Matarani Bhajan

Naam Hai Tera Taran Hara Kab Tera Darshan Hoga | नाम है तेरा तारणहारा कब तेरा दर्शन होगा|Bhajan 2021 - BhaktiLok

77 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा" — यह भजन भक्ति साहित्य की उस अमूल्य परंपरा का हिस्सा है जिसमें जीवात्मा अपने आराध्य देव से मिलन की व्याकुलता प्रकट करती है। यह भजन मुख्य रूप से माता के चरणों में समर्पित भावना, नाम-महिमा और शरणागति का सजीव चित्रण है। भक्त जब संसार के दुखों से व्याकुल होकर प्रभु के द्वार पर पहुँचता है, तब उसकी एक ही पुकार होती है — "हे नाथ! तेरा नाम ही तारणहारा है, अब कब तेरा दर्शन होगा?" यह भजन उसी आंतरिक विरह, अनुराग और अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति है। भक्ति परंपरा में नाम-संकीर्तन को कलियुग का सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है, और यह भजन उसी सिद्धांत को सरल, मधुर एवं हृदयस्पर्शी शब्दों में प्रस्तुत करता है। मातारानी के भक्त इस भजन को विशेष रूप से नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार तथा दैनिक आरती के समय गाते हैं। इसकी धुन सरल होने के कारण यह सामूहिक भजन, जागरण एवं कीर्तन सभाओं में भी अत्यंत लोकप्रिय है। यह भजन केवल श्रवण का विषय नहीं, बल्कि आत्म-समर्पण और प्रभु-चरणों में पूर्ण विश्राम का माध्यम है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मुखड़ा (Refrain):

नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा।
नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा।

अंतरा १:

भवसागर में डूब रहा हूँ, तेरे बिना सहारा।
चरणों में तेरे आया हूँ मैं, अब तो उतारो पारा।
नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा।

अंतरा २:

जन्म-जन्म की प्यासी आँखें, तुझको ही है तकतीं।
माता तेरी ममता में ही, जीवन मेरा महकती।
नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा।

अंतरा ३:

दुख दर्द के बादल छाए, कोई न साथी मेरा।
तेरे भरोसे बैठा हूँ मैं, तू ही है साँझ सवेरा।
नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा।

अंतरा ४:

भक्ति का यह दीप जलाए, तेरे द्वार पे आया।
शीश झुकाकर माँग रहा हूँ, दर्शन का वरदान।
नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा।

अंतरा ५:

तू ही माता, तू ही पिता है, तू ही है सब जग का।
तेरे चरणों की धूल बने यह, जीवन सारा जग का।
नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन होगा।

नोट: भजन के बोल परंपरागत कीर्तन शैली पर आधारित हैं; भिन्न गायकी एवं स्थानीय परंपराओं में कुछ पंक्तियों का क्रम या शब्दावली भिन्न हो सकती है।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का केंद्रीय भाव है — नाम-महिमा और शरणागति। "नाम है तेरा तारणहारा" पंक्ति में भक्त यह स्वीकार करता है कि संसार-सागर से पार उतारने वाला एकमात्र साधन प्रभु का नाम ही है। सनातन परंपरा में कहा गया है — "कलौ नामैव केवलम्" अर्थात् कलियुग में केवल नाम-संकीर्तन ही मुक्ति का सरल मार्ग है। भक्त जब "कब तेरा दर्शन होगा" कहता है, तो वह केवल शारीरिक दर्शन की बात नहीं कर रहा; वह उस आंतरिक मिलन की व्याकुलता व्यक्त कर रहा है जहाँ जीव और ब्रह्म का भेद मिट जाता है।

पहले अंतरे में भक्त स्वयं को भवसागर में डूबता हुआ अनुभव करता है। यह भवसागर मोह, माया, अहंकार और कर्म-बंधन का प्रतीक है। भक्त कहता है कि तेरे बिना कोई सहारा नहीं — यह पूर्ण समर्पण की अवस्था है। दूसरे अंतरे में जन्म-जन्म की प्यास का वर्णन है, जो पुनर्जन्म के सिद्धांत और आत्मा की अनादि यात्रा को दर्शाता है। माता की ममता में जीवन महकने की बात मातृ-शक्ति के वात्सल्य भाव को प्रकट करती है।

तीसरे अंतरे में भक्त दुख-दर्द के बादलों के बीच अकेलापन अनुभव करता है और केवल प्रभु को ही अपना साँझ-सवेरा मानता है। यह पंक्ति उस विश्वास को दर्शाती है कि संसार के सभी संबंध अंततः छूट जाते हैं, केवल ईश्वर ही स्थायी सहारा है। चौथे अंतरे में भक्ति-दीप जलाकर द्वार पर खड़े होने का भाव है — यह पूजा, आराधना और विनम्रता का प्रतीक है। पाँचवें अंतरे में भक्त माता-पिता और समस्त जगत के स्वामी को एक ही परम सत्ता के रूप में स्वीकार करता है और चरण-धूलि बनने की कामना करता है — यह अहंकार के पूर्ण विलय की पराकाष्ठा है।

कुल मिलाकर यह भजन भक्ति के नवधा भावों में से श्रवण, कीर्तन, वंदन, दास्य और आत्म-निवेदन को एक साथ प्रस्तुत करता है। इसका भावार्थ यही है कि जब जीव अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु के नाम में आश्रय लेता है, तब दर्शन स्वयं हो जाते हैं — क्योंकि दर्शन माँगने की वस्तु नहीं, पाने की अवस्था है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन मुख्य रूप से मातारानी (देवी शक्ति) की उपासना से जुड़ा है, यद्यपि इसका भाव सर्वेश्वरवादी भी है। भजन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सरल भाषा एवं मधुर धुन: भजन की भाषा सहज ब्रज-अवधी मिश्रित हिंदी है, जिसे हर आयु वर्ग गा सकता है।
  • नाम-महिमा का गुणगान: यह भजन नाम-संकीर्तन की श्रेष्ठता स्थापित करता है।
  • शरणागति का भाव: भक्त पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु के चरणों में बैठता है।
  • विरह एवं मिलन की रस-धारा: इसमें विरह (वियोग) और मिलन (संयोग) दोनों रसों का सुंदर संगम है।
  • सामूहिक कीर्तन योग्य: जागरण, नवरात्रि, मंगल कीर्तन एवं आरती में यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह भजन साधक को यह सिखाता है कि दुख का मूल कारण ईश्वर से दूरी है, और उपाय है — नाम-स्मरण। नियमित श्रवण एवं गायन से मन में वैराग्य, शांति और भक्ति का संचार होता है। यह भजन भय, अकेलेपन और निराशा को दूर कर आत्मबल बढ़ाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को किसी भी शुभ अवसर पर गाया जा सकता है, परंतु कुछ विशेष समय एवं अवसर इसके लिए अत्यंत फलदायी माने जाते हैं:

  • प्रातःकाल: स्नान के बाद, दीप प्रज्वलित करके, माता के समक्ष बैठकर।
  • संध्या आरती: दीपक एवं धूप के साथ आरती के समय।
  • नवरात्रि: नौ दिनों तक विशेष रूप से माता की उपासना में।
  • मंगलवार एवं शुक्रवार: माता के दिनों में व्रत एवं भजन के साथ।
  • जागरण एवं कीर्तन सभा: रात्रि जागरण में सामूहिक रूप से।

गायन विधि: स्वच्छ स्थान पर बैठें, मन को शांत करें, माता का ध्यान करें और फिर मुखड़े से आरंभ करें। प्रत्येक अंतरे के बाद मुखड़ा दोहराएँ। ताली या मंजीरा, ढोलक अथवा हारमोनियम के साथ गाया जा सकता है। भाव सबसे महत्वपूर्ण है — शब्दों से अधिक भावना का महत्व है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से मातारानी (देवी शक्ति) की उपासना से जुड़ा है, परंतु इसका भाव सर्वेश्वरवादी है — इसमें परम सत्ता को माता-पिता एवं जगत के स्वामी के रूप में स्वीकार किया गया है।

प्रातःकाल, संध्या आरती, नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार तथा जागरण एवं कीर्तन सभाओं में यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है।

भक्ति परंपरा के अनुसार नाम-संकीर्तन से मन शुद्ध होता है, भय एवं निराशा दूर होती है, और आत्मिक शांति का अनुभव होता है। यह भजन भक्त को शरणागति एवं विश्वास की ओर प्रेरित करता है।

"तारणहारा" का अर्थ है — तारने वाला, पार उतारने वाला। यह शब्द प्रभु के नाम की उस शक्ति को दर्शाता है जो जीव को भवसागर से मुक्त करती है।

यह भजन परंपरागत लोक-भक्ति साहित्य का हिस्सा है और विभिन्न कीर्तन परंपराओं में प्रचलित है। इसका कोई एकल प्रामाणिक रचनाकार सर्वसम्मति से निर्धारित नहीं है; यह भक्ति परंपरा की सामूहिक विरासत है।

हाँ, इसे घर में अकेले भी गाया जा सकता है। भक्ति में संख्या से अधिक भाव का महत्व है। एकाग्रचित्त होकर गाया गया भजन अत्यंत फलदायी होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें भजन के पारंपरिक बोल, उनका सरल हिंदी भावार्थ एवं भक्ति परंपरा के संदर्भों को सम्मिलित किया गया है। भजन की पंक्तियाँ लोक-कीर्तन परंपरा में प्रचलित रूपों पर आधारित हैं; भिन्न क्षेत्रीय गायकी में इनमें थोड़ा अंतर संभव है। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपनी कुल-परंपरा एवं गुरु-निर्देशानुसार ही साधना करें।

संदर्भ एवं व्याख्या सहित सामग्री — भक्तिलोक.इन

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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