Parvati Stotram

छठ पुजनमा करे आ जईती

80 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के जन-जन के हृदय में बसा महापर्व छठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति, अटूट आस्था और प्रकृति के प्रति अगाध कृतज्ञता का प्रतीक है। इस पावन अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक और आधुनिक लोकगीत साधकों के अंतर्मन को झंकृत कर देते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत भावुक और भक्ति रस से सराबोर भोजपुरी छठ गीत है "छठ पुजनमा करे आ जईती" (Chhath Pujnama Kare Aa Jaiti), जिसे सुप्रसिद्ध लोक गायक दीपक राज यादव ने अपने मधुर कंठ से सजाया है। यह गीत विशेष रूप से उन प्रवासियों (परदेसियों) की मर्मस्पर्शी वेदना, तड़प और मातृभूमि के प्रति उनके असीम प्रेम को दर्शाता है, जो आजीविका के कारण अपने घर-परिवार से दूर रहते हैं और छठ महापर्व के समय घर लौटने के लिए व्याकुल रहते हैं। इस विस्तृत लेख में हम इस गीत के गहरे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं का विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

॥ छठ पुजनमा करे आ जईती ॥

छठ पुजनमा करे आ जईती, ऐ सजनवा हो...
टिकटवा जदी मिल जईती, ऐ सजनवा हो...
छठ पुजनमा करे आ जईती, ऐ सजनवा हो...

कांचे ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए...
बहंगी लचकत जाए, मोरा जियरा धड़कन जाए...
टिकटवा जदी मिल जईती, ऐ सजनवा हो...
छठ पुजनमा करे आ जईती, ऐ सजनवा हो...

उगा हो सुरुज देव भइले अरघ के बेर...
गंगा जी के पावन तीरे, लागल बाटे ढेर...
दउरा सजइती अपने हाथे, ऐ सजनवा हो...
छठ पुजनमा करे आ जईती, ऐ सजनवा हो...

कांच ही बांस के सुपवा, फल-फूल से सजल बा...
छठी मईया के महिमा अपार, जग सारा भजल बा...
गोदी में बालकवा मुस्काई, ऐ सजनवा हो...
छठ पुजनमा करे आ जईती, ऐ सजनवा हो...

सदा सुहागिन राखीं माई, सेनुर अमर होई...
दीपक राज गावे गीत, किरपा तोहार होई...
घरवा हम दौड़ी-दौड़ी आई, ऐ सजनवा हो...
टिकटवा जदी मिल जईती, ऐ सजनवा हो...
छठ पुजनमा करे आ जईती, ऐ सजनवा हो...

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत भोजपुरी लोक संस्कृति की उस मर्मस्पर्शी वास्तविकता को उजागर करता है, जहां एक प्रवासी पति या पत्नी अपने घर लौटने की असमर्थता और तीव्र इच्छा के बीच झूल रहे हैं। गीत का पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ निम्नलिखित है:

प्रथम अंतरा: घर लौटने की व्याकुलता

गीत की शुरुआत में नायिका (या स्वयं परदेसी साधक) अपने सजन (पति या प्रियतम) से कहती है कि यदि इस महापर्व के अवसर पर रेलगाड़ी का टिकट मिल जाता, तो मैं अवश्य ही घर आकर छठ पूजन करती। यह पंक्ति भारत के उन लाखों प्रवासियों की वास्तविक पीड़ा को दर्शाती है, जो त्योहारों के समय टिकट न मिल पाने के कारण अपने घर नहीं जा पाते। उनके लिए छठ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि अपने परिवार और मिट्टी से जुड़ने का सबसे बड़ा माध्यम है।

द्वितीय अंतरा: बहंगी और दउरा की तैयारी

गीत में पारंपरिक छठ गीतों के बिंबों का सुंदर प्रयोग किया गया है। "कांचे ही बांस के बहंगिया" के माध्यम से उस पवित्र बांस की टोकरी और बहंगी का वर्णन है, जिसमें छठी मैया का प्रसाद (ठेकुआ, फल, नारियल आदि) रखकर घाट पर ले जाया जाता है। साधक कहता है कि यदि वह घर आ पाता, तो अपने हाथों से दउरा सजाता और उस बहंगी को उठाकर पावन गंगा तट की ओर प्रस्थान करता।

तृतीय अंतरा: गंगा तट और अरघ का दृश्य

गीत के इस भाग में गंगा नदी के पावन किनारे का अत्यंत सजीव चित्रण है। सूर्य देव को अर्घ्य देने का समय हो चुका है और घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। साधक की कल्पना में वह पावन दृश्य घूम रहा है, जहां सभी लोग एक साथ मिलकर भगवान भास्कर की आराधना कर रहे हैं।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत का मुख्य स्वर "विरह और समर्पण" (Separation and Devotion) का है। इसमें एक ओर जहां छठी मैया के प्रति अटूट श्रद्धा है, वहीं दूसरी ओर अपनों से दूर रहने की विवशता का करुण क्रंदन भी है। यह गीत हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  • मातृभूमि और संस्कृति से जुड़ाव: मनुष्य चाहे दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए, उसकी जड़ें हमेशा उसकी संस्कृति और मिट्टी से जुड़ी रहती हैं।
  • पारिवारिक एकजुटता: छठ महापर्व बिखरते हुए परिवारों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता है।
  • प्रकृति की महत्ता: यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमारी आस्था के केंद्र बिंदु कोई अमूर्त शक्ति नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देव सूर्य और नदियां (गंगा मैया) हैं।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु (Parameter) गीत की जानकारी (Details)
गीत का नाम (Song Name) छठ पुजनमा करे आ जईती (Chhath Pujnama Kare Aa Jaiti)
मुख्य गायक (Singer) दीपक राज यादव (Deepak Raj Yadav)
गीत की भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य विषय (Theme) छठ महापर्व, घर वापसी की तड़प, छठी मैया की आराधना
संगीत शैली (Genre) भोजपुरी लोकगीत / भक्ति संगीत (Folk Devotional)
रिलीज वर्ष (Release Year) 2021

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

भोजपुरी भक्ति संगीत के क्षेत्र में दीपक राज यादव एक जाना-माना नाम हैं। उन्होंने अपनी सुरीली और ठेठ देहाती आवाज से इस गीत को जीवंत बना दिया है। इस गीत के संगीत संयोजन में पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे ढोलक, मंजीरा, बांसुरी और शहनाई का उत्कृष्ट प्रयोग किया गया है, जो सुनने वाले के मन में सीधे बिहार के छठ घाटों की छवि अंकित कर देता है। गीतकार ने बहुत ही सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली शब्दों का चयन किया है, जो सीधे श्रोताओं के हृदय को छूते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Context)
पुजनमा पूजन / पूजा अनुष्ठान छठ व्रत की पावन पूजा
सजनवा सजन / पति / प्रियतम घर के मुखिया या जीवनसाथी को संबोधन
टिकटवा रेलवे या यात्रा का टिकट त्योहारों के समय घर लौटने की जद्दोजहद
बहंगिया बांस का बना हुआ कांवड़ जिसमें पूजा की सामग्री रखकर घाट तक ले जाई जाती है
दउरा / सुपवा बांस की टोकरी और सूप छठ पूजा का मुख्य पात्र जिसमें अर्घ्य की सामग्री सजती है
अरघ (अर्घ्य) सूर्य देव को जल या दूध अर्पित करना छठ पूजा की मुख्य क्रिया

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस महापर्व में किसी भी प्रकार की मूर्ति पूजा नहीं होती, बल्कि प्रत्यक्ष देव सूर्य और उनकी शक्ति 'उषा' (छठी मैया) की आराधना की जाती है। यह गीत इस वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।

सांस्कृतिक रूप से, यह गीत पूर्वी भारत के प्रवासियों के लिए एक भावनात्मक संबल है। जब वे परदेस में अकेले होते हैं, तो ऐसे गीत उन्हें अपनी संस्कृति के करीब महसूस कराते हैं। यह गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी लोक विरासत को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम है। जैसे हम भगवान विष्णु की स्तुति के लिए ॐ जय जगदीश हरे आरती गाते हैं या देवी पार्वती की वंदना के लिए पार्वती स्तोत्र का पाठ करते हैं, वैसे ही छठ महापर्व के दौरान इन लोकगीतों का गायन अनिवार्य माना जाता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह पावन लोकगीत हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ सिखाता है:

  1. सादगी और पवित्रता: छठ पूजा में मिट्टी के चूल्हे, बांस के सूप और प्राकृतिक फलों का उपयोग होता है, जो हमें सादगी से जीने की प्रेरणा देते हैं।
  2. धैर्य और संघर्ष: टिकट न मिलने की तड़प के बावजूद छठी मैया पर अटूट विश्वास रखना हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखना सिखाता है।
  3. समानता का संदेश: छठ घाट पर राजा और रंक, अमीर और गरीब सभी एक साथ खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। यह सामाजिक समरसता का सर्वोत्तम उदाहरण है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि यह गीत साल के किसी भी समय सुना जा सकता है, लेकिन इसका वास्तविक आनंद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय महापर्व के दौरान आता है।

  • नहाय-खाय (चतुर्थी): इस दिन से ही घरों में यह गीत गूंजने लगता है, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है।
  • खरना (पंचमी): शाम के समय जब प्रसाद बनता है, तब इस गीत की मधुर ध्वनि मन को शांति प्रदान करती है।
  • संध्या अर्घ्य (षष्ठी): घाट पर जाते समय इस गीत को गाकर भक्त अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
  • उषा अर्घ्य (सप्तमी): व्रत की पूर्णाहुति के समय यह गीत विदाई और कृतज्ञता के भाव को दर्शाता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक छठ पुजनमा करे आ जईती
गायक दीपक राज यादव
मुख्य आराध्य भगवान सूर्य देव एवं छठी मैया
काव्य रस करुण रस एवं भक्ति रस (Devotional & Emotional)
मुख्य वाद्य यंत्र बांसुरी, ढोलक, शहनाई, मंजीरा
सांस्कृतिक प्रासंगिकता बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश का महापर्व छठ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस गीत का मुख्य संदेश परदेस में रहने वाले भक्तों की अपने घर लौटने की तीव्र इच्छा और छठी मैया के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को प्रदर्शित करना है। यह गीत पारिवारिक मिलाप और लोक आस्था के महत्व को रेखांकित करता है।

इस लोकप्रिय छठ गीत के गायक दीपक राज यादव हैं। यह गीत पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत और आधुनिक भक्ति संगीत की शैली में रचा गया है।

'दउरा' बांस की बनी एक बड़ी टोकरी होती है जिसमें पूजा के फल और ठेकुआ प्रसाद रखा जाता है। 'बहंगी' एक प्रकार का कांवड़ होता है जिसके दोनों सिरों पर दउरा लटकाकर पुरुष श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर घाट तक ले जाते हैं। यह पवित्रता और सेवा का प्रतीक है।

छठ पूजा में प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य और उनकी मानस बहन या शक्ति 'छठी मैया' (देवी उषा) की पूजा की जाती है। यह प्रकृति और जीवनदायिनी शक्ति की उपासना का पर्व है।

यद्यपि यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के महापर्व के दौरान गाया और सुना जाता है, लेकिन चैती छठ के पावन अवसर पर भी भक्त इसे अत्यंत श्रद्धा के साथ सुनते हैं।

छठ पूजा में लोकगीतों का स्थान सर्वोपरि है। ये गीत व्रत की कठिन साधना के दौरान व्रतियों को मानसिक शक्ति प्रदान करते हैं और पूजा के संपूर्ण वातावरण को पवित्र और आनंदमय बनाते हैं।

इस पंक्ति का अर्थ है कि यदि त्योहार के समय घर जाने के लिए रेलगाड़ी का टिकट मिल जाता, तो साधक अवश्य ही अपने घर जाकर पूजा में शामिल होता। यह प्रवासियों की व्यावहारिक कठिनाई को दर्शाता है।

हाँ, यह गीत साधक के मन में समर्पण और करुणा का भाव जगाता है। इसे गाकर या सुनकर भक्त मानसिक रूप से भी छठ मैया के चरणों में लीन हो सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस गीत के माध्यम से लोक संस्कृति के उस अनूठे पहलू को उजागर किया गया है जो आधुनिक युग में भी हमारी जड़ों को सुरक्षित रखने का कार्य कर रहा है। दीपक राज यादव का यह गीत भोजपुरी लोक संगीत की अमूल्य धरोहर है, जो हर वर्ष छठ के अवसर पर लाखों दिलों को अपनी माटी से जोड़ता है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत पुराण एवं भविष्य पुराण (सूर्य उपासना प्रसंग)
  • बिहार और पूर्वांचल की पारंपरिक छठ लोक-परंपराएं
  • भोजपुरी लोकगीत संग्रह एवं सांस्कृतिक अध्ययन

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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