भक्त शिरोमणि मीराबाई के अनन्य कृष्ण प्रेम और आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा को व्यक्त करने वाला भजन "ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन" भारतीय भक्ति संगीत का एक अमर स्तम्भ है। यह पावन भजन केवल संगीतमय रचना नहीं, अपितु जीवात्मा का परमात्मा में पूर्ण विलय हो जाने की आध्यात्मिक गाथा है। जब मीराबाई के हृदय में गिरधर गोपाल के प्रति प्रेम का अंकुर फूटा, तो संसार के समस्त वैभव, राजसी भोग, लोक-लाज और कुल की मर्यादाएं उस दिव्य अनुराग के समक्ष तुच्छ हो गईं। इस भजन में माधुर्य भाव, अनन्य निष्ठा, पूर्ण शरणागति और वैराग्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। भजन सम्राट अनूप जलोटा जी के मधुर कंठ से गाए जाने के बाद इस पद ने विश्वभर के कृष्ण भक्तों के अंतःकरण को झंकृत किया है। प्रभात वेला, संकीर्तन, सत्संग और जन्माष्टमी जैसे पावन पर्वों पर इस भजन का श्रवण एवं कीर्तन साधक के चित्त को शांत कर प्रभु चरणों में एकाकार करने का सामर्थ्य रखता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन ॥
(दोहा)
है आँख वो जो श्याम का दर्शन किया करे,
है शीश वो जो प्रभु के चरण पर झुका करे।
कहे न कभी किसी का बुरा यह ज़ुबां सदा,
प्रभु नाम का ही हर पल सुमिरन किया करे॥
(मुखड़ा)
ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन,
वो तो गली-गली हरी गुण गाने लगी।
महलों में पली, बन के जोगन चली,
मीरा रानी दिवानी कहाने लगी॥
ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन...
(अंतरा 1)
कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं,
मीरा गोविंद गोपाल गाने लगी।
बैठी संतों के संग, रंगी मोहन के रंग,
मीरा अपने प्रभु को रिझाने लगी।
लोक-लाज को खोकर, प्रेम-प्याली को पीकर,
साधु-संगत में निर्भय समाने लगी॥
ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन...
(अंतरा 2)
राणा ने भेजा विष का प्याला,
हँस के मीरा ने पी डाला।
विष को भी अमृत बना दिया,
मेरे साँवरे ने लाज बचा ली।
पिटारी में भेजा काला नाग राणा ने,
मीरा ने हार समझ गले लगा लिया।
नाग बन गया शालिग्राम का हार,
प्रभु ने दासी का मान बढ़ा दिया॥
ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन...
(अंतरा 3)
चरणामृत पिया, नाम-सुमिरन किया,
मीरा गिरधर के रंग में रंगी ही रही।
बाँधी पाँवों में घुंघरू, नाची मीरा छम-छम,
भक्ति की गंगा धरा पर बहाने लगी।
महलों की रानी बन गई जोगनिया,
गिरधर नागर की दासी कहाने लगी॥
ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन,
वो तो गली-गली हरी गुण गाने लगी॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का प्रत्येक अंतरा प्रेमलक्षणा भक्ति के रहस्य को उद्घाटित करता है। आरंभिक दोहे में मानव जीवन के इंद्रिय सुखों की सार्थकता भगवान की सेवा में निरूपित की गई है। कवि कहते हैं कि नेत्र वही धन्य हैं जो केवल भगवान श्रीकृष्ण के सांवले सलोने रूप का दर्शन करें, शीश वही सार्थक है जो अभिमान त्यागकर प्रभु के श्रीचरणों में नतमस्तक हो और वाणी वही पवित्र है जो परनिंदा से मुक्त रहकर अहर्निश प्रभु नाम का संकीर्तन करे। यह दोहा साधक को बाह्य प्रपंचों से हटाकर अंतर्मुखी भक्ति की ओर उन्मुख करता है।
मुखड़े और प्रथम अंतरे में मीराबाई की उस अलौकिक दशा का वर्णन है जिसे अध्यात्म में 'उन्मनी अवस्था' अथवा 'भावावेश' कहा जाता है। जब हृदय में ईश्वर का सच्चा प्रेम जागृत होता है, तब संसार के समस्त सांसारिक भय समाप्त हो जाते हैं। मीराबाई जो राजमहल के सुख-सुविधाओं और ऐश्वर्य में पली-बढ़ी थीं, उन्होंने प्रभु प्रेम के लिए जोगन का वेश धारण कर लिया। वे एकतारा लेकर गलियों में हरि के गुण गाने लगीं। सांसारिक दृष्टि से लोगों ने उन्हें 'दीवानी' और 'कुलनाशिनी' कहा, परंतु मीरा के लिए गोविंद ही उनका सर्वस्व थे। संतों की संगति में बैठकर वे श्रीकृष्ण के रंग में पूर्णतः रंग गईं।
द्वितीय अंतरा मीराबाई की अडिग श्रद्धा और परमात्मा की भक्तवत्सलता की पराकाष्ठा को दर्शाता है। सांसारिक मर्यादा और कुल के झूठे अहंकार से ग्रस्त होकर जब मेवाड़ के राणा ने मीरा को समाप्त करने के लिए हलाहल विष का कटोरा भेजा, तो मीरा ने संशय रहित होकर उसे प्रभु का चरणामृत समझकर पी लिया। श्रीकृष्ण ने अपने अनन्य भक्त की रक्षा करते हुए उस विष को अमृत में रूपांतरित कर दिया। इसी प्रकार पिटारे में भेजा गया विषैला सर्प प्रभु कृपा से शालिग्राम और पुष्पमाला बन गया। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि जिसके हृदय में भगवान का वास है, उसका अनिष्ट संसार की कोई भी शक्ति नहीं कर सकती।
तृतीय अंतरे में मीराबाई का नृत्य और समर्पण जीवात्मा के मोक्ष का उत्सव बन जाता है। पाँवों में घुँघरू बाँधकर मीरा का नाचना किसी लौकिक प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि अपने आराध्य गिरधर नागर के सम्मुख अपने अहंकार को मिटाने का प्रतीक है। मीरा संसार को यह सिखाती हैं कि परमात्मा की प्राप्ति ज्ञान के भारी-भरकम सिद्धांतों से नहीं, अपितु सरल, निष्कपट और सर्वस्व समर्पित प्रेम से होती है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- प्रेमलक्षणा भक्ति का शिखर: यह भजन नवधा भक्ति के अंतर्गत 'आत्मनिवेदन' और 'कीर्तन' का सर्वोत्तम दृष्टांत प्रस्तुत करता है।
- भयमुक्ति और निर्भयता: संसार के राजदंड और मृत्यु के भय पर ईश्वरीय विश्वास की विजय को यह भजन स्पष्ट करता है।
- वैराग्य का प्रत्यक्ष दर्शन: राजमहल, आभूषण और राजसी प्रतिष्ठा को तिनके के समान त्यागकर साधु-संगत को चुनना सांसारिक असारता को प्रमाणित करता है।
- चमत्कार नहीं, कृपा का प्रमाण: विष का अमृत बनना और नाग का शालिग्राम रूप लेना केवल चमत्कार नहीं, अपितु पूर्ण शरणागति पर प्रभु की वात्सल्य कृपा की पुष्टि है।
- संगीत एवं भाव की त्रिवेणी: इस भजन का शास्त्रीय और लोक धुनों पर आधारित गायन मन के तनाव को दूर कर चित्त को भक्ति रस में निमग्न कर देता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि प्रभु संकीर्तन के लिए सभी काल शुभ माने गए हैं, तथापि इस भजन के गायन एवं श्रवण के लिए विशेष विधियां साधक के अनुभव को गहरा बनाती हैं:
- प्रातःकाल एवं संध्या आरती: ब्रह्ममुहूर्त में अथवा संध्या काल के पूजन के उपरांत इस भजन का शांत मन से गायन चित्त की वृत्तियों को एकाग्र करता है।
- सत्संग एवं संकीर्तन: सामूहिक संकीर्तन, प्रभात फेरी और एकादशी के जागरण में करताल एवं झांझ के साथ इसका गायन वातावरण को कृष्णमय बना देता है।
- जन्माष्टमी एवं मीरा जयंती: श्री कृष्ण जन्माष्टमी, शरद पूर्णिमा और मीरा स्मृति उत्सव के पावन अवसरों पर इसका पाठ एवं गायन विशेष फलदायी माना जाता है।
- गायन की सही विधि: इस भजन को गाते समय शब्दों के साथ-साथ हृदय में मीरा के त्याग और भगवान श्रीकृष्ण के सामीप्य का ध्यान करना चाहिए। यदि आप नित्य पूजा में लड्डू गोपाल की सेवा पूजा विधि का पालन करते हैं, तो बाल गोपाल के सम्मुख यह भजन अत्यंत भावपूर्ण सेवा बन जाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह पावन भजन मूलतः दो महान आध्यात्मिक सत्ताओं के दिव्य संबंध पर केंद्रित है:
1. भगवान श्री गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण): मीराबाई के आराध्य वही नटवर नागर श्रीकृष्ण हैं जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। मीरा के लिए वे केवल देव नहीं, अपितु उनके नित्य स्वामी, प्रियतम और परम आश्रय हैं।
2. भक्त शिरोमणि मीराबाई: 16वीं शताब्दी में राजस्थान के मेड़ता में जन्मी मीराबाई भक्ति आंदोलन की प्रमुख स्तम्भ हैं। संत रविदास (रैदास) जी को अपना गुरु मानने वाली मीराबाई ने सामाजिक विषमताओं और राजसी बंधनों को तोड़कर जिस निर्भीक भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया, वह आज भी करोड़ों भक्तों के लिए प्रेरणास्रोत है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
मीराबाई के अनेक पदों की परंपरा सदियों से राजस्थान, ब्रज, गुजरात और संपूर्ण उत्तर भारत के संतों और गायकों द्वारा गाई जाती रही है। "ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन" भजन मीराबाई के पारंपरिक पदों, लोक-काव्य और उनके जीवन चरित की अमर घटनाओं को संजोकर एक सुगठित गीत के रूप में तैयार किया गया। आधुनिक काल में इस भजन को भजन सम्राट अनूप जलोटा ने अपनी विशिष्ट शैली और भावपूर्ण स्वर देकर जन-जन तक पहुँचाया। यह रचना मीरा के जीवन संघर्ष, चित्तौड़ राजघराने में उन पर हुए अत्याचार, विषपान की सत्य घटना और अंततः द्वारिका में रणछोड़ जी की मूर्ति में उनके समा जाने की आध्यात्मिक यात्रा का निचोड़ है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, प्रवाहमयी हिंदी है जिसमें ब्रजभाषा, राजस्थानी और अवधी के मधुर शब्दों का सहज सम्मिश्रण है।
- काव्य रस: इसमें मुख्य रूप से 'भक्ति रस' और 'शांत रस' की प्रधानता है, जबकि अंतर्निहित भाव 'माधुर्य भाव' (मधुरा भक्ति) का है।
- अलंकार एवं बिंब: 'विष का प्याला अमृत होना', 'नाग का शालिग्राम बनना' और 'पाँवों में घुँघरू बाँधना' जैसे सशक्त बिंब साधक की आंतरिक निष्ठा और रूपांतरण को दर्शाते हैं।
- गेयता एवं लय: भजन की लयबद्धता इतनी सहज है कि शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञों से लेकर सामान्य जन तक इसे सुगमता से गा सकते हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
मीराबाई का यह भजन केवल श्रवण का आनंद नहीं देता, बल्कि आधुनिक जीवन के लिए गंभीर शिक्षाएं प्रदान करता है:
- दृढ़ संकल्प एवं निष्ठा: संसार चाहे कितना भी विरोध करे, यदि आपका मार्ग सत्य और ईश्वर के प्रति समर्पित है, तो मार्ग से कभी विचलित न हों।
- आंतरिक सुख बनाम बाह्य विलासिता: महलों के वैभव में वह शांति नहीं थी जो मीरा को धूल भरे संतों के संग में मिली। सच्चा सुख बाह्य वस्तुओं में नहीं, अंतरात्मा के प्रभु से जुड़ने में है।
- अहंकार का त्याग: जब तक व्यक्ति लोक-लाज, पद और प्रतिष्ठा के झूठे दंभ में बंधा रहता है, तब तक ईश्वर की पराभक्ति प्राप्त नहीं हो सकती।
- सहनशीलता और क्षमा: मीरा ने राणा के अत्याचारों का उत्तर कभी क्रोध या प्रतिशोध से नहीं दिया, बल्कि उन्होंने सब कुछ अपने ठाकुर जी पर छोड़ दिया।
- सत्संग का महत्व: संतों के सान्निध्य में ही भक्ति का रंग पक्का होता है। जैसा संग होगा, वैसा ही मन का रंग होगा। यदि आप नियमित रूप से श्री कुंजबिहारी की आरती और भगवन्नाम का आश्रय लेते हैं, तो चित्त के विकार स्वतः शांत होने लगते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक एवं संदर्भगत अर्थ |
|---|---|---|
| लगन | गहरी प्रीति, धुन, एकाग्रता | संसार के समस्त विषयों को भूलकर केवल परमात्मा में मन का लग जाना। |
| मगन | लीन, आनंदविभोर, आत्मविस्मृत | सांसारिक चेतना से ऊपर उठकर भगवद् प्रेम के आनंद में डूब जाना। |
| जोगन | तपस्विनी, संन्यासिन, वैरागिन | संसार के राजसी सुखों का त्याग कर वैराग्य धारण करने वाली साधिका। |
| गिरधर नागर | श्रीकृष्ण, गोवर्धनधारी चतुर प्रभु | गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले और भक्तों के संकट हरने वाले नटवर। |
| लोक-लाज | संसार की मर्यादा, सामाजिक संकोच | संसार के झूठे मान-अपमान और बंधनों की परवाह न करना। |
| शालिग्राम | भगवान विष्णु का पाषाण स्वरूप | विषैले नाग का प्रभु कृपा से पवित्र पूजनीय विग्रह में परिवर्तित होना। |
| चरणामृत | प्रभु चरणों का पावन जल | ईश्वर की कृपा रूपी प्रसाद जो हलाहल विष को भी निष्प्रभावी कर देता है। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
पंक्ति: "ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन, वो तो गली-गली हरी गुण गाने लगी।"
भावार्थ: मीराबाई के अंतःकरण में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति ऐसी अनन्य लगन लगी कि वे अपनी सुध-बुध खोकर मगन हो गईं। वे संकोच छोड़कर प्रत्येक गली और मार्ग में भगवान के पावन गुणों का संकीर्तन करने लगीं।
पंक्ति: "महलों में पली, बन के जोगन चली, मीरा रानी दिवानी कहाने लगी।"
भावार्थ: जो मीराबाई राजमहलों के रेशमी वस्त्रों और दास-दासियों के बीच पली थीं, वे भगवद् प्रेम के लिए वैरागिन बनकर निकल पड़ीं। संसार के अज्ञानी लोग उनके इस दिव्य अनुराग को समझ न सके और उन्हें 'दीवानी' की संज्ञा देने लगे।
पंक्ति: "बैठी संतों के संग, रंगी मोहन के रंग, मीरा अपने प्रभु को रिझाने लगी।"
भावार्थ: मीराबाई ने राजसी बंधनों का त्याग कर ज्ञानियों और साधुओं की संगति की। सत्संग के प्रभाव से वे सांवरे श्रीकृष्ण के प्रेम रंग में रंग गईं और अपने भजनों एवं पदों से प्रभु को प्रसन्न करने लगीं।
पंक्ति: "राणा ने भेजा विष का प्याला, हँस के मीरा ने पी डाला। विष को भी अमृत बना दिया, मेरे साँवरे ने लाज बचा ली।"
भावार्थ: मीरा के राजसी देवर राणा ने उनकी भक्ति से क्षुब्ध होकर प्राण लेने हेतु विष का प्याला भेजा। मीरा ने बिना किसी भय के प्रभु का स्मरण कर उसे पी लिया। भक्तवत्सल श्रीकृष्ण ने उस घातक विष को भी अमृत बनाकर अपनी दासी के प्राणों और सम्मान की रक्षा की।
पंक्ति: "बाँधी पाँवों में घुंघरू, नाची मीरा छम-छम, भक्ति की गंगा धरा पर बहाने लगी।"
भावार्थ: मीरा ने अपने चरणों में घुंघरू बांधकर अपने आराध्य के सम्मुख संपूर्ण समर्पण का नृत्य किया। उनका यह नृत्य लोक के लिए भक्ति रस की ऐसी पावन गंगा बन गया जिसमें स्नान कर आज भी साधक कृतार्थ होते हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
मीराबाई के अनन्य भाव को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता और भागवत के निम्नलिखित पावन श्लोकों का स्मरण अत्यंत प्रासंगिक है:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
(श्रीमद्भगवद्गीता - 18.65)
अर्थ: हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें लगा, मेरा अनन्य भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझको ही प्रणाम कर। ऐसा करने से तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा, यह मेरा सत्य वचन है क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है।
मीराबाई का प्रसिद्ध मूल उद्घोष मंत्र:
॥ मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई ॥
अर्थात मेरे केवल गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण ही एकमात्र आश्रय हैं, इस त्रिलोकी में उनके अतिरिक्त मेरा कोई अन्य नहीं है। साधक इस भाव के साथ हरे कृष्ण महामंत्र का अर्थ एवं जप विधि का अभ्यास करके भी इसी अनन्य प्रेम का अनुभव कर सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विषय विवरण | तथ्य एवं जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन |
| केंद्रीय आराध्य / देवता | भगवान श्री गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) |
| केंद्रीय भक्त / संत | भक्त शिरोमणि मीराबाई |
| प्रसिद्ध गायक | भजन सम्राट अनूप जलोटा (एवं पारंपरिक संत मंडली) |
| काव्य भाषा | सरल हिंदी (ब्रज एवं राजस्थानी प्रभाव सहित) |
| मुख्य भक्ति भाव | माधुर्य भाव, अनन्य शरणागति, प्रेमलक्षणा भक्ति |
| काव्य रस | भक्ति रस, शांत रस |
| उपयुक्त अवसर | प्रातः संकीर्तन, जन्माष्टमी, एकादशी, सत्संग एवं मीरा स्मृति उत्सव |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह आलेख भक्त शिरोमणि मीराबाई के प्रामाणिक जीवन चरित्र, नाभादास जी कृत 'भक्तमाल', श्रीमद्भागवत महापुराण के भक्ति दर्शन तथा पारंपरिक भजन संकलनों के गहन अध्ययन के उपरांत भक्तिलोक की संपादकीय परिषद द्वारा तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत भावार्थ और दार्शनिक व्याख्याएं सनातन धर्म की निष्काम भक्ति परंपरा पर आधारित हैं। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री भक्ति मार्ग के जिज्ञासुओं और साधकों के स्वाध्याय हेतु प्रस्तुत की गई है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्री भक्तमाल: श्री नाभादास जी विरचित (भक्त चरित्र एवं मीराबाई प्रसंग)।
- मीराबाई पदावली: आचार्य परशुराम चतुर्वेदी द्वारा संपादित प्रामाणिक पद संकलन।
- श्रीमद्भगवद्गीता: नवम एवं अष्टादश अध्याय (भक्तियोग एवं शरणागति दर्शन)।
- श्रीमद्भागवत महापुराण: एकादश स्कंध (उद्धव-गोपी संवाद एवं प्रेमलक्षणा भक्ति)।
संबंधित भजन एवं लेख
भगवान श्रीकृष्ण और भक्ति परंपरा के अन्य पावन भजनों व स्तुतियों के विस्तृत अध्ययन के लिए निम्नलिखित आलेखों का अवलोकन करें:
- भगवान श्रीकृष्ण की पूर्ण कृपा और दर्शन हेतु पढ़ें: अच्युतम केशवम कृष्ण दामोदरम लिरिक्स एवं भावार्थ
- कन्हैया की मनमोहक स्तुति के लिए देखें: मधुराष्टकम मूल पाठ एवं हिंदी अनुवाद
- नित्य पूजा में भगवान की आराधना हेतु: आरती कुंजबिहारी की - आरती पाठ व विधि
- नाम संकीर्तन की शक्ति जानने के लिए पढ़ें: हरे कृष्ण महामंत्र का अर्थ एवं जप विधि
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें