भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

नगरकोट की ज्वाला रानी भजन इन हिंदी लिरिक्स

नगरकोट की ज्वाला रानी भजन के संपूर्ण बोल और हिंदी अर्थ पढ़ें। मां ज्वाला जी की महिमा और भक्तिपूर्ण स्तुति के साथ जुड़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित।

नगरकोट की अधिष्ठात्री एवं 51 शक्तिपीठों में प्रमुख मां ज्वाला जी (ज्वालामुखी) को समर्पित पावन भजन "नगरकोट की ज्वाला रानी" सनातन धर्म की शाक्त परंपरा का एक अत्यंत भावपूर्ण और प्रसिद्ध देवी भजन है। हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी स्थित नगरकोट धाम में मां भगवती साक्षात ज्योति रूप में बिना किसी ईंधन या तेल के निरंतर प्रज्वलित रहती हैं। यह भजन मां भगवती के ज्योति स्वरूप, उनकी असीम ममता, शरणागतवत्सलता और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले वरदानी रूप की स्तुति करता है। नवरात्रि महापर्व, मंगलवार, शुक्रवार, जागरण, माता की चौकी एवं पारिवारिक संकीर्तन में इस भजन का श्रवण व गायन साधक के अंतःकरण में अटूट श्रद्धा, निर्भयता और भक्ति रस का संचार करता है। प्रस्तुत लेख में भजन के सम्पूर्ण बोल (Lyrics), पंक्ति-दर-पंक्ति सरल भावार्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि, गायन विधि, शास्त्रीय मंत्र तथा आध्यात्मिक सीख का विस्तृत विवरण प्रस्तुत है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ श्री नगरकोट ज्वाला रानी भजन ॥

【 स्थायी / मुखड़ा 】

ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी।
सदा जले तेरी पावन ज्योति, मां भवरानी कल्याणी॥
ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी॥

【 प्रथम अंतरा 】

ऊंचे-ऊंचे पर्वत घेरे, कांगड़ा घाटी में डेरे।
नौ रूपों में ज्योति चमके, दूर करे भक्तों के अंधेरे॥
चंडी, हिंगलाज, अन्नपूर्णा, महालक्ष्मी वरदानी।
ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी॥

【 द्वितीय अंतरा 】

न कोई बाती न कोई तेल, यह तो मैया तेरा खेल।
पत्थर चीर के निकली ज्वाला, भक्तों का कर दिया सुमेल॥
ध्यानू भक्त की लाज बचाई, शीश चढ़ाया जब बलिदानी।
ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी॥

【 तृतीय अंतरा 】

अकबर चढ़कर जब था आया, सोने का छत्र चढ़ाया।
गर्व किया जब उसने मैया, छत्र अनोखी धातु बनाया॥
तेरी शक्ति के आगे मां, हारी राजा की मनमानी।
ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी॥

【 चतुर्थ अंतरा 】

लाल चूनर मैया तोहे सोहे, माथे का टीका मन मोहे।
हाथ जोड़ जो द्वारे आए, जनम-जनम के पाप सब धोए॥
झोली सबकी भरती मैया, तू ही जग की महारानी।
ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी॥

【 समापन 】

शरण तिहारी जो भी आया, उसने मुंह मांगा फल पाया।
'भक्तिलोक' पर जो गुण गाए, जग में अमर नाम कर पाया॥
सदा जले तेरी पावन ज्योति, मां भवरानी कल्याणी।
ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी॥
॥ बोल सच्चे दरबार की जय ॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

"नगरकोट की ज्वाला रानी" भजन का मूल भाव मां जगदंबा के परात्पर, प्रत्यक्ष और जाग्रत ज्योति स्वरूप के प्रति आत्मसमर्पण है। इस भजन में भक्त उद्गार व्यक्त करता है कि हे नगरकोट की महारानी मां ज्वाला! आपकी दिव्य महिमा का विस्तार संपूर्ण ब्रह्मांड में फैला हुआ है। बिना किसी तेल, घी या बाती के सदियों से पाषाण से निरंतर प्रज्वलित आपकी नौ ज्योतियां (महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका एवं अंजी देवी) यह प्रमाणित करती हैं कि प्रकृति का मूल संचालन आपकी ही पराशक्ति से हो रहा है।

भजन के माध्यम से साधक यह स्मरण करता है कि जब भक्त ध्यानू ने अटूट निष्ठा से अपना शीश काटकर अर्पित किया, तब मां ने तत्काल प्रकट होकर उसके शीश को पुनः जोड़कर उसकी भक्ति को अमर बना दिया। वहीं दूसरी ओर, जब तत्कालीन सम्राट अकबर ने अपने सांसारिक ऐश्वर्य और अहंकार के मद में सोने का भारी छत्र चढ़ाया, तो मां ने उस अहंकार को खंडित करते हुए उस सोने के छत्र को एक अज्ञात धातु में परिवर्तित कर दिया। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि मां भगवती को केवल निष्कपट प्रेम, विनीत भाव और समर्पण प्रिय है, बाह्य आडंबर या अहंकार नहीं। जो भी श्रद्धालु सच्ची निष्ठा से मां के दरबार में हाजिरी लगाता है, मां उसके समस्त पाप, संताप और दरिद्रता का नाश कर उसे आध्यात्मिक शांति एवं सांसारिक सुख प्रदान करती हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • प्रत्यक्ष ज्योति स्वरूप की स्तुति: यह भजन मां ज्वाला जी की उस अलौकिक शक्ति का गान करता है जहां किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि साक्षात अग्नि रूपी दिव्य ज्योतियों की पूजा की जाती है।
  • भक्ति एवं शरणागति का संगम: इसमें भक्त ध्यानू की अमर कथा का उल्लेख है, जो साधक को सिखाता है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए अहंकार का विसर्जन और पूर्ण समर्पण अनिवार्य है।
  • अहंकार मुक्ति का संदेश: सम्राट अकबर के प्रसंग द्वारा यह भजन मानव को यह चेतावनी देता है कि ईश्वर के सम्मुख सांसारिक धन, पद और सत्ता का कोई मूल्य नहीं है।
  • मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक प्रभाव: लयबद्ध रूप से इस भजन का संकीर्तन करने से मन का भय, अवसाद और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है तथा आत्मबल में वृद्धि होती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

मां ज्वाला रानी के इस मंगलकारी भजन का गायन एवं श्रवण अत्यंत फलदायी माना गया है। इसकी अनुशंसित विधि निम्नलिखित है:

  1. सर्वोत्तम समय: चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि महापर्व, प्रत्येक मंगलवार, शुक्रवार, पूर्णिमा तिथि तथा अष्टमी-नवमी के दिन प्रातः अथवा संध्याकालीन आरती के समय इसका गायन सर्वोत्तम है।
  2. शुद्धि एवं वातावरण: स्नान आदि से पवित्र होकर स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. दीप प्रज्वलन: मां भगवती की प्रतिमा अथवा यंत्र के समक्ष शुद्ध देसी घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। चूंकि यह ज्वाला जी का भजन है, अतः दीपक की ज्योति का दर्शन करते हुए भजन गाना विशेष फलदायी होता है।
  4. भोग एवं अर्पण: मां को लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल या गुलाब), रोली, अक्षत, धूप और पंचमेवा या हलवा-पूरी का भोग अर्पित करें।
  5. सामूहिक संकीर्तन: जागरण, चौकी अथवा संकीर्तन मंडली में करताल, ढोलक और मंजीरे के साथ सस्वर इस भजन का सामूहिक गायन वातावरण को परम पावन बना देता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

आराध्य देवी: मां ज्वाला जी (सती माता की जिह्वा गिरने से प्रादुर्भूत 51 शक्तिपीठों में से अत्यंत जाग्रत महापीठ)। यहां सती की जिह्वा गिरी थी, जिसे 'ज्वालामुखी' अथवा 'नगरकोट की रानी' कहा जाता है।

परम भक्त ध्यानू भगत: 16वीं शताब्दी में दिल्ली से मां ज्वाला जी के दर्शन हेतु पैदल यात्रा करने वाले अनन्य भक्त। इन्होंने मां के चरणों में अपनी निष्ठा प्रमाणित करने के लिए अपना शीश अर्पित कर दिया था। मां ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पुनर्जीवित किया और वरदान दिया कि ज्वाला धाम की यात्रा ध्यानू भगत के स्मरण के बिना अधूरी मानी जाएगी।

भैरवनाथ एवं उन्मत्त भैरव: ज्वाला पीठ के रक्षक के रूप में उन्मत्त भैरव जी की स्थापना है, जिनका दर्शन भी तीर्थ यात्रा का महत्वपूर्ण अंग है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

नगरकोट (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश) अनादिकाल से शक्ति साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। यह भजन उत्तर भारतीय लोक-भक्ति परंपरा और माता के जागरणों की समृद्ध संस्कृति से उपजा है। पीढ़ियों से लोकगायकों, संतों और शाक्त भक्तों द्वारा यह भजन गाया जाता रहा है। इसमें कांगड़ा घाटी के प्राकृतिक सौंदर्य और मां के चमत्कारों को सरल गेय पदों में पिरोया गया है। वर्तमान समय में इस भजन के अनेक रूपांतरण प्रसिद्ध गायकों द्वारा गाए गए हैं, किंतु इसका मूल संदेश सदैव मां की ज्योति के प्रति निष्ठा ही रहा है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध एवं प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है जिसमें पंजाबी और हिमाचली लोक-शब्दावली का अत्यंत मधुर समन्वय देखने को मिलता है।

  • काव्य रूप: पद शैली एवं पारंपरिक भजन संरचना (मुखड़ा एवं अंतरा प्रारूप)।
  • रस: मुख्य रूप से भक्ति रस और अद्भुत रस (बिना तेल-बाती के ज्योति जलने और अकबर के छत्र परिवर्तन का वर्णन)।
  • अलंकार: अनुप्रास एवं रूपक अलंकार का सहज प्रयोग, जिससे भजन का कर्णप्रिय प्रवाह बनता है।
  • लय एवं ताल: यह भजन प्रायः दादरा या कहरवा ताल में अत्यंत सुगमता से गाया जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  1. आंतरिक ज्योति का जागरण: जिस प्रकार मां ज्वाला पाषाण को भेदकर प्रज्वलित होती हैं, उसी प्रकार मनुष्य को अपनी अंतरात्मा में स्थित चेतना और विवेक की ज्योति को जाग्रत कर अज्ञान के अंधकार को मिटाना चाहिए।
  2. सच्ची भक्ति में अहंकार का त्याग: अकबर का छत्र परिवर्तन हमें सिखाता है कि धन, प्रतिष्ठा या बौद्धिक अहंकार ईश्वर के द्वार पर व्यर्थ हैं। वहां केवल निष्कपट हृदय और सरलता स्वीकार्य होती है।
  3. संकट में धैर्य और विश्वास: भक्त ध्यानू का प्रसंग यह प्रेरणा देता है कि जीवन की कठिनतम परीक्षा में भी यदि ईश्वर पर अटूट विश्वास हो, तो परमात्मा स्वयं साधक की रक्षा करते हैं।
  4. समानता और परोपकार: मां के दरबार में राजा और रंक दोनों समान हैं। मां की कृपा का प्रकाश बिना किसी भेदभाव के सभी प्राणियों पर समान रूप से बरसता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

कठिन / विशेष शब्द सरल हिंदी अर्थ भजन के संदर्भ में भाव
नगरकोट कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) का प्राचीन नाम मां ज्वाला जी और ब्रजेश्वरी देवी का पावन शक्तिपीठ क्षेत्र।
कल्याणी कल्याण करने वाली, मंगलमयी भक्तों के समस्त अमंगल दूर कर परम शुभ देने वाली भगवती।
भवरानी संसार की स्वामिनी, भवतारिणी जन्म-मरण रूपी भवसागर से पार उतारने वाली पराशक्ति।
छत्र मुकुट के ऊपर लगने वाला सुसज्जित छाता सम्राट अकबर द्वारा अहंकारवश चढ़ाया गया सोने का छत्र।
सुमेल मेल, संयोग, शुभ समन्वय ईश्वर और भक्त के मध्य अटूट आध्यात्मिक संबंध की स्थापना।
वरदानी वरदान देने वाली शरणागत भक्तों की मनोकामनाएं तत्काल पूर्ण करने वाली मां।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. ओ नगरकोट की ज्वाला रानी, तेरी महिमा सब जग जानी। सदा जले तेरी पावन ज्योति, मां भवरानी कल्याणी॥
भावार्थ: हे नगरकोट धाम में विराजने वाली मां ज्वाला! आपकी अलौकिक महिमा से संपूर्ण संसार परिचित है। आपकी पवित्र ज्योति निरंतर बिना रुके प्रज्वलित रहती है। आप संसार का कल्याण करने वाली परमेश्वरी हैं।

२. ऊंचे-ऊंचे पर्वत घेरे, कांगड़ा घाटी में डेरे। नौ रूपों में ज्योति चमके, दूर करे भक्तों के अंधेरे॥
भावार्थ: ऊंचे-ऊंचे सुरम्य शिखरों के बीच कांगड़ा घाटी में आपका दिव्य निवास है। वहां आप नौ रूपों में ज्योतियों के माध्यम से साक्षात दर्शन देकर अपने भक्तों के जीवन के समस्त अज्ञान और दुखों का अंधकार हर लेती हैं।

३. न कोई बाती न कोई तेल, यह तो मैया तेरा खेल। पत्थर चीर के निकली ज्वाला, भक्तों का कर दिया सुमेल॥
भावार्थ: इस पावन मंदिर में न तो कोई रुई की बाती है और न ही कोई तेल, यह सब आपकी असीम लीला का चमत्कार है। कठोर पाषाण शिलाओं को चीरकर निकलने वाली यह दिव्य ज्वाला भक्तों को परमात्मा के साथ एकरस कर देती है।

४. ध्यानू भक्त की लाज बचाई, शीश चढ़ाया जब बलिदानी। अकबर चढ़कर जब था आया, सोने का छत्र चढ़ाया॥
भावार्थ: जब अनन्य भक्त ध्यानू ने अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए शीश अर्पित किया, तब आपने उसकी लाज रखी और उसे जीवनदान दिया। इसके विपरीत जब अभिमानी अकबर ने सोने का छत्र भेंट किया, तो आपने उसके अहंकार को तोड़कर छत्र को विचित्र धातु में बदल दिया।

५. लाल चूनर मैया तोहे सोहे, माथे का टीका मन मोहे। शरण तिहारी जो भी आया, उसने मुंह मांगा फल पाया॥
भावार्थ: मां का दिव्य स्वरूप लाल चुनरी और भव्य शृंगार से सुशोभित है। जो भी दीन-दुखी भक्त निष्कपट भाव से आपकी शरण में आता है, वह अपने जीवन में मनवांछित फल और परम शांति प्राप्त करता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

मां ज्वाला जी और भगवती दुर्गा की आराधना में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख शास्त्रीय मंत्र निम्नलिखित हैं:

॥ ज्वाला देवी ध्यान श्लोक ॥

ॐ ज्वालामुखि सर्वतोमुखि सर्वभूतदयापरे।
सर्वशक्तिकलायुक्ते पावकप्रभे नमोऽस्तु ते॥

सरल अर्थ: सब ओर मुख वाली, समस्त प्राणियों पर दया करने वाली, समस्त शक्तियों और कलाओं से युक्त, अग्नि के समान तेजस्वी मां ज्वालामुखी, आपको बारंबार नमस्कार है।

॥ नवार्ण मंत्र ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥

सरल अर्थ: ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति की अधिष्ठात्री मां चामुंडा (दुर्गा) के इस महामंत्र का जप समस्त मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाला है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु तथ्य / जानकारी
भजन का नाम नगरकोट की ज्वाला रानी (Nagarkot Ki Jwala Rani)
आराध्य देवी मां ज्वाला जी / ज्वालामुखी (शक्तिपीठ नगरकोट, कांगड़ा)
भक्ति परंपरा सनातन शाक्त परंपरा (दुर्गा भक्ति)
प्रमुख प्रसंग भक्त ध्यानू का शीश दान एवं अकबर का छत्र खंडन
भाषा / शैली सरल हिंदी (खड़ी बोली) व लोक पद शैली
भक्ति भाव समर्पण, शरणागति, विनय एवं वात्सल्य भाव
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, जागरण, माता की चौकी, मंगलवार, शुक्रवार संकीर्तन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित 51 शक्तिपीठों में से एक 'मां ज्वाला जी' (ज्वालामुखी) को समर्पित है, जिन्हें नगरकोट की रानी भी कहा जाता है।

ज्वाला जी मंदिर में किसी पाषाण अथवा धातु की मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निरंतर प्रज्वलित नौ प्राकृतिक पावन ज्योतियों (अग्नि शिखाओं) की पूजा की जाती है।

प्रसंग के अनुसार, भक्त ध्यानू मां के अनन्य उपासक थे। जब उनके घोड़े का सिर काट दिया गया, तो उन्होंने मां के चरणों में अपनी निष्ठा सिद्ध करने हेतु अपना शीश अर्पित कर दिया। मां ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें और उनके घोड़े को पुनर्जीवित कर दिया था।

मुगल सम्राट अकबर ने अपनी शक्ति के घमंड में मां ज्वाला जी के मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाया था। मां ने उसके अहंकार को अस्वीकार करते हुए उस सोने के छत्र को एक अज्ञात धातु में बदल दिया, जो आज भी मंदिर में दर्शन हेतु सुरक्षित है।

इस भजन का नियमित संकीर्तन करने से साधक के अंतर्मन का भय, नकारात्मक विचार और संशय दूर होते हैं, परिवार में सुख-शांति आती है और मां भगवती की असीम कृपा प्राप्त होती है।

हां, नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की आराधना के दौरान ज्वाला जी का भजन गाना अत्यंत पुण्यकारी और मनोकामना सिद्धि कारक माना गया है।

नौ प्रमुख ज्योतियों में महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका एवं अंजी देवी की पावन ज्योतियां शामिल हैं।

गायन के समय मन में पूर्ण श्रद्धा और स्वच्छता का ध्यान रखें। मां के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाकर एकाग्रचित्त होकर भजन का उच्चारण करना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिलोक शोध दल द्वारा सनातन धर्म की शाक्त परंपरा, पौराणिक ग्रंथों एवं प्रमाणित लोक संकीर्तन परंपराओं के आधार पर तैयार किया गया है। प्रस्तुत भजन के बोल, अर्थ और कथाएं पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और शक्तिपीठ के इतिहास के अनुकूल हैं। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को प्रामाणिक एवं आध्यात्मिक रूप से समृद्ध जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से संकलित की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • देवी भागवत पुराण: शक्तिपीठ प्रादुर्भाव एवं महिमा प्रसंग।
  • स्कंद पुराण (हिमाद्रि खंड): ज्वालामुखी शक्तिपीठ तीर्थ महात्म्य।
  • कांगड़ा गजेटियर एवं क्षेत्रीय इतिहास: नगरकोट धाम एवं भक्त ध्यानू की ऐतिहासिक परंपराएं।
  • पारंपरिक संकीर्तन संग्रह: उत्तर भारतीय शाक्त लोक भजन संकलन।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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