Mahadev Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

शिव अमृतवाणी लिरिक्स हिन्दी ( Shiv Amritwani Lyrics in Hindi ) - Bhole Bhajan Shiv Bhajan

शिव अमृतवाणी का पाठ करें और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करें। यहाँ शिव अमृतवाणी के संपूर्ण लिरिक्स हिन्दी अर्थ और भावार्थ के साथ उपलब्ध हैं।

प्रस्तावना एवं परिचय

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

शिव अमृतवाणी  लिरिक्स हिन्दी ( Shiv Amritwani Lyrics in Hindi ) -

शिव अमृत की पावन धारा
धो देती हर कष्ट हमारा
शिव का काज सदा सुखदाय�
शिव के बिन है कौन सहाय�

शिव की निसदिन की जो भक्ति
देंगे शिव हर भय से मुक्ति
माथे धरो शिव नाम की धुल�
टूट जायेगी यम कि सूल�

शिव का साधक दुःख ना माने
शिव को हरपल सम्मुख जाने
सौंप दी जिसने शिव को डोर
लूटे ना उसको पांचो चोर

शिव सागर में जो जन डूबे
संकट से वो हंस के जूझे
शिव है जिनके संगी साथ�
उन्हें ना विपदा कभी सतात�

शिव भक्तन का पकडे हाथ
शिव संतन के सदा ही साथ
शिव ने है बृह्माण्ड रचाया
तीनो लोक है शिव कि माया

जिन पे शिव की करुणा होत�
वो कंकड़ बन जाते मोत�
शिव संग तान प्रेम की जोड़ो
शिव के चरण कभी ना छोडो

शिव में मनवा मन को रंग ले
शिव मस्तक की रेखा बदले
शिव हर जन की नस-नस जाने
बुरा भला वो सब पहचाने

अजर अमर है शिव अविनाश�
शिव पूजन से कटे चौरास�
यहाँ वहाँ शिव सर्व व्यापक
शिव की दया के बनिये याचक

शिव को दीजो सच्ची निष्ठां
होने न देना शिव को रुष्टा
शिव है श्रद्धा के ही भूखे
भोग लगे चाहे रूखे-सूखे

भावना शिव को बस में करती ,
प्रीत से ही तो प्रीत है बढ़ती।
शिव कहते है मन से जागो
प्रेम करो अभिमान त्यागो।

दुनिया का मोह त्याग के शिव में रहिये लीन ।
सुख-दुःख हानि-लाभ तो शिव के ही है अधीन।
भस्म रमैया पार्वती वल्ल्भ
शिव फलदायक शिव है दुर्लभ

महा कौतुकी है शिव शंकर
त्रिशूल धारी शिव अभयंकर
शिव की रचना धरती अम्बर ,
देवो के स्वामी शिव है दिगंबर

काल दहन शिव रूण्डन पोषित
होने न देते धर्म को दूषित
दुर्गापति शिव गिरिजानाथ
देते है सुखों की प्रभात

सृष्टिकर्ता त्रिपुरधार�
शिव की महिमा कही ना जात�
दिव्या तेज के रवि है शंकर
पूजे हम सब तभी है शंकर

शिव सम और कोई और दान�
शिव की भक्ति है कल्याण�
सबके मनोरथ सिद्ध कर देते
सबकी चिंता शिव हर लेते

बम भोला अवधूत सवरूपा
शिव दर्शन है अति अनुपा
अनुकम्पा का शिव है झरना
हरने वाले सबकी तृष्णा

भूतो के अधिपति है शंकर
निर्मल मन शुभ मति है शंकर
काम के शत्रु विष के नाशक
शिव महायोगी भय विनाशक

रूद्र रूप शिव महा तेजस्व�
शिव के जैसा कौन तपस्व�
शिव है जग के सृजन हारे
बंधु सखा शिव इष्ट हमारे

गौ ब्राह्मण के वे हितकार�
कोई न शिव सा पर उपकार�
शिव करुणा के स्रोत है शिव से करियो प्रीत
शिव ही परम पुनीत है शिव साचे मन मीत ।

शिव सर्पो के भूषणधार�
पाप के भक्षण शिव त्रिपुरार�
जटाजूट शिव चंद्रशेखर
विश्व के रक्षक कला कलेश्वर

शिव की वंदना करने वाला
धन वैभव पा जाये निराला
कष्ट निवारक शिव की पूजा
शिव सा दयालु और ना दूजा

पंचमुखी जब रूप दिखावे
दानव दल में भय छा जावे
डम-डम डमरू जब भी बोले
चोर निशाचर का मन डोले

घोट घाट जब भंग चढ़ावे
क्या है लीला समझ ना आवे
शिव है योगी शिव सन्यास�
शिव ही है कैलास के वास�

शिव का दास सदा निर्भीक
शिव के धाम बड़े रमणीक
शिव भृकुटि से भैरव जन्मे
शिव की मूरत राखो मन में

शिव का अर्चन मंगलकार�
मुक्ति साधन भव भयहार�
भक्त वत्सल दीन द्याला
ज्ञान सुधा है शिव कृपाला

शिव नाम की नौका है न्यार�
जिसने सबकी चिंता टार�
जीवन सिंधु सहज जो तरना
शिव का हरपल नाम सुमिरना

तारकासुर को मारने वाले
शिव है भक्तो के रखवाले
शिव की लीला के गुण गाना
शिव को भूल के ना बिसराना

अन्धकासुर से देव बचाये
शिव ने अद्भुत खेल दिखाये
शिव चरणो से लिपटे रहिये
मुख से शिव शिव जय शिव कहिये

भस्मासुर को वर दे डाला
शिव है कैसा भोला भाला
शिव तीर्थो का दर्शन कीजो
मन चाहे वर शिव से लीजो

शिव शंकर के जाप से मिट जाते सब रोग
शिव का अनुग्रह होते ही पीड़ा ना देते शोक
ब्र्हमा विष्णु शिव अनुगाम�
शिव है दीन – हीन के स्वाम�

निर्बल के बलरूप है शम्भु
प्यासे को जलरूप है शम्भु
रावण शिव का भक्त निराला
शिव ने दी दश शीश कि माला

गर्व से जब कैलाश उठाया
शिव ने अंगूठे से था दबाया
दुःख निवारण नाम है शिव का
रत्न है वो बिन दाम शिव का

शिव है सबके भाग्यविधाता
शिव का सुमिरन है फलदाता
महादेव शिव औघड़दान�
बायें अंग में सजे भवान�

शिव शक्ति का मेल निराला
शिव का हर एक खेल निराला
शम्भर नामी भक्त को तारा
चन्द्रसेन का शोक निवारा

पिंगला ने जब शिव को ध्याया
देह छूटी और मोक्ष पाया
गोकर्ण की चन चूका अनार�
भव सागर से पार उतार�

अनसुइया ने किया आराधन
टूटे चिन्ता के सब बंधन
बेल पत्तो से पूजा करे चण्डाल�
शिव की अनुकम्पा हुई निराल�

मार्कण्डेय की भक्ति है शिव
दुर्वासा की शक्ति है शिव
राम प्रभु ने शिव आराधा
सेतु की हर टल गई बाधा

धनुषबाण था पाया शिव से
बल का सागर तब आया शिव से
श्री कृष्ण ने जब था ध्याया
दश पुत्रों का वर था पाया

हम सेवक तो स्वामी शिव है
अनहद अन्तर्यामी शिव है
दीन दयालु शिव मेरे, शिव के रहियो दास
घट – घट की शिव जानते , शिव पर रख विश्वास

परशुराम ने शिव गुण गाया
कीन्हा तप और फरसा पाया
निर्गुण भी शिव निराकार
शिव है सृष्टि के आधार

शिव ही होते मूर्तिमान
शिव ही करते जग कल्याण
शिव में व्यापक दुनिया सार�
शिव की सिद्धि है भयहार�

शिव ही बाहर शिव ही अन्दर
शिव ही रचना सात समुन्द्र
शिव है हर इक के मन के भीतर
शिव है हर एक कण – कण के भीतर

तन में बैठा शिव ही बोले
दिल की धड़कन में शिव डोले
�हम’ कठपुतली शिव ही नचाता
नयनों को पर नजर ना आता

माटी के रंगदार खिलौने
साँवल सुन्दर और सलोने
शिव हो जोड़े शिव हो तोड़े
शिव तो किसी को खुला ना छोड़े

आत्मा शिव परमात्मा शिव है
दयाभाव धर्मात्मा शिव है
शिव ही दीपक शिव ही बात�
शिव जो नहीं तो सब कुछ माट�

सब देवो में ज्येष्ठ शिव है
सकल गुणो में श्रेष्ठ शिव है
जब ये ताण्डव करने लगता
बृह्माण्ड सारा डरने लगता

तीसरा चक्षु जब जब खोले
त्राहि त्राहि यह जग बोले
शिव को तुम प्रसन्न ही रखना
आस्था लग्न बनाये रखना

विष्णु ने की शिव की पूजा
कमल चढाऊँ मन में सुझा
एक कमल जो कम था पाया
अपना सुंदर नयन चढ़ाया

साक्षात तब शिव थे आये
कमल नयन विष्णु कहलाये
इन्द्रधनुष के रंगो में शिव
संतो के सत्संगों में शिव

महाकाल के भक्त को मार ना सकता काल
द्वार खड़े यमराज को शिव है देते टाल
यज्ञ सूदन महा रौद्र शिव है
आनन्द मूरत नटवर शिव है

शिव ही है श्मशान के वास�
शिव काटें मृत्युलोक की फांस�
व्याघ्र चरम कमर में सोहे
शिव भक्तों के मन को मोहे

नन्दी गण पर करे सवार�
आदिनाथ शिव गंगाधार�
काल में भी तो काल है शंकर
विषधारी जगपाल है शंकर

महासती के पति है शंकर
दीन सखा शुभ मति है शंकर
लाखो शशि के सम मुख वाले
भंग धतूरे के मतवाले

काल भैरव भूतो के स्वाम�
शिव से कांपे सब फलगाम�
शिव है कपाली शिव भस्मांग�
शिव की दया हर जीव ने मांग�

मंगलकर्ता मंगलहार�
देव शिरोमणि महासुखकार�
जल तथा विल्व करे जो अर्पण
श्रद्धा भाव से करे समर्पण

शिव सदा उनकी करते रक्षा
सत्यकर्म की देते शिक्षा
वासुकि नाग कण्ठ की शोभा
आशुतोष है शिव महादेवा

विश्वमूर्ति करुणानिधान
महा मृत्युंजय शिव भगवान
शिव धारे रुद्राक्ष की माला
नीलेश्वर शिव डमरू वाला

पाप का शोधक मुक्ति साधन
शिव करते निर्दयी का मर्दन
शिव सुमरिन के नीर से धूल जाते है पाप
पवन चले शिव नाम की उड़ते दुख संताप

पंचाक्षर का मंत्र शिव है
साक्षात सर्वेश्वर शिव है
शिव को नमन करे जग सारा
शिव का है ये सकल पसारा

क्षीर सागर को मथने वाले
ऋद्धि सीधी सुख देने वाले
अहंकार के शिव है विनाशक
धर्म-दीप ज्योति प्रकाशक

शिव बिछुवन के कुण्डलधार�
शिव की माया सृष्टि सार�
महानन्दा ने किया शिव चिन्तन
रुद्राक्ष माला किन्ही धारण

भवसिन्धु से शिव ने तारा
शिव अनुकम्पा अपरम्पारा
त्रि-जगत के यश है शिवज�
दिव्य तेज गौरीश है शिवज�

महाभार को सहने वाले
वैर रहित दया करने वाले
गुण स्वरूप है शिव अनूपा
अम्बानाथ है शिव तपरूपा

शिव चण्डीश परम सुख ज्योति
शिव करुणा के उज्ज्वल मोत�
पुण्यात्मा शिव योगेश्वर
महादयालु शिव शरणेश्वर

शिव चरणन पे मस्तक धरिये
श्रद्धा भाव से अर्चन करिये
मन को शिवाला रूप बना लो
रोम रोम में शिव को रमा लो

दशों दिशाओं मे शिव दृष्टि
सब पर शिव की कृपा दृष्टि
शिव को सदा ही सम्मुख जानो
कण-कण बीच बसे ही मानो

शिव को सौंपो जीवन नैया
शिव है संकट टाल खिवैया
अंजलि बाँध करे जो वंदन
भय जंजाल के टूटे बन्धन

जिनकी रक्षा शिव करे  मारे न उसको कोय
आग की नदिया से बचे  बाल ना बांका होय
शिव दाता भोला भण्डार�
शिव कैलाशी कला बिहार�

सगुण ब्रह्म कल्याण कर्ता
विघ्न विनाशक बाधा हर्ता
शिव स्वरूपिणी सृष्टि सार�
शिव से पृथ्वी है उजियार�

गगन दीप भी माया शिव क�
कामधेनु है छाया शिव क�
गंगा में शिव  शिव मे गंगा
शिव के तारे तुरत कुसंगा

शिव के कर में सजे त्रिशूला
शिव के बिना ये जग निर्मूला
.
स्वर्णमयी शिव जटा निराळ�

शिव शम्भू की छटा निराल�
जो जन शिव की महिमा गाये
शिव से फल मनवांछित पाये
शिव पग पँकज सवर्ग समाना

शिव पाये जो तजे अभिमाना
शिव का भक्त ना दुःख मे डोलें
शिव का जादू सिर चढ बोले
परमानन्द अनन्त स्वरूपा

शिव की शरण पड़े सब कूपा
शिव की जपियो हर पल माळा
शिव की नजर मे तीनो क़ाला
अन्तर घट मे इसे बसा लो

दिव्य जोत से जोत मिला लो
नम: शिवाय जपे जो स्वासा
पूरीं हो हर मन की आसा
परमपिता परमात्मा पूरण सच्चिदानन्द

शिव के दर्शन से मिले सुखदायक आनन्द
शिव से बेमुख कभी ना होना
शिव सुमिरन के मोती पिरोना
जिसने भजन है शिव के सीखे

उसको शिव हर जगह ही दिखे
प्रीत में शिव है शिव में प्रीत�
शिव सम्मुख न चले अनीति
शिव नाम की मधुर सुगन्ध�

जिसने मस्त कियो रे नन्द�
शिव निर्मल ‘निर्दोष’ ‘संजय’ निराले
शिव ही अपना विरद संभाले
परम पुरुष शिव ज्ञान पुनीता

भक्तो ने शिव प्रेम से जीता
आंठो पहर अराधीय ज्योतिर्लिंग शिव रूप
नयनं बीच बसाइये शिव का रूप अनूप
लिंग मय सारा जगत हैं

लिंग धरती आकाश
लिंग चिंतन से होत हैं सब पापो का नाश
लिंग पवन का वेग हैं
लिंग अग्नि की ज्योत

लिंग से पाताल हैँ लिंग वरुण का स्त्रोत
लिंग से हैं वनस्पति
लिंग ही हैं फल फूल
लिंग ही रत्न स्वरूप हैं

लिंग माटी निर्धूप
लिंग ही जीवन रूप हैं
लिंग मृत्युलिंगकार
लिंग मेघा घनघोर हैं

लिंग ही हैं उपचार
ज्योतिर्लिंग की साधना करते हैं तीनो लोग
लिंग ही मंत्र जाप हैं
लिंग का रूम श्लोक

लिंग से बने पुराण
लिंग वेदो का सार
रिधिया सिद्धिया लिंग हैं
लिंग करता करतार

प्रातकाल लिंग पूजिये पूर्ण हो सब काज
लिंग पे करो विश्वास तो लिंग रखेंगे लाज
सकल मनोरथ से होत हैं दुखो का अंत
ज्योतिर्लिंग के नाम से सुमिरत जो भगवंत

मानव दानव ऋषिमुनि ज्योतिर्लिंग के दास
सर्व व्यापक लिंग हैं पूरी करे हर आस
शिव रुपी इस लिंग को पूजे सब अवतार
ज्योतिर्लिंगों की दया सपने करे साकार

लिंग पे चढ़ने वैद्य का जो जन ले परसाद
उनके ह्रदय में बजे
शिव करूणा का नाद
महिमा ज्योतिर्लिंग की जाएंगे जो लोग

भय से मुक्ति पाएंगे रोग रहे न शोब
शिव के चरण सरोज तू ज्योतिर्लिंग में देख
सर्व व्यापी शिव बदले भाग्य तीरे
डारीं ज्योतिर्लिंग पे गंगा जल की धार

करेंगे गंगाधर तुझे भव सिंधु से पार
चित सिद्धि हो जाए रे लिंगो का कर ध्यान
लिंग ही अमृत कलश हैं लिंग ही दया निधान
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भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें।

साझा करें:
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ देवादिदेव महादेव को समर्पित यह भजन "शिव अमृतवाणी लिरिक्स हिन्दी ( Shiv Amritwani Lyrics in Hindi ) - Bhole Bhajan Shiv Bhajan - Bhaktilok" भगवान शिव के कल्याणकारी और वैराग्यपूर्ण रूप का सजीव चित्रण करता है। शिव का अर्थ ही कल्याण है। इस भजन के शब्दों के माध्यम से साधक शिव की अनंत चेतना, भस्म आरती, डमरू की ध्वनि और ध्यानमग्न मुद्रा का ध्यान करता है।
शिव भक्ति का मूल सिद्धांत यही है कि जगत की प्रत्येक नश्वर वस्तु का अंत शिव में ही होना है। यह भजन भक्त को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है। शिव का नाम पंचमहाभूतों को नियंत्रित करने वाली परम शक्ति का प्रतीक है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव अत्यंत भोले हैं और साधारण जल तथा बेलपत्र अर्पण करने मात्र से भी प्रसन्न हो जाते हैं। इस शिव भजन का संकीर्तन करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और कुंडली के ग्रहों के दोष शांत होते हैं।

भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें। नियमित शिव भजन और पंचाक्षरी मंत्र (ॐ नमः शिवाय) के जप से तनाव का नाश होता है, अवसाद दूर होता है और अंतर्मन में अपूर्व शांति का उदय होता है। यह आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करने में भी सहायक है।
🕒 साधना एवं गायन विधि शिव संकीर्तन के लिए प्रदोष काल (संध्या समय) अथवा सोमवार का दिन सर्वोत्तम माना जाता है। उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठकर शिवजी का ध्यान करते हुए भजन गाएं।
�� अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने की सरल विधि क्या है?शुद्ध जल, बेलपत्र, धतूरा अर्पित करते हुए श्रद्धापूर्वक शिव मंत्र अथवा भजनों का संकीर्तन करने से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
शिव भजनों के लिए कौन सा दिन विशेष है?सोमवार, प्रदोष व्रत की तिथि और महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की उपासना और भजन संकीर्तन के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

क्या शिव जी की उपासना से कुंडली के दोष दूर होते हैं?हाँ, भगवान शिव (महाकाल) की आराधना से कालसर्प दोष, राहु-केतु दोष और शनि जनित कष्टों का निवारण होता है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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