Parvati Stotram

दुःख मैं बन जाती है साथी (ऐसी है ये मेरी दाती) | Dukh Me Ban Jati Hai Sathi | Mata Rani Ka Bhajan - Bhaktilok

90 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भक्ति और करुणा की पावन स्वर लहरी से परिपूर्ण भजन "दुःख मैं बन जाती है साथी (ऐसी है ये मेरी दाती)" माता रानी के चरणों में अनन्य समर्पण, अगाध विश्वास और पूर्ण शरणागति का एक अत्यंत जीवंत और हृदयस्पर्शी उदाहरण है। सनातन धर्म में जगत जननी आदिशक्ति माँ दुर्गा, अम्बे, शेरावाली, और वैष्णो देवी का स्मरण मात्र ही मनुष्य के समस्त दुखों, संतापों और भयों का नाश करने वाला माना गया है। कलयुग के इस भागदौड़ और मानसिक तनाव से भरे जीवन में जब चारों तरफ निराशा के बादल छा जाते हैं, तब माता रानी की कृपा ही साधक की सबसे बड़ी संबल और सच्ची साथी बनती है। इस दिव्य भजन के प्रत्येक शब्द में इस बात की अनुभूति कराई गई है कि माँ अपने बालकों की पुकार को कभी अनसुनी नहीं करतीं और संकट के हर मोड़ पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी ढाल बनकर खड़ी रहती हैं। इस विस्तृत और शास्त्रीय विवेचन के माध्यम से हम इस भजन के साहित्यिक सौंदर्य, गहन आध्यात्मिक अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि और जीवनोपयोगी संदेशों पर विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि साधक माँ की भक्ति में तल्लीन होकर अपने जीवन को धन्य बना सकें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूलांक एवं मुखड़ा:

दुःख मैं बन जाती है साथी, ऐसी है ये मेरी दाती।
चरणों में जिसके झुकती दुनिया, वो है जग की महारानी माटी॥
जब-जब भक्तों पर विपदा आए, दौड़ी चली आती है मेरी मैया।
कष्ट सभी हर लेती पल में, पार लगाती सबकी नइया॥

प्रथम अंतरा:

दुनिया के ठुकराए हुओं को, अपने गले से लगाती है।
रुठे हुए किस्मत के खेलों को, पल में नया बनाती है॥
कोई ना भूखा सोए द्वारे, ममता ऐसी बरसाती है।
दुःख मैं बन जाती है साथी, ऐसी है ये मेरी दाती॥

द्वितीय अंतरा:

पाप और संताप मिटाकर, ज्ञान का दीप जलाती है।
अंधेरे जीवन की राहों में, उजाला बनकर छाती है॥
शेरों वाली लाट तुम्हारी, तीनों लोक में गूँजती गाथा।
भक्तों के हर संकट को हरती, अंबे मैया की प्यारी गाथा॥

तृतीय अंतरा:

श्रद्धा और विश्वास का बंधन, कभी न टूटने पाती है।
जो एक बार पुकारे दिल से, सुनती सबकी विनती माता है॥
चरणों की रज माथे लगा लो, जीवन सफल हो जाता है।
दुःख मैं बन जाती है साथी, ऐसी है ये मेरी दाती॥

अन्त्य / समापन पंक्तियाँ:

शीश झुकाकर ध्यान धरो तुम, माता के पावन चरणों का।
मिट जाएगा अज्ञान तुम्हारा, सुख बरसेगा इन चरणों का॥
बोलिए सांचे दरबार की जय! शेरावाली मैया की जय!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह एक साधक के उस आंतरिक अनुभव की अभिव्यक्ति है जो उसने अपनी माँ (जगदम्बा) के चरणों में बैठकर प्राप्त किया है। भजन की शुरुआती पंक्तियों में कहा गया है कि जब इंसान दुनिया भर के बंधनों से थक जाता है और चारों तरफ से रास्ते बंद नजर आते हैं, तब माँ जगदंबा दुःख के समय में उसकी सच्ची साथी बनकर साथ निभाती हैं। 'दाती' शब्द का अर्थ है देने वाली—वह जो अपने भक्तों को अभयदान, सुख, शांति और मोक्ष प्रदान करती है।

प्रथम अंतरे में माँ की वात्सल्यमयी ममता का वर्णन है। संसार जिन लोगों को नकार देता है या जो अपनी किस्मत से हार चुके होते हैं, माता रानी उन्हें अपनी भुजाओं में समेटकर नया जीवन प्रदान करती हैं। माँ के दरबार में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता; जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, उसकी झोली हमेशा भर जाती है। द्वितीय अंतरे में माँ के ज्ञान रूपी प्रकाश का वर्णन है जो अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मनुष्य के भीतर विवेक का संचार करता है। तृतीय अंतरा हमें सिखाता है कि भक्ति में केवल श्रद्धा और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है। माता अपने बच्चों की एक पुकार पर दौड़ी चली आती हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, मधुरता और सीधा हृदय को छूने वाला भाव है। इसे किसी भी उम्र के लोग सहजता से गा सकते हैं।

  • देवी संदर्भ: यह भजन प्रत्यक्ष रूप से जगत जननी माँ दुर्गा, अम्बे भवानी और शेरावाली के स्वरूप को समर्पित है।
  • भक्ति भाव: इसमें शरणागति (Surrender), वात्सल्य (Motherly Affection), और अगाध विश्वास का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है।
  • सांस्कृतिक महत्व: नवरात्र, जागरण, चौकी, या किसी भी मांगलिक अवसर पर माता के संकीर्तन में इस प्रकार के भजनों का विशेष स्थान है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

माता रानी के इस पावन भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठोर नियम नहीं बंधे हैं, फिर भी कुछ पारंपरिक पद्धतियों से इसका फल कई गुना बढ़ जाता है:

  • उचित समय: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या बेला में दीप प्रज्वलित करने के पश्चात इस भजन का गायन या श्रवण अत्यंत लाभकारी होता है।
  • स्थान: पूजा घर, मंदिर, या घर के शांत कोने में जहाँ माता की चौकी या तस्वीर स्थापित हो।
  • विधि: माता के सम्मुख घी का दीपक जलाकर, पुष्प अर्पित कर, भावपूर्ण हृदय से इस भजन को गाना चाहिए। इससे मन को अपार शांति और मानसिक स्थिरता मिलती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

सनातन परंपरा में आदिशक्ति को ही समस्त चराचर जगत की माता माना गया है। मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का समन्वित रूप ही माँ दुर्गा है। संतों और महात्माओं ने हमेशा से यही उपदेश दिया है कि जैसे एक साधारण बालक अपनी माँ के आंचल में सुरक्षित महसूस करता है, वैसे ही यह संपूर्ण जीव-सृष्टि अपनी मूल जननी पराशक्ति की गोद में पलती है। इस भजन की रचना भी इसी महान सनातन परंपरा से प्रेरित है, जहाँ भक्त और भगवान का संबंध माता और संतान का माना गया है.

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

लोक संगीत और पारंपरिक भक्ति धाराओं में ऐसे भजनों की जड़ें बहुत गहरी हैं। लोक कवियों और भक्तों ने अपनी अनुभूतियों को सरल शब्दों में पिरोकर समाज को समर्पित किया है। माता रानी के दरबार में गाए जाने वाले पारंपरिक लोक भजनों की श्रृंखला में "दुःख मैं बन जाती है साथी" एक ऐसा गीत है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक और लिखित रूप से आगे बढ़ा है। यह भजन उन भक्तों के लिए विशेष रूप से रचा गया है जो जीवन के संघर्षों से जूझते हुए आध्यात्मिक संबल की तलाश में रहते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और आम जनमानस की समझ में आने वाली हिंदी एवं बोलचाल की मिश्रित शब्दावली (ब्रज-अवधि एवं खड़ी बोली का सुंदर प्रभाव) है। इसमें अनुप्रास और उपमा अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है जैसे "पार लगाती सबकी नइया" और "ज्ञान का दीप जलाती है"। भाषा की यह सुगमता ही इस भजन की सबसे बड़ी शक्ति है जो बिना किसी कठिन व्याकरण के सीधे श्रोता के हृदय में उतर जाती है.

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल मनोरंजन या गायन का साधन नहीं है, बल्कि इसमें जीवन के गहरे दार्शनिक और व्यावहारिक संदेश छिपे हैं:

  • अटूट विश्वास: कठिन समय में भी ईश्वर या माता पर से भरोसा कभी नहीं उठाना चाहिए।
  • समर्पण: अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण रूप से परम सत्ता के चरणों में समर्पित हो जाना ही सच्ची मुक्ति का मार्ग है।
  • सहानुभूति और सेवा: जिस प्रकार माँ सबका कल्याण करती है, हमें भी अपने आसपास के दुखी और असहाय लोगों की मदद करनी चाहिए।
  • अधिक जानकारी के लिए आप श्री हनुमान चालीसा के पाठ और शिव तांडव स्तोत्र के दिव्य भावों का भी अध्ययन कर सकते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
दाती देने वाली (दाता का स्त्री रूप) भक्तों को मनोवांछित फल और मुक्ति प्रदान करने वाली आदिशक्ति
महारानी माटी समस्त ब्रह्मांड की अधीश्वर सम्पूर्ण प्रकृति और जीवों की स्वामिनी
विपदा संकट, मुसीबत जीवन के मोह और कर्म बंधनों के कारण आने वाले कष्ट
चरणों की रज चरणों की धूल परम पवित्र ऊर्जा जो अहंकार का नाश करती है
संताप मानसिक या शारीरिक पीड़ा माया जनित दुःख और संताप

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: दुःख मैं बन जाती है साथी, ऐसी है ये मेरी दाती।
भावार्थ: जब संसार का कोई भी अपना साथ नहीं देता और चारों तरफ अंधेरा होता है, तब माँ जगदंबा ही एकमात्र सच्ची साथी बनकर हाथ थामती हैं।

पंक्ति: दुनिया के ठुकराए हुओं को, अपने गले से लगाती है।
भावार्थ: समाज द्वारा तिरस्कृत और अनाथ माने जाने वाले लोग भी जब माता के द्वार पर आते हैं, तो माँ उन्हें अपनी संतान की तरह सीने से लगा लेती है।

पंक्ति: चरणों की रज माथे लगा लो, जीवन सफल हो जाता है।
भावार्थ: माता के चरणों की धूल को अपने मस्तक पर धारण करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप और संताप नष्ट हो जाते हैं और उसका जीवन सार्थक हो जाता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ निम्नलिखित पावन मंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है:

"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥"

यह श्लोक माँ दुर्गा के कल्याणकारी और संकटमोचक स्वरूप का सबसे बड़ा प्रमाण है, जो हर प्रकार के अमंगल को दूर करता है.

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

बिंदु विवरण
भजन का नाम दुःख मैं बन जाती है साथी (ऐसी है ये मेरी दाती)
समर्पित देवता माता रानी / माँ दुर्गा / आदिशक्ति
मुख्य भाषा सरल हिंदी / लोक भाषा
भक्ति भाव शरणागति, वात्सल्य, प्रेम और विश्वास
उपयुक्त अवसर नवरात्र, मंगलवार/शुक्रवार पूजा, माता की चौकी, जागरण
मुख्य संदेश माता की शरण में सभी दुखों का अंत और मोक्ष की प्राप्ति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन जगत जननी माँ दुर्गा, अम्बे भवानी और शेरावाली माता को समर्पित है।

इस भजन को प्रातः काल पूजा के समय, संध्या वंदन के वक्त या किसी भी मांगलिक उत्सव एवं जागरण में गाया जा सकता है।

'दाती' का अर्थ 'देने वाली' होता है। माता रानी अपने भक्तों को सुख, समृद्धि, शांति और मोक्ष प्रदान करती हैं, इसलिए उन्हें प्रेम से 'दाती' कहा जाता है।

हाँ, इस भजन का पाठ एकांत में या सामूहिक रूप से परिवार के साथ सस्वर किया जा सकता है। इससे घर का वातावरण शुद्ध और सकारात्मक बनता है।

माता रानी की सच्ची भक्ति से मन का भय समाप्त होता है, संकटों से लड़ने की शक्ति मिलती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह आलेख संपूर्ण सनातन भक्ति परंपरा, लोक साहित्य और माता रानी के विभिन्न रूपों के शास्त्रीय प्रमाणों का अध्ययन करके तैयार किया गया है। पाठकों की सुविधा और प्रामाणिकता को ध्यान में रखते हुए इसे सरल हिंदी में प्रस्तुत किया गया है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रकाशित की गई है ताकि सभी भक्तजन इसका पूर्ण आध्यात्मिक लाभ उठा सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण एवं व्यास रचित ग्रंथ)
  • सनातन लोकगीत एवं पारंपरिक भक्ति संकीर्तन साहित्य
  • श्री माता वैष्णो देवी और विभिन्न शक्तिपीठों की कथा परंपरा

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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