Parvati Stotram

करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन (karuda karo kast haro gyan do bhagwan Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

76 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन - परिचय एवं भक्ति रस

सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में संकीर्तन, भजन और प्रार्थना का स्थान अत्यंत सर्वोच्च माना गया है। "करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन (karuda karo kast haro gyan do bhagwan)" एक ऐसा पावन और अंतर्मन को झंकृत कर देने वाला भक्ति गीत है, जो साधक के भीतर छिपी जिजीविषा, ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, पूर्ण शरणागति (Surrender) और आत्मसमर्पण के भाव को जागृत करता है। कलयुग में भगवान के नाम का स्मरण और उनकी करुणा प्राप्ति का सहज साधन संकीर्तन को बताया गया है। जब मनुष्य संसार के दुखों, मोह-माया, और कष्टों से घिर जाता है, तब एकमात्र परम सत्ता ही उसे इस भवसागर से पार लगा सकती है। यह भजन साधक की पुकार है, जिसमें वह अपने आराध्य प्रभु श्री कृष्ण, भगवान विष्णु अथवा समस्त ब्रह्मांड के पालक से यह विनती करता है कि हे प्रभु! हमारे समस्त कष्टों का निवारण करो, हमारे जीवन को अपनी अहैतुरी करुणा से सींचो और हमारे अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान रूपी प्रकाश से हमारे अंतःकरण को आलोकित करो। इस गीत की प्रत्येक पंक्ति में एक गहरी आध्यात्मिक छटपटाहट और अपने इष्ट के प्रति अगाध विश्वास झलकता है, जो किसी भी साधक को मानसिक शांति और आंतरिक ऊर्जा प्रदान करता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण बोल, गहन भावार्थ, दार्शनिक महत्व, गायन विधि और जीवन पर इसके प्रभाव का संपूर्ण विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन,

तुम्हीं हो हमारे प्राण, तुम्हीं हो जीवन धन।

संसार की इस आंधी में, नैया डगमगाए,

कोई नहीं इस जग में, जो राह हमें दिखाए।

तुम ही आकर थाम लो, हे कृपा के सागर,

चरणों में तेरे बीते, जीवन का हर पल हर क्षण।

करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन...

अज्ञान का अंधियारा, छाया है मन भारी,

माया के बंधनों में, फंसी है यह मतवारी।

विवेक का दीप जलाओ, हे प्रभु अंतर में,

तेरी ही ज्योति से हो, दूर सारे संताप गहन।

करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन...

सुख-दुःख की धूप-छांव में, डगमगाए न मन मेरा,

हर परिस्थिति में रहे, मुझको भरोसा तेरा।

भक्ति का दान दो हमको, निष्काम सेवा का व्रत,

तेरे चरणों में झुका रहे, सदा हमारा यह शीश नमन।

करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन, तुम्हीं हो हमारे प्राण, तुम्हीं हो जीवन धन।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक भक्त की अपने आराध्य के प्रति भावभीनी पुकार है। भजन के मुखड़े में भक्त भगवान से विनती करता है कि हे भगवन! आप हम पर अपनी कृपा रूपी करुणा की वर्षा करें, हमारे जीवन के समस्त भौतिक और आध्यात्मिक कष्टों का हरण करें और हमारे भीतर दिव्य ज्ञान का संचार करें। भक्त कहता है कि इस संसार में केवल आप ही हमारे प्राण और जीवन के वास्तविक धन हैं। इसके बिना सांसारिक मोह-माया व्यर्थ है।

प्रथम अंतरे में भक्त संसार की तुलना एक आंधी या तूफान से करता है, जिसमें जीवन रूपी नैया डगमगा रही है। इस भवसागर में कोई ऐसा अपना मार्गदर्शक नहीं मिलता जो सही दिशा दिखा सके, अतः हे कृपा के सागर! केवल आप ही आकर हमारी इस नैया को संभाल लीजिए। हमारी यही अभिलाषा है कि हमारा जीवन आपके श्रीचरणों में ही बीते।

द्वितीय अंतरे में भक्त अपने अज्ञान और आंतरिक कमजोरियों को स्वीकार करता है। वह कहता है कि हमारे मन पर अज्ञानता का अंधकार छाया हुआ है और हमारी बुद्धि माया के बंधनों में उलझ गई है। हे प्रभु! हमारे अंतःकरण में विवेक का दीप जला दीजिए ताकि आपकी ज्योति से हमारे सारे संताप और दुख दूर हो जाएं।

अंतिम अंतरे में साधक सुख और दुख की परिस्थितियों में समान भाव (समता) में रहने का आशीर्वाद मांगता है। जीवन में धूप-छांव तो आती-जाती रहती है, परंतु हमारी निष्ठा आपके चरणों में अटूट बनी रहे। हमें निष्काम भक्ति और सेवा का व्रत दें ताकि हमारा मस्तक सदा आपके चरणों में नत रहे। इस प्रकार यह भजन साधक को पूर्ण शरणागति का मार्ग दिखाता है, जो सनातन धर्म की श्रीमद्भगवद्गीता सार का भी मुख्य संदेश है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की विशेषता इसकी सरलता, मार्मिकता और उच्च दार्शनिक गहराई में निहित है। यह भजन किसी विशेष आयु वर्ग या पंथ तक सीमित नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है जो मानसिक शांति, तनाव मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति की तलाश में है।

  • शरणागति का भाव: भजन साधक को सिखाता है कि अहंकार त्यागकर ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना ही भक्ति की पराकाष्ठा है।
  • कष्ट निवारण: भगवान श्री कृष्ण गीता में आश्वासन देते हैं कि जो मेरा स्मरण करते हैं, मैं उनके योगक्षेम का वहाहन करता हूँ। यह भजन उसी विश्वास को पुष्ट करता है।
  • ज्ञान की पिपासा: केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आंतरिक अज्ञान को दूर करने और दिव्य ज्ञान प्राप्ति की कामना इस भजन का मूल आधार है।
  • तनाव एवं चिंता मुक्ति: इस भजन के नियमित स्मरण से मन की चंचलता शांत होती है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन भजन को गाने और सुनने के लिए विशेष नियमों की आवश्यकता नहीं होती, परंतु यदि इसे विधिपूर्वक किया जाए तो इसकी प्रभावशीलता कई गुना बढ़ जाती है:

  • ब्रह्म मुहूर्त एवं संध्याकाल: प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा घर में दीपक प्रज्वलित कर इस भजन का गान करना मन को पूरे दिन ऊर्जावान रखता है। संध्या के समय आरती के पश्चात इसे गाना मानसिक शांति देता है।
  • सत्संग एवं सामूहिक संकीर्तन: पारिवारिक आयोजनों, साप्ताहिक सत्संग, एकादशी व्रतों या संकीर्तन सभाओं में इसे सामूहिक रूप से स्वरबद्ध करने से वातावरण दिव्य और पवित्र हो जाता है।
  • एकांत साधना: जब भी मन अशांत हो या जीवन में कठिनाइयां आ रही हों, एकांत में बैठकर इस भजन की पंक्तियों का मानसिक जप करना संबल प्रदान करता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मूल रूप से सर्वव्यापक परमेश्वर—विशेषकर भगवान श्री कृष्ण, विष्णु और भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें सनातन परंपरा में 'करुणा निधान' और 'दुखहर्ता' माना जाता है। संत परंपरा में सूरदास, मीराबाई, कबीर दास और तुलसीदास जैसे महापुरुषों ने भी भगवान से इसी प्रकार की विनय की है। भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप और उनके विराट रूप दोनों ही इस प्रकार की प्रार्थनाओं के केंद्र रहे हैं। इसी भक्ति परंपरा का विस्तार हमारे अन्य पवित्र स्तोत्रों जैसे संकट मोचन हनुमान चालीसा और स्तोत्रों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक और शास्त्रीय भक्ति संगीत की मिश्रित शैली पर आधारित है। इसे संत-साहित्य और आधुनिक भक्ति संगीत के समन्वय से तैयार किया गया है ताकि आज की पीढ़ी भी इसे आसानी से समझ सके और गा सके। सनातन संस्कृति में मौखिक परंपरा (Shruti tradition) के माध्यम से ऐसे भजन पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते रहे हैं। इसकी पृष्ठभूमि में भक्त की वह पुकार है जो वह अपने आराध्य के सम्मुख विरह और समर्पण के क्षणों में करता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सुबोध और प्रवाहित हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित ब्रज-अवधि की मिठास) है। इसमें रूपक (Metaphor) और अनुप्रास अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है जैसे—"कृपा के सागर", "अज्ञान का अंधियारा", और "विवेक का दीप"। शब्दों की यह मधुरता श्रोता के हृदय को तुरंत स्पर्श कर लेती है और बिना किसी कठिन शब्दार्थ के सीधा अर्थ समझ में आ जाता है.

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन जीने की एक अद्भुत कला सिखाता है:

  • अहंकार का त्याग: जब मनुष्य यह स्वीकार करता है कि "तुम ही हमारे प्राण हो", तो उसका अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • धैर्य और सहनशीलता: सुख और दुख जीवन के दो पहिए हैं। भजन सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान पर अटूट भरोसा रखना चाहिए।
  • ज्ञान की प्राप्ति: अज्ञान ही समस्त दुखों का मूल कारण है। प्रभु से ज्ञान की मांग करना सबसे श्रेष्ठ प्रार्थना है।
  • नियमित साधना: जीवन की आपाधापी में भी ईश्वर स्मरण के लिए समय निकालना ही वास्तविक मानव जीवन की सार्थकता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
करुणा दया, कृपा भक्त पर ईश्वर की अहैतुरी कृपा
कष्ट हरण दुखों का निवारण भौतिक और मानसिक संतापों से मुक्ति
भगवन ईश्वर, परमपिता समस्त ब्रह्मांड के पालक और स्वामी
जीवन धन जीवन की सबसे बहुमूल्य पूंजी ईश्वर का प्रेम और उनका स्मरण
अंधियारा अंधकार अज्ञान, मोह और माया का आवरण
विवेक सत्य-असत्य का ज्ञान आत्मा और परमात्मा को पहचानने की बुद्धि

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

भजन की प्रत्येक पंक्ति एक गहरा संदेश देती है:

  • "करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन..." - हे ईश्वर! हमारे सभी भौतिक व मानसिक कष्टों को दूर करो और हमें आत्मज्ञान प्रदान करो।
  • "तुम्हीं हो हमारे प्राण, तुम्हीं हो जीवन धन..." - हमारे जीवन का आधार केवल आप हैं, संसार की कोई भी वस्तु आपके प्रेम से बढ़कर नहीं है।
  • "संसार की इस आंधी में, नैया डगमगाए..." - जीवन के इस भवसागर में मोह-माया के तूफानों के बीच हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है।
  • "तुम ही आकर थाम लो, हे कृपा के सागर..." - हे दयालु! अब केवल आपकी ही शरण में हमारा उद्धार संभव है।
  • "अज्ञान का अंधियारा, छाया है मन भारी..." - हमारे मन में अज्ञानता और भ्रम का घना अंधेरा छाया हुआ है।
  • "विवेक का दीप जलाओ, हे प्रभु अंतर में..." - हमारे भीतर ज्ञान और विवेक का प्रकाश प्रकट कीजिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव से मिलते-जुलते कई वैदिक और पौराणिक श्लोक सनातन ग्रंथों में मिलते हैं, जिनका स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है:

"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणाशक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"

अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण, वासुदेव, हरि और परमात्मा को बार-बार नमस्कार है, जो सभी क्लेशों और कष्टों का नाश करने वाले हैं। इसी प्रकार शिव तांडव स्तोत्र या विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी कष्टों से मुक्ति दिलाता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विशेषता विवरण
भजन का नाम करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन (Karuna Karo Kast Haro)
समर्पित देवता भगवान श्री कृष्ण / भगवान विष्णु / सर्वव्यापक परमेश्वर
रचना शैली पारंपरिक भक्ति भजन एवं संकीर्तन
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधि मिश्रित
मुख्य विषय करुणा, शरणागति, कष्ट निवारण और ज्ञान प्राप्ति
भक्ति का भाव विनय, प्रेम, समर्पण और आर्त भाव
उपयुक्त अवसर दैनिक पूजा, संकीर्तन, एकादशी, सुबह-शाम की प्रार्थना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से जगत के पालनहार भगवान श्री कृष्ण, भगवान विष्णु और समस्त आराध्य देवों को समर्पित है। इसमें साधक अपने इष्ट देव से करुणा, कष्ट निवारण और ज्ञान की प्रार्थना करता है।

इस भजन को प्रातः काल पूजा के समय, संध्या वंदन के पश्चात, अथवा किसी भी सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान में शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ गाया जा सकता है। एकांत में मानसिक शांति के लिए भी इसका स्मरण बहुत उत्तम है।

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) है। यह सिखाता है कि जीवन के दुखों और अज्ञान से पार पाने के लिए केवल भगवान की कृपा और दिव्य ज्ञान ही एकमात्र मार्ग है।

हाँ, इस भजन की शब्दावली अत्यंत सरल, मधुर और सुबोध है। इसे बच्चे, युवा और वृद्ध सभी बहुत आसानी से याद करके गा सकते हैं। यह पारिवारिक संकीर्तन के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

जब हम पूरी तल्लीनता और भक्ति भाव से भगवान के गुणों और करुणा का गान करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क सांसारिक चिंताओं से हटकर सकारात्मक ऊर्जा में केंद्रित हो जाता है, जिससे मानसिक तनाव स्वतः कम हो जाता है।

किसी विशेष यंत्र की अनिवार्यता नहीं है। इसे केवल तालियों के साथ (करकीर्तन), अथवा हारमोनियम और ढोलक की सहायता से बहुत ही सुंदर ढंग से गाया जा सकता है। मूल भाव केवल भक्ति और समर्पण का होना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह मार्गदर्शिका सनातन धर्म की भक्ति परंपरा, संत साहित्य और संकीर्तन संस्कृति के गहन अध्ययन पर आधारित है। पाठकों को शुद्ध, प्रामाणिक और प्रेरणादायक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए इसे विशेष रूप से तैयार किया गया है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रकाशित की गई है, जिसका उद्देश्य सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
  • सनातन भक्ति साहित्य एवं पारंपरिक संकीर्तन संग्रह
  • पारंपरिक लोक भजन एवं स्तोत्र पाठ परंपरा

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समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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