Parvati Stotram

अंगना में पोखरी खोनैब (Angna Mein Pokhri Khonaib) - Chhath Pooja Ke Geet KAVITA PAUDWAL - Bhaktilok

75 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोक-हृदय में बसा महापर्व छठ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, शुचिता और अगाध श्रद्धा का जीवंत उत्सव है। इस महापर्व के अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत साधक के अंतर्मन को झंकृत कर देते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण पारंपरिक छठ गीत है "अंगना में पोखरी खोनैब" (Angna Mein Pokhri Khonaib), जिसे सुप्रसिद्ध गायिका कविता पौडवाल (Kavita Paudwal) ने अपने मधुर और भक्तिमय स्वर से सजाया है। यह गीत मैथिली और भोजपुरी लोक संस्कृति की सुगंध समेटे हुए है, जिसमें एक अनन्य भक्त की यह अभिलाषा व्यक्त हुई है कि वह अपने ही घर के आंगन में पवित्र सरोवर (पोखरी) का निर्माण कर, उसमें गंगाजल भरकर छठी मैया की पूजा अर्चना करे। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन गीत के बोल, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, सांस्कृतिक महत्व और इससे जुड़े विभिन्न पक्षों का सांगोपांग विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

अंगना में पोखरी खोनैब - छठ पूजा गीत


अंगना में पोखरी खोनैब, ओही में गंगा जल ढरबैब हो।
करबै छठी मैया के बरतिया, अरघ देबै सुरुज देव के हो॥

सोना के खड़ुआ मँगाइब, गंगा जल भरि-भरि लेबैब हो।
करबै छठी मैया के बरतिया, अरघ देबै सुरुज देव के हो॥

नारियल-केरा के घवदा, सूपवा में सजि-सजि राखब हो।
करबै छठी मैया के बरतिया, अरघ देबै सुरुज देव के हो॥

मखना के लावा छिटैब, फूलवा से वेदिया सजैब हो।
करबै छठी मैया के बरतिया, अरघ देबै सुरुज देव के हो॥

अंगना में पोखरी खोनैब, ओही में गंगा जल ढरबैब हो।
करबै छठी मैया के बरतिया, अरघ देबै सुरुज देव के हो॥

सदा सुहागिन राखिहऽ मैया, गोदी में बालक खेलाइहऽ हो।
करबै छठी मैया के बरतिया, अरघ देबै सुरुज देव के हो॥

अंगना में पोखरी खोनैब, ओही में गंगा जल ढरबैब हो।
करबै छठी मैया के बरतिया, अरघ देबै सुरुज देव के हो॥

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक भक्त के हृदय की कोमल और पवित्र भावनाओं का प्रकटीकरण है। आइए इस पावन गीत के प्रत्येक अंतरे के गहरे अर्थ और भावार्थ को समझें:

आंगन में सरोवर की स्थापना और गंगाजल का आह्वान

"अंगना में पोखरी खोनैब, ओही में गंगा जल ढरबैब हो..."
गीत की शुरुआत में भक्त अपनी गहरी अभिलाषा व्यक्त करता है। वह कहता है कि हे छठी मैया! मैं अपने घर के आंगन में ही एक सुंदर और पवित्र पोखरी (तालाब) खुदवाऊंगा। उस पोखरी में मैं पवित्र गंगा नदी का जल लाकर भरूंगा। इस पंक्ति का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि भक्त अपने अंतःकरण रूपी आंगन को शुद्ध करना चाहता है और उसमें भक्ति रूपी गंगाजल प्रवाहित करना चाहता है ताकि वह पूर्ण पवित्रता के साथ भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना कर सके।

स्वर्ण पात्रों से पूजन की तैयारी

"सोना के खड़ुआ मँगाइब, गंगा जल भरि-भरि लेबैब हो..."
भक्त कहता है कि वह पूजा के लिए सोने के कलश (खड़ुआ) मंगाएगा और उसमें पवित्र गंगाजल भरकर लाएगा। यहां 'सोना' केवल एक धातु नहीं है, बल्कि यह भक्त की श्रद्धा की बहुमूल्यता और उसकी निष्काम भक्ति का प्रतीक है। ईश्वर की आराधना में भक्त अपनी सर्वोत्तम वस्तुएं अर्पित करने की इच्छा रखता है।

नैवेद्य और सूप की सजावट

"नारियल-केरा के घवदा, सूपवा में सजि-सजि राखब हो..."
छठ पूजा में फल और नैवेद्य का विशेष महत्व है। भक्त कहता है कि वह नारियल और केले के बड़े-बड़े घवद (गुच्छे) मंगाएगा और उन्हें बांस के बने पवित्र सूप में सुंदर ढंग से सजाकर रखेगा। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का तरीका है, जहां धरती मां द्वारा दिए गए फलों को सबसे पहले भगवान सूर्य को समर्पित किया जाता है।

वेदी का श्रृंगार और मखाने का अर्पण

"मखना के लावा छिटैब, फूलवा से वेदिया सजैब हो..."
मिथिलांचल और बिहार की संस्कृति में मखाना अत्यंत पवित्र माना जाता है। भक्त कहता है कि वह मखाने के लावे को बिखेरेगा और सुंदर सुगंधित फूलों से पूजा की वेदी को सजाएगा। यह दृश्य अत्यंत मनोहारी है जो पूजा स्थल को दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।

सुहाग और संतान की मंगल कामना

"सदा सुहागिन राखिहऽ मैया, गोदी में बालक खेलाइहऽ हो..."
अंत में, भक्त छठी मैया से अपने परिवार के कल्याण की प्रार्थना करता है। वह याचना करता है कि हे मैया! मुझे सदा सुहागिन रखना और मेरी गोदी में सुंदर बालक खेलाना (संतान सुख देना)। यह प्रार्थना लोक जीवन की मूलभूत आकांक्षाओं—अखंड सौभाग्य और वंश वृद्धि—को दर्शाती है, जिसे छठी मैया के आशीर्वाद से ही संभव माना जाता है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना "आत्मिक समर्पण" और "प्रकृति पूजा" है। सनातन धर्म में नदियों, तालाबों और सूर्य देव को साक्षात ईश्वर का रूप माना गया है। यह गीत हमें संदेश देता है कि ईश्वर की आराधना के लिए किसी भव्य मंदिर या आडंबर की आवश्यकता नहीं है; यदि मन में सच्ची श्रद्धा हो, तो अपने ही आंगन को तीर्थ बनाया जा सकता है।

  • सरलता और शुचिता: गीत में प्रयुक्त सामग्रियां जैसे सूप, नारियल, केला, मखाना और गंगाजल हमारी पारंपरिक जीवन शैली और सादगी को दर्शाती हैं।
  • पारिवारिक सामंजस्य: गीत में पूरे परिवार के सुख, सौभाग्य और संतान की कामना की गई है, जो समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है।
  • पर्यावरण संरक्षण: आंगन में पोखरी खोदने की बात जल संरक्षण और प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे जुड़ाव को रेखांकित करती है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
गीत का नाम अंगना में पोखरी खोनैब (Angna Mein Pokhri Khonaib)
गायिका कविता पौडवाल (Kavita Paudwal)
पर्व/अवसर महापर्व छठ पूजा (Chhath Pooja)
भाषा मैथिली / भोजपुरी (लोक भाषा)
मुख्य विषय छठी मैया की आराधना, सूर्य देव को अर्घ्य, गृह-आंगन में पूजा की तैयारी
संगीत शैली पारंपरिक लोक संगीत (Devotional Folk)

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस गीत को अपनी सुरीली आवाज से अमर बनाने का श्रेय सुप्रसिद्ध गायिका कविता पौडवाल को जाता है। उन्होंने अपनी माता अनुराधा पौडवाल और पिता अरुण पौडवाल की संगीत विरासत को अत्यंत गरिमा के साथ आगे बढ़ाया है। कविता पौडवाल की आवाज में जो सादगी, मिठास और भक्ति का पुट है, वह इस पारंपरिक छठ गीत को सीधे श्रोताओं के हृदय तक पहुंचाता है। इस गीत का संगीत पारंपरिक धुनों पर आधारित है, जो सदियों से बिहार के गांवों में गूंजती आ रही हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ
पोखरी छोटा तालाब या सरोवर छठ पूजा के लिए जल स्रोत का होना अनिवार्य है।
खोनैब खुदवाऊंगा / निर्माण करवाऊंगा आंगन में तालाब खोदने की पवित्र क्रिया।
ढरबैब प्रवाहित करना / डालना तालाब में गंगाजल भरने की क्रिया।
खड़ुआ कलश या घड़ा (सोने का पात्र) पूजा के लिए प्रयुक्त होने वाला पवित्र धातु का पात्र।
घवदा केले का पूरा गुच्छा छठ पूजा में केले के पूरे गुच्छे का अर्पण अत्यंत शुभ माना जाता है।
सूपवा बांस का बना सूप जिसमें पूजा की सामग्री रखकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है।
अरघ अर्घ्य (जल या दूध का अर्पण) अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को दिया जाने वाला अर्घ्य।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा का त्योहार ऋग्वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। सूर्योपनिषद और महाभारत में भी सूर्य पूजा का विस्तृत उल्लेख मिलता है। "अंगना में पोखरी खोनैब" गीत इस वैदिक परंपरा का लोक-संस्करण है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह गीत मिथिलांचल की समृद्ध परंपरा को प्रदर्शित करता है। मिथिला में तालाबों (पोखरों) का विशेष महत्व है। हर घर के पास एक पोखरी होना वहां की जीवन शैली का हिस्सा रहा है। जब कोई व्रती अपने आंगन में ही पोखरी खोदने की बात करती है, तो वह यह दर्शाती है कि उसकी श्रद्धा इतनी प्रगाढ़ है कि वह संपूर्ण तीर्थ को अपने ही घर में आमंत्रित कर रही है। यह कबीर के उस कथन की याद दिलाता है—"मन चंगा तो कठौती में गंगा"।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह पावन लोकगीत हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाता है:

  1. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: सूर्य, जल, फल और फूल के माध्यम से हम प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना सीखते हैं।
  2. सामूहिकता और सेवा भाव: छठ पूजा अकेले नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के सहयोग से संपन्न होती है। यह गीत आपसी प्रेम को बढ़ावा देता है।
  3. मानसिक और शारीरिक शुचिता: पूजा की तैयारी में स्वच्छता का जो स्तर बनाए रखा जाता है, वह हमें अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि यह गीत वर्षभर सुना जा सकता है, परंतु इसका वास्तविक आनंद और महत्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय महापर्व छठ के दौरान होता है।

  • नहाय-खाय (चतुर्थी): इस दिन से ही घरों में यह गीत गूंजने लगता है, जिससे वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
  • खरना (पंचमी): संध्या समय प्रसाद बनते समय इस गीत का श्रवण मन को शांति प्रदान करता है।
  • संध्या अर्घ्य (षष्ठी): जब व्रती घाट की ओर प्रस्थान करते हैं, तब यह गीत सामूहिक रूप से गाया जाता है।
  • उषा अर्घ्य (सप्तमी): उगते सूर्य को अर्घ्य देते समय इस गीत की मधुर ध्वनि से संपूर्ण वातावरण गुंजायमान रहता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

विशेषता संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक अंगना में पोखरी खोनैब
मुख्य देवी-देवता छठी मैया (प्रकृति देवी) एवं सूर्य देव
स्वर कविता पौडवाल
काव्य रस भक्ति रस, वात्सल्य रस, शांत रस
प्रमुख वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, हारमोनियम
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस गीत का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची श्रद्धा और पवित्रता के साथ अपने ही घर-आंगन को तीर्थ बनाया जा सकता है। यह गीत प्रकृति पूजा, सादगी और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना को दर्शाता है।

इस गीत को सुप्रसिद्ध गायिका कविता पौडवाल ने गाया है। इसकी शैली पारंपरिक मैथिली/भोजपुरी लोक संगीत (छठ लोकगीत) है।

छठ पूजा में जल स्रोत (नदी, तालाब या पोखरी) का होना अनिवार्य है क्योंकि व्रती पानी में खड़े होकर ही सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। यदि नदी पास न हो, तो आंगन या सामूहिक स्थल पर पोखरी खोदकर पूजा की जाती है।

"सोना के खड़ुआ" का अर्थ सोने के कलश या पात्र से है। यह भक्त की उत्कृष्ट श्रद्धा और पूजा सामग्री की पवित्रता व बहुमूल्यता का प्रतीक है।

मुख्य रूप से यह गीत कार्तिक मास में छठ पूजा के चार दिनों के दौरान गाया और सुना जाता है, लेकिन भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार इसे कभी भी सुन सकते हैं।

छठ पूजा में मुख्य रूप से प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और उनकी मानस बहन छठी मैया (उषा देवी/प्रकृति देवी) की पूजा-अर्चना की जाती है।

इस गीत में नारियल, केले के घवद (गुच्छे) और मखाने के लावे का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जो छठ पूजा के मुख्य प्रसाद हैं।

यह गीत मुख्य रूप से मैथिली और भोजपुरी मिश्रित लोक भाषा में रचित है, जो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की मुख्य बोलियां हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख Bhaktilok के विद्वान संपादकों और संगीत समीक्षकों द्वारा तैयार किया गया है। इस सामग्री को तैयार करने में पारंपरिक लोकगीतों के मूल पाठ, क्षेत्रीय सांस्कृतिक मान्यताओं और प्रामाणिक स्रोतों का उपयोग किया गया है। यह "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" पाठकों को शुद्ध और त्रुटिहीन जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • बिहार की लोक संस्कृति और पारंपरिक छठ गीत संग्रह।
  • श्रीमद्भागवत महापुराण एवं सूर्योपनिषद (सूर्य आराधना के संदर्भ में)।
  • कविता पौडवाल के आधिकारिक भक्ति एल्बम (T-Series Devotional)।
  • मैथिली और भोजपुरी लोक साहित्य अकादमी के शोध पत्र।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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