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हेंचि दान देगा देवा लिरिक्स (Hechi Dan Dega Dewa Lyrics in Hindi) - marathi Bhajan

संत तुकाराम महाराज रचित अभंग 'हेंचि दान देगा देवा' के लिरिक्स हिंदी अर्थ सहित पढ़ें। भगवान विट्ठल की भक्ति और संतों के सान्निध्य की पावन प्रार्थना।

महाराष्ट्र की पावन और संत-बहुल भूमि पर भक्ति आंदोलन के शलाका पुरुष जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज द्वारा रचित अभंग "हेंचि दान देगा देवा" (Hechi Dan Dega Dewa Lyrics in Hindi) वारकरी संप्रदाय की आध्यात्मिक चेतना का सर्वोच्च प्रतीक है। यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि भगवान पांडुरंग (विट्ठल) के चरणों में अनन्य प्रेम, पूर्ण शरणागति और निष्काम भक्ति की पराकाष्ठा है। इस भजन में साधक सांसारिक भोग-विलासिता, धन-दौलत, ऐश्वर्य या यहां तक कि मुक्ति (मोक्ष) की भी कामना नहीं करता, बल्कि वह प्रभु से केवल एक ही वरदान मांगता है—ईश्वर का कभी न भूलने वाला स्मरण और संतों का पावन सान्निध्य। वारकरी संप्रदाय के प्रत्येक वारकरी के कंठ से निकलने वाला यह अभंग साधक के हृदय को अश्रुपूर्ण और आत्मानुभूत से भर देता है। जब भक्त इसे समवेत स्वर में गाते हैं, तो संपूर्ण वातावरण विट्ठलमय हो जाता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, हिंदी अर्थ, भावार्थ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके आध्यात्मिक महत्व का गहन अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

हेंचि दान देगा देवा । तुझा विसर न व्हावा ॥

हेंचि दान देगा देवा ।
तुझा विसर न व्हावा ॥१॥

गुण गाईन आवडी ।
हेचि माझी सर्व जोडी ॥२॥

तुझा विसर न व्हावा.....

न लगे मुक्ति आणि संपदा ।
संतसंग देई सदा ॥३॥

तुझा विसर न व्हावा.....

तुका ह्मणे गर्भवासी ।
सुखें घालावें आह्मांसी ॥४॥

तुझा विसर न व्हावा.....

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

संत तुकाराम महाराज द्वारा रचित इस अमर अभंग का प्रत्येक चरण आध्यात्मिक गहराई से परिपूर्ण है। इसके भावार्थ को समझने से भक्त के मन में भक्ति के प्रति निर्मल भावना जागृत होती है:

प्रथम चरण: "हेंचि दान देगा देवा । तुझा विसर न व्हावा ॥"
संत तुकाराम महाराज भगवान विट्ठल से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मैं आपसे केवल एक ही दान या वरदान मांगता हूं कि हे ईश्वर! मुझे कभी भी आपका विस्मरण (भूलना) न हो। मेरा मन हर पल आपकी याद में डूबा रहे, क्योंकि भगवान को भूल जाना ही सबसे बड़ा कष्ट है और उनका स्मरण ही सबसे बड़ा सुख है।

द्वितीय चरण: "गुण गाईन आवडी । हेचि माझी सर्व जोडी ॥२॥"
भक्त कहता है कि हे प्रभु! मेरी सबसे बड़ी पूंजी और कमाई (जोड़ी) यही है कि मैं प्रेम और आनंद (आवडी) के साथ आपके गुणों, आपकी लीलाओं और आपके नामों का निरंतर गान करता रहूं। मुझे सांसारिक धन-दौलत की कोई लालसा नहीं है, आपके गुणों का गान ही मेरा एकमात्र संचित धन है।

तृतीय चरण: "न लगे मुक्ति आणि संपदा । संतसंग देई सदा ॥३॥"
यह संत तुकाराम के उच्च कोटि के वैराग्य और अनन्य भक्ति को दर्शाता है। वे कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे न तो किसी प्रकार की मुक्ति (कैवल्य) चाहिए और न ही संसार की कोई बड़ी संपदा (ऐश्वर्य)। यदि आप मुझे देना ही चाहते हैं तो बस इतना कीजिए कि मुझे निरंतर संतों का पावन संग (संतसंग) प्रदान करते रहें, क्योंकि संतों के सान्निध्य में ही भगवान की वास्तविक भक्ति प्राप्त होती है।

चतुर्थ चरण: "तुका ह्मणे गर्भवासी । सुखें घालावें आह्मांसी ॥४॥"
संत तुकाराम महाराज अत्यंत विनम्रता और समर्पण के साथ कहते हैं कि हे भगवान! भले ही मुझे आपके स्मरण के लिए बार-बार गर्भवास (योनियों में जन्म और मृत्यु का चक्र) ही क्यों न भोगना पड़े, मुझे यह भी स्वीकार है। यदि गर्भ में रहते हुए भी मेरा मन आपके चरणों में लगा रहे और आपका विस्मरण न हो, तो वह गर्भवास का कष्ट भी मेरे लिए सुखद बन जाएगा।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह अभंग वारकरी परंपरा का प्राण है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • निष्काम भक्ति का संदेश: इस भजन में किसी भी प्रकार की भौतिक या आध्यात्मिक कामना (जैसे मुक्ति या स्वर्ग) का त्याग कर केवल भगवान की स्मृति को सर्वोपरि माना गया है।
  • संतसंग की महिमा: मोक्ष से भी बढ़कर संतों के संग को महत्व देना इस अभंग की सबसे बड़ी दार्शनिक विशेषता है।
  • समर्पण की पराकाष्ठा: जन्म-मृत्यु के चक्र (गर्भवास) से भी न डरने का भाव केवल एक पूर्ण भक्त ही रख सकता है।
  • वारकरी संप्रदाय की पहचान: पंढरपुर की यात्रा (वारी) के दौरान और विट्ठल मंदिरों में लाखों वारकरी एकस्वर में इस भजन का गान करते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष नियम या कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह शुद्ध भाव का विषय है:

  • नित्य पूजा एवं ध्यान: प्रातः काल उठकर या संध्याकालीन वंदना के समय भगवान विट्ठल, श्रीकृष्ण या अपने इष्ट देव के समक्ष इस भजन का गान मानसिक शांति प्रदान करता है।
  • कीर्तन एवं सत्संग: वारकरी संप्रदाय के भजनों, एकादशी की रात्रि के जागरण और सामूहिक सत्संगों में इसका विशेष रूप से गान किया जाता है।
  • दैनिक साधना के दौरान एकाग्रता प्राप्ति के लिए इसे गुनगुनाना अत्यंत लाभकारी माना गया है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के आराध्य भगवान विट्ठल (पांडुरंग) हैं, जिन्हें महाराष्ट्र में भगवान विष्णु या कृष्ण का रूप माना जाता है। पंढरपुर का विठ्ठल मंदिर वारकरी संप्रदाय का मुख्य केंद्र है। इस भजन के रचयिता संत तुकाराम महाराज हैं, जो 17वीं शताब्दी के महान वारकरी संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनके अभंग आज भी महाराष्ट्र के घर-घर में गाए जाते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

संत तुकाराम महाराज ने अपने जीवन में अत्यंत कष्ट, पारिवारिक आपदाएं और सामाजिक विरोध का सामना किया, परंतु उनकी भगवान विट्ठल के प्रति अटूट निष्ठा कभी विचलित नहीं हुई। उनके द्वारा रचित हजारों अभंगों में से "हेंचि दान देगा देवा" उनके अंतरमन की पुकार है। यह रचना दर्शाती है कि भौतिक संकट व्यक्ति को तोड़ सकते हैं, परंतु यदि ईश्वर का स्मरण और संतों का संग साथ हो, तो भक्त हर परिस्थिति में आनंदित रह सकता है.

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह अभंग प्राचीन मराठी (संत भाषा) में रचित है, जिसमें सरलता, सहजता और गाथात्मक प्रवाह का अद्भुत समन्वय है। इसमें अनुप्रास और सादगीपूर्ण अलंकारों का प्रयोग किया गया है जो सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करते हैं। हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी इसके भावार्थ को उतनी ही तल्लीनता से गाया और समझा जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • ईश्वर स्मरण ही सर्वोपरि है: जीवन की भागदौड़ में कभी भी ईश्वर को नहीं भूलना चाहिए।
  • सत्संग का महत्व: अच्छे और सात्विक लोगों (संतों) की संगति जीवन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।
  • अहंकार का त्याग: मुक्ति या बड़े पदों की इच्छा रखने के बजाय भगवत प्रेम को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानना चाहिए।
  • संतोषी जीवन: भगवान की कृपा जिस पर हो, उसे किसी अन्य भौतिक वस्तु की लालसा नहीं रहती।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल अर्थ संदर्भ / भाव
हेंचि यही, केवल यही एकमात्र निश्चित कामना
विसर भूलना, विस्मरण भगवान की याद का छूट जाना
आवडी प्रेम से, रुचिपूर्वक भक्तिभाव के साथ
जोडी कमाई, संचित पूंजी आध्यात्मिक धन
संपदा धन-दौलत, ऐश्वर्य सांसारिक सुख-सुविधाएं
गर्भवासी गर्भ में जन्म लेना पुनर्जन्म और संसार चक्र

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

इस अभंग की प्रत्येक पंक्ति साधक को आंतरिक गहराई में ले जाती है। पहली पंक्ति में भगवान से विस्मरण न होने की विनती की गई है, जो भक्ति की मूल शर्त है। दूसरी पंक्ति में भजन और गुणगान को ही अपनी संपत्ति बताया गया है। तीसरी पंक्ति में मुक्ति और ऐश्वर्य का त्याग कर केवल संतों का संग मांगा गया है, जो ज्ञान और भक्ति दोनों का मार्ग प्रशस्त करता है। अंतिम पंक्ति में संत तुकाराम जी परम समर्पण का परिचय देते हुए कहते हैं कि यदि भगवान की भक्ति बनी रहे, तो हमें बार-बार जन्म लेने का कष्ट भी सहर्ष स्वीकार है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव के समकक्ष वेदों और पुराणों में भी कई श्लोक मिलते हैं:

"स्मर्तव्यः सततं विष्णुः विस्मर्तो न जातुचित् ।
सर्वे विधिनिषेधाः स्युः एतयोः किङ्किंकरौ ॥"

अर्थात: भगवान विष्णु का स्मरण हमेशा करना चाहिए और कभी भी उनका विस्मरण नहीं करना चाहिए। अन्य सभी विधि-निषेध इन दोनों के ही अधीन हैं। वारकरी संप्रदाय में भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र की तरह ही विट्ठल नाम स्मरण को सर्वोपरि माना गया है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विशेषता विवरण
भजन का नाम हेंचि दान देगा देवा (Hechi Dan Dega Dewa)
आराध्य देव भगवान विट्ठल (पांडुरंग / श्रीकृष्ण)
रचियता / संत जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज
भाषा मराठी (संत अभंग वाणी)
संप्रदाय वारकरी संप्रदाय
भक्ति का भाव निष्काम भक्ति, शरणागति और संतसंग
उपयुक्त अवसर एकादशी, संकीर्तन, वारी यात्रा और नित्य प्रार्थना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध अभंग के रचयिता महाराष्ट्र के महान संत एवं वारकरी संप्रदाय के प्रणेता जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज हैं।

इस भजन में भगवान से सांसारिक सुख, धन या मुक्ति नहीं मांगी गई है, बल्कि केवल भगवान का कभी विस्मरण न हो (विसर न व्हावा) और हमेशा संतों का संग मिले, यही वरदान मांगा गया है।

"विसर न व्हावा" का अर्थ है - भगवान की याद या उनका स्मरण कभी भी न छूटे, अर्थात प्रभु हमारे मन से कभी ओझल न हों।

वारकरी संप्रदाय में यह भजन आत्मीयता, सरलता और विट्ठल भक्ति का मूल मंत्र माना जाता है। पंढरपुर की वारी के दौरान वारकरी इसे अत्यंत भावुक होकर गाते हैं।

हाँ, मूल रूप से यह मराठी अभंग है, परंतु इसके गहरे आध्यात्मिक भाव के कारण हिंदी भाषी भक्त भी इसे भावार्थ सहित गाते और गुनगुनाते हैं।

इसका भाव यह है कि मोक्ष या धन की इच्छा स्वार्थी हो सकती है, जबकि भगवान की निरंतर भक्ति और संतों का सान्निध्य ही सबसे बड़ा आनंद है।

इस भजन का गान प्रातःकालीन पूजा, संध्या वंदन, एकादशी व्रत या किसी भी धार्मिक सत्संग के समय करना अत्यंत शांतिदायक और फलदायी होता है।

संत तुकाराम जी कहते हैं कि यदि भगवान का स्मरण बना रहे, तो बार-बार जन्म लेने का कष्ट (गर्भवास) भी हमारे लिए सुखद बन जाएगा, क्योंकि भगवान का विस्मरण न होना ही सबसे बड़ा सुख है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री वारकरी संप्रदाय के प्रामाणिक ग्रंथों, संत तुकाराम गाथा और पारंपरिक भक्ति साहित्य के अध्ययन पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध, सटीक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध जानकारी प्रदान करना है। यह पृष्ठ संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है ताकि भक्तों को सही और प्रेरक जानकारी मिल सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • संत तुकाराम गाथा (सकल संत गाथा संग्रह)
  • वारकरी संप्रदाय और उसका इतिहास - प्राच्य विद्या प्रकाशन
  • पंढरपुर दर्शन एवं विट्ठल भक्ति परंपरा
  • पारंपरिक लोकगीत एवं अभंग संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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