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जय अम्बे माँ ( - Mohammed Rafi Lata Mangeshkar Mata Bhajan

लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में 'जय अम्बे माँ' भजन के सम्पूर्ण बोल और भावार्थ पढ़ें। बप्पी लहरी द्वारा संगीतमय यह पावन देवी भक्ति गीत।

जय अम्बे माँ - Mohammed Rafi Lata Mangeshkar Mata Bhajan | सम्पूर्ण गीत, बोल एवं भावार्थ

गायक: मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर
संगीतकार: बप्पी लहरी
गीतकार: हसरत जयपुरी
फिल्म/एल्बम: खून की पुकार (1978)

भारतीय संगीत जगत के दो महानायक, स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर और गानों के शहंशाह मोहम्मद रफ़ी की सुरीली आवाज़ में सजा यह पावन देवी भजन 'जय अम्बे माँ' सनातन धर्म की आराध्य आदिशक्ति जगदम्बा की महिमा का गुणगान करता है। फिल्म 'खून की पुकार' के इस अद्भुत भजन में संगीत के जादूगर बप्पी लहरी ने पारंपरिक भक्ति और शास्त्रीय संगीत का ऐसा सम्मिश्रण प्रस्तुत किया है, जो श्रोताओं के मन में असीम श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर देता है। हसरत जयपुरी द्वारा रचित इन पवित्र पंक्तियों में माता के ममतामयी, करुणावान और दुष्टनाशिनी स्वरूप का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। जब भी इस भजन के स्वर गूंजते हैं, माता के दरबार की अलौकिक छवि भक्तों के नेत्रों के समक्ष साकार हो उठती है। यह भजन केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि साधक के अंतःकरण को पावन करने वाला एक दिव्य साधना पथ है। नवरात्र के पवित्र दिनों में, देवी जागरण में अथवा दैनिक संध्या वंदन के समय इस भजन का श्रवण और गायन मनुष्य को भौतिक संतापों से मुक्त कर मानसिक शांति और भगवती की कृपा का अधिकारी बनाता है।

🎵 गीत की संक्षिप्त जानकारी

भजन / गीत का नाम जय अम्बे माँ (Jai Ambe Maa)
गायक कलाकार मोहम्मद रफ़ी एवं लता मंगेशकर
संगीतकार बप्पी लहरी (Bappi Lahiri)
गीतकार हसरत जयपुरी (Hasrat Jaipuri)
फिल्म / एल्बम खून की पुकार (Khoon Ki Pukar)
भाषा हिंदी / फिल्मी devotional
मुख्य भाव भक्ति, समर्पण, देवी वंदना एवं शरणागति

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

॥ जय अम्बे माँ - सम्पूर्ण गीत के बोल ॥

जय अम्बे माँ, जगदम्बे माँ,
तेरी महिमा गाए संसार।
तू ही भवानी, तू ही कल्याणी,
तुझसे चले ये सारा संसार॥

अंधेरों में तू दीप जलाए,
भटके हुओं को राह दिखाए।
जो भी तेरे दर पे आए,
खाली झोली कोई न जाए॥

मैया तेरे चरणों की धूल,
मेरे जीवन का है सिंगार।
जय अम्बे माँ, जगदम्बे माँ,
तेरी महिमा गाए संसार॥

सिंह सवारी रूप तुम्हारा,
दुष्टों का तू करे संहार।
भक्तों की तू रक्षा करती,
मैया तू है करुणा आगार॥

शीश झुका के तुझको ध्याएं,
सुर और नर सब मिलकर गाएं।
तेरी दया की छांव में मैया,
हम सब पाएँ सुख अपार॥

जय अम्बे माँ, जगदम्बे माँ,
तेरी महिमा गाए संसार।
तू ही भवानी, तू ही कल्याणी,
तुझसे चले ये सारा संसार॥
              

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह भजन आदिशक्ति जगत जननी माँ दुर्गा के चरणों में समर्पित एक अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक स्तुति है। इसके माध्यम से गीतकार हसरत जयपुरी ने यह दर्शाया है कि इस समस्त ब्रह्मांड का संचालन और नियंत्रण उस पराशक्ति भगवती की कृपा के बिना असंभव है। आइए इस पवित्र गीत के एक-एक अंश के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

मुखड़ा एवं आरंभिक भाव:

"जय अम्बे माँ, जगदम्बे माँ, तेरी महिमा गाए संसार। तू ही भवानी, तू ही कल्याणी, तुझसे चले ये सारा संसार॥"
इस पंक्ति में संपूर्ण सृष्टि के प्राणियों द्वारा माँ अम्बे की वंदना करने का प्रसंग है। माँ को 'भवानी' (संसार रूपी भवसागर से पार लगाने वाली) और 'कल्याणी' (कल्याण करने वाली) कहकर संबोधित किया गया है। सनातन दर्शन के अनुसार, प्रकृति ही गतिशीलता प्रदान करती है और पुरुष (परमात्मा) आधार बनता है; देवी वही प्रकृति स्वरूपा हैं जिनके स्पंदन से यह संपूर्ण जगत गतिमान है।

अंधकार से प्रकाश की ओर मार्गदर्शन:

"अंधेरों में तू दीप जलाए, भटके हुओं को राह दिखाए। जो भी तेरे दर पे आए, खाली झोली कोई न जाए॥"
मानव जीवन में जब मोह, अज्ञान, और दुखों का अंधकार छा जाता है, तब भगवती का स्मरण मनुष्य के भीतर विवेक और ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करता है। जो साधक अपने जीवन के मार्ग से भटक जाते हैं, उन्हें माँ अपने वात्सल्यपूर्ण आंचल की छाया में लेकर सही राह दिखाती हैं। माँ के दरबार की यह विशेषता है कि वहाँ से कोई भी याचक निराश नहीं लौटता।

शरणागति और समर्पण:

"मैया तेरे चरणों की धूल, मेरे जीवन का है सिंगार।"
भक्त का अहंकार जब पूरी तरह गल जाता है, तब वह माँ के चरणों की रज (धूल) को अपने जीवन का सबसे बड़ा आभूषण मानता है। सांसारिक भौतिक आभूषणों से परे, भगवती के चरणों की धूल साधक को भवसागर के विकारों से बचाती है और उसे आन्तरिक शांति प्रदान करती है।

दुष्टनाशिनी और करुणा की मूर्ति:

"सिंह सवारी रूप तुम्हारा, दुष्टों का तू करे संहार। भक्तों की तू रक्षा करती, मैया तू है करुणा आगार॥"
सिंह पर आसीन माता का यह स्वरूप शौर्य, तेज और न्याय का प्रतीक है। जहाँ एक ओर वह अधर्म और अहंकार का नाश करने वाली रौद्र रूपा हैं, वहीं दूसरी ओर अपने भक्तों के लिए वे करुणा का अपार सागर (आगार) हैं। उनकी यह दोहरी भूमिका ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखती है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की केंद्रीय भावना 'अनन्य शरणागति' (Total Surrender) और 'अटूट विश्वास' पर टिकी हुई है। मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर की दिव्य आवाज़ों ने इस भजन में ऐसी रूहानी तासीर भर दी है जो पत्थर दिल को भी पिघला सकती है। संदेश स्पष्ट है—मनुष्य चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियों में क्यों न घिर जाए, यदि उसका ध्यान और विश्वास जगत जननी माँ के चरणों में है, तो वह हर संकट से सहज ही पार पा सकता है। यह गीत पारिवारिक मूल्यों, सात्विक जीवन शैली और देवी शक्ति के प्रति अटूट आस्था का संदेश देता है।

इसी प्रकार की अन्य पावन स्तुतियों और चालीसा के पाठ के लिए आप हमारे श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र के पावन पृष्ठों का भी दर्शन कर सकते हैं, जो आपकी आध्यात्मिक यात्रा को और अधिक समृद्ध बनाएंगे।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द सरल हिंदी अर्थ संदರ್ಭ / प्रसंग
जगदम्बा संपूर्ण जगत की माता माता दुर्गा का ब्रह्मांडीय स्वरूप
भवानी संसार रूपी भवसागर से पार लगाने वाली देवी का कृपालु नाम
कल्याणी कल्याण करने वाली, मंगलकारिणी भक्तों का अमंगल दूर करने वाली शक्ति
आगार भण्डार, घर या स्रोत करुणा का आगार (करुणा का असीम भंडार)
संहार नाश करना, अंत करना अधर्म और दुष्टों का विनाश
सिंगार श्रृंगार, आभूषण या सजावट चरणों की धूल को आभूषण मानना

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

भारतीय संस्कृति में संगीत को ईश्वर प्राप्ति का सबसे सुगम मार्ग माना गया है (नादोपासना)। जब मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर जैसे दिग्गज कलाकारों ने बप्पी लहरी के संगीत निर्देशन में इस देवी गीत को स्वरबद्ध किया, तो यह केवल एक फिल्मी गाना नहीं बल्कि कोटि-कोटि सनातनियों के दिलों की धड़कन बन गया। नवरात्र के नौ दिनों में मंदिरों, पंडालों और घरों में इस प्रकार के भजनों का गूंजना भारतीय संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण है।

यह भजन साधक के भीतर सात्विक वृत्तियों को जाग्रत करता है। जब कोई व्यक्ति सुबह या संध्या के समय स्नान-ध्यान के पश्चात इस भजन को सुनता है, तो उसके मन का संताप, क्रोध और तनाव स्वतः ही शांत होने लगता है। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर का वह अनमोल रत्न है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आस्था के दीप को प्रज्वलित रखता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  • अहंकार का त्याग: जैसे भक्त माँ के चरणों की धूल को अपना श्रृंगार मानता है, वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन से अहंकार त्यागकर विनम्रता अपनानी चाहिए।
  • संकट में धैर्य: कठिन समय में ईश्वर या शक्ति का स्मरण मनुष्य को मानसिक संबल देता है और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।
  • करुणा और न्याय का संतुलन: माँ दुर्गा की तरह जीवन में न्याय के प्रति दृढ़ और दीन-दुखियों के प्रति करुणावान होना चाहिए।
  • संगीत और साधना का समन्वय: कला और संगीत का उपयोग यदि उच्च आदर्शों और भगवत् भक्ति के लिए किया जाए, तो वह समाज के उत्थान का माध्यम बन जाता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

इस पावन भजन को सुनने और गुनगुनाने के लिए निम्नलिखित अवसर अत्यंत उत्तम माने जाते हैं:

  • शारदीय एवं चैत्र नवरात्र: देवी के नौ दिनों के अनुष्ठान के दौरान सुबह और शाम की आरती या पूजन के समय।
  • दैनिक पूजा-पाठ: घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करते समय मानसिक एकाग्रता के लिए।
  • माता का जागरण या चौकी: सामूहिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक-आध्यात्मिक आयोजनों में।
  • जब मन अशांत हो: मानसिक शांति, तनाव मुक्ति और सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए किसी भी समय एकांत में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध भजन को भारतीय संगीत जगत के दो अत्यंत प्रतिष्ठित और स्वर-सम्राट कलाकारों—मोहम्मद रफ़ी जी और गानकोकिला लता मंगेशकर जी ने अपनी मधुर आवाज़ से सजाया है।

इस पावन भजन का संगीत प्रसिद्ध संगीतकार बप्पी लहरी जी ने तैयार किया है तथा इसके मार्मिक और प्रेरणादायक बोल जाने-माने गीतकार हसरत जयपुरी जी द्वारा रचे गए हैं।

यह भजन वर्ष 1978 में रिलीज हुई हिंदी फिल्म 'खून की पुकार' (Khoon Ki Pukar) का एक अत्यंत लोकप्रिय और भक्तिमय गीत है।

नवरात्र के दौरान इस भजन को सुनने से मन को असीम शांति मिलती है, घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक होता है तथा देवी माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

नहीं, यद्यपि नवरात्र और देवी जागरण में इसका विशेष महत्व है, परंतु भगवती की आराधना और मानसिक शांति के लिए इसे वर्ष के किसी भी दिन और किसी भी समय सुना या गाया जा सकता है।

सनातन परंपरा में माँ अम्बे को आदिशक्ति, जगत जननी, दुष्टों का संहार करने वाली महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का सम्मिलित स्वरूप तथा भक्तों की रक्षा करने वाली करुणा मूर्ति के रूप में पूजा जाता है।

इस भजन का केंद्रीय भाव माता के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति), उनकी महिमा का गुणगान और संकट के समय उनकी शरण में जाने पर सभी कष्टों का निवारण होना है।

आज की भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जीवनशैली में इस तरह के क्लासिक भजनों का श्रवण मानसिक तनाव को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक स्थिरता और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव प्रदान करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह आलेख और इसके अंतर्गत प्रस्तुत संपूर्ण सामग्री (गीत के बोल, भावार्थ, और सांस्कृतिक महत्व) पाठकों की धार्मिक एवं आध्यात्मिक संतुष्टि को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत की गई है। इसमें प्रयुक्त सभी पारंपरिक संदर्भ सनातन लोक-आस्था और देवी उपासना की परंपराओं पर आधारित हैं।

स्रोत एवं संदर्भ:

  • सनातन देवी उपासना एवं लोक परंपराएं
  • भारतीय फिल्म संगीत इतिहास एवं अभिलेखागार (फिल्म 'खून की पुकार', 1978)
  • भक्ति साहित्य एवं संगीत कोश

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 16 Oct 2026

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