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जोड़े कलसुपवा बांस के बहंगीया (Jode Kalsupwa ) - Shikha Tiwari Chhath Puja Geet

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छठ पूजा विशेष गीत | Devotional Song

जोड़े कलसुपवा बांस के बहंगीया (Jode Kalsupwa) - शिखा तिवारी छठ पूजा गीत

अपडेटेड: वर्ष 2026 | श्रेणी: छठ पूजा गीत

लोक आस्था के महापर्व छठ की पावन बेला में लोकगायिका शिखा तिवारी द्वारा स्वरबद्ध और प्रस्तुत भक्ति गीत "जोड़े कलसुपवा बांस के बहंगीया" पूर्वांचल और बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और प्रकृति के प्रति अगाध समर्पण का एक अत्यंत जीवंत और भावपूर्ण प्रतीक है। छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह सूर्योपासना, आत्मशुद्धि, पर्यावरण प्रेम और अनुशासन का वह अनुष्ठान है जहाँ मनुष्य प्रकृति के साक्षात स्वरूप—नदी, सूर्य, और बांस से बने पवित्र सूप व बहंगी—के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है। लोकगायिका शिखा तिवारी ने अपनी मधुर और सधी हुई आवाज से इस पारंपरिक गीत में जिस भक्ति भाव, मार्मिक लय और लोक-संस्कृति की खुशबू को पिरोया है, वह हर श्रद्धालु के हृदय को अनायास ही छठी मइया की आराधना में लीन कर देता है। इस विस्तृत आलेख में हम इस पावन भजन के बोल, उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, लोक परंपराओं और छठ महापर्व के दार्शनिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

छठ व्रत में 'कलसुपवा' (बांस के छोटे-छोटे सूप) और 'बहंगी' का विशेष स्थान होता है। बांस को हिंदू धर्म में वंश वृद्धि और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। जब व्रती महिलाएं बांस से बने जोड़े सूप में ठेकुआ, फल, कंदमूल और अर्घ्य की सामग्री सजाकर सिर या कंधे पर बहंगी पर रखकर घाट की ओर प्रस्थान करती हैं, तो वह दृश्य अलौकिक होता है। शिखा तिवारी का यह गीत इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृश्य को संगीत के माध्यम से जीवंत कर देता है, जो न केवल लोकगीतों प्रेमियों को बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

जोड़े कलसुपवा बांस के बहंगीया, कांच ही बांस के बहंगीया बहंगी लचकत जाव... उगा हे सुरुज देव भइले अरघ के बेर, सुना छठी मइया मोर अरधिया हे! बांसे के बहंगीया पर सूपवा सजाइल, केकरा घरे छठी मइया बरतिया धाइल? भक्ति भाव से सब मिलि गाइले भजनवा, छठी मइया दील्हें सुख-शांति धनवा! जोड़े कलसुपवा सुघ्घर सजा के, घाट पर जाइब हम दीया जरा के। सूरज भगवान के करी जैसन पूजन, धिन हो गइल छठी मइया तोहर भुवन! घाट के किनारे उमड़ल बा भीड़ भारी, दर्शन पावे खातिर तरसे महतारी। शिखा तिवारी गावे मइया के महिमा, सुने से पावन हो जाला सब महिमा!

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

शिखा तिवारी द्वारा गाए गए इस लोकप्रिय छठ गीत "जोड़े कलसुपवा बांस के बहंगीया" का भावार्थ बेहद गहरा और लोक-जीवन के समर्पण से ओत-प्रोत है। आइए इस गीत के विभिन्न चरणों के आंतरिक और आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

प्रथम चरण: बहंगी और सूप का अर्पण

गीत की शुरुआत बांस से बनी बहंगी और जोड़े (जोड़े हुए/दो) कलसुपवा (सूप) के वर्णन से होती है। 'कांच ही बांस के बहंगीया बहंगी लचकत जाव' पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति से प्राप्त बांस के कच्चे और लचीले तनों से तैयार बहंगी पर जब छठी मइया का प्रसाद रखकर व्रती घाट की ओर बढ़ती हैं, तो वह बहंगी श्रद्धा के भार से हल्की सी झुक जाती है। यह झुकना अहंकार के विसर्जन और पूर्ण समर्पण का द्योतक है।

द्वितीय चरण: सूर्य देव और छठी मइया की आराधना

'उगा हे सुरुज देव भइले अरघ के बेर'—यह पंक्ति छठ महापर्व के उस अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण को दर्शाती है जब संध्या या प्रात:काल में सूर्य भगवान को अर्घ्य देने का समय हो जाता है। व्रती और उनके परिवारजन अत्यंत व्याकुलता और श्रद्धा के साथ सूर्य देव और प्रकृति की शक्ति 'छठी मइया' (माता उषा या षष्ठी देवी) से अपने व्रत को स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं।

तृतीय चरण: पारिवारिक और सामाजिक समरसता

गीत के अंत में लोकगायिका बताती हैं कि कैसे पूरा समाज जात-पात और ऊंच-नीच के भेदों को भूलकर घाट पर इकट्ठा होता है। दीया जलाना, छठी मइया के गीत गाना और संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना देना इस पर्व की अद्भुत विशेषता है। शिखा तिवारी का नाम इस लोक परंपरा को आधुनिक माध्यमों से घर-घर तक पहुंचाने में सराहनीय है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मूल भावना लोक-समर्पण, प्रकृति पूजा और अटूट निष्ठा पर आधारित है। छठ पर्व भारत की उस प्राचीन संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है जो उगते के साथ-साथ डूबते सूर्य की भी उपासना करना सिखाती है। यह गीत हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, यदि आपका विश्वास और संयम पक्का है, तो छठी मइया और सूर्य देव की कृपा से सभी संकट टल जाते हैं।

पारंपरिक छठ गीतों के अध्ययन से हमें भगवान श्री राम और माता सीता द्वारा पहली बार अयोध्या में छठ व्रत करने की पौराणिक कथाओं की भी याद आती है। यह गीत उसी सनातन परंपरा को आधुनिक काल में जीवंत रखता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण (Parameter) तथ्य (Details)
गीत का नाम जोड़े कलसुपवा बांस के बहंगीया (Jode Kalsupwa)
गायिका शिखा तिवारी (Shikha Tiwari)
संगीत शैली पारंपरिक पूर्वांचली लोकगीत / छठ गीत
भाषा भोजपुरी / हिंदी लोकभाषा
मुख्य पर्व छठ पूजा (Chhath Puja)
आराध्य देवता सूर्य देव एवं छठी मइया (माता षष्ठी)
मुख्य संदेश प्रकृति प्रेम, अनुशासन, स्वच्छता और अटूट भक्ति

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

लोक संगीत संस्कृति की वह धरोहर है जो पीढ़ियों से मौखिक रूप से चली आ रही है। शिखा तिवारी जैसी प्रतिभावान लोकगायिकाओं ने इस पारंपरिक धरोहर को आधुनिक ऑडियो-विजुअल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पुनर्जीवित किया है। पारंपरिक छठ गीतों में बांस, सूप, दउरा, कोसी और घाट की सजावट का जो सजीव चित्रण मिलता है, उसे अपनी स्वर लहरियों से श्रोताओं के मन में उतारना एक कठिन साधना है। इस गीत के माध्यम से लोक कलाकारों ने ग्रामीण भारत की सादगी और उसकी सांस्कृतिक गहराई को वैश्विक पटल पर रखा है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द (Word) सरल अर्थ (Simple Meaning) संदर्भ (Context)
कलसुपवा बांस से बना छोटा सूप पूजा की सामग्री रखने का पारंपरिक पात्र
बहंगीया बांस की कांवड़ जिस पर टोकरी या सूप लटकाए जाते हैं घाट तक प्रसाद ले जाने का साधन
कांच बांस कच्चा या हरा बांस जिसे पवित्र और लचीला माना जाता है
अरघ (अर्घ्य) सूर्य देव को जल अर्पित करना छठ पूजा का मुख्य अनुष्ठान
बरतिया व्रत करने वाला / व्रती छठ व्रत का कठिन अनुष्ठान करने वाली माताएं-बहनें

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ महापर्व भारतीय संस्कृति का सबसे कठोर और पवित्र अनुष्ठान माना जाता है। इस पर्व में किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि प्रत्यक्ष दिखने वाले देवता सूर्य और जल की शक्ति का पूजन होता है। 'जोड़े कलसुपवा' गीत इस बात का प्रतीक है कि कैसे साधारण बांस और प्राकृतिक वस्तुओं को अपनी श्रद्धा से पवित्र करके देवी-देवताओं को समर्पित किया जाता है।

यह पर्व समानता का संदेश देता है, जहाँ राजा हो या रंक, सभी को नदी तट पर एक समान रेत पर बैठकर अर्घ्य देना होता है। इस प्रकार के लोकगीत समाज में सांस्कृतिक समरसता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी प्रकार अन्य पावन पर्वों पर गाए जाने वाले भजन जैसे श्री लक्ष्मी आरती और श्री हनुमान चालीसा भी सनातन संस्कृति में भक्ति और ऊर्जा का संचार करते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  • 🌿 प्रकृति के प्रति सम्मान: बांस, फल, और जल हमारी प्राकृतिक संपदा हैं, जिनका छठ पर्व में आदर किया जाता है।
  • 🤝 कठिन परिस्थितियों में धैर्य: 36 घंटे का निर्जला व्रत सिखाता है कि जीवन में संयम और अनुशासन से किसी भी कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
  • 👨‍👩‍👧‍👦 पारिवारिक एकजुटता: छठ पूजा के बहाने पूरा परिवार और समाज मिलकर एक उत्सव मनाता है, जिससे आपसी प्रेम बढ़ता है।
  • 🙏 अहंकार का त्याग: बहंगी का झुकना और नदी तट पर सबका एक समान बैठना अहंकार के शमन की सीख देता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक चलने वाले छठ महापर्व के दौरान सुना और गाया जाता है। विशेषकर जब महिलाएं नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य (नदी घाट जाते समय) और उषा अर्घ्य के लिए तैयारी करती हैं, तब यह लोकगीत वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना देता है। इसके अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों, छठ घाटों पर लाउडस्पीकर और डिजिटल माध्यमों पर भी इसे बड़े चाव से सुना जाता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

विशेषता विवरण
गीत शीर्षक जोड़े कलसुपवा बांस के बहंगीया
प्रसिद्ध कलाकार शिखा तिवारी
पर्व संबंध छठ पूजा (Chhath Vrat)
सांस्कृतिक महत्व लोक आस्था, प्रकृति वंदन और पारिवारिक सुख-समृद्धि
मुख्य स्वर भक्तिपूर्ण, मधुर और लोक-लयबद्ध
प्लेटफॉर्म भक्तिलोक (BhaktiLok.in)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस लोकप्रिय छठ गीत को प्रसिद्ध लोकगायिका शिखा तिवारी (Shikha Tiwari) ने अपने मधुर स्वर में गाया है।

'कलसुपवा' बांस से बने छोटे सूप होते हैं जिनमें प्रसाद सजाया जाता है। 'बहंगी' एक कांवड़नुमा संरचना होती है जिस पर प्रसाद रखकर व्रती महिलाएं नदी घाट तक ले जाती हैं। यह प्रकृति के प्रति सम्मान और पवित्रता का प्रतीक है।

छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य देव (सुरुज देव) और उनकी शक्ति छठी मइया (माता षष्ठी) को समर्पित है। इसमें प्रकृति, जल और ऊर्जा के स्रोतों की पूजा की जाती है।

यह गीत पारंपरिक भोजपुरी और हिंदी लोकभाषा की मिश्रित शैली में है, जो पूर्वांचल और बिहार के सांस्कृतिक परिवेश को दर्शाता है।

छठ महापर्व चार दिनों का होता है, जिसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है, उसके बाद खरना, संध्या अर्घ्य और अंत में सुबह के अर्घ्य के साथ व्रत का समापन होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और सनातन परंपराओं के अध्ययन पर आधारित है। इसे पाठकों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जानकारी को समृद्ध करने के लिए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यदि आपके पास इस गीत या छठ परंपरा से जुड़ा कोई अन्य प्रामाणिक संस्मरण है, तो आप हमसे साझा कर सकते हैं।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पूर्वांचल की लोक गाथाएं एवं पारंपरिक छठ गीत संग्रह।
  • भारतीय सनातन संस्कृति, सूर्योपासना और लोक पर्वों के ऐतिहासिक ग्रंथ।
  • लोकगायिका शिखा तिवारी के प्रामाणिक संगीत एलबम एवं ऑडियो-विजुअल संदर्भ।
  • क्षेत्रीय लोक-साहित्य और पारंपरिक अनुष्ठान पद्धतियां।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 07 Oct 2026

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