Parvati Stotram

तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं मैया मेरी लाज रख ले

82 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं मैया मेरी लाज रख ले" सनातन धर्म में देवी आराधना और शरणागति भाव का एक अत्यंत ही मधुर, भावपूर्ण और लोकप्रिय भजन है। यह भजन आदि शक्ति, जगदम्बा, मां दुर्गा और मां पार्वती के प्रति अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। जब एक भक्त संसार के कोलाहल, दुखों और कठिनाइयों से थककर मां की शरण में आता है, तब उसके हृदय से निकले ये करुण स्वर सीधे मां के चरणों तक पहुंचते हैं। इस भजन का मुख्य स्वर 'विनय' और 'करुणा' का है, जहां जीवात्मा अपनी असमर्थता को स्वीकार करते हुए परमात्मा रूपी मां से अपनी लज्जा, सम्मान और जीवन-नैया को पार लगाने की प्रार्थना करती है। नवरात्रि के पावन पर्व, साप्ताहिक मंगलवार व शुक्रवार की पूजा, अथवा दैनिक संध्या आरती के समय इस भजन का गायन साधक के अंतःकरण में असीम शांति और सात्विक ऊर्जा का संचार करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं मैया मेरी लाज रख ले ॥

तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले।
मैया मेरी लाज रख ले, मैया मेरी लाज रख ले।
तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले॥

तुम बिन मेरा कोई न जग में, किसको जाके हाल सुनाऊं।
किसको जाके हाल सुनाऊं, मैया मेरी लाज रख ले।
तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले॥

भवसागर में नैया मेरी, डगमग डगमग डोले।
पार लगा दो मेरी नैया, मैया मेरी लाज रख ले।
तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले॥

दीन-दुखी और निर्बल हूँ मैं, शरण तुम्हारी आया।
अपनी दया की छांव में रख लो, मैया मेरी लाज रख ले।
तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले॥

पाप और अवगुण भरे हैं मुझमें, फिर भी बालक हूँ तेरा।
भूल हमारी क्षमा करो मां, मैया मेरी लाज रख ले।
तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले॥

मैया तुम हो दया की सागर, सब पर कृपा बरसाती।
मुझ पर भी एक बूंद गिरा दो, मैया मेरी लाज रख ले।
तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और मर्मस्पर्शी है। यह भजन जीवात्मा और परमात्मा के बीच के वात्सल्य संबंध को उजागर करता है। प्रथम पंक्ति में भक्त कहता है कि हे माता! मैं अपने अहंकार को त्यागकर आपके पावन चरणों में अपना मस्तक झुकाता हूँ। इस संसार रूपी चक्रव्यूह में मेरी मर्यादा, मेरा सम्मान और मेरा अस्तित्व केवल आपकी कृपा पर निर्भर है, इसलिए आप मेरी लाज रख लीजिए।

भक्त आगे अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहता है कि इस मतलबी संसार में आपके अतिरिक्त मेरा कोई सच्चा हितैषी नहीं है। मैं अपने मन की व्यथा, अपने दुख और अपनी पीड़ा किसे जाकर सुनाऊं? केवल आप ही हैं जो बिना कहे मेरे हृदय की बात समझ लेती हैं। संसार के थपेड़ों से त्रस्त होकर जब मेरी जीवन रूपी नैया इस भवसागर में डगमगाने लगती है, तब मुझे केवल आपका ही सहारा दिखाई देता है। हे मां! आप इस नैया की पतवार अपने हाथों में ले लीजिए और मुझे इस संसार-सागर से पार उतार दीजिए।

भजन के अंतिम भाग में भक्त अपनी कमियों और भूलों को स्वीकार करता है। वह कहता है कि मैं अज्ञानी हूँ, मुझमें अनेक अवगुण और पाप हैं, परंतु फिर भी मैं आपका ही नादान बालक हूँ। एक मां कभी अपने बच्चे के अपराधों को मन में नहीं रखती, वह सदैव क्षमाशील होती है। इसलिए हे दयामयी मां! मेरे अपराधों को क्षमा कर अपनी दया की शीतल छाया में मुझे स्थान दीजिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह साधना मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए एक मानसिक संबल है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • पूर्ण शरणागति (Surrender): श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने जिस 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' का संदेश दिया है, वही शरणागति भाव इस भजन में मां दुर्गा के प्रति व्यक्त किया गया है।
  • अहंकार का विसर्जन: चरणों में शीश झुकाना इस बात का प्रतीक है कि साधक अपने बुद्धि, ज्ञान और शक्ति के अहंकार को मां के चरणों में समर्पित कर रहा है।
  • मानसिक शांति: इस भजन के निरंतर जप और गायन से मन की चंचलता समाप्त होती है और साधक को आंतरिक सुरक्षा का अनुभव होता है।
  • भक्ति रस का संचार: यह भजन शांत और करुण रस से ओतप्रोत है, जो हृदय को द्रवित कर अश्रुधारा प्रवाहित करने की क्षमता रखता है, जिसे भक्ति मार्ग में अत्यंत शुभ माना गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए हर क्षण पवित्र है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष समय और विधियां अत्यधिक फलदायी मानी गई हैं:

शुभ समय: इस भजन का गायन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या काल की आरती के समय करना सर्वोत्तम माना जाता है। विशेष रूप से नवरात्रि के नौ दिनों में, प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को देवी मंदिर में या घर के पूजा स्थल पर इसका गायन करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।

गायन की विधि:

  • सर्वप्रथम शुद्ध वस्त्र धारण कर मां दुर्गा या मां पार्वती की प्रतिमा के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • अपने नेत्र बंद कर मां के ममतामयी स्वरूप का ध्यान करें।
  • हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र और करुण भाव से इस भजन का सस्वर गायन करें।
  • गायन के समय मन में यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मां हमारी पुकार सुन रही हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से मां दुर्गा और मां पार्वती को समर्पित है। सनातन परंपरा में मां को आदि शक्ति, जगदम्बा और सर्वकल्याणकारी माना गया है। पार्वती स्तोत्र और देवी महात्म्य के अनुसार, देवी अपने भक्तों की पुकार पर तुरंत दौड़ी चली आती हैं। इस भजन की रचना शैली मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के संतों के पदों से प्रेरित है, जहां भगवान को माता-पिता मानकर अनन्य भाव से पुकारा जाता था।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति धारा से आता है। इसकी रचना किसी एक विशिष्ट कवि द्वारा नहीं, बल्कि समय-समय पर भक्तों के हृदयोद्गारों के संकलन से हुई है। भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में यह भजन पीढ़ियों से गाया जा रहा है। इसकी सरलता और सुबोधता के कारण यह जन-जन के कंठ में बस गया है। जब भी समाज में कोई विपत्ति आती है या व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन में निराश होता है, तो यह भजन उसे आशा की नई किरण दिखाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुगम और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कहीं-कहीं ब्रजभाषा का प्रभाव भी देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली 'पद' शैली है, जिसमें गेयता (गाए जाने की योग्यता) का गुण कूट-कूट कर भरा है। 'डगमग डगमग', 'दीन-दुखी' जैसे शब्दों का प्रयोग अनुप्रास अलंकार की सुंदर छटा बिखेरता है। रूपक अलंकार के माध्यम से जीवन को 'नैया' और संसार को 'भवसागर' बताया गया है, जो सनातन दर्शन का मूल आधार है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ही नहीं दिखाता, बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए भी कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. विनम्रता का महत्व: जीवन में कितनी भी सफलता मिल जाए, ईश्वर के सामने सदैव विनम्र बने रहना चाहिए।
  2. स्वीकारोक्ति की शक्ति: अपनी गलतियों और अवगुणों को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।
  3. धैर्य और विश्वास: जब चारों ओर अंधकार हो, तब भी ईश्वर की सत्ता पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
  4. समर्पण भाव: कर्तापन के भाव को छोड़कर कर्म करना और फल मां के चरणों में अर्पित कर देना ही सच्ची शांति का मार्ग है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
शीश झुकाना मस्तक नमन करना अहंकार का पूर्ण विसर्जन करना।
लाज रखना मर्यादा और सम्मान की रक्षा करना संसार में भक्त की प्रतिष्ठा और भक्ति मार्ग की रक्षा।
भवसागर संसार रूपी समुद्र जन्म और मृत्यु का चक्र जिसमें जीवात्मा फंसी है।
नैया नाव मनुष्य का जीवन और उसका शरीर।
दीन-दुखी गरीब और पीड़ित सांसारिक कष्टों से व्याकुल जीव।
अवगुण दोष या बुराइयां मनुष्य के भीतर के विकार जैसे काम, क्रोध, लोभ।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं, मैया मेरी लाज रख ले।"
व्याख्या: हे जगतजननी! मैं आपके परम पावन और अभय प्रदान करने वाले चरणों में अपना मस्तक झुकाता हूँ। इस संसार में मेरी मान-प्रतिष्ठा और मर्यादा केवल आपके हाथ में है, मेरी रक्षा करें।

पंक्ति: "तुम बिन मेरा कोई न जग में, किसको जाके हाल सुनाऊं।"
व्याख्या: इस स्वार्थी संसार में आपके अतिरिक्त मेरा कोई अपना नहीं है जो निस्वार्थ प्रेम कर सके। मैं अपने दुखों की कथा और मन की व्यथा आपके सिवा और किसे सुनाऊं, क्योंकि केवल आप ही मेरी पुकार सुन सकती हैं।

पंक्ति: "भवसागर में नैया मेरी, डगमग डगमग डोले। पार लगा दो मेरी नैया..."
व्याख्या: यह संसार एक विशाल और अशांत समुद्र की भांति है, जिसमें मेरी जीवन रूपी नाव माया-मोह के थपेड़ों से डगमगा रही है। हे मां! आप ही खेवनहार बनकर मेरी इस नैया को सुरक्षित किनारे (मोक्ष) तक पहुंचा दीजिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए मां दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करना चाहिए, जो शरणागति का ही संदेश देता है:

"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते॥"

अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं, कल्याणकारिणी हैं, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली हैं। शरण में आए हुओं की रक्षा करने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं, आपको नमस्कार है।

इसके साथ ही श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी इस भजन के साथ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं मैया मेरी लाज रख ले
मुख्य देवी-देवता मां दुर्गा, मां पार्वती, आदि शक्ति
भजन का मुख्य भाव शरणागति, करुणा, विनय भक्ति (Surrender & Devotion)
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार, संध्या आरती, सत्संग
मुख्य संदेश अहंकार का त्याग और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से मां दुर्गा, मां पार्वती और आदि शक्ति जगदम्बा को समर्पित है। भक्त इन्हें 'मैया' कहकर पुकारते हैं।

इस भजन के गायन से साधक के भीतर का अहंकार नष्ट होता है, मन को असीम शांति मिलती है और मां के प्रति समर्पण भाव सुदृढ़ होता है।

हां, दैनिक संध्या आरती या सुबह की पूजा के समय इस भजन का पाठ या गायन करना अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है।

'भवसागर' का अर्थ जन्म-मृत्यु और सांसारिक दुखों का महासागर है, और 'नैया' का अर्थ मनुष्य का जीवन है जो इस संसार में संघर्ष कर रहा है।

इसके लिए किसी कठिन नियम की आवश्यकता नहीं है। केवल तन और मन की पवित्रता, और हृदय में मां के प्रति सच्चा प्रेम व श्रद्धा होनी चाहिए।

नवरात्रि मां दुर्गा की साधना का विशेष समय होता है। इस दौरान इस भजन को गाने से मां की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है और साधना सफल होती है।

इसकी मुख्य सीख यह है कि मनुष्य को अपने कर्म करते हुए अंतिम परिणाम और अपना जीवन ईश्वर (मां) के चरणों में सौंप देना चाहिए।

जी हां, जब हम अपनी चिंताओं को मां के चरणों में सौंप देते हैं, तो हमारा मन हल्का हो जाता है, जिससे मानसिक तनाव और भय का नाश होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्ति रस के सुप्रसिद्ध भजन "तेरे चरणों में शीश मैं झुकाऊं मैया मेरी लाज रख ले" के शास्त्रीय, आध्यात्मिक और व्यावहारिक पक्षों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस सामग्री का संकलन सनातन धर्म के ग्रंथों, देवी भागवत पुराण के सिद्धांतों और पारंपरिक भजन संग्रहों के आधार पर किया गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को न केवल भजन के शब्द प्रदान करती है, बल्कि उन्हें इसके अंतर्निहित दार्शनिक संदेश से भी जोड़ती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - मां दुर्गा की महिमा और शरणागति प्रसंग।
  • पारंपरिक भजन संग्रह एवं लोक संगीत संकलन।
  • सनातन धर्म की स्तुति एवं प्रार्थना परंपराएं।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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