ढोल बाजे माँ जिधर देखो जगराते (Dhol Baje Maa Jidhar Dekho Jagrate) - Lakhbir Singh Lakha Panna Gill Bhakti
सनातन भक्ति परंपरा में माँ आदिशक्ति जगदम्बा की आराधना का विशेष स्थान है। नवरात्रि के पावन पर्वों, मंगलायतन जागरणों और विशेष अनुष्ठानों में गूंजने वाला यह अत्यंत लोकप्रिय भजन "ढोल बाजे माँ जिधर देखो जगराते" श्रोताओं के अंतर्मन को भक्ति और उल्लास से भर देता है। प्रख्यात भजन सम्राट लखबीर सिंह लक्खा और पन्ना गिल की ओजस्वी और मधुर वाणी से सजा यह संकीर्तन केवल एक संगीत रचना नहीं, बल्कि माँ दुर्गा के दरबार में हाजिरी लगाने का एक आध्यात्मिक माध्यम है। इस भजन का मुख्य भाव साधक के भीतर माँ के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और उत्सवधर्मी संस्कृति का प्रकटीकरण है, जहाँ ढोल-नगाड़ों की थाप पर संपूर्ण वातावरण दिव्यता से ओत-प्रोत हो जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
स्थाई (Mukhda):
ढोल बाजे माँ जिधर देखो जगराते,
शेरावाली के भवन में आज मेले लगते!
झूम रहे भक्त सारे गाके जयकारे,
मैया जी के दर पर नजारे बड़े प्यारे!
अंतररा 1:
लाल चुनरिया माँ ने आज है सजाई,
भक्तों ने मिलके है अलख जगाई।
घर-घर में गूंजे मैया तेरी ही महिमा,
चरणों में झुकती है सारी ये दुनिया!
मैया की जोत से उजाले होते सारे,
शेरावाली के भवन में आज मेले लगते!
अंतररा 2:
कोई लाए फूल कोई नारियल चढ़ाए,
चरणों में शीश झुकाके झोली फैलाए।
जो भी सच्चे मन से माँ का नाम ध्यावे,
उसकी मुराद माँ तो झटपट पावे!
भगतों के संग माँ करे खेल-नजारे,
शेरावाली के भवन में आज मेले लगते!
समापन / अंतरा 3:
लक्खा और पन्ना गाएं महिमा तुम्हारी,
कृपा करो मैया हम पर भी अबकी बारी।
दर पे जो आया वो खाली ना गया है,
जिसने भी माँ को दिल से पुकारा!
डमरू और ढोल बाजे गूंजे जयकारे,
शेरावाली के भवन में आज मेले लगते!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन माँ दुर्गा के प्रति अनन्य प्रेम, उल्लास और उत्सव का प्रतीक है। 'ढोल बाजे माँ जिधर देखो जगराते' पंक्तियाँ इस बात का द्योतक हैं कि जब-जब माँ भगवती की आराधना का समय आता है, तब-तब संपूर्ण वातावरण उत्सवमय हो जाता है। ढोल और नगाड़ों की गूंज इस बात का संकेत है कि भक्तगण अपनी आराध्य के स्वागत के लिए पूरी तरह तल्लीन हैं।
भजन के माध्यम से यह समझाया गया है कि माता शेरावाली के दरबार में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। जो भी भक्त सच्चे भाव से लाल चुनरी, नारियल और पुष्प लेकर पहुंचता है, माँ उसकी झोली खुशियों से भर देती हैं। लखबीर सिंह लक्खा और पन्ना गिल की गायकी इस भाव को और अधिक प्रबल करती है, जहाँ सांसारिक दुखों को भूलकर जीवात्मा केवल और केवल परम शक्ति की शरण में आनंदित होना चाहती है। यह भजन साधक को सिखाता है कि भक्ति केवल रुदन या वैराग्य का नाम नहीं, बल्कि ईश्वर प्राप्ति का आनंदोत्सव भी है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- दिव्य ऊर्जा का संचार: भजन के बोल और संगीत श्रोता के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह का संचार करते हैं।
- सामूहिक संकीर्तन परंपरा: यह भजन सनातन धर्म के सामूहिक जागरण और मेलों की संस्कृति को जीवंत करता है।
- शरणागति का भाव: माँ के चरणों में संपूर्ण समर्पण का सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया गया है।
- लोकप्रियता: नवरात्रि और माता के चौकियों में यह गीत अनिवार्य रूप से गाया जाता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस ऊर्जावान भजन को विशेष रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान, माता के जागरण (Jagrata), चौकी, या संध्या वंदन के समय गाना या सुनना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसे प्रातःकाल स्नान के पश्चात माता के सम्मुख दीपक प्रज्वलित करके अथवा सायंकाल की आरती के बाद आनंदपूर्वक गाया जा सकता है। सामूहिक रूप से ताली बजाकर और ढोल-मंजीरे के साथ इसे गाने से मानसिक तनाव दूर होता है और घर में सकारात्मकता का वास होता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन की केंद्र बिंदु हैं जगत जननी माँ आदिशक्ति दुर्गा (शेरावाली)। सनातन परंपरा में माँ दुर्गा को समस्त ब्रह्मांड की जननी, आदि शक्ति और दुष्टों का संहार करने वाली दयामयी शक्ति माना गया है। वहीं, इस भजन को अपनी अवीट और समर्पित गायकी से अमर बनाने वाले प्रसिद्ध गायक लखबीर सिंह लक्खा और पन्ना गिल हैं, जिन्होंने अपनी सुमधुर आवाज से माता के भजनों को घर-घर तक पहुँचाया है। उनकी गायकी में एक खास भक्तिरस होता है जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
यह भजन सरल और सहज हिंदी-लोक भाषा (ब्रज-अवधी मिश्रित बोलचाल की भाषा) में रचित है, जिससे आम जनमानस इसके अर्थ को आसानी से समझ सके। इसमें उपमा और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है। शब्दों की लयबद्धता और तुकबंदी ऐसी है कि सुनते ही पैर थिरकने लगते हैं और मन झूम उठता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, ईश्वर के प्रति आस्था और उत्सव का उल्लास कभी कम नहीं होना चाहिए। माँ दुर्गा के दरबार में सभी समान हैं। सच्ची श्रद्धा और पुकार से बड़े से बड़ा संकट टल जाता है। आनंद और उत्साह ही सकारात्मकता की सबसे बड़ी कुंजी है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | संदर्भ / प्रसंग |
|---|---|---|
| जगराता | रात्रि जागरण | माता के सम्मान में रातभर भजन-कीर्तन करना |
| शेरावाली | सिंह पर सवार रहने वाली | माँ दुर्गा का एक प्रमुख नाम |
| अलख जगाना | ईश्वर स्मरण का संदेश फैलाना | भक्ति भाव को जन-जन तक पहुँचाना |
| मुराद | मनोकामना / इच्छा | भक्तों की सच्ची प्रार्थना का फल |
संबंधित मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
यह श्लोक माँ दुर्गा की स्तुति और उनके मंगलकारी स्वरूप का स्मरण कराता है, जो इस भजन के भाव से पूरी तरह मेल खाता है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | ढोल बाजे माँ जिधर देखो जगराते |
|---|---|
| आराध्य देवी | माँ दुर्गा / शेरावाली |
| गायक कलाकार | लखबीर सिंह लक्खा, पन्ना गिल |
| भाषा | हिंदी / लोक भाषा |
| मुख्य थीम | भक्ति, उल्लास, जागरण और उत्सव |
| उचित अवसर | नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री Bhaktilok.in के संपादकीय मंडल द्वारा सनातन भक्ति परंपरा, लोक संस्कृति और संगीत के सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक भजन लिरिक्स और उसका आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करना है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री
स्रोत एवं संदर्भ
- पारंपरिक देवी जागरण और संकीर्तन संग्रह
- सनातन भक्ति संगीत एवं लोकगीत परंपरा
- श्रीमद्देवीभागवत पुराण (संदर्भित शक्ति महिमा)
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