिक्षा बाबा घर जा अपने, तें मेरा बालक डराया
द्वारे नंद रे...
द्वितीय अंतरा:
क्या करनी तेरी दोलत दुनिया, क्या करनी तेरी माया
बालक अपने का मुख तू दिखायी दे, शिव कैलाशों ते आया...
द्वारे नन्द रे...
तृतीय अंतरा:
रो रो हारी नगरी सारी, श्याम ने सभी को रुलाया
कोई तो कान्हा को चुप करायी दे, योगी ने जादू चलाया…
द्वारे नंद रे...
चतुर्थ अंतरा (अंतिम भाग):
बोलेया भोला यशोदा रानी, तें क्यों जुल्म कमाया
दर्शन करने को कृष्ण कन्हैया रे, नंगे पाँव कैलाश ते आया
द्वारे नंद रे...
बोलो शंकर भगवान की जय! हर हर महादेव!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस अद्भुत भजन की शुरुआत इस दृश्य से होती है कि भगवान शिव अपने त्रिशूल, डमरू और सर्प की माला धारण किए हुए सीधे गोकुल में नंद बाबा के दरबार में जा पहुंचते हैं। देवादिदेव महादेव, जो सामान्यतः कैलाश पर्वत की बर्फीली कंदराओं में ध्यानमग्न रहते हैं अथवा श्मशान की धूलि रमाने वाले अघोर रूप में विचरते हैं, वे द्वापर युग में बालकृष्ण के दर्शन के लिए लालायित होकर ब्रजभूमि में आ धमके हैं। भजन के मुखड़े में ही इस बात पर बल दिया गया है कि 'शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद के' - अर्थात डमरू की वह ध्वनि जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति और प्रलय का प्रतीक है, आज नंद बाबा के घर के बाहर गूंज रही है। यह नाद साधारण संगीत नहीं, बल्कि उस परम चेतना का आह्वान है जो गोलोकपति और कैलाशपति के मिलन की प्रस्तावना लिख रहा है।
जब माता यशोदा महलों से बाहर निकलकर आती हैं, तो उनके हाथों में मोतियों से सजा हुआ थाल होता है। वे शिवजी को एक साधारण साधु या भिक्षुक समझकर उन्हें भिक्षा देना चाहती हैं और कहती हैं कि 'ले भिक्षा बाबा घर जा अपने, तें मेरा बालक डराया'। यहाँ माता यशोदा का यह कथन लोक-संस्कृति का एक सुंदर प्रसंग प्रस्तुत करता है जहाँ एक माँ अपने छोटे से बालक कन्हैया की रक्षा के लिए किसी भी अजनबी भयानक दिखने वाले योगी से थोड़ा भयभीत हो जाती है। शिवजी का भयंकर रूप - जटाएं, गले में नाग, और भस्म रमी देह - देखकर माता यशोदा समझती हैं कि यह कोई अवधूत उनके नन्हे कन्हैया को डरा रहा है।
इसके उत्तर में भगवान शिव जो कहते हैं, वह इस पूरे भजन का दार्शनिक और आध्यात्मिक सार है। शिव कहते हैं— 'क्या करनी तेरी दोलत दुनिया, क्या करनी तेरी माया? बालक अपने का मुख तू दिखायी दे, शिव कैलाशों ते आया...' इसका अर्थ है कि शिवजी को संसार की किसी भी भौतिक सुख-सुविधा, धन या माया की कोई लालसा नहीं है। वे तो केवल और केवल अपने आराध्य नारायण के बाल रूप का दर्शन करने के लिए मीलों दूर कैलाश से नंगे पांव चलकर आए हैं। भजन के अंत में जब यशोदा रानी को यह ज्ञात होता है कि यह साधारण भिक्षुक नहीं स्वयं देवादिदेव महादेव हैं जो उनके लाल के दर्शन के लिए आए हैं, तो वात्सल्य और भक्ति का एक नया प्रवाह बह निकलता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान के दर्शन के लिए बड़े-बड़े यज्ञ और अनुष्ठान उतने आवश्यक नहीं हैं, जितनी तड़प और सच्ची भावना आवश्यक है, जैसी शिवजी के हृदय में कृष्ण दर्शन के लिए थी। इस प्रकार के प्रेरक प्रसंगों के लिए आप हमारे शिव तांडव स्तोत्र और श्री हनुमान चालीसा के पावन लेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन सनातन संस्कृति की उस महान परंपरा का प्रतीक है जहाँ शैव और वैष्णव मतों में कोई भेद नहीं माना जाता। हरि और हर एक ही परम सत्य के दो अलग-अलग पहलू हैं। भजन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- अद्वैत का संदेश: शिव और कृष्ण का यह मिलन यह सिद्ध करता है कि जगत के पालनहार विष्णु और संहारक शिव में अंततः कोई भिन्नता नहीं है।
- वैराग्य और भक्ति का संगम: जहाँ शिव परम वैरागी हैं, वहीं कृष्ण परम रस और प्रेम के प्रतीक हैं। दोनों का यह प्रसंग साधक को भक्ति और ज्ञान का संतुलन सिखाता है।
- लोक-भाषा का माधुर्य: यह भजन ब्रजभाषा और ठेठ हिंदी के सुंदर मिश्रण से रचा गया है, जो सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करता है।
- वात्सल्य रस की प्रधानता: माता यशोदा का ममतामयी भय और शिवजी की बाल-दर्शन की व्याकुलता इस भजन को अत्यंत भावनात्मक बनाती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पावन भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठोर नियम नहीं हैं, तथापि इसे निम्नलिखित अवसरों पर करने से विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है:
- महाशिवरात्रि और जन्माष्टमी: इन दोनों महापर्वों पर इस भजन का संकीर्तन करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
- प्रदोष काल और सोमवार पूजा: भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत या सोमवार के दिन संध्या वंदन के समय इसे गाया जा सकता है।
- पारिवारिक सत्संग और जागरण: रात्रि के समय जब पूरा परिवार मिलकर माता के भजन या संकीर्तन का आयोजन करता है, तब इस भजन को गाकर वातावरण को पूरी तरह से भक्तिमय बनाया जा सकता है।
- ध्यान और मानसिक शांति के समय: जब मन अशांत हो, तब इस भजन के बोलों का मानसिक स्मरण करने से चित्त को असीम शांति मिलती है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में दो प्रमुख दृष्टियां हैं - प्रथम देवादिदेव महादेव (शिव) और द्वितीय नंदनंदन भगवान श्रीकृष्ण। शिवजी को वेदों में 'रुद्र' कहा गया है जो समस्त दुखों को हरने वाले हैं, जबकि कृष्ण को 'आनंदकंद' कहा गया है जो प्राणी मात्र के हृदय में प्रेम का संचार करते हैं। पारंपरिक लोक-साहित्य और संकीर्तनों में ऐसे अनगिनत पद अनाम संतों और लोक-कवियों द्वारा रचे गए हैं जिन्होंने पौराणिक कथाओं को जन-जन तक पहुँचाने का महान कार्य किया है। इन संतों का मुख्य उद्देश्य दार्शनिक सत्यों को कथाओं के माध्यम से सरल बनाना था ताकि आम आदमी भी भक्ति के रस में सराबोर हो सके।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
भजन की रचना लोक-साहित्य (Folk Tradition) की उस समृद्ध शैली पर आधारित है जिसमें पुराणों की कथाओं को स्थानीय बोलियों के संपुट में ढालकर प्रस्तुत किया जाता है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि यहाँ कथाएं केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे माताओं की लोरियों, लोक-गीतों और संकीर्तन मंडलियों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। "शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद के" भी उसी मौखिक और पारंपरिक लोक-साहित्य का एक अनमोल रत्न है जिसे उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और प्रवाहमयी है। इसमें ब्रजभाषा और खड़ी बोली के शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है जैसे 'मेहला', 'तें मेरा बालक', 'बोलेया', 'कैलाशों ते आया' आदि। यह लोक-शैली की विशेषता है जो व्याकरण की औपचारिकताओं से परे सीधे जनमानस के भावों से जुड़ती है। भजन में डमरू के नाद का बिंब (Imagery) और यशोदा रानी के वात्सल्य का दृश्य अत्यंत सजीव बन पड़ा है, जिससे श्रोता की कल्पना शक्ति तुरंत गोकुल के प्रांगण में पहुँच जाती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें जीवन के कई गहरे दार्शनिक और व्यावहारिक संदेश देता है:
- भगवान के सामने अहंकार का त्याग: जैसे शिवजी ने कैलाश के अधिपति होने का अहंकार छोड़कर एक साधारण याची की तरह नंद बाबा के द्वार पर दस्तक दी, वैसे ही भक्त को भी ईश्वर के दरबार में दीनता और समर्पण भाव से जाना चाहिए।
- माया से विरक्ति: शिवजी का यह कथन कि "क्या करनी तेरी दोलत दुनिया, क्या करनी तेरी माया" हमें सिखाता है कि भौतिक संचय से अधिक महत्वपूर्ण परमात्मा का सान्निध्य है।
- भक्ति में कोई भेद नहीं: शैव और वैष्णव का भेद केवल अज्ञानियों का है, ज्ञानी भक्त जानता है कि राम, कृष्ण और शिव एक ही परम शक्ति के विभिन्न नाम हैं।
- धीरज और सच्ची तड़प: जिस प्रकार शिवजी भगवान कृष्ण के बाल रूप के दर्शन के लिए नंगे पांव चल पड़े, उसी प्रकार सच्ची प्राप्ति के लिए निरंतर साधना और व्याकुलता की आवश्यकता होती है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ / प्रसंग |
|---|---|---|
| नाद | डमरू की गूंज या ध्वनि | शिवजी द्वारा बजाया जाने वाला ब्रह्मांडीय नाद |
| नंद मेहला | नंद बाबा का महल / भवन | गोकुल में स्थित नन्द बाबा का निवास |
| भिक्षा | दान या भिक्षाटन की वस्तु | जो यशोदा रानी शिवजी को देना चाहती हैं |
| माया | सांसारिक मोह-माया और धन-दौलत | जिसे शिवजी ने तुच्छ बताया है |
| योगी | ध्यान लगाने वाला संन्यासी | भगवान शिव का संन्यासी स्वरूप |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद के..." - यहाँ कवि वर्णन करता है कि महाकाल शिव ने अपने डमरू से ऐसा नाद उत्पन्न किया जिससे पूरा गोकुल गूंज उठा। यह नाद हरिगुणों का गान करते हुए नंद बाबा के चौखट तक जा पहुँचा।
"नंद मेहला से आयी नंद रानी, मोती थाल सजाया..." - ब्रज की रानी यशोदा माता अपने महल से बाहर आती हैं, उनके हाथ में मोतियों से सजा थाल है जिसमें भिक्षा की सामग्रियां हैं। वे सोचती हैं कि कोई भिक्षुक आया है।
"ले भिक्षा बाबा घर जा अपने, तें मेरा बालक डराया..." - माता यशोदा स्नेह और भय के मिले-जुले भाव से कहती हैं कि हे बाबा! तुम अपनी भिक्षा लो और अपने घर जाओ, क्योंकि तुम्हारे इस भयानक और अलौकिक रूप को देखकर मेरा छोटा बालक कन्हैया डर रहा है।
"क्या करनी तेरी दोलत दुनिया, क्या करनी तेरी माया..." - महादेव उत्तर देते हैं कि मुझे इस संसार की कोई भी माया या ऐश्वर्य नहीं चाहिए। मुझे तो केवल अपने प्रियतम कृष्ण के बाल-मुख का दर्शन करना है जिसके लिए मैं कैलाश छोड़कर आया हूँ।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस पावन प्रसंग के स्मरण के साथ निम्नलिखित महामृत्युंजय मंत्र और शिव-कृष्ण स्तुति का पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी होता है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय నమో नमः॥
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | शंकर ने नाद बजाया द्वारे नंद के (Dware Nand Re Shiv Ji Ne Naad Bajaya) |
|---|---|
| मुख्य आराध्य | भगवान शिव (महादेव) एवं भगवान श्रीकृष्ण |
| रचना परंपरा | पारंपरिक लोक भजन एवं संकीर्तन परंपरा |
| भाषा | ब्रजभाषा मिश्रित हिंदी |
| मुख्य भाव (Bhava) | भक्ति, वात्सल्य, वैराग्य और हरि-हर मिलन |
| उपयुक्त अवसर | महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी, सोमवार व्रत, सत्संग एवं जागरण |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस लेख में प्रस्तुत भजन के बोल, अर्थ और दार्शनिक व्याख्या को सनातन धर्म की लोक-साहित्य परंपरा और पुराणों में वर्णित हरि-हर समन्वय के आधार पर अत्यंत सावधानी और प्रामाणिकता के साथ संकलित किया गया है ताकि पाठकों को श्रेष्ठ आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत पुराण - बाल लीला एवं संकीर्तन प्रसंग
- शिव महापुराण - शिव महिमा एवं भक्त प्रसंग
- उत्तर भारतीय लोक-साहित्य एवं पारंपरिक भजन संग्रह
- सनातन धर्म की शैव-वैष्णव समन्वय परंपरा
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें