श्री जाहरवीर गोगा जी महाराज (गोगा राणा) लोकदेवता एवं नाग देवता के साक्षात स्वरूप माने जाते हैं। "सास गोगा ने मना ले री ये है पदम् नाग अवतारी" भजन राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी भारत की लोक-सांस्कृतिक एवं भक्ति परंपरा का एक अत्यंत सुमधुर और लोकप्रिय संकीर्तन है। इस भजन में बहू अपनी सास से लोकदेवता गोगा जी महाराज की महिमा गाते हुए उन्हें घर में पूजने और प्रसन्न करने का आग्रह करती है। गोगा जी को भगवान शिव के नागलोक के "पदम् नाग" का अवतार तथा महायोगी गुरु गोरखनाथ जी का परम सिद्ध शिष्य माना जाता है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की नवमी (गोगा नवमी) पर इस भजन का गायन विशेष रूप से किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गोगा जी महाराज की कृपा से साधक के घर से सर्प भय, विषैले जीवों का उपद्रव, दरिद्रता तथा शारीरिक-मानसिक कष्टों का समूल नाश होता है और परिवार में सुख, समृद्धि तथा वंश वृद्धि का वरदान प्राप्त होता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ सास गोगा ने मना ले री ये है पदम् नाग अवतारी ॥
टेक (मुखड़ा):
सास गोगा ने मना ले री, ये है पदम् नाग अवतारी।
ये है पदम् नाग अवतारी, ये तो संकट हरण हारी॥
सास गोगा ने मना ले री, ये है पदम् नाग अवतारी॥
प्रथम अंतरा:
माता बाछल के राजदुलारे, गुरु गोरख के वरदानी।
ददरेवे में जन्म लिया है, अमर हुई ये कहानी॥
नीले घोड़े का असवार, जिसकी महिमा जग से न्यारी।
सास गोगा ने मना ले री, ये है पदम् नाग अवतारी॥
द्वितीय अंतरा:
छड़ी पूज के जो नर ध्यावे, मनवांछित फल पावे।
विषधर नाग भी सीस नवावे, कष्ट निकट ना आवे॥
जागा जोत जगे मंदिर में, दर्शन देवें त्रिपुरारी।
सास गोगा ने मना ले री, ये है पदम् नाग अवतारी॥
तृतीय अंतरा:
भादो नवमी का मेला भारी, गोगामेड़ी धाम सजे।
भगत खड़े हैं हाथ जोड़ के, ढोल नगाड़े संग बाजे॥
'जय जाहरवीर' की गूंज उठी है, जावे बलिहारी-बलिहारी।
सास गोगा ने मना ले री, ये है पदम् नाग अवतारी॥
चतुर्थ अंतरा (समापन):
जो भी शरण गोगा की आवे, उसके कारज सिद्ध करे।
अन्न-धन और संतति देके, भक्तन के भण्डार भरे॥
सदा रहे कुल में खुशहाली, गावे दुनिया ये सारी।
सास गोगा ने मना ले री, ये है पदम् नाग अवतारी॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह पारंपरिक लोकभजन "सास गोगा ने मना ले री ये है पदम् नाग अवतारी" पारिवारिक भक्ति, सामाजिक समरसता और ईश्वरीय शरणागति का अनुपम प्रतीक है। भजन का भावार्थ केवल एक पारिवारिक संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच के गूढ़ संबंध को प्रकट करता है।
भजन के माध्यम से एक नववधू (बहू) अपनी सास को संबोधित करते हुए कहती है कि हे सास जी! घर की सुख-शांति और कुल की रक्षा के लिए हमें लोकदेवता श्री जाहरवीर गोगा जी महाराज को प्रसन्न करना चाहिए। गोगा जी महाराज साधारण मनुष्य नहीं, अपितु नागलोक के अधिपति "पदम् नाग" के अवतारी हैं। वे भक्तों के जीवन से समस्त भय, संकट और विषैले तत्वों (शारीरिक विष और मन के कषाय-कल्मष) को हरने वाले हैं।
गोगा जी महाराज का जन्म माता बाछल के तप और सिद्ध गुरु गोरखनाथ जी के Google फल रूपी दिव्य प्रसाद के प्रभाव से हुआ था। उन्होंने चूरू जिले के ददरेवा धाम में अवतार लिया। नीला घोड़ा (नीला बापा) उनकी दिव्य सवारी है। जब भक्त निष्ठापूर्वक उनकी छड़ी (निशान) का पूजन करते हैं और गोगामेड़ी धाम में धूप-दीप जलाते हैं, तो नागराज स्वयं नतमस्तक हो जाते हैं। भाद्रपद की नव
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