Parvati Stotram

चली पनिया भरण शिव नार निर्गुण भजन भक्ति इन हिंदी लिरिक्स

95 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"चली पनिया भरण शिव नार निर्गुण भजन भक्ति इन हिंदी लिरिक्स" भारतीय लोक-संस्कृति और निर्गुण भक्ति परंपरा का एक अत्यंत सुंदर और दार्शनिक भजन है। यह भजन भगवान शिव और माता पार्वती (शिव नार) के पावन संवाद के माध्यम से जीवात्मा और परमात्मा के दिव्य संबंध को उजागर करता है। निर्गुण काव्य शैली में रचित इस भजन में 'पानी भरने जाने' (पनिया भरण) की लोक-परंपरा को एक गहरे आध्यात्मिक रूपक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ पानी भरना सांसारिक कर्मों और साधना का प्रतीक है, जबकि मार्ग रोकने वाले त्रिपुरारी (भगवान शिव) उस परम चेतना के प्रतीक हैं जो जीव को सांसारिक मोह-माया से मुक्त कर अपनी ओर आकर्षित करती है। इस भजन का गायन विशेष रूप से महाशिवरात्रि, सावन के पवित्र सोमवार, शिव आराधना और सत्संगों के अवसरों पर किया जाता है। यह भजन साधक के भीतर वैराग्य, समर्पण और अनन्य शिव भक्ति का संचार करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ चली पनिया भरण शिव नार ॥


॥ कोरस ॥

चली पनिया भरण शिव नार, डगरिया रोक रहे त्रिपुरार।
चली पनिया भरण शिव नार, डगरिया रोक रहे त्रिपुरार॥

॥ अंतरा १ ॥

हाथ में सोहे सोने की गागर, सिर पर धरे गंगा की धार।
बीच डगरिया खड़े दिगंबर, कैसे जाऊं मैं पार।
डगरिया रोक रहे त्रिपुरार, चली पनिया भरण शिव नार॥

॥ अंतरा २ ॥

अंग भभूति गले मुंडमाला, हाथ त्रिशूल और डमरू वाला।
पीकर मस्त रहे विष का प्याला, ऐसे हैं मेरे भरतार।
डगरिया रोक रहे त्रिपुरार, चली पनिया भरण शिव नार॥

॥ अंतरा ३ ॥

कहे पार्वती सुनो हे स्वामी, तुम हो घट-घट के अंतर्यामी।
मैं दासी तुम दीनबंधु नामी, कर दो भव से पार।
डगरिया रोक रहे त्रिपुरार, चली पनिया भरण शिव नार॥

॥ अंतरा ४ ॥

बाघंबर धारी मस्तक चंदा, काट रहे सब जग का फंदा।
शरण तिहारी आए बंदा, राखो लाज हमार।
डगरिया रोक रहे त्रिपुरार, चली पनिया भरण शिव नार॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह निर्गुण भजन ऊपरी तौर पर माता पार्वती और भगवान शिव के बीच का एक मधुर संवाद प्रतीत होता है, परंतु इसके भीतर अद्वैत वेदांत और निर्गुण भक्ति का अत्यंत गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। भजन में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रतीक है:

  • पनिया भरण (पानी भरना): यह जीवात्मा द्वारा संसार रूपी कुएं से कर्म, साधना और भक्ति रूपी जल को संचित करने की प्रक्रिया का प्रतीक है।
  • शिव नार (पार्वती): यह जीवात्मा (Individual Soul) या प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल है।
  • डगरिया रोकना (मार्ग रोकना): जब साधक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो भगवान शिव (परम चेतना) उसके अहंकार और सांसारिक आसक्तियों के मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं ताकि वह अंतर्मुखी हो सके।
  • सोने की गागर: यह मानव शरीर और बुद्धि का प्रतीक है, जिसे पवित्र विचारों और भक्ति रस से भरा जाना चाहिए।

इस प्रकार, यह भजन दर्शाता है कि जब जीवात्मा अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए ईश्वर की ओर बढ़ती है, तो देवादिदेव महादेव स्वयं उसका मार्ग रोककर उसे अपनी शरण में ले लेते हैं और भवसागर से पार उतार देते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह साधना मार्ग का एक व्यावहारिक मानचित्र है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • निर्गुण और सगुण का समन्वय: यद्यपि इसमें शिव के सगुण रूप (त्रिशूल, डमरू, भस्म, मुंडमाला) का वर्णन है, परंतु इसका अंतर्निहित संदेश निर्गुण (निराकार चेतना) की प्राप्ति है।
  • वैराग्य की प्रेरणा: शिव का 'दिगंबर' और 'भभूति' धारी रूप साधक को भौतिक संसार की नश्वरता की याद दिलाता है और वैराग्य की भावना जागृत करता है।
  • शरणगति भाव: भजन के अंतिम छंदों में पूर्ण समर्पण (शरणागति) का भाव है, जो भक्ति मार्ग का सर्वोच्च शिखर माना जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे निम्नलिखित विधि और समय पर गाना या सुनना चाहिए:

  • सर्वोत्तम समय: ब्रह्ममुहूर्त (सुबह ४ से ६ बजे) या संध्या काल में इस भजन का श्रवण अत्यंत फलदायी होता है।
  • विशेष अवसर: महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत और शिवरात्रि के जागरण में इस भजन को सामूहिक रूप से गाया जाता है।
  • गायन की विधि: इसे शांत चित्त होकर, आंखें बंद करके भगवान शिव के ध्यानमग्न रूप का स्मरण करते हुए गाना चाहिए। डमरू और मंजीरे की थाप पर इसका गायन इसके आध्यात्मिक प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान शिव (महादेव) और माता पार्वती (आदिशक्ति) को समर्पित है। भारतीय उपमहाद्वीप की निर्गुण संत परंपरा, विशेष रूप से कबीर पंथ और नाथ संप्रदाय के संतों ने इस प्रकार के भजनों की रचना की है। इन संतों ने लोकभाषा का उपयोग करके आम जनमानस तक वेदों और उपनिषदों के कठिन ज्ञान को अत्यंत सरल रूप में पहुँचाया।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना लोक-परंपरा के अंतर्गत हुई है। सदियों से भारत के ग्रामीण अंचलों में महिलाएं कुएं या नदी से पानी भरते समय लोकगीत गाती थीं। संतों ने इसी दैनिक जीवन की गतिविधि को आध्यात्मिक रूपक में बदल दिया। "चली पनिया भरण शिव नार" इसी लोक-चेतना और आध्यात्मिक क्रांति का परिणाम है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक और लिखित रूप में हम तक पहुँची है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा लोकभाषा (अवधी और भोजपुरी मिश्रित हिंदी) है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल, सुबोध और गेय (गाने योग्य) है। इसमें 'रूपक अलंकार' (Metaphor) का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया है। 'गागर', 'डगरिया', 'भरतार' जैसे शब्द लोक-जीवन से सीधे जुड़े हुए हैं, जो श्रोता के हृदय में तुरंत उतर जाते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. अहंकार का त्याग: सोने की गागर (अहंकार) को खाली करके ही उसमें ईश्वर की कृपा का जल भरा जा सकता है।
  2. विषमताओं में समता: शिव विष पीकर भी शांत रहते हैं। हमें भी जीवन के दुखों और कठिनाइयों (विष) को धैर्यपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
  3. परम सत्य की खोज: संसार के सभी मार्ग अंततः ईश्वर की ओर ही जाते हैं। हमें अपने कर्मों को निष्काम भाव से करना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ (Spiritual Context)
पनिया भरण पानी भरने जाना साधना और पुण्य कर्मों का संचय करना
शिव नार शिव की पत्नी (पार्वती) परमात्मा से मिलन के लिए आतुर जीवात्मा
त्रिपुरार त्रिपुरासुर का वध करने वाले (शिव) तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे परमेश्वर
दिगंबर दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं पूर्ण वैराग्य और असीमित चेतना
भरतार पति या स्वामी सृष्टि का पालनहार और रक्षक
बाघंबर धारी बाघ की खाल धारण करने वाले इंद्रियों और वासनाओं पर विजय प्राप्त करने वाले

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. "चली पनिया भरण शिव नार, डगरिया रोक रहे त्रिपुरार..."
जीवात्मा जब साधना के मार्ग पर आगे बढ़ती है, तो स्वयं भगवान शिव उसके मार्ग में आकर खड़े हो जाते हैं ताकि वह संसार की ओर न जाकर अंतर्मुखी हो सके।

२. "हाथ में सोहे सोने की गागर, सिर पर धरे गंगा की धार..."
साधक का शरीर रूपी गागर अत्यंत मूल्यवान (सोने के समान) है, और उसके मस्तक में ज्ञान रूपी गंगा प्रवाहित हो रही है। परंतु जब तक मार्ग में शिव (ज्ञान) नहीं मिलते, तब तक यात्रा अधूरी है।

३. "अंग भभूति गले मुंडमाला, हाथ त्रिशूल और डमरू वाला..."
यहाँ शिव के दिव्य और वैराग्यपूर्ण रूप का वर्णन है। वे भस्म लगाकर संसार की नश्वरता को दर्शाते हैं और डमरू बजाकर सृष्टि के स्पंदन (नाद ब्रह्म) का सृजन करते हैं।

४. "कहे पार्वती सुनो हे स्वामी, तुम हो घट-घट के अंतर्यामी..."
जीवात्मा को जब यह बोध होता है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं बल्कि उसके अपने भीतर (घट-घट में) विराजमान हैं, तो वह पूर्णतः आत्मसमर्पण कर देती है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात भगवान शिव के इस कल्याणकारी मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

॥ महामृत्युंजय मंत्र ॥

ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

इसके साथ ही माता पार्वती की स्तुति के लिए पार्वती स्तोत्रम का पाठ भी अत्यंत फलदायी होता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम चली पनिया भरण शिव नार निर्गुण भजन
मुख्य देवी-देवता भगवान शिव एवं माता पार्वती
काव्य शैली / परंपरा निर्गुण भक्ति एवं लोकगीत परंपरा
भाषा लोकभाषा (अवधी / भोजपुरी मिश्रित हिंदी)
मुख्य भाव वैराग्य, समर्पण और अद्वैत भाव
उपयुक्त अवसर महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, शिव पूजा, सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश जीवात्मा (पार्वती) और परमात्मा (शिव) का मिलन है। यह दर्शाता है कि सांसारिक कार्यों को करते हुए भी हमारा ध्यान ईश्वर की ओर होना चाहिए।

'पनिया भरण' साधना, सत्कर्म और भक्ति रूपी जल को जीवन रूपी गागर में संचित करने का प्रतीक है।

यह भजन भारत की प्राचीन निर्गुण भक्ति और लोक-परंपरा से संबंधित है, जिसे संतों ने जनमानस को जगाने के लिए रचा था।

हाँ, महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर और सावन के सोमवारों में इस भजन का गायन और श्रवण अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है।

'दिगंबर' का अर्थ है "दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं"। यह भगवान शिव के उस रूप को दर्शाता है जो पूर्णतः अनासक्त, मुक्त और अनंत हैं।

इस भजन के साथ डमरू, मंजीरा, ढोलक और हारमोनियम का प्रयोग करने से भजन का आध्यात्मिक प्रभाव और माधुर्य बढ़ जाता है।

भस्म इस बात का प्रतीक है कि यह भौतिक शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। यह साधक को अहंकार से दूर रहने और वैराग्य अपनाने की प्रेरणा देती है।

इसके नियमित श्रवण से मानसिक शांति मिलती है, सांसारिक तनाव कम होता है और भगवान शिव के चरणों में अनन्य प्रीति जागृत होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी विद्वत मंडली ने इस भजन के पारंपरिक पाठ, लोक-संदर्भों और आध्यात्मिक प्रतीकों का गहन विश्लेषण करके इसे तैयार किया है। इस भजन का उद्देश्य पाठकों को न केवल इसके शाब्दिक अर्थ से परिचित कराना है, बल्कि इसके पीछे छिपे वेदांत के गूढ़ रहस्यों को भी उजागर करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव पुराण: भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य संवाद और लीलाओं का शास्त्रीय आधार।
  • भारतीय लोक साहित्य: उत्तर भारत की पारंपरिक निर्गुण भजन और साखी परंपरा।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: निष्काम कर्मयोग और शरणागति भाव के सिद्धांत।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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