"देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ" सनातन धर्म के सबसे लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भजनों में से एक है। यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार प्रभु श्री खाटू श्याम जी को समर्पित है। इस भजन में एक भक्त की अपने आराध्य के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्ण समर्पण (आत्मनिवेदन) और निष्काम प्रेम की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। यहाँ भक्त भगवान से किसी भी प्रकार की सांसारिक वस्तु, धन, दौलत या यश की कामना नहीं करता, बल्कि वह केवल उनके चरणों की सेवा और हर जन्म में उनका साथ मांगता है। इस भजन का मुख्य भाव 'शरणागति' और 'दैन्य भाव' है, जो भक्त के अहंकार को मिटाकर उसे ईश्वर के दिव्य सानिध्य का अनुभव कराता है। इसे विभिन्न धार्मिक उत्सवों, विशेष रूप से एकादशी, श्याम संध्या और दैनिक पूजा-अर्चना के समय अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ गाया जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ
देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ ।
अब तो कृपा कर दीजिए जनम जनम का साथ ।
मेरे सर पर रख बनवारी अपने दोनों यह हाथ ॥
देने वाले श्याम प्रभु से धन और दौलत क्या मांगे ।
श्याम प्रभु से मांगे तो फिर नाम और इज्ज़त क्या मांगे ।
मेरे जीवन में अब कर दे तू कृपा की बरसात ॥
देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ ॥
श्याम तेरे चरणों की धूलि धन दौलत से महंगी है ।
एक नज़र कृपा की बाबा नाम इज्ज़त से महंगी है ।
मेरे दिल की तम्मना यही है करूँ सेवा तेरी दिन रात ॥
देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ ॥
झुलस रहें है गम की धुप में प्यार की छईया कर दे तू ।
बिन माझी के नाव चले ना अब पतवार पकड़ ले तू ।
मेरा रास्ता रौशन कर दे छायी अन्धिआरी रात ॥
देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ ॥
सुना है हमने शरणागत को अपने गले लगाते हो ।
ऐसा हमने क्या माँगा जो देने से घबराते हो ।
चाहे जैसे रख बनवारी बस होती रहे मुलाक़ात ॥
देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ ॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का प्रत्येक अंतरा आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति रस से परिपूर्ण है। इसका मुख्य संदेश यह है कि संसार की सभी भौतिक वस्तुएं नश्वर हैं, जबकि ईश्वर का प्रेम और उनका साथ शाश्वत है।
प्रथम अंतरा: भक्त अपने आराध्य से कहता है कि हे प्रभु! यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं, तो मुझे इस जन्म में ही नहीं, बल्कि हर जन्म में अपना साथ दीजिए। मेरे सिर पर अपने दोनों वरदहस्त (आशीर्वाद के हाथ) रख दीजिए ताकि मुझे इस संसार के थपेड़ों से मुक्ति मिल सके।
द्वितीय अंतरा: यहाँ भक्त निष्काम भक्ति की बात करता है। वह कहता है कि जब देने वाला स्वयं त्रिलोकीनाथ श्याम सुंदर हो, तो उससे तुच्छ धन-दौलत या क्षणभंगुर नाम और इज्ज़त क्या मांगना? भक्त केवल प्रभु की कृपा की वर्षा चाहता है, जो उसके जीवन को धन्य बना दे।
तृतीय अंतरा: इस भाग में प्रभु के चरणों की महिमा का वर्णन है। भक्त के लिए भगवान के चरणों की धूलि इस संसार के सबसे कीमती खजाने से भी अधिक मूल्यवान है। प्रभु की एक करुणामयी दृष्टि ही भक्त के लिए परम सौभाग्य है। भक्त की एकमात्र इच्छा दिन-रात प्रभु की सेवा करना है।
चतुर्थ अंतरा: सांसारिक दुखों को 'गम की धूप' कहा गया है। भक्त प्रार्थना करता है कि प्रभु अपने प्रेम की शीतल छाया प्रदान करें। जीवन रूपी नैया बिना पतवार और माझी (नाविक) के डगमगा रही है, इसलिए प्रभु स्वयं इसकी पतवार थाम लें और अज्ञानता के अंधकार को दूर कर जीवन का मार्ग आलोकित करें।
पंचम अंतरा: भक्त अपने अधिकार और प्रेम से प्रभु को उलाहना देता है कि मैंने सुना है आप शरण में आए जीव को गले लगाते हैं। फिर मुझसे ऐसी क्या भूल हुई या मैंने ऐसा क्या मांग लिया जो आप संकोच कर रहे हैं? आप मुझे चाहे जिस हाल में रखें, बस आपसे मेरा संपर्क और मुलाक़ात बनी रहे।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा का परमात्मा से मिलन का एक संगीतमय मार्ग है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- निष्काम भक्ति का संदेश: यह भजन सिखाता है कि ईश्वर से कभी भी भौतिक सुखों की मांग नहीं करनी चाहिए। जब हम ईश्वर को ही मांग लेते हैं, तो सृष्टि की हर वस्तु स्वतः ही हमें प्राप्त हो जाती है।
- शरणागति भाव: श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो सर्वधर्मान्परित्यज्य का संदेश दिया था, वही शरणागति का भाव इस भजन की हर पंक्ति में झलकता है।
- मानसिक शांति का स्रोत: इस भजन का सस्वर पाठ करने से मन को असीम शांति मिलती है और जीवन के तनाव व चिंताओं से मुक्ति मिलती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष समय और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:
- शुभ समय: इसे सुबह की पूजा के समय या संध्या आरती के दौरान गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेष रूप से खाटू श्याम जी की एकादशी (ग्यारस) के दिन इसका गायन विशेष फल देता है।
- गायन की विधि: शांत चित्त होकर, आँखें बंद करके और भगवान श्रीकृष्ण या खाटू श्याम जी की मूर्ति के समक्ष बैठकर इस भजन को गाना चाहिए। गायन में प्रदर्शन के स्थान पर समर्पण और करुणा का भाव होना आवश्यक है।
- वाद्य यंत्र: इस भजन को हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा और बांसुरी की मधुर ध्वनि के साथ गाने से वातावरण अत्यंत दिव्य और भक्तिमय हो जाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और उनके कलयुगी स्वरूप श्री खाटू श्याम जी को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, खाटू श्याम जी महाभारत काल के महान योद्धा बर्बरीक हैं, जो भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। उन्होंने धर्म की स्थापना के लिए अपना शीश दान कर दिया था। उनकी इस महान आहुति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था कि कलयुग में वे उनके नाम 'श्याम' से पूजे जाएंगे और जो भी भक्त सच्चे मन से उनका स्मरण करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
इस भजन को लोकप्रिय बनाने में आधुनिक युग के कई प्रसिद्ध भजन गायकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिन्होंने अपनी सुरीली आवाज से इसे घर-घर तक पहुँचाया।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा और राजस्थानी लोक संस्कृति का सुंदर पुट देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली गेय (गाने योग्य) है। इसमें प्रयुक्त रूपक और उपमाएं अत्यंत सजीव हैं। उदाहरण के लिए, जीवन को एक 'नाव' और भगवान को 'माझी' के रूप में चित्रित करना सनातन काव्य परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:
| जीवन सीख | आध्यात्मिक अर्थ | व्यावहारिक उपयोग |
|---|---|---|
| संतोष और धैर्य | सांसारिक सुख क्षणिक हैं, इसलिए उनके पीछे भागने के बजाय ईश्वर पर विश्वास रखें। | कठिन परिस्थितियों में विचलित न हों और धैर्य बनाए रखें। |
| अहंकार का त्याग | स्वयं को कर्ता मानने के बजाय ईश्वर को अपने जीवन का माझी स्वीकार करें। | अपने कार्यों में विनम्रता लाएं और सफलता का श्रेय टीम और ईश्वर को दें। |
| सच्ची सेवा | प्रभु के चरणों की धूलि और उनकी सेवा ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है। | निःस्वार्थ भाव से समाज और जरूरतमंदों की सेवा करें। |
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| बनवारी | वनों में विहार करने वाले, भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम। | भक्तों के दुखों को हरने वाले कृपालु देव। |
| पतवार | नाव को दिशा देने वाला साधन। | जीवन को सही दिशा देने वाला ईश्वरीय मार्गदर्शन। |
| माझी | नाविक, मल्लाह। | परमात्मा, जो भवसागर से पार उतारते हैं। |
| शरणागत | शरण में आया हुआ। | वह जीव जिसने अपना सर्वस्व ईश्वर को समर्पित कर दिया हो। |
| छईया | छाया, शीतलता। | ईश्वर की कृपा और सुरक्षा का कवच। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
आइए इस पावन भजन की प्रत्येक पंक्ति के गहरे अर्थ को समझें:
"देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ..."
हे प्रभु, यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं, तो मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरा और आपका संबंध केवल इस जन्म तक सीमित न रहे, बल्कि हर जन्म में मैं आपके सानिध्य में रहूँ।
"मेरे सर पर रख बनवारी अपने दोनों यह हाथ..."
हे बनवारी! अपने आशीर्वाद रूपी दोनों हाथों को मेरे मस्तक पर रख दीजिए, ताकि मायावी संसार का कोई भी विकार मुझे स्पर्श न कर सके।
"देने वाले श्याम प्रभु से धन और दौलत क्या मांगे..."
जब स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी हमारे सम्मुख हों, तो उनसे तुच्छ और नश्वर धन-दौलत मांगना हमारी अज्ञानता को दर्शाता है।
"श्याम तेरे चरणों की धूलि धन दौलत से महंगी है..."
संसार का समस्त वैभव भी प्रभु के चरणों की एक धूलि के कण के बराबर नहीं है। प्रभु की भक्ति ही वास्तविक और अक्षय धन है।
"झुलस रहें है गम की धुप में प्यार की छईया कर दे तू..."
यह संसार दुखों का सागर है जहाँ जीव कष्टों की धूप में झुलस रहा है। हे प्रभु! अपनी कृपा की शीतल छाया प्रदान कर हमारे संताप को हर लीजिए।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के शरणागति भाव को पुष्ट करने वाला श्रीमद्भगवद्गीता का यह प्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः ॥
अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें समर्पित करके केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ |
| समर्पित देवता | भगवान श्रीकृष्ण / श्री खाटू श्याम जी |
| भक्ति मार्ग | निष्काम भक्ति, शरणागति (प्रपत्ति मार्ग) |
| मुख्य भाव | दैन्य भाव, आत्मसमर्पण, प्रेम रस |
| भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| उपयुक्त अवसर | एकादशी, श्याम संध्या, जन्माष्टमी, दैनिक प्रार्थना |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
'देना हो तो दीजिए जनम जनम का साथ' भजन किस देवता को समर्पित है?
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार श्री खाटू श्याम जी को समर्पित है।
इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
इस भजन का मुख्य संदेश निष्काम भक्ति है, जिसमें भक्त भौतिक सुखों के बजाय केवल ईश्वर का शाश्वत साथ और उनकी सेवा मांगता है।
खाटू श्याम जी कौन हैं?
खाटू श्याम जी महाभारत काल के भीम के पौत्र बर्बरीक हैं, जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने कलयुग में अपने नाम से पूजे जाने का वरदान दिया था।
इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय कौन सा है?
इसे सुबह या शाम की आरती के समय, विशेष रूप से एकादशी (ग्यारस) के दिन गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
भजन में 'बनवारी' शब्द का क्या अर्थ है?
'बनवारी' भगवान श्रीकृष्ण का एक सुंदर नाम है, जिसका अर्थ है वनों में विहार करने वाले या वनमाला धारण करने वाले।
'बिन माझी के नाव चले ना' पंक्ति का क्या आध्यात्मिक अर्थ है?
इसका अर्थ है कि जिस प्रकार बिना नाविक के नाव गंतव्य तक नहीं पहुँच सकती, उसी प्रकार ईश्वर के मार्गदर्शन के बिना मनुष्य का जीवन सफल नहीं हो सकता।
क्या इस भजन को दैनिक पूजा में शामिल किया जा सकता है?
हाँ, इस भजन को दैनिक पूजा, कीर्तन या मानसिक शांति के लिए प्रतिदिन गाया या सुना जा सकता है।
इस भजन से हमें क्या सीख मिलती है?
इससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति छोड़कर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहिए।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख सनातन धर्म की समृद्ध भजन परंपरा और खाटू श्याम जी के प्रति भक्तों की अगाध श्रद्धा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस भजन की व्याख्या और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों और संतों के प्रवचनों के आलोक में सरल शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। यह "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" पाठकों को आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति प्रदान करने के उद्देश्य से संकलित की गई है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (शरणागति योग)
- श्री खाटू श्याम महात्म्य एवं पौराणिक कथाएं
- पारंपरिक भजन संग्रह एवं सनातन कीर्तन परंपरा
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