Parvati Stotram

Amrit Ki Barse Badariya || Full Bhajan Audio || Singer : Lakhbir Singh Lakkha || Mata Ji Ka Bhajan

81 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"अमृत की बरसे बदरिया" (Amrit Ki Barse Badariya) सनातन धर्म के अंतर्गत माँ भगवती (आदि शक्ति दुर्गा) की आराधना में गाया जाने वाला एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण भजन है। इस भजन को सुप्रसिद्ध भजन गायक लखबीर सिंह लख्खा (Lakhbir Singh Lakkha) ने अपनी ओजस्वी और मधुर आवाज में गाकर जन-जन के हृदय में स्थापित कर दिया है। यह भजन देवी दुर्गा के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्ण शरणागति और माँ के दिव्य दरबार की अलौकिक सुंदरता का सजीव चित्रण करता है। इस भजन का मुख्य भाव 'उत्सव' और 'आनंद' है, जहाँ भक्त माँ के मंदिर में बरसने वाली कृपा रूपी अमृत वर्षा का अनुभव करता है। नवरात्र के पावन पर्व, माता के जगराते, चौकी और नित्य संध्या वंदन के समय इस भजन का श्रवण और कीर्तन साधक के अंतःकरण में असीम शांति और भक्ति रस का संचार करता है। इस लेख में हम इस भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व, और इससे जुड़े रहस्यों का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ अमृत की बरसे बदरिया ॥

स्थायी (मुखड़ा):
अमृत की बरसे बदरिया, माँ के ऊंचे मंदिर में।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल कूक सुनावे री॥
अमृत की बरसे बदरिया, माँ के ऊंचे मंदिर में...

अंतरा १:
लाल चुनरिया चम चम चमके, माथे बिंदिया सोहे री।
हाथों में त्रिशूल विराजे, सिंह की सवारी सोहे री॥
अमृत की बरसे बदरिया, माँ के ऊंचे मंदिर में...

अंतरा २:
ऊंचे पर्वत भवन तुम्हारा, नीचे बहती गंगा री।
दर्शन करने जो भी आवे, मन पावे अति आनंदा री॥
अमृत की बरसे बदरिया, माँ के ऊंचे मंदिर में...

अंतरा ३:
ध्वजा नारियल भेंट चढ़ावे, हलवा पूरी का भोग लगे।
सच्चे मन से जो भी ध्यावे, उसके सारे कष्ट मिटे॥
अमृत की बरसे बदरिया, माँ के ऊंचे मंदिर में...

अंतरा ४:
लक्खा गावे महिमा तेरी, सुर और ताल मिलाके री।
शर्मा शीश झुकावे मैया, तेरे चरणों में आके री॥
अमृत की बरसे बदरिया, माँ के ऊंचे मंदिर में...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

"अमृत की बरसे बदरिया" भजन का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत गहरा है। यहाँ 'बदरिया' (बादल) केवल भौतिक बादलों का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह माँ भगवती की असीम कृपा, करुणा और वात्सल्य रूपी अमृत की वर्षा का सूचक है। जब कोई भक्त सच्चे हृदय से माँ के ऊंचे मंदिर (जो कि हमारे हृदय के उच्च चक्रों या आज्ञा चक्र का प्रतीक है) में प्रवेश करता है, तो उसके भीतर भक्ति का अमृत बरसने लगता है।

दादुर (मेंढक), मोर, पपीहा और कोयल का बोलना इस बात का प्रतीक है कि जब प्रकृति और पुरुष (ईश्वर और जीव) का मिलन होता है, तो संपूर्ण सृष्टि आनंदित हो उठती है। साधक का मन मयूर की भांति नाचने लगता है और उसकी वाणी कोयल की तरह मधुर हो जाती है। भजन के अंतराओं में माँ के दिव्य स्वरूप का वर्णन है। लाल चुनरी, माथे की बिंदिया, हाथों में त्रिशूल और सिंह की सवारी—ये सभी माँ दुर्गा की शक्ति, तेज, और ममता के प्रतीक हैं। सिंह की सवारी दर्शाती है कि माँ हमारे भीतर के पशुत्व (क्रोध, लोभ, अहंकार) को नियंत्रित करती हैं। त्रिशूल त्रितापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक कष्टों) के विनाश का प्रतीक है। गंगा का नीचे बहना ज्ञान और पवित्रता के प्रवाह को दर्शाता है। जो भी भक्त इस पावन दरबार में आता है, वह सांसारिक दुखों से मुक्त होकर परम आनंद को प्राप्त करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई अनूठी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से अलग और विशेष बनाती हैं:

  • भक्ति और प्रकृति का समन्वय: यह भजन केवल देवी की स्तुति नहीं करता, बल्कि प्रकृति के तत्वों (बादल, मोर, कोयल, गंगा) के माध्यम से ईश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।
  • नाद ब्रह्म का प्रभाव: लखबीर सिंह लख्खा की बुलंद और सुरीली आवाज में इस भजन का गायन श्रोता को एक अलग ही ध्यानमग्न अवस्था में ले जाता है।
  • शरण्य भाव: भजन में पूर्ण समर्पण की भावना है। भक्त माँ के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इसके श्रवण मात्र से घर और मन का वातावरण शुद्ध होता है तथा नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने का कोई निश्चित समय तो नहीं है, क्योंकि माँ की भक्ति हर क्षण कल्याणकारी है, परंतु कुछ विशेष अवसरों पर इसका महत्व और बढ़ जाता है:

  • नवरात्रि पर्व: आश्विन और चैत्र नवरात्रि के दौरान इस भजन का गायन और श्रवण अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • संध्या आरती व कीर्तन: संध्या काल में जब माँ की आरती की जाती है, उसके पश्चात इस भजन को सामूहिक रूप से गाने से घर में सुख-समृद्धि आती है।
  • श्रवण विधि: शांत चित्त होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके, माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष घी का दीपक जलाकर इस भजन को सुनना चाहिए। इससे एकाग्रता बढ़ती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से माँ दुर्गा (आदि शक्ति) को समर्पित है। सनातन परंपरा में माँ दुर्गा को शक्ति, बुद्धि, और मुक्ति की दात्री माना गया है। इस भजन के माध्यम से माँ के ममतामयी और महिषासुरमर्दिनी दोनों रूपों की परोक्ष वंदना की गई है। इसके साथ ही, इस भजन के मुख्य गायक लखबीर सिंह लख्खा हैं, जिन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा माता रानी के भजनों को समर्पित किया है। उनके भजनों में जो तड़प और पुकार है, वह सीधे श्रोताओं के दिलों को छूती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना प्रसिद्ध गीतकार और संगीतकार दुर्गा प्रसाद शर्मा (शर्मा जी) द्वारा की गई है। लखबीर सिंह लख्खा और शर्मा जी की जोड़ी ने ९० के दशक और २००० की शुरुआत में कई कालजयी भजनों का निर्माण किया। इस भजन की पृष्ठभूमि माँ वैष्णो देवी और माँ विंध्यवासिनी के ऊंचे पहाड़ों पर स्थित मंदिरों से प्रेरित है। पहाड़ों की चढ़ाई करते समय भक्तों के मन में जो उत्साह और उमंग होती है, उसी को इस भजन के शब्दों में पिरोया गया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-भाषा (खड़ी बोली और राजस्थानी/ब्रज का पुट) से प्रभावित है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'बदरिया', 'दादुर', 'पपीहा' लोक संस्कृति के अत्यंत निकट हैं। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक गेय पद है, जिसमें लय और ताल का अद्भुत सामंजस्य है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है, जहाँ कृपा को 'अमृत की वर्षा' और मन को 'मोर' के रूप में दर्शाया गया है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  • समर्पण ही सर्वोपरि है: ईश्वर की प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या की नहीं, बल्कि सरल और निष्कपट हृदय से किए गए समर्पण की आवश्यकता होती है।
  • प्रकृति का सम्मान: भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर की सत्ता प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है, इसलिए हमें प्रकृति से प्रेम करना चाहिए।
  • कष्टों का निवारण: जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, यदि हम माँ के चरणों में शीश झुकाते हैं, तो हमारे सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
बदरिया बादल / घटा माँ की कृपा और करुणा की वर्षा
दादुर मेंढक सृष्टि के छोटे से छोटे जीव का हर्षित होना
पपीहा / कोयल पक्षी विशेष भक्त की आत्मा की पुकार और मधुर वाणी
लाल चुनरिया लाल रंग का वस्त्र सौभाग्य, शक्ति और तेज का प्रतीक
त्रिशूल तीन शूलों वाला अस्त्र आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक दुखों का नाशक
आनंदा परम सुख / मोक्ष सांसारिक सुखों से परे ब्रह्मानंद की प्राप्ति

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

अमृत की बरसे बदरिया, माँ के ऊंचे मंदिर में...

भावार्थ: माँ के ऊंचे और पावन मंदिर में कृपा रूपी अमृत की वर्षा हो रही है। इस दिव्य वातावरण को देखकर प्रकृति के सभी जीव-जंतु जैसे दादुर, मोर, पपीहा और कोयल आनंदित होकर अपनी-अपनी बोलियों में माँ का यशगान कर रहे हैं।

लाल चुनरिया चम चम चमके, माथे बिंदिया सोहे री...

भावार्थ: माँ का श्रृंगार अत्यंत अल

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 27 Sep 2026

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